Mrut Brahmin Putron Ko Wapas Lana Aur Arjun Ka Garv Bhang (Bhagwat Puran)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

मृत ब्राह्मण पुत्रों को वापस लाना और अर्जुन का गर्व-भंग: ब्रह्मांड के पार महाविष्णु के दर्शन

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 89)

मनुष्य का अहंकार इतना सूक्ष्म होता है कि बड़े-बड़े योगियों और शूरवीरों को भी पता नहीं चलता कि कब यह उनके भीतर प्रवेश कर गया। महाभारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर और भगवान श्रीकृष्ण के सखा 'अर्जुन' को भी एक बार अपने 'गांडीव' और 'बाहुबल' पर अत्यंत गर्व हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि वे अपने बाणों से किसी की भी रक्षा कर सकते हैं। अर्जुन के इसी अहंकार को तोड़ने और संसार को यह बताने के लिए कि 'परमात्मा की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता', भगवान श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत अलौकिक लीला रची। यह लीला थी— द्वारका के एक ब्राह्मण के मृत पुत्रों को वापस लाना।

1. द्वारका के ब्राह्मण का दुःख और यदुवंशियों को उलाहना

द्वारका में एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहता था। उसका भाग्य बड़ा विचित्र था। जब भी उसकी पत्नी किसी शिशु को जन्म देती, जन्मते ही वह बालक भूमि पर गिरते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता। दुःखी होकर वह ब्राह्मण अपने मृत बालक को राजा उग्रसेन और भगवान श्रीकृष्ण की राजसभा के दरवाजे पर रख देता और रो-रोकर विलाप करता।

वह ब्राह्मण छाती पीटकर कहता— "यह राजा क्रूर है, लालची है और ब्राह्मणों का द्वेषी है। जिस राज्य का राजा पापी और अधर्मी होता है, उसी राज्य की प्रजा दरिद्र होती है और उसके बच्चे अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं।"

इस प्रकार, लगातार आठ (8) बार उस ब्राह्मण के पुत्र उत्पन्न होते ही मर गए। भगवान श्रीकृष्ण, जो सर्वज्ञ हैं, सब कुछ सुनते और देखते हुए भी मौन रहते थे। वे इस घटना के माध्यम से एक बहुत बड़ी लीला की भूमिका तैयार कर रहे थे।

2. अर्जुन का आगमन और अहंकार भरा वचन

जब उस ब्राह्मण की पत्नी 9वीं बार गर्भवती थी, तब किसी कार्यवश अर्जुन द्वारका आए हुए थे। वे राजसभा में श्रीकृष्ण के पास ही बैठे थे। तभी वह ब्राह्मण पुनः रोता-बिलखता हुआ अपने नवें मृत पुत्र को लेकर द्वारका के राजद्वार पर आया और भगवान को कोसने लगा।

ब्राह्मण का विलाप सुनकर अर्जुन का क्षत्रिय रक्त खौल उठा। उन्हें अपने बाहुबल पर अत्यंत अभिमान था। अर्जुन ब्राह्मण के पास गए और बोले— "हे ब्राह्मण देवता! क्या इस नगर में कोई भी धनुर्धर ऐसा नहीं है जो आपके पुत्र की रक्षा कर सके? जहाँ ब्राह्मणों को इस प्रकार रोना पड़े, वहां के क्षत्रिय तो जीते जी मुर्दे के समान हैं।"

अहंकार में अंधे होकर अर्जुन ने कहा— "हे विप्रवर! आप चिंता न करें। मैं प्रद्युम्न या अनिरुद्ध नहीं हूँ, मैं साक्षात 'अर्जुन' हूँ, जिसके 'गांडीव' की टंकार से तीनों लोक कांपते हैं। इस बार मैं स्वयं आपके प्रसूति-गृह (डिलीवरी रूम) की रक्षा करूँगा। यदि मैं आपके पुत्र की रक्षा न कर सका, तो यह मेरी प्रतिज्ञा है कि मैं जलती हुई चिता में कूदकर अपने प्राण दे दूँगा।"

ब्राह्मण को अर्जुन की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उसने कहा— "जहाँ साक्षात श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न मेरे पुत्रों की रक्षा नहीं कर सके, वहाँ तुम क्या करोगे? व्यर्थ में अपनी जान जोखिम में मत डालो।" परंतु अर्जुन अपने अहंकार और प्रतिज्ञा पर अड़े रहे।

3. बाणों का पिंजरा और नवजात शिशु का रहस्यमयी ढंग से गायब होना

जब ब्राह्मण की पत्नी के प्रसव का समय आया, तो अर्जुन अपने गांडीव धनुष और अक्षय तरकश के साथ ब्राह्मण के घर पहुँच गए। उन्होंने कई दिव्य मंत्रों का उच्चारण करते हुए, जल, थल और आकाश—सभी ओर से प्रसूति-गृह को अपने बाणों से ढक दिया। उन्होंने बाणों का एक ऐसा अभेद्य पिंजरा बना दिया, जिसे हवा भी पार नहीं कर सकती थी।

ब्राह्मण की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। बच्चा रोया, परंतु पलक झपकते ही वह बालक सशरीर (शरीर सहित) आकाश में न जाने कहाँ अदृश्य हो गया! वहाँ केवल सन्नाटा रह गया।

ब्राह्मण ने छाती पीटते हुए अर्जुन का उपहास किया— "अरे झूठे क्षत्रिय! मैंने पहले ही कहा था कि तेरी डींगें व्यर्थ हैं। जहाँ कृष्ण और बलराम कुछ नहीं कर सके, वहाँ तेरा गांडीव क्या कर लेगा? धिक्कार है तेरे बाहुबल पर!"

4. अर्जुन की हताशा और आत्मदाह की तैयारी

ब्राह्मण के वचनों से अर्जुन का सारा अहंकार टूट गया। वे अत्यंत लज्जित हुए। अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए वे तुरंत यमलोक (यमराज के पास) गए। वहाँ बालक नहीं था। उन्होंने स्वर्ग, पाताल, इंद्रलोक, वरुणलोक, पाताल के नागलोक— पूरे ब्रह्मांड का कोना-कोना छान मारा, परंतु उस ब्राह्मण पुत्र का कहीं भी पता नहीं चला।

निराश होकर अर्जुन द्वारका लौटे। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार, उन्होंने एक विशाल चिता तैयार की और अग्नि में कूदकर आत्मदाह करने के लिए जैसे ही आगे बढ़े, भगवान श्रीकृष्ण ने उनका हाथ पकड़ लिया।

भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा— "सखा! इतनी जल्दी क्या है? क्षत्रियों को अपना जीवन इस प्रकार व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। तुम्हारा गांडीव और बाहुबल संसार में श्रेष्ठ है, परंतु यह मत भूलो कि परम-सत्ता (ईश्वर) की इच्छा के बिना कोई अस्त्र काम नहीं करता। आओ मेरे रथ पर बैठो, मैं तुम्हें उस ब्राह्मण के पुत्र दिखाता हूँ।"

5. ब्रह्मांड के पार महा-यात्रा: सुदर्शन चक्र का प्रकाश

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने दिव्य रथ पर बैठाकर पश्चिम दिशा की ओर उड़े। यह कोई साधारण यात्रा नहीं थी। रथ ने पृथ्वी को पार किया, सातों समुद्रों को लांघा, सप्त द्वीपों को पार करते हुए वे लोकालोक पर्वत (वह पर्वत जो प्रकाश और अंधकार को बांटता है) के पार पहुँच गए।

इसके बाद अत्यंत घोर अंधकार (महातम) आ गया, जहाँ सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश भी नहीं पहुँच सकता था। अर्जुन के लिए कुछ भी देख पाना असंभव हो गया और उनके घोड़े (शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक) रुकने लगे।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने 'सुदर्शन चक्र' को आज्ञा दी। कोटि-सूर्यों के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र रथ के आगे-आगे चलने लगा और वह घोर अंधकार ऐसे छंट गया जैसे सूर्य के उदय होने पर रात छंट जाती है।

अंधकार पार करने के बाद अर्जुन ने देखा कि एक अत्यंत दिव्य, चकाचौंध करने वाला अनंत प्रकाश फैला हुआ है। यह साक्षात 'ब्रह्म-ज्योति' थी। अर्जुन की आंखें चुंधिया गईं। इसके आगे एक अत्यंत विशाल, लहरें मारता हुआ 'कारण-जल' (Causal Ocean) था, जिसमें भयंकर तूफान उठ रहे थे।

6. महाविष्णु (भूम-पुरुष) के दर्शन और पुत्रों की प्राप्ति

उस कारण-जल के भीतर अर्जुन ने एक अत्यंत अद्भुत दृश्य देखा। वहां हजार फणों वाले साक्षात अनंत शेषनाग अपनी शय्या बिछाए हुए थे। उन शेषनाग की शय्या पर एक अत्यंत विशाल, नीलमणि के समान चमकते हुए, चतुर्भुज पुरुष विराजमान थे। वे साक्षात 'महाविष्णु' (भूम-पुरुष) थे, जो समस्त ब्रह्मांडों के कारण हैं।

भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने रथ से उतरकर उन भूम-पुरुष को प्रणाम किया। (यहाँ यह जानना अत्यंत रहस्यमयी है कि श्रीकृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम हैं, परंतु वे अपनी ही एक कला—महाविष्णु—को प्रणाम करके लीला कर रहे थे)।

॥ महाविष्णु का रहस्योद्घाटन ॥
द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षया
मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये ।
अवतीर्णांशागिह भागतान् किल
त्वरयमानान् द्रष्टुमिहागतौ युवाम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.89.58)
अर्थ: महाविष्णु ने मुस्कुराते हुए कहा— "हे कृष्ण और अर्जुन! मैंने तुम दोनों के दर्शन करने की इच्छा से ही उस ब्राह्मण के पुत्रों को यहाँ अपने पास छिपा लिया था। तुम दोनों मेरे ही अंश 'नर और नारायण' हो, जो पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुए हो। मैं तुम दोनों को यहाँ बुलाना चाहता था, इसलिए मैंने यह लीला रची।"

महाविष्णु के पास ही वे दसों (10) ब्राह्मण पुत्र जीवित अवस्था में खेल रहे थे। महाविष्णु की आज्ञा पाकर, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन उन सभी ब्राह्मण पुत्रों को रथ में बैठाकर वापस द्वारका ले आए।

कथा का दार्शनिक सार और अर्जुन का ज्ञान

इस पूरी यात्रा और लीला के बाद अर्जुन का सारा 'अहंकार' पूरी तरह से नष्ट हो गया। अर्जुन ने जान लिया कि उनका गांडीव, उनकी विद्या और उनका बल— यह सब उनका अपना कुछ नहीं है, बल्कि यह सब भगवान श्रीकृष्ण (परमात्मा) की ही शक्ति है। जब भगवान की कृपा होती है, तभी बाण निशाने पर लगते हैं, और जब उनकी इच्छा नहीं होती, तो बाणों का अभेद्य पिंजरा भी एक नवजात शिशु को गायब होने से नहीं रोक सकता।

अर्जुन को यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ कि "जो कुछ भी सामर्थ्य और ऐश्वर्य जीवों में दिखाई देता है, वह साक्षात श्रीहरि की ही लीला है।" उन्होंने ब्राह्मण को उसके दसों पुत्र सौंप दिए। ब्राह्मण अपने मृत पुत्रों को जीवित पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की महिमा का गान किया।

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