Syamantaka Mani Ki Katha: Bhagwan Krishna Par Kalank Aur Satyabhama Vivah

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

स्यमन्तक मणि की कथा: भगवान पर लगा कलंक और जाम्बवती-सत्यभामा विवाह

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 56)

संसार में यदि कोई व्यक्ति पूर्णतः निर्दोष और निष्कलंक है, तो वह केवल ईश्वर है। परंतु द्वापर युग में एक ऐसा प्रसंग भी आया जब साक्षात द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण पर भी चोरी और हत्या का घोर कलंक लग गया। यह प्रसंग है— 'स्यमन्तक मणि' का। यह कथा न केवल मिथ्या आरोपों से मुक्त होने की प्रेरणा देती है, बल्कि इसी कथा के माध्यम से भगवान को जाम्बवती और सत्यभामा के रूप में अपनी दो अष्टभार्याएं (पटरानियां) प्राप्त हुईं।

सत्राजित का अहंकार और स्यमन्तक मणि का चमत्कार

द्वारका में 'सत्राजित' नाम का एक यादव रहता था, जो सूर्यदेव का परम भक्त था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे 'स्यमन्तक' नामक एक अत्यंत दिव्य मणि प्रदान की। यह मणि इतनी तेजस्वी थी कि जब सत्राजित इसे गले में पहनकर द्वारका में चला, तो लोगों को लगा कि स्वयं सूर्यदेव द्वारका पधारे हैं।

इस मणि की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह प्रतिदिन आठ भार (लगभग 80 मन या कई किलो) सोना उत्पन्न करती थी। जहाँ यह मणि होती थी, वहाँ कोई अकाल, महामारी, रोग या कोई भी अमंगल नहीं हो सकता था। भगवान श्रीकृष्ण ने यह विचार करके कि इतनी दिव्य और कल्याणकारी वस्तु राजा उग्रसेन (राजकोष) के पास होनी चाहिए, सत्राजित से मणि मांगी। परंतु सत्राजित अत्यंत लोभी था, उसने भगवान की बात को अनसुना कर दिया और मणि अपने पास ही रखी।

प्रसेन की मृत्यु और भगवान पर झूठा कलंक

एक दिन सत्राजित का छोटा भाई 'प्रसेन' उस स्यमन्तक मणि को गले में पहनकर घोड़े पर सवार होकर जंगल में शिकार खेलने गया। जंगल में एक विशाल सिंह (शेर) ने प्रसेन को घोड़े सहित मार डाला और उस चमकती हुई मणि को अपने मुँह में दबाकर ले गया। उसी जंगल में रामावतार के समय के परम भक्त ऋक्षराज जाम्बवान भी एक गुफा में निवास करते थे। जाम्बवान जी ने उस शेर को मार गिराया और वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर अपने छोटे बालक को खेलने के लिए दे दी।

इधर, जब प्रसेन लौटकर द्वारका नहीं आया, तो सत्राजित ने पूरे नगर में यह अफवाह फैला दी कि— "श्रीकृष्ण की नज़र मेरी मणि पर थी, अवश्य ही उन्होंने अकेले में प्रसेन की हत्या करके वह मणि चुरा ली है।"

पूरे द्वारका नगर में भगवान की निंदा होने लगी। भगवान श्रीकृष्ण जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, उन्हें इस तुच्छ मणि की क्या आवश्यकता थी? परंतु भगवान ने समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिए इस कलंक को चुपचाप सहने के बजाय, सत्य को सामने लाने का निश्चय किया।
गुफा में प्रवेश और जाम्बवान से 28 दिनों का महायुद्ध

अपने ऊपर लगे इस मिथ्या कलंक को धोने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण द्वारका के कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों को साथ लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। घोड़े और प्रसेन के पैरों के निशानों का पीछा करते हुए वे एक भयंकर गुफा के द्वार पर पहुँचे। द्वारकावासियों को बाहर खड़ा करके भगवान अकेले ही उस घोर अंधकारमयी गुफा में प्रविष्ट हुए।

गुफा के भीतर भगवान ने देखा कि एक धाय (सेविका) जाम्बवान के बच्चे को उस स्यमन्तक मणि से खिला रही है। भगवान ने मणि उठाना चाहा, तो वह सेविका ज़ोर से चीख पड़ी। उसकी चीख सुनकर महाबली जाम्बवान क्रोध में भरकर वहाँ आ गए।

जाम्बवान जी ने श्रीकृष्ण को पहचाना नहीं और उन्हें एक साधारण मनुष्य समझकर उन पर आक्रमण कर दिया। दोनों के बीच भयंकर मल्ल-युद्ध (कुश्ती) शुरू हो गया। यह युद्ध लगातार 28 दिन और रात तक चलता रहा। जाम्बवान के वज्र जैसे प्रहारों से भी जब श्रीकृष्ण तनिक भी विचलित नहीं हुए, और जाम्बवान का शरीर पसीने से लथपथ होकर टूट गया, तब जाम्बवान को अपनी भूल का आभास हुआ।

॥ श्लोक ॥
जाने त्वाम् सर्वभूतानाम् प्राण ओजः सहो बलम् ।
विष्णुम् पुराणपुरुषम् प्रभविष्णुम् अधीश्वरम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.56.26)
अर्थ: जाम्बवान जी हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहते हैं— "हे प्रभु! अब मैं जान गया हूँ कि आप समस्त प्राणियों के प्राण, ओज, सहनशक्ति और शारीरिक बल हैं। आप ही सबके अधीश्वर, पुराण-पुरुष साक्षात भगवान विष्णु (श्रीराम) हैं।"

जाम्बवान जी को अपने इष्टदेव 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम' के रूप में ही श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ। उन्होंने क्षमा मांगते हुए वह स्यमन्तक मणि भगवान को सौंप दी। साथ ही, अपनी परम सुंदरी और गुणवती कन्या 'जाम्बवती' का विवाह भी भगवान श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

कलंक मुक्ति और सत्यभामा से विवाह

गुफा के बाहर खड़े यादव 12 दिनों तक प्रतीक्षा करके निराश होकर द्वारका लौट गए थे। उन्होंने मान लिया था कि कृष्ण अब जीवित नहीं हैं। परंतु जब 28 दिन बाद भगवान श्रीकृष्ण मणि और अपनी नवविवाहिता पत्नी जाम्बवती के साथ द्वारका लौटे, तो पूरे नगर में उत्सव मनने लगा।

भगवान ने राजा उग्रसेन की राजसभा बुलाई और सत्राजित को भी बुलवाया। भरी सभा में भगवान ने पूरी घटना का वर्णन किया और स्यमन्तक मणि सत्राजित को लौटा दी। सत्राजित अपनी क्षुद्र बुद्धि और भगवान पर लगाए गए झूठे कलंक के कारण अत्यंत लज्जित हुआ। उसका सिर शर्म से झुक गया।

अपने पाप का प्रायश्चित करने और भगवान को प्रसन्न करने के लिए, सत्राजित ने वह स्यमन्तक मणि भगवान के चरणों में अर्पित कर दी और अपनी परम रूपवती एवं अष्ट-सिद्धियों की स्वामिनी पुत्री 'सत्यभामा' का विवाह भगवान श्रीकृष्ण से कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा जी को सहर्ष अपनी पटरानी के रूप में स्वीकार कर लिया, परंतु उन्होंने वह मणि सत्राजित को वापस करते हुए कहा— "हे सत्राजित! हम ब्रह्मचारी नहीं हैं, इसलिए इस मणि को हमारे पास नहीं रहना चाहिए। तुम ही इसे रखो और इसके द्वारा उत्पन्न स्वर्ण से द्वारका राज्य का कल्याण करो।"

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