Bhaumasur (Narakasur) Vadh Aur 16,100 Kanyaon Ka Uddhar - Bhagwat Puran

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

भौमासुर (नरकासुर) वध और 16,100 कन्याओं का उद्धार: भगवान की अद्भुत करुणा

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 59)

संसार के इतिहास में कई महान युद्ध हुए हैं। कुछ युद्ध राज्य के लिए लड़े गए, कुछ धन और ऐश्वर्य के लिए, तो कुछ प्रतिशोध के लिए। परंतु भगवान श्रीकृष्ण का अवतार जिन उद्देश्यों के लिए हुआ था, उनमें सबसे प्रमुख था— 'धर्म की स्थापना और असहायों की रक्षा।' श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध का यह प्रसंग उस महासंग्राम की कथा है जो द्वारकाधीश ने किसी राज्य या संपत्ति के लिए नहीं, बल्कि उन 16,100 असहाय और बंदी राजकन्याओं के सम्मान और उद्धार के लिए लड़ा था, जिन्हें एक क्रूर असुर ने नरक जैसी यातनाओं में कैद कर रखा था।

1. प्राग्ज्योतिषपुर का अत्याचारी राजा भौमासुर (नरकासुर)

प्राचीन काल में भगवान विष्णु ने जब 'वराह अवतार' धारण करके पृथ्वी (भूमि देवी) का रसातल से उद्धार किया था, तब उनके स्पर्श से पृथ्वी देवी को एक अत्यंत बलशाली पुत्र की प्राप्ति हुई थी। भूमि का पुत्र होने के कारण उसका नाम 'भौमासुर' पड़ा। परंतु अपनी क्रूरता, आसुरी प्रवृत्ति और धरती पर नरक जैसी स्थितियां पैदा कर देने के कारण उसे 'नरकासुर' के नाम से जाना जाने लगा।

नरकासुर की राजधानी 'प्राग्ज्योतिषपुर' (वर्तमान असम/कामरूप क्षेत्र) थी। शक्ति और वरदानों के मद में अंधा होकर उसने पूरे ब्रह्मांड में त्राहि-त्राहि मचा दी। उसने देवराज इंद्र पर आक्रमण करके देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल छीन लिए। उसने वरुण देव का छत्र (छाता) और मेरु पर्वत का अत्यंत मूल्यवान 'मणिपर्वत' भी बलपूर्वक लूट लिया।

उसकी क्रूरता की कोई सीमा नहीं थी। उसने पृथ्वी के विभिन्न राजाओं, गंधर्वों और देवताओं पर आक्रमण करके उनकी 16,100 परम सुंदरी राजकन्याओं का अपहरण कर लिया था और उन्हें प्राग्ज्योतिषपुर के एक भयंकर और दुर्गम बंदीगृह (Audiyana) में कैद कर रखा था।

इंद्र अपने इस घोर अपमान और स्वर्ग की दुर्दशा को लेकर रोते हुए द्वारका पहुँचे और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर भौमासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

2. सत्यभामा जी के साथ गरुड़ पर प्रस्थान

इंद्र की प्रार्थना सुनकर भगवान श्रीकृष्ण उसी क्षण युद्ध के लिए तैयार हो गए। यहाँ भगवान ने एक अत्यंत रहस्यमयी और अलौकिक निर्णय लिया। उन्होंने अपनी पटरानी सत्यभामा जी को अपने साथ गरुड़ पर बिठा लिया और प्राग्ज्योतिषपुर की ओर उड़ चले।

आध्यात्मिक रहस्य: भगवान सत्यभामा जी को युद्ध में क्यों ले गए? इसका अत्यंत गूढ़ रहस्य है। सत्यभामा जी साक्षात 'पृथ्वी (भूमि देवी)' का ही अंश अवतार हैं। भौमासुर (नरकासुर) भूमि का पुत्र था। किसी भी पुत्र का वध उसकी माता की सहमति के बिना या माता की उपस्थिति के बिना करना धर्म के विरुद्ध होता है। इसलिए भगवान ने साक्षात भूमि स्वरूपा सत्यभामा जी को साथ रखा, ताकि वे स्वयं अपने क्रूर पुत्र के अत्याचार देख सकें और धर्म की रक्षा के लिए उसके वध की साक्षी बनें।
3. प्राग्ज्योतिषपुर का अभेद्य दुर्ग और मुर दैत्य का वध ('मुरारी')

प्राग्ज्योतिषपुर कोई साधारण नगर नहीं था। नरकासुर ने अपने नगर को चारों ओर से अभेद्य सुरक्षा चक्रों से घेर रखा था। सबसे पहले पर्वतों का घेरा था, उसके बाद शस्त्रों का घेरा, फिर जल का घेरा और अंत में अग्नि का घेरा था। इसके अतिरिक्त 'मुर' नामक एक अत्यंत भयंकर पांच सिर वाले दानव ने पूरे नगर को 'मुर-पाश' (एक प्रकार के जादुई और भयंकर तारों/रस्सियों) से घेर रखा था।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने 'कौमोदकी गदा' के प्रहार से पर्वतों को चूर-चूर कर दिया। अपने बाणों से शस्त्रों के घेरे को नष्ट किया और सुदर्शन चक्र से अग्नि तथा जल के दुर्ग को काट दिया। भगवान के पांचजन्य शंख की भयंकर ध्वनि सुनकर पांच सिर वाला 'मुर' दानव जल के भीतर से जाग उठा और उसने त्रिशूल लेकर गरुड़ पर प्रहार किया।

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने तीखे बाणों से उसके त्रिशूल के तीन टुकड़े कर दिए और अंततः अपने सुदर्शन चक्र से मुर दानव के पांचों सिर धड़ से अलग कर दिए। मुर दानव का वध करने के कारण ही तीनों लोकों में भगवान श्रीकृष्ण का एक अत्यंत प्रिय नाम 'मुरारी' (मुर के अरी/शत्रु) पड़ा।

मुर के मारे जाने पर उसके सात भयंकर पुत्र (ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान और अरुण) नरकासुर के सेनापति 'पीठ' के साथ भगवान पर टूट पड़े। भगवान ने खेल-खेल में ही अपने तीखे बाणों से उन सभी का सिर काट कर उन्हें यमलोक भेज दिया।

4. नरकासुर का अंत और पृथ्वी देवी की स्तुति

अपनी पूरी सेना और मुर दानव के मारे जाने का समाचार सुनकर नरकासुर अत्यंत क्रोधित हुआ। वह एक विशाल और भयंकर हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में आया। उसने भगवान श्रीकृष्ण पर अपनी सबसे अमोघ 'शतघ्नी' (एक साथ सौ को मारने वाली शक्ति) चलाई, लेकिन भगवान के बाणों के सामने वह तिनके के समान कटकर गिर गई।

नरकासुर ने गरुड़ पर एक भयंकर शक्ति (बरछी) का प्रहार किया, किंतु गरुड़ जी उस प्रहार से तनिक भी विचलित नहीं हुए, मानो किसी ने उन्हें फूलों की माला मारी हो। जब नरकासुर कोई और अस्त्र उठाने लगा, उससे पहले ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपना अमोघ 'सुदर्शन चक्र' छोड़ दिया। चमकते हुए सूर्य के समान सुदर्शन चक्र ने एक ही पल में भौमासुर (नरकासुर) का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया।

नरकासुर के मरते ही देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और 'जय हो! जय हो!' के नारे लगाए। उसी समय वहां साक्षात 'पृथ्वी देवी (भूमि)' प्रकट हुईं। उन्होंने देवमाता अदिति के कुंडल, वरुण का छत्र और मणिपर्वत भगवान के चरणों में रख दिए और भगवान की अत्यंत मार्मिक स्तुति की:

॥ श्लोक ॥
नमस्ते देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर ।
भक्तेच्छोपात्तरूपात्मन् परमात्मन् नमोऽस्तु ते ॥
(श्रीमद्भागवत 10.59.25)
अर्थ: पृथ्वी देवी कहती हैं— "हे देवताओं के भी देव! हे शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले प्रभु! आपको मेरा नमस्कार है। हे परमात्मन्! आप अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए ही यह दिव्य रूप धारण करते हैं, मैं आपको बारम्बार प्रणाम करती हूँ।"

पृथ्वी देवी ने भगवान से प्रार्थना की कि "हे प्रभु! मेरे पुत्र नरकासुर के अपराधों को क्षमा करें और उसके पुत्र 'भगदत्त' के प्राणों की रक्षा करें।" भगवान ने भगदत्त को अभयदान देकर उसे प्राग्ज्योतिषपुर का राजा घोषित कर दिया।

5. 16,100 राजकन्याओं का बंदीगृह से उद्धार

नरकासुर के वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण प्राग्ज्योतिषपुर के उस विशाल बंदीगृह (जेल) में प्रविष्ट हुए, जहाँ 16,100 राजकन्याएं वर्षों से नरक का जीवन जी रही थीं। उनके शरीर मलिन हो गए थे, वस्त्र फट चुके थे और उनकी आँखों में केवल निराशा के आंसू थे।

जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने उस बंदीगृह के द्वार खोले, उस अंधकारमयी जगह में भगवान के श्यामसुंदर रूप की कोटि-कोटि सूर्यों के समान दिव्य छटा फैल गई। भगवान के उस परम मनमोहक, शांत और करुणा से भरे स्वरूप को देखकर उन 16,100 कन्याओं के जन्म-जन्मांतर के दुःख उसी क्षण नष्ट हो गए।

॥ श्लोक ॥
ताः प्रविष्टं स्त्रियो वीक्ष्य नरवीरं विमोहिताः ।
मनसा वव्रिरे कान्तं दैवोपसादितं पतिम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.59.33)
अर्थ: बंदीगृह में प्रविष्ट हुए उन पुरुषोत्तम नरवीर (श्रीकृष्ण) को देखकर वे सभी स्त्रियां उन पर अत्यंत मुग्ध (मोहित) हो गईं। उन्होंने मन ही मन विचार किया कि विधाता ने स्वयं इन्हें हमारे पास भेजा है, इसलिए उन्होंने उसी क्षण पूर्ण भक्ति-भाव से भगवान को मानसिक रूप से अपना पति स्वीकार कर लिया।
6. समाज का तिरस्कार और भगवान की असीम करुणा

यहाँ कथा में एक बहुत बड़ा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मोड़ आता है। भगवान ने उन 16,100 कन्याओं को मुक्त तो कर दिया, परंतु उन कन्याओं के सामने एक अत्यंत भयानक प्रश्न खड़ा था— "अब वे कहाँ जाएंगी?"

करुणा का चरमोत्कर्ष: उस युग की सामाजिक व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। जो स्त्री किसी अन्य पुरुष (असुर) द्वारा अपहरण कर ली गई हो और वर्षों तक उसके बंदीगृह में रही हो, उसे न तो उसका पिता वापस अपने घर में स्वीकार करता था, और न ही कोई राजकुमार या समाज का व्यक्ति उससे विवाह करने को तैयार होता। वे 16,100 कन्याएं समाज की दृष्टि में 'अपवित्र' और 'अछूत' मान ली गई थीं।

जब उन रोती हुई कन्याओं ने अपनी यह व्यथा भगवान के सामने रखी, तो करुणासागर द्वारकाधीश का हृदय पिघल गया। भगवान ने कहा— "जिस समाज ने तुम्हें ठुकरा दिया है, उस समाज के नियमों को मैं नहीं मानता। आज से तुम सब अनाथ नहीं हो। मैं साक्षात परब्रह्म वासुदेव, तुम सभी 16,100 कन्याओं को अपनी 'पत्नी' के रूप में स्वीकार करता हूँ। आज से तुम सभी द्वारका की 'पटरानियां' (महारानियां) कहलाओगी।"

यह भगवान का वह महान स्वरूप था, जहाँ उन्होंने समाज के तिरस्कार और कलंक को स्वयं अपने माथे पर ले लिया, परंतु उन असहाय स्त्रियों के सम्मान और उनके जीवन की रक्षा की। भगवान ने उन सभी कन्याओं को दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए और अत्यंत आदर के साथ पालकियों में बिठाकर द्वारका भिजवा दिया।

7. द्वारका में 16,100 रूपों में एक साथ भव्य विवाह

जब वे 16,100 कन्याएं द्वारका पहुँचीं, तो वहाँ उनके निवास के लिए भगवान ने विश्वकर्मा जी से रातों-रात 16,100 दिव्य और स्वर्णमयी महल तैयार करवा दिए थे। हर महल में पारिजात के वृक्ष, स्फटिक मणियों के खंभे और अप्सराओं जैसी दासियां थीं।

श्रीमद्भागवत में शुकदेव जी महाराज वर्णन करते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की योगमाया का अद्भुत खेल देखिए। भगवान ने अपनी उन नव-विवाहिताओं के प्रेम का सम्मान करने के लिए, एक ही मुहूर्त (समय) में, 16,100 अलग-अलग रूप धारण किए।

॥ श्लोक ॥
तासां मुहूर्त एकस्मिन् नानागारेषु योषिताम् ।
सविधं जगृहे पाणीननुपामचरित्रवान् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.59.42)
अर्थ: अनुपम चरित्र वाले भगवान श्रीकृष्ण ने एक ही शुभ मुहूर्त में, अलग-अलग 16,100 महलों में (योगमाया से उतने ही रूप धारण करके), विधि-विधान पूर्वक उन सभी 16,100 स्त्रियों का एक साथ पाणिग्रहण (विवाह) किया।

भगवान श्रीकृष्ण 16,108 महलों में एक साथ रहते थे (8 पटरानियां और 16,100 यह कन्याएं)। हर रानी यही सोचती थी कि "प्रभु केवल मेरे ही पास रहते हैं, वे मुझसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं।" भगवान किसी के साथ चौपड़ खेलते, किसी के साथ उद्यान में विहार करते और किसी के यहाँ यज्ञ करते हुए प्रतीत होते थे। यह भगवान की अकल्पनीय 'योगेश्वर' लीला थी।

कथा का आध्यात्मिक रहस्य और संदेश

श्रीमद्भागवत की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक बहुत गहरा आध्यात्मिक दर्शन (Philosophy) छिपा है:

  • नरकासुर (अहंकार): नरकासुर मनुष्य के उस घोर अज्ञान और 'अहंकार' का प्रतीक है, जो पृथ्वी (भौतिकता) से उत्पन्न होता है। यह अहंकार ही हमारी बुद्धि और विवेक पर कब्ज़ा कर लेता है।
  • 16,100 कन्याएं (जीवात्माएं/वेद ऋचाएं): ये 16,100 कन्याएं वास्तव में हमारे मन की 16,000 वृत्तियां (Thoughts) हैं या वे शुद्ध जीवात्माएं हैं जिन्हें अहंकार (नरकासुर) ने भौतिकता के बंदीगृह में कैद कर रखा है। कुछ संतों के अनुसार ये वेद की 16,000 ऋचाएं (मंत्र) हैं जिन्हें असुरों ने लुप्त कर दिया था।
  • उद्धार: जब परमात्मा (श्रीकृष्ण) ज्ञान रूपी सुदर्शन चक्र से इस अहंकार का सिर काट देते हैं, तब जीवात्मा मुक्त होती है। और परमात्मा उस शुद्ध जीवात्मा को अपनी अर्धांगिनी (भक्त) के रूप में सदा के लिए अपने हृदय में बसा लेते हैं।

भगवान की यह लीला हमें यह भी सिखाती है कि चाहे मनुष्य कितना भी पतित क्यों न हो जाए, समाज चाहे उसे कितना भी अछूत या गिरा हुआ क्यों न माने, यदि वह सच्चे हृदय से 'हे नाथ!' कहकर परमात्मा को पुकारता है, तो भगवान उसे अपने गले लगाने में एक क्षण की भी देरी नहीं करते।

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