सृष्टि के आदि काल में, वैकुंठ लोक के द्वार पर पहरा देने वाले भगवान विष्णु के दो परम प्रिय पार्षद थे— जय और विजय। एक बार उन्होंने सनकादि ऋषियों (ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों) को वैकुंठ में प्रवेश करने से रोक दिया। ऋषियों ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि "तुम दोनों भगवान के सान्निध्य से गिरकर मृत्युलोक (पृथ्वी) पर असुर बन जाओगे।" जब जय-विजय रोते हुए भगवान विष्णु की शरण में गए, तो भगवान ने कहा— "यदि तुम प्रेम से मेरी भक्ति करोगे तो सात जन्मों में वापस आओगे, लेकिन यदि तुम शत्रु-भाव (वैर) से मेरा चिंतन करोगे, तो मैं स्वयं अवतार लेकर तुम्हारा वध करूँगा और तुम केवल तीन जन्मों में ही मुक्त होकर वापस वैकुंठ लौट आओगे।"
जय-विजय ने अपने आराध्य से शीघ्र मिलने के लिए 'वैर-भाव' (शत्रुता) का मार्ग चुना। उनका पहला जन्म सतयुग में 'हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु' के रूप में हुआ (जिनका वध वराह और नृसिंह अवतार ने किया)। दूसरा जन्म त्रेता युग में 'रावण और कुंभकर्ण' के रूप में हुआ (जिनका वध श्रीराम ने किया)। और द्वापर युग में उनका तीसरा और अंतिम जन्म चेदिराज 'शिशुपाल' और करुष देश के राजा 'दन्तवक्त्र' के रूप में हुआ। यह कथा उसी तीसरे जन्म के अंत और उनकी वैकुंठ वापसी की महागाथा है।
शिशुपाल का जन्म चेदि देश के राजा दमघोष और उनकी पत्नी सात्वती (जो रिश्ते में भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं) के यहाँ हुआ। जन्म के समय शिशुपाल के तीन नेत्र (आँखें) और चार भुजाएं (हाथ) थीं। साथ ही, वह जन्मते ही गधे के समान भयंकर आवाज़ में रेंकने लगा। यह देखकर माता-पिता घबरा गए और उसे त्यागने का विचार करने लगे।
तभी एक आकाशवाणी हुई— "हे राजन! इस बालक का त्याग मत करो। यह अत्यंत बलशाली होगा। जिसके गोद में जाने पर इस बालक की दो अतिरिक्त भुजाएं और तीसरा नेत्र लुप्त हो जाएगा, उसी के हाथों इस बालक की मृत्यु निश्चित है।"
जब यह बात फैली, तो कई राजा शिशुपाल को देखने आए। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी भी अपनी बुआ से मिलने चेदि देश पधारे। जैसे ही श्रीकृष्ण ने उस बालक को स्नेहवश अपनी गोद में उठाया, चमत्कार हुआ! बालक की दो भुजाएं गिर गईं और तीसरा नेत्र छिप गया। बुआ सात्वती समझ गईं कि आकाशवाणी के अनुसार श्रीकृष्ण ही शिशुपाल के काल हैं।
समय बीतता गया। शिशुपाल रुक्मिणी जी से विवाह करना चाहता था, परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी जी का हरण करके उनसे विवाह कर लिया। जरासंध के वध के बाद शिशुपाल के मन में श्रीकृष्ण के प्रति द्वेष और शत्रुता की अग्नि धधक रही थी। वह उठते-बैठते, सोते-जागते केवल कृष्ण को गालियां देता था और उनका अहित सोचता था।
उसी समय, इंद्रप्रस्थ में सम्राट युधिष्ठिर ने 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन किया। इस महायज्ञ में पूरे भारतवर्ष के राजा, महर्षि, और देवता पधारे थे। यज्ञ के अंत में यह प्रश्न उठा कि इस सभा में 'अग्रपूजा' (सबसे पहली पूजा और सम्मान) किसकी की जाए?
पितामह भीष्म ने खड़े होकर घोषणा की— "इस पूरी सभा में, बल्कि तीनों लोकों में भगवान श्रीकृष्ण से श्रेष्ठ, ज्ञानी, और पूजनीय कोई नहीं है। वे ही परब्रह्म हैं। इसलिए अग्रपूजा श्रीकृष्ण की ही होनी चाहिए।" युधिष्ठिर और सहदेव ने अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवान श्रीकृष्ण के चरण धोए और उनकी अग्रपूजा संपन्न की। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की।
श्रीकृष्ण की अग्रपूजा देखकर शिशुपाल का अहंकार और ईर्ष्या भड़क उठी। वह अपने आसन से उछल पड़ा और भरी सभा में भगवान श्रीकृष्ण, भीष्म पितामह और पांडवों को अत्यंत भद्दी और कठोर गालियां देने लगा।
शिशुपाल ने चिल्लाते हुए कहा— "अरे मूर्ख पांडवों! क्या तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है? इस सभा में बड़े-बड़े तपस्वी, महर्षि और चक्रवर्ती सम्राट बैठे हैं। तुमने उन्हें छोड़कर इस ग्वाले (श्रीकृष्ण) की पूजा क्यों की? यह तो गायें चराने वाला, माखन चुराने वाला और गोपियों के साथ नाचने वाला एक साधारण व्यक्ति है। इसका न कोई कुल है न गोत्र। भीष्म! तू सठिया गया है जो इस पाखंडी की स्तुति कर रहा है।"
शिशुपाल भगवान को लगातार गालियां देता जा रहा था। सभा में बैठे पांडव और अन्य यदुवंशी क्रोध से अपने अस्त्र निकालने लगे, परंतु भगवान श्रीकृष्ण शांत बैठे मुस्कुरा रहे थे। वे उंगलियों पर शिशुपाल की गालियां (अपराध) गिन रहे थे। वे अपनी बुआ को दिए गए 'सौ अपराध क्षमा करने' के वचन से बंधे हुए थे।
भगवान श्रीकृष्ण का मौन देखकर शिशुपाल को लगा कि कृष्ण उससे डर गए हैं। उसका दुस्साहस और बढ़ गया। उसने जैसे ही 101वीं गाली दी (कुछ ग्रंथों के अनुसार उसने भगवान पर प्रहार करने के लिए अपनी तलवार निकाली), भगवान श्रीकृष्ण ने अपना मौन तोड़ा।
भगवान ने जैसे ही संकल्प किया, कोटि-सूर्य के समान तेजस्वी और अमोघ 'सुदर्शन चक्र' भगवान की उंगली पर प्रकट हो गया। सुदर्शन चक्र तीव्र गति से घूमा और पलक झपकते ही उसने शिशुपाल का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। शिशुपाल का अहंकार भरी सभा में धूल में मिल गया।
प्रविवेश महाराज पश्यतां सर्वभूभृताम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.74.45)
शिशुपाल के वध के पश्चात, उसका मित्र दन्तवक्त्र (जो जय-विजय की जोड़ी का दूसरा अंश था) प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा। जब भगवान श्रीकृष्ण राजसूय यज्ञ के पश्चात मथुरा में थे (कुछ समय बाद), तब दन्तवक्त्र अपनी भयंकर गदा लेकर पैदल ही मथुरा पर आक्रमण करने आ पहुँचा।
दन्तवक्त्र ने भगवान श्रीकृष्ण को ललकारते हुए कहा— "कृष्ण! तूने कपट से मेरे मित्र शिशुपाल को मारा है। आज मैं अपने इस गदा से तुझे मारकर अपने मित्र का कर्ज चुकाऊंगा।" ऐसा कहकर उसने अपनी गदा से भगवान के सिर पर प्रहार किया।
परंतु भगवान श्रीकृष्ण तो वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल हैं। उन्होंने उस प्रहार को तनिक भी विचलित हुए बिना सह लिया। फिर भगवान ने अपनी दिव्य 'कौमोदकी गदा' उठाई और दन्तवक्त्र की छाती पर ऐसा भयंकर प्रहार किया कि उसका हृदय फट गया और वह रक्त वमन करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा।
दन्तवक्त्र के शरीर से भी वैसी ही एक सूक्ष्म और दिव्य 'ज्योति' निकली और सबके देखते-देखते भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गई। इस प्रकार, दन्तवक्त्र का भी उद्धार हो गया। इसके साथ ही जय और विजय के तीन जन्मों का वह कठोर शाप समाप्त हो गया, और वे पुनः अपने दिव्य रूप में वैकुंठ लोक में भगवान के पार्षद बन गए।
श्रीमद्भागवत का यह प्रसंग संसार के सभी ग्रंथों से सबसे अलग और अकल्पनीय दर्शन प्रस्तुत करता है। आम तौर पर माना जाता है कि मुक्ति केवल प्रेम, जप, तप या भक्ति से मिलती है। परंतु भागवत कहती है:
"गोपियां काम (प्रेम) से, कंस भय से, और शिशुपाल तथा दन्तवक्त्र जैसे असुर 'द्वेष' (शत्रुता) से भगवान को प्राप्त हो गए।"
इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें भगवान से शत्रुता करनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि 'परमात्मा का ध्यान' इतना शक्तिशाली है कि यदि कोई शत्रुता के कारण भी दिन-रात चौबीसों घंटे केवल भगवान के ही स्वरूप का चिंतन करता है (जैसे शिशुपाल क्रोध में हमेशा कृष्ण का ही नाम रटता था), तो उसका मन पूरी तरह तन्मय (भगवान के स्वरूप वाला) हो जाता है। आग को चाहे आप प्रेम से छुएं या क्रोध में, वह जलाएगी ही। उसी प्रकार परमात्मा का चिंतन चाहे जिस भाव से किया जाए, वह जीव के पापों को भस्म करके उसे मुक्त कर ही देता है।

