Rukmini Haran Aur Vivah Katha: Prem Ka Sarvoch Shikhar (Dwarka Leela)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

रुक्मिणी हरण और विवाह: प्रेम और समर्पण का सर्वोच्च शिखर

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 52-54)

श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका लीलाओं में यदि कोई प्रसंग प्रेम, भक्ति और वीरता का अद्भुत संगम है, तो वह है 'रुक्मिणी हरण'। यह केवल एक राजकुमार द्वारा राजकुमारी के हरण की कथा नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा (रुक्मिणी) की परमात्मा (श्रीकृष्ण) से मिलने की व्याकुलता और भगवान द्वारा अपने अनन्य भक्त को स्वीकार करने की दिव्य लीला है। विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी साक्षात माता लक्ष्मी का अवतार थीं, जो पृथ्वी पर अपने स्वामी नारायण (श्रीकृष्ण) की संगिनी बनने आई थीं।

विदर्भ कुमारी का अदृश्य प्रेम और भाई का हठ

विदर्भ देश (वर्तमान बरार क्षेत्र) के राजा भीष्मक की एक परम सुंदरी और गुणवती पुत्री थीं— रुक्मिणी। राजा भीष्मक के महल में अक्सर नारद जी जैसे संत-महात्मा और अतिथि राजा आते रहते थे। रुक्मिणी जी बचपन से ही उनके मुख से भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप, उनके दिव्य गुणों, वीरता और ऐश्वर्य की चर्चा सुनती आ रही थीं।

सुनते-सुनते रुक्मिणी जी का मन श्रीकृष्ण में ही रम गया। उन्होंने बिना देखे ही श्रीकृष्ण को अपना पति मान लिया था। उन्होंने निश्चय कर लिया था कि— "यदि इस जीवन में मेरा विवाह होगा, तो केवल द्वारकाधीश श्रीकृष्ण से ही होगा, अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।"

राजा भीष्मक भी चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण से हो। किंतु रुक्मिणी का बड़ा भाई 'रुक्मी' श्रीकृष्ण से घोर ईर्ष्या करता था। वह कंस और जरासंध का मित्र था। उसने हठ पकड़ लिया कि रुक्मिणी का विवाह चेदिराज दमघोष के पुत्र 'शिशुपाल' (जो श्रीकृष्ण का शत्रु था) से ही होगा। विवाह की तिथि निश्चित हो गई और शिशुपाल बारात लेकर कुण्डिनपुर आ पहुँचा।

रुक्मिणी जी का प्रेम-संदेश (गुप्त पत्र)

जब रुक्मिणी जी को पता चला कि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध शिशुपाल से तय कर दिया गया है, तो वे अत्यंत व्याकुल हो उठीं। विवाह में केवल एक दिन शेष था। उन्होंने तुरंत एक विश्वासपात्र और वृद्ध ब्राह्मण को बुलाया और उनके हाथो भगवान श्रीकृष्ण को एक गुप्त पत्र (प्रेम-संदेश) भेजा।

यह पत्र श्रीमद्भागवत के सबसे सुंदर प्रसंगों में से एक है, जिसमें 7 श्लोक हैं। इसमें रुक्मिणी जी ने अपने हृदय की पीड़ा और श्रीकृष्ण के प्रति अपने पूर्ण समर्पण को व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा:

॥ श्लोक ॥
श्रुत्वा गुणान् भुवनसुन्दर शृण्वतां ते
निर्विश्य कर्णविवरैर्हरतोऽङ्गतापम् ।
रूपं दृशां दृशिमतामखिलार्थलाभं
त्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे ॥
(श्रीमद्भागवत 10.52.37)
अर्थ: रुक्मिणी जी लिखती हैं— "हे त्रिभुवन सुन्दर! आपके गुणों को सुनने वालों के कानों के रास्ते हृदय में प्रवेश करके आप उनके शरीर और मन के सारे ताप (दुःख) हर लेते हैं। आपका रूप नेत्रधारियों के लिए नेत्रों का सर्वोत्तम फल है। हे अच्युत! यह सब सुनकर मेरा लज्जाशील चित्त भी निर्लज्ज होकर सब कुछ छोड़कर केवल आप में ही प्रवेश कर गया है (मैंने आपको अपना पति स्वीकार कर लिया है)।"

रुक्मिणी जी ने आगे लिखा— "हे प्रभु! यदि आप मुझे शिशुपाल के हाथ में जाने देंगे, तो यह वैसा ही होगा जैसे सिंह का भाग गीदड़ ले जाए। मैं कल विवाह से पूर्व नगर के बाहर माँ अंबिका (पार्वती) के मंदिर में पूजा करने जाऊंगी। आप वहीं आकर मुझे स्वीकार करें, अन्यथा मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।"

श्रीकृष्ण का कुण्डिनपुर प्रस्थान

ब्राह्मण देवता ने द्वारका पहुँचकर जब भगवान श्रीकृष्ण को वह पत्र सुनाया, तो भक्तवत्सल भगवान का हृदय भर आया। उन्होंने ब्राह्मण से कहा— "हे विप्रवर! जिस प्रकार रुक्मिणी का चित्त मुझमें लगा है, वैसे ही मेरा मन भी उसी में लगा है। मैं जानता हूँ कि उसका भाई मुझसे द्वेष करता है। जैसे अग्नि को मथकर उसमें से शिखा निकाली जाती है, वैसे ही मैं उन दुष्ट राजाओं के बीच से अपनी रुक्मिणी को निकालकर लाऊंगा।"

भगवान उसी क्षण अपने सारथि दारुक को रथ तैयार करने का आदेश देकर, उस ब्राह्मण को साथ लेकर तीव्र गति से विदर्भ देश की ओर चल पड़े। इधर, जब बलराम जी को पता चला कि श्रीकृष्ण अकेले ही शत्रुओं के बीच गए हैं, जहाँ जरासंध, शिशुपाल और दन्तवक्त्र जैसे राजा सेना लेकर मौजूद हैं, तो वे भी यादवों की विशाल सेना लेकर कुण्डिनपुर के लिए निकल पड़े।

अंबिका मंदिर और रुक्मिणी हरण

विवाह की सुबह, रुक्मिणी जी उदास मन से, सखियों और अंगरक्षकों से घिरी हुई नगर के बाहर माँ अंबिका के मंदिर में पूजा करने गईं। उन्होंने माता गौरी से प्रार्थना की— "हे माँ! यदि मैंने सच्चे मन से आपकी आराधना की है, तो भगवान श्रीकृष्ण ही मुझे पति रूप में प्राप्त हों।"

पूजा करके जैसे ही रुक्मिणी जी मंदिर से बाहर निकलीं, उनका बायां अंग फड़कने लगा, जो शुभ शकुन था। तभी उन्होंने देखा कि गरुड़ध्वज रथ पर सवार, मेघवर्ण भगवान श्रीकृष्ण वहां आ पहुँचे हैं।

शिशुपाल, जरासंध और अन्य राजाओं की भारी सेना वहाँ मौजूद थी, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की तेजस्विता देखकर वे सब मोहित और स्तब्ध रह गए। भगवान ने सबके देखते-देखते, सिंह की भांति गर्जना करते हुए रुक्मिणी जी को हाथ पकड़कर अपने रथ में बैठा लिया और द्वारका की ओर चल पड़े। यह दृश्य देखकर शत्रुओं के होश उड़ गए।
भीषण युद्ध और रुक्मी का मान-मर्दन

जब जरासंध और शिशुपाल को होश आया, तो वे क्रोध से पागल हो गए— "धिक्कार है हम पर! हमारे देखते-देखते एक ग्वाला राजकन्या को हर ले गया।" वे सभी राजा अपनी सेना लेकर श्रीकृष्ण का पीछा करने लगे। तभी बलराम जी अपनी यादव सेना के साथ वहां आ पहुँचे और उन्होंने शत्रु सेना को गाजर-मूली की तरह काटना शुरू कर दिया। भयभीत होकर जरासंध आदि राजा भाग खड़े हुए।

किंतु, रुक्मिणी का अहंकारी भाई 'रुक्मी' यह अपमान सहन नहीं कर सका। उसने प्रतिज्ञा की— "या तो मैं कृष्ण को मारकर रुक्मिणी को वापस लाऊंगा, या फिर कुण्डिनपुर में प्रवेश नहीं करूँगा।" वह अकेला ही श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा और उन्हें अपशब्द कहने लगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उसके सारे बाण काट दिए और उसे पकड़कर बांध लिया। वे उसका वध करने ही वाले थे कि रुक्मिणी जी ने रोते हुए भगवान के चरण पकड़ लिए और अपने भाई के प्राणों की भीख मांगी। भगवान ने उसे छोड़ा, लेकिन बलराम जी के कहने पर उसका मान-मर्दन करने के लिए उसके सिर के आधे बाल और आधी मूंछें मूंड दीं और उसे विरूप करके छोड़ दिया। रुक्मी लज्जित होकर वहीं भोजकट नामक नगर बसाकर रहने लगा, क्योंकि वह अपनी प्रतिज्ञा हार चुका था।

द्वारका में भव्य विवाह

भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी जी को लेकर द्वारका पहुँचे। पूरी द्वारका नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया था। घर-घर में मंगल गीत गाए जा रहे थे। सभी यदुवंशी इस बात से अत्यंत प्रसन्न थे कि साक्षात लक्ष्मी जी ही रुक्मिणी के रूप में उनके घर आई हैं।

द्वारका में वैदिक रीति-रिवाज से, अग्नि को साक्षी मानकर भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी का भव्य पाणिग्रहण संस्कार (विवाह) संपन्न हुआ। यह विवाह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं था, बल्कि यह भक्त के पूर्ण 'समर्पण' और भगवान की 'शरणागति' का सर्वोच्च उदाहरण था, जो युगों-युगों तक भक्तों को प्रेरित करता रहेगा।

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