सृष्टि के आरंभिक काल में जब कामदेव ने भगवान शिव की समाधि भंग करने का दुस्साहस किया था, तब महादेव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। बिना शरीर के कामदेव 'अनंग' कहलाने लगे। उनकी पत्नी रति के विलाप करने पर, भगवान शिव ने वरदान दिया था कि द्वापर युग में जब भगवान विष्णु श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित होंगे, तब कामदेव उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग उसी 'कामदेव के पुनर्जन्म' अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण और महारानी रुक्मिणी के प्रथम पुत्र 'प्रद्युम्न' के प्राकट्य और उनके द्वारा महामायावी शम्बरासुर के वध की अलौकिक गाथा है।
भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी महारानी रुक्मिणी जी के गर्भ से एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक कोई और नहीं, बल्कि साक्षात कामदेव का ही अवतार था। बालक के रूप और तेज को देखकर पूरे द्वारका नगर में उत्सव मनाया जाने लगा। बालक का नाम 'प्रद्युम्न' (जिसका बल अत्यंत प्रचंड हो) रखा गया।
देहोपपत्तये भूयस्तमेव प्रत्यपद्यत ॥
(श्रीमद्भागवत 10.55.1)
उसी समय, 'शम्बरासुर' नाम का एक अत्यंत क्रूर और मायावी राक्षस था। उसे ज्योतिषियों द्वारा यह पता चल चुका था कि रुक्मिणी जी के गर्भ से जन्म लेने वाला यह बालक ही भविष्य में उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। शम्बरासुर इतना मायावी था कि वह रूप बदलने में माहिर था। वह बालक की मृत्यु के लिए एक भयंकर योजना बनाने लगा।
जब प्रद्युम्न केवल छह (6) दिन के शिशु थे, तब सूतिकागृह (प्रसूति कक्ष) में सभी दासियां और रक्षक सो रहे थे। शम्बरासुर अपनी मायावी शक्ति से अदृश्य रूप धारण करके रुक्मिणी जी के महल में घुस गया। उसने उस कोमल शिशु को उठाया और आकाश मार्ग से उड़ गया।
शम्बरासुर ने सोचा कि यदि वह इसे किसी अस्त्र से मारेगा, तो श्रीकृष्ण को पता चल जाएगा। इसलिए उसने उस छह दिन के नवजात शिशु को ले जाकर अथाह और गहरे समुद्र में फेंक दिया। उसे लगा कि समुद्र की लहरों में यह बालक निश्चित रूप से डूबकर मर जाएगा या उसे समुद्री जीव खा जाएंगे। इधर द्वारका में प्रातः काल जब महारानी रुक्मिणी ने अपने शिशु को पालने में नहीं देखा, तो वे शोक से मूर्छित हो गईं। पूरे द्वारका में हाहाकार मच गया, परंतु भगवान श्रीकृष्ण (जो सब जानते थे) शांत रहे।
भगवान की लीला बड़ी विचित्र है। समुद्र में गिरते ही उस कोमल शिशु को एक अत्यंत विशाल मछली ने निगल लिया। परंतु ईश्वर की कृपा से वह शिशु उस मछली के पेट में भी सुरक्षित और जीवित रहा।
कुछ दिनों बाद, कुछ मछुआरों ने अपने जाल में उसी विशाल मछली को पकड़ लिया। वह मछली इतनी बड़ी और सुंदर थी कि मछुआरों ने उसे ले जाकर शम्बरासुर की रसोई (भोजनालय) में भेंट कर दिया। यह नियति का कैसा खेल था कि जिस असुर ने शिशु को समुद्र में फेंका था, वही शिशु जीवित अवस्था में उसी असुर की रसोई में पहुँच गया!
जब रसोइयों ने मछली का पेट चीरा, तो उसके भीतर से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और जीवित बालक निकला! सभी आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने वह बालक मायावती (रति) को सौंप दिया। उसी समय देवर्षि नारद वहां पधारे और उन्होंने मायावती को उस बालक का रहस्य बताया— "हे रति! यह कोई और नहीं, तुम्हारे पति कामदेव का ही पुनर्जन्म (प्रद्युम्न) है। शम्बरासुर ने इसे समुद्र में फेंका था। अब तुम इसका गुप्त रूप से पालन-पोषण करो।"
मायावती ने अत्यधिक वात्सल्य और प्रेम के साथ प्रद्युम्न का पालन-पोषण किया। प्रद्युम्न बहुत ही कम समय में यौवन को प्राप्त हो गए। उनका रूप बिल्कुल भगवान श्रीकृष्ण के समान था— लंबी भुजाएं, कमल जैसे नेत्र, और श्याम वर्ण। जब प्रद्युम्न युवा हुए, तो मायावती (रति) उनके प्रति माता के समान नहीं, बल्कि पति-पत्नी के प्रेम-भाव से देखने लगीं।
प्रद्युम्न इस व्यवहार से चकित होकर बोले— "हे माता! आपका यह आचरण एक माता के योग्य नहीं है। आप मेरे प्रति ऐसा भाव क्यों रख रही हैं?"
तब मायावती ने उन्हें उनका असली परिचय दिया— "हे नाथ! आप मेरे पुत्र नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र हैं। आप पूर्वजन्म के कामदेव हैं और मैं आपकी पत्नी रति हूँ। उस दुष्ट शम्बरासुर ने आपको सूतिकागृह से चुराकर समुद्र में फेंका था। आपकी माता रुक्मिणी आज भी आपके विरह में रो रही हैं। अब समय आ गया है कि आप उस दुष्ट का वध करें।"
शम्बरासुर अनेक प्रकार की 'आसुरी माया' (काले जादू) का ज्ञाता था। इसलिए मायावती ने प्रद्युम्न को सभी प्रकार की मायाओं को नष्ट करने वाली 'महाविद्या' (महामाया विद्या) सिखाई, जिससे वे शम्बरासुर के छल-कपट का सामना कर सकें।
अपनी वास्तविकता जानकर प्रद्युम्न का रक्त खौल उठा। वे सीधे शम्बरासुर की राजसभा में पहुँच गए और उसे कठोर अपशब्द कहते हुए युद्ध के लिए ललकारा। एक ही क्षण में प्रद्युम्न ने उसके दरबार के रक्षकों को धूल चटा दी।
शम्बरासुर क्रोध से फुफकारता हुआ अपनी गदा लेकर निकला। दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। जब शम्बरासुर ने देखा कि वह सीधे युद्ध में इस युवक से नहीं जीत सकता, तो उसने अपनी 'दानवी माया' का प्रयोग किया। वह आकाश में छिपकर प्रद्युम्न पर पत्थरों, विषैले बाणों और अग्नि की वर्षा करने लगा।
परंतु प्रद्युम्न जी तैयार थे। उन्होंने मायावती द्वारा सिखाई गई 'महाविद्या' (सात्त्विक माया) का प्रयोग किया। इस सात्त्विक विद्या के प्रभाव से शम्बरासुर की सारी आसुरी माया छिन्न-भिन्न हो गई। वह यक्ष, गंधर्व, पिशाच और नागों की माया का प्रयोग करता, और प्रद्युम्न उसे अपने तीखे बाणों से काट देते।
अंततः जब शम्बरासुर के सभी मायावी अस्त्र और छल-कपट विफल हो गए, तो प्रद्युम्न ने अपनी म्यान से अत्यंत तीक्ष्ण धार वाली तलवार निकाली। उन्होंने बिजली की गति से झपटकर शम्बरासुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। आकाश में देवताओं ने नगाड़े बजाए और प्रद्युम्न पर पुष्पों की वर्षा की।
युद्ध के पश्चात, मायावती (रति) आकाश-गामी रथ लेकर आईं। वे दोनों रथ पर बैठकर आकाश मार्ग से द्वारका पहुँचे। जब प्रद्युम्न द्वारका के राजमहल में उतरे, तो उनका रूप हुबहू भगवान श्रीकृष्ण जैसा लग रहा था। सभी स्त्रियां उन्हें श्रीकृष्ण समझकर लज्जावश छिपने लगीं।
तभी महारानी रुक्मिणी वहां आईं। उस युवक को देखते ही उनके स्तनों से दूध की धारा बहने लगी और उनका वात्सल्य उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं— "मेरा पुत्र भी तो अब इतना ही बड़ा हो गया होगा। यह सुंदर युवक कौन है?"
उसी समय भगवान श्रीकृष्ण, देवकी माता, वसुदेव जी और देवर्षि नारद वहां पधारे। नारद जी ने पूरी कथा सुनाई कि किस प्रकार शम्बरासुर ने अपहरण किया था और कैसे प्रद्युम्न ने उसका वध करके अपनी पत्नी रति (मायावती) के साथ वापसी की है। पूरी द्वारका में आनंद और उत्सव की लहर दौड़ गई। जो बालक मृत्यु के मुंह में जा चुका था, वह आज एक महान विजेता बनकर लौटा था।
इस कथा में एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक दर्शन (Philosophy) छिपा है:
- शम्बरासुर (मोह और अहंकार): शम्बर का अर्थ होता है माया या भ्रम। शम्बरासुर मनुष्य के हृदय में बैठे 'अहंकार' और 'मोह' का प्रतीक है, जो ईश्वर से दूर ले जाता है।
- प्रद्युम्न (दिव्य प्रेम/सात्त्विक काम): काम (इच्छा) जब संसार की ओर दौड़ती है तो वह पतन का कारण बनती है, परंतु जब वही 'काम' भगवान का अंश (प्रद्युम्न) बनकर हृदय में जन्म लेता है, तो वह 'दिव्य प्रेम' बन जाता है।
- महाविद्या का प्रयोग: आसुरी माया (अहंकार) को केवल 'महाविद्या' (ईश्वर की शुद्ध ज्ञानमयी भक्ति) से ही नष्ट किया जा सकता है। जब हृदय में ईश्वर-प्रेम (प्रद्युम्न) युवा होता है, तो वह अज्ञान रूपी शम्बरासुर का सिर काट देता है।

