Prem Ka Roopantaran: Moh Se Mukti Ki Ek Heart Touching Spiritual Story

Sooraj Krishna Shastri
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✨ आध्यात्मिक दृष्टांत ✨

प्रेम का रूपांतरण: एक महारानी के शोक से ज्ञान तक की यात्रा

स्त्रियाँ स्वभाव से ही अत्यंत कोमल और भावुक होती हैं। उनका हृदय करुणा, ममता और असीम प्रेम का अथाह सागर होता है। इसलिए, जब भी उनके सौन्दर्य, वात्सल्य और गुणों का वर्णन किया जाता है, तो बड़े-बड़े विद्वान और कवि सर्वोत्तम और कोमल वस्तुओं (जैसे पुष्प, चाँदनी, और करुणा की नदियां) के अलंकार प्रस्तुत करते हैं। स्त्रियाँ साक्षात ममता और प्रेम का जीवंत रूप होती हैं।

किंतु जब यही प्रेम किसी एक व्यक्ति तक सीमित हो जाता है, तो वह 'मोह' बन जाता है, और जब यह असीम होकर पूरे ब्रह्मांड में फ़ैल जाता है, तो 'भक्ति' बन जाता है। इसी अद्वैत रहस्य को दर्शाने वाली यह कहानी आपको जीवन के एक नए और गहरे सत्य से परिचित कराएगी।

महारानी प्रमोदिनी और कुसुमलता

प्राचीन समय की बात है। प्रमोदिनी नामक एक अत्यंत रूपवती और बुद्धिमती राजकुमारी एक विशाल और समृद्ध नगरी की महारानी बनीं। जैसी वह नगरी सुंदर थी, वैसी ही उसकी रानी भी। सुंदरता, शील और गुणों में प्रमोदिनी का कोई सानी नहीं था। विवाह के कुछ समय पश्चात, महारानी प्रमोदिनी ने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया 'कुसुमलता' (कुसुमा)।

महारानी अपनी इकलौती पुत्री कुसुमा को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती थीं। उनके दिन का आरंभ कुसुमा के मुख-दर्शन से होता और रात्रि उसकी लोरियों के साथ। महारानी का संपूर्ण जीवन, उनका सारा प्रेम केवल अपनी पुत्री के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गया था।

वज्रपात और श्मशान का विलाप

किंतु विधाता का विधान और काल की गति बड़ी क्रूर होती है। जब कुसुमा मात्र पाँच वर्ष की वय (उम्र) में पहुँची, तो अकस्मात् एक असाध्य रोग ने उसे घेर लिया और वह नन्ही सी जान काल के गाल में समा गई। अपनी परमप्रिय पुत्री की इस अकाल मृत्यु से महारानी प्रमोदिनी भीतर तक हिल गईं। उनका पूरा संसार उजड़ गया। उन्हें हृदय में ऐसा लगा मानो किसी ने कठोर वज्रपात कर दिया हो।

राजमहल की दासियों और राजा ने महारानी को बहुत सांत्वना दी, लेकिन एक माँ का विलाप शांत न हुआ। कुसुम के दाह-संस्कार के बाद भी महारानी का मोहभंग नहीं हुआ। वह कई दिनों तक राजमहल त्याग कर उसी श्मशान भूमि में जाकर घंटों बैठी रहतीं और राख से लिपटकर अपनी पुत्री को याद कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगतीं। अपनी पुत्री के प्रति यह अंधा राग (मोह) उन्हें जीने नहीं दे रहा था और तिल-तिल कर मार रहा था।

महर्षि का आगमन और ज्ञानोपदेश

इसी तरह एक दिन शोकाकुल महारानी प्रमोदिनी श्मशान में बैठकर फूट-फूट कर रो रही थीं कि अचानक एक पहुंचे हुए, सिद्ध महर्षि वहाँ से गुजर रहे थे। जब महर्षि ने यह करुण दृष्टांत देखा, तो अचंभे से आस-पास खड़े लोगों से इसका कारण पूछने लगे। जब लोगों ने उन्हें महारानी की पूरी व्यथा बताई, तो महर्षि शांत भाव से प्रमोदिनी के पास गए और बोले:

“बेटी! जो इस संसार से जा चुके हैं, जिनकी देह पंचतत्व में विलीन हो चुकी है, उनके लिए इस प्रकार अनंत शोक करने से क्या लाभ? इस श्मशान में तो इससे पहले भी लाखों-करोड़ों लोग खाक हो चुके हैं। यदि उन सबके घरवाले भी तुम्हारी ही तरह नित्य यहाँ आकर रुदन करना और जीवन त्यागना शुरू कर दें, तो कल्पना करो, इस संसार की और तुम्हारे राज्य की क्या दशा होगी?"

महारानी आंसुओं से भरी आँखों से महर्षि की ओर देखने लगीं। महर्षि ने आगे कहा:

"तुमने भले ही अपनी परमप्रिय पुत्री को गंवा दिया हो, किंतु उसने अपनी कर्म-यात्रा पूरी करके अपनी मंजिल को पा लिया है। यह शरीर मात्र एक वस्त्र है। यदि तुम उस मोह में अपनी ही आत्मा को गंवाना नहीं चाहती, तो यह अज्ञान त्याग दो और 'आत्मानुसंधान' (स्वयं की खोज) करो। यदि तुम स्वयं को जान लोगी, तो तुम भी उस लोक (परमात्मा के लोक) को पा लोगी, जहाँ तुम्हारी परमप्रिय कुसुमा भी उस परम-पिता में विलीन है।"

प्रेम का वास्तविक रूपांतरण

सिद्ध महर्षि के उन अमृत वचनों ने महारानी प्रमोदिनी के हृदय पर पड़े अज्ञान और मोह के भारी परदे को क्षण भर में चीर दिया। उन्हें जीवन की नश्वरता और आत्मा की अमरता की बात समझ आ गई। उन्होंने उसी क्षण अपने उस अनंत दुःख से स्वयं को विलग (अलग) कर लिया।

राजमहल लौटकर उन्होंने प्रजापालन और आत्मानुसंधान को ही अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया। महारानी का वह अथाह प्रेम जो केवल अपनी पुत्री 'कुसुम' तक सीमित था, वह अब अपनी पूरी 'प्रजा' में चला गया। राज्य का हर बच्चा उन्हें अपनी कुसुमलता लगने लगा।

यही है प्रेम का वास्तविक रूपांतरण (Transformation)

"जब हम किसी व्यक्ति विशेष से प्रेम करते हैं, तब हमारे प्रेम का दायरा बहुत ही सीमित होता है (जो मोह कहलाता है)। लेकिन जब हम खुद से, अपनी आत्मा से, और अपनी आत्मा में स्थित परमात्मा से प्रेम करते हैं, तो हम इस ब्रह्मांड के कण-कण से प्रेम करने लगते हैं।"

जब हम खुद में स्थित परमात्मा को जान लेते हैं, तो हमें सभी ओर एक वही परमेश्वर नज़र आता है। हमारे शास्त्र इसी स्थिति को “आत्मवत सर्वभूतेषु” (सभी जीवों को अपने समान देखना) कहते हैं!

जो वैज्ञानिक एक परमाणु (Atom) के रहस्य को जान लेता है, उसके लिए यह सारा भौतिक संसार मात्र परमाणुओं से बना एक पुतला है। ठीक उसी तरह, जो ज्ञानी 'परमात्मा' को जान लेता है, उसके लिए यह सारा संसार उसी ईश्वर की ऊर्जा से परिपूर्ण है। इसलिए, मनुष्य के भीतर हमेशा उस शाश्वत ईश्वर को पाने की चाह होनी चाहिए। जहाँ चाह है, वहाँ राह अवश्य मिलती है!

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