Uddhava Gita: Dattatreya Ke 24 Guruon Ki Katha (Bhagwat Puran)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

'उद्धव गीता': ज्ञान, वैराग्य और अवधूत दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की अद्भुत कथा

श्रीमद्भागवत महापुराण: एकादश स्कंध (अध्याय 7, 8 और 9)

महाभारत के युद्ध के पश्चात जब द्वापर युग का अंत निकट आ गया और यदुवंश का संहार हो गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम धाम (वैकुंठ) लौटने का निश्चय किया। उस समय भगवान के अनन्य सखा और परम भक्त 'उद्धव' जी अत्यंत व्याकुल हो गए। उद्धव जी का भगवान के सगुण (शारीरिक) रूप से इतना गहरा मोह था कि वे उनके वियोग की कल्पना से ही तड़प उठे। अपने प्रिय सखा के इस मोह को भंग करने और उन्हें 'ब्रह्म-ज्ञान' (आत्मज्ञान) प्रदान करने के लिए, भगवान श्रीकृष्ण ने जो महान उपदेश दिया, उसे ही शास्त्रों में 'उद्धव गीता' (Uddhava Gita) या 'हंस गीता' कहा जाता है। इसी उपदेश के अंतर्गत भगवान ने 'अवधूत दत्तात्रेय' और उनके 24 गुरुओं की वह अद्भुत कथा सुनाई, जो सिद्ध करती है कि यदि मनुष्य के भीतर सीखने की इच्छा हो, तो प्रकृति का कण-कण उसका गुरु बन सकता है।

1. उद्धव की व्याकुलता और भगवान का वैराग्य-उपदेश

जब उद्धव जी ने देखा कि द्वारका में भयंकर अपशकुन हो रहे हैं और भगवान श्रीकृष्ण इस धरा-धाम को छोड़ने वाले हैं, तो वे एकांत में भगवान के चरणों में गिर पड़े। उद्धव जी ने रोते हुए कहा— "हे प्रभो! मैं आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकता। आप मुझे भी अपने साथ अपने परम धाम ले चलिए।"

भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को समझाते हुए कहा कि यह संसार एक स्वप्न के समान है, जहाँ मिलन और बिछड़ना प्रकृति का नियम है। भगवान ने उद्धव को अपने मोह का त्याग करके संन्यास मार्ग अपनाने का यह प्रामाणिक उपदेश दिया:

॥ भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश ॥
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु ।
मयावेशितसर्वात्मा समदृग्विचरस्व गाम् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.7.6)
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— "हे उद्धव! तुम अपने परिवार और सगे-संबंधियों का सारा मोह (स्नेह) त्याग दो। अपना पूरा मन और आत्मा मुझमें (परमात्मा में) लीन कर दो और सभी को समान दृष्टि (समभाव) से देखते हुए इस पृथ्वी पर विचरण करो।"

उद्धव जी ने पूछा— "प्रभो! यह मोह छोड़ना इतना सरल नहीं है। मनुष्य इस अज्ञान और आसक्ति के जाल से कैसे बाहर निकले? उसे सच्चा गुरु कहाँ मिलेगा जो उसे वैराग्य सिखा सके?" इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने हमारे इतिहास की सबसे महान दार्शनिक कथा— 'अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदु का संवाद' सुनाया।

2. महाराज यदु और अवधूत दत्तात्रेय का संवाद

प्राचीन काल में यदुवंश के मूल पुरुष, परम प्रतापी महाराज 'यदु' एक बार जंगल से गुजर रहे थे। उन्होंने वहां एक अत्यंत तेजस्वी, युवा और शांत संन्यासी (अवधूत) को देखा। वे अवधूत कोई और नहीं, स्वयं महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र 'दत्तात्रेय' (Dattatreya) थे। उनका मुख मंडल सूर्य के समान चमक रहा था और वे सांसारिक चिंताओं से पूर्णतः मुक्त थे।

महाराज यदु ने हाथ जोड़कर अवधूत से पूछा— "हे भगवन्! लोग धन, परिवार और राज्य पाने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं, फिर भी दुःखी रहते हैं। आपके पास तो कुछ भी नहीं है, फिर भी आप इतने आनंदित और शांत कैसे हैं? आपके इस असीम ज्ञान और वैराग्य का गुरु कौन है?"

इस प्रश्न पर मुस्कुराते हुए अवधूत दत्तात्रेय ने कहा— "राजन्! मेरा कोई एक गुरु नहीं है। मैंने अपनी ही बुद्धि से प्रकृति का अवलोकन किया है और 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की है। प्रकृति ही मेरी सबसे बड़ी गुरु है।"

3. अवधूत के 24 गुरुओं का प्रामाणिक वर्णन

श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध में अवधूत दत्तात्रेय ने महाराज यदु को अपने उन 24 गुरुओं के नाम बताए। महर्षि वेदव्यास जी ने इन 24 गुरुओं का उल्लेख इस प्रामाणिक श्लोक में किया है:

॥ अवधूत के 24 गुरु ॥
पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रविः ।
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृद् गजः ॥
मधुहा हरिणो मीनः पिङ्गला कुररोऽर्भकः ।
कुमारी शरकृत् सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥
(श्रीमद्भागवत 11.7.33-34)
अर्थ: अवधूत दत्तात्रेय कहते हैं— "हे राजन्! मेरे 24 गुरु इस प्रकार हैं: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, भंवरा (मधुमक्खी), हाथी, शहद निकालने वाला, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुररी (टिटहरी) पक्षी, बालक, कुंवारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीड़ा।"

आइए, जानते हैं कि अवधूत दत्तात्रेय ने प्रकृति के इन 24 गुरुओं से क्या अद्भुत शिक्षाएं प्राप्त कीं:

4. पंचमहाभूतों (प्रकृति) से प्राप्त शिक्षाएं

1. पृथ्वी (Earth): लोग पृथ्वी पर मल-मूत्र त्यागते हैं, उसे खोदते हैं, फिर भी पृथ्वी क्षमाशील रहती है। पृथ्वी से मैंने 'क्षमा' (Forgiveness) और धैर्य की शिक्षा ली।
2. वायु (Air): हवा सुगंध और दुर्गंध दोनों के बीच से गुजरती है, परंतु वह किसी में आसक्त (attach) नहीं होती। इसी प्रकार योगी को संसार में रहते हुए भी सबसे 'अनासक्त' (Detached) रहना चाहिए।
3. आकाश (Sky): बादल आते हैं और चले जाते हैं, आकाश का कुछ नहीं बिगड़ता। आत्मा भी आकाश के समान सर्वव्यापी और 'निर्लिप्त' है। शरीर के जन्म-मरण से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
4. जल (Water): जल स्वभाव से निर्मल, मधुर और पवित्र होता है। मुनि को भी जल के समान 'पवित्र और मधुर' स्वभाव वाला होना चाहिए, जिसका दर्शन ही लोगों को पवित्र कर दे।
5. अग्नि (Fire): अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है परंतु स्वयं अपवित्र नहीं होती। अग्नि की ज्वालाएं दिखाई देती हैं परंतु उसका मूल रूप अदृश्य रहता है। साधक को भी 'तेजस्वी और ज्ञान की अग्नि' से युक्त होना चाहिए।

5. सूर्य, चंद्रमा और समुद्र: जीवन का व्यापक दृष्टिकोण

6. चंद्रमा (Moon): चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती हैं, परंतु वास्तविक चंद्रमा वही रहता है। इसी प्रकार बचपन, यौवन और बुढ़ापा शरीर के होते हैं, आत्मा के नहीं।
7. सूर्य (Sun): सूर्य अपनी किरणों से जल को खींचता है, परंतु बाद में उसी जल को वर्षा के रूप में संसार को लौटा देता है। मुनि को भी इंद्रियों से विषय ग्रहण कर उन्हें समाज के कल्याण के लिए त्याग देना चाहिए
8. समुद्र (Ocean): नदियां आकर समुद्र में मिलें तो वह प्रसन्न होकर मर्यादा नहीं लांघता, और ग्रीष्म ऋतु में नदियां सूख जाएं तो वह दुःखी नहीं होता। ज्ञानी पुरुष को भी संपत्ति आने पर उछलना नहीं चाहिए और दुःख आने पर घबराना नहीं चाहिए

6. जीव-जंतुओं से वैराग्य की कठोर शिक्षा

प्रकृति के जीव-जंतु मनुष्य को उसकी इंद्रियों की दुर्बलता का साक्षात दर्पण दिखाते हैं। अवधूत ने इनसे क्या सीखा, आइए देखते हैं:

9. कबूतर (Pigeon): एक कबूतर को अपनी पत्नी और बच्चों से अत्यधिक मोह था। जब बहेलिए (शिकारी) ने उसके बच्चों को जाल में फंसाया, तो मोह में अंधा होकर कबूतर भी उस जाल में कूद पड़ा और मारा गया। शिक्षा: परिवार का 'अत्यधिक मोह' (Attachment) ही मनुष्य के विनाश का सबसे बड़ा कारण है।
10. अजगर (Python): अजगर भोजन की तलाश में भटकता नहीं है। वह एक जगह पड़ा रहता है, जो मिल जाए खा लेता है। शिक्षा: इसे 'अजगर वृत्ति' कहते हैं। सन्यासी को प्रारब्ध (भाग्य) पर छोड़कर संतुष्ट रहना चाहिए।
11. पतंगा (Moth): पतंगा अग्नि के रूप और चमक (दृश्य) पर मोहित होकर जल मरता है। शिक्षा: मनुष्य भी स्त्री/पुरुष के 'रूप' (Visual Temptation) पर मोहित होकर अपना जीवन नष्ट कर लेता है।
12. भंवरा / मधुमक्खी (Honeybee): मधुमक्खी कंजूस की तरह दिन-रात मेहनत करके शहद इकट्ठा करती है, जिसे अंत में कोई और ले जाता है। शिक्षा: धन का अत्यधिक संचय (Hoarding) मूर्खता है।
13. शहद निकालने वाला (Honey-gatherer): यह मेरा गुरु है क्योंकि यह सिखाता है कि जो धन कंजूस संचय करता है, उसका उपभोग हमेशा कोई दूसरा (चोर या लुटेरा) ही करता है।
14. हाथी (Elephant): हाथी 'स्पर्श' (Touch) के सुख का दास होता है। शिकारी एक नकली हथिनी खड़ी कर देते हैं, जिसके स्पर्श के लालच में बलवान हाथी गड्ढे में गिरकर जीवन भर के लिए गुलाम हो जाता है। शिक्षा: 'काम-वासना' और 'स्पर्श' का सुख बड़े-बड़ों को गुलाम बना देता है।
15. हिरण (Deer): हिरण 'श्रवण' (Hearing) का दास होता है। शिकारी मधुर संगीत बजाता है, जिसे सुनकर हिरण अपनी सुध-बुध खो बैठता है और मारा जाता है। शिक्षा: सांसारिक गीत-संगीत और झूठी प्रशंसा मन को भटका देती है।
16. मछली (Fish): मछली अपनी जीभ (Taste) के स्वाद के कारण कांटे में फंसा हुआ मांस खाने जाती है और प्राण गवां देती है। शिक्षा: 'रसना' (जिह्वा/स्वाद) पर जिसका नियंत्रण नहीं है, वह मृत्यु को निमंत्रण देता है।

7. परम वैराग्य: पिंगला वेश्या और कुमारी कन्या

अवधूत दत्तात्रेय के गुरुओं में कुछ ऐसे गुरु भी हैं, जो समाज की दृष्टि में साधारण या तिरस्कृत हो सकते हैं, परंतु उनका जीवन सबसे बड़ा वेदांत सिखाता है:

17. पिंगला वेश्या (Pingala the Prostitute): विदेह नगरी में पिंगला नाम की एक वेश्या रहती थी। एक रात वह द्वार पर खड़ी होकर किसी अमीर ग्राहक की प्रतीक्षा कर रही थी कि वह आएगा और धन देगा। आधी रात बीत गई, कोई नहीं आया। पिंगला धन की आशा में बार-बार बाहर जाती और अंदर आती। अंततः उसे इस निरर्थक आशा से भयंकर विरक्ति (Detachment) हो गई। उसने सोचा, "मैं एक नाशवान शरीर वाले पुरुष से प्रेम की आशा कर रही हूँ, यदि मैंने यही प्रेम अपने हृदय में बैठे परमात्मा से किया होता तो मेरा उद्धार हो गया होता।"

॥ पिंगला का वैराग्य ॥
आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम् ।
यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला ॥
(श्रीमद्भागवत 11.8.44)
अर्थ: अवधूत कहते हैं— "संसार में 'आशा' (उम्मीद/Desire) ही सबसे बड़ा दुःख है, और 'निराशा' (आशाओं का त्याग/Desirelessness) ही परम सुख है। जिस प्रकार उस रात पुरुषों से धन की आशा को काटकर (त्याग कर) पिंगला वेश्या सुख की नींद सो गई।"
18. कुररी (टिटहरी) पक्षी (Osprey): एक बार कुररी पक्षी के मुंह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसके कारण कई बड़े पक्षी उस पर हमला कर रहे थे। तंग आकर कुररी ने वह मांस का टुकड़ा मुंह से नीचे गिरा दिया। टुकड़ा गिरते ही अन्य पक्षी उसे छोड़कर चले गए और कुररी को शांति मिल गई। शिक्षा: 'परिग्रह' (वस्तुओं को पकड़ कर रखना) ही झगड़े का कारण है, 'त्याग' में ही परम शांति है।
19. बालक (Child): एक छोटा बच्चा बिना किसी चिंता के खेलता और सोता है। उसे मान-अपमान की चिंता नहीं होती। शिक्षा: ज्ञानी पुरुष को भी बालक के समान चिंता मुक्त और निष्कपट होना चाहिए।
20. कुमारी कन्या (Young Girl): एक बार कुछ लोग एक कुंवारी कन्या को देखने उसके घर आए। घर में कोई नहीं था। मेहमानों के लिए भोजन बनाते समय कन्या धान कूटने लगी। धान कूटते समय उसके हाथों की चूड़ियाँ (Bangles) आपस में टकराकर शोर करने लगीं। कन्या ने सोचा कि चूड़ियों का शोर मेहमानों को अच्छा नहीं लगेगा। उसने एक-एक करके अपनी चूड़ियाँ तोड़ दीं और अंत में केवल एक ही चूड़ी हाथ में रखी, ताकि शोर न हो। शिक्षा: जहाँ बहुत से लोग रहते हैं, वहाँ विवाद और शोर होता है। अतः साधक को 'एकांत' (अकेले) में ही रहना चाहिए।

8. एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार के गुरु

21. बाण बनाने वाला (Arrow-maker): एक बाण बनाने वाला लोहार अपने काम में इतना एकाग्र था कि उसके पास से राजा की पूरी सेना और गाजे-बाजे गुजर गए, परंतु उसे पता ही नहीं चला। शिक्षा: परमात्मा के ध्यान में मनुष्य का मन ऐसा ही 'एकाग्र' होना चाहिए कि उसे बाहरी संसार का भान न रहे।
22. सर्प (Snake): सर्प कभी अपना घर (बिल) स्वयं नहीं बनाता। वह चूहों द्वारा बनाए गए बिलों में जाकर रहता है। शिक्षा: संन्यासी को अपने लिए घर बनाने के प्रपंच में नहीं पड़ना चाहिए। घर बनाना दुःखों का कारण है।
23. मकड़ी (Spider): मकड़ी अपने ही भीतर से जाला (Web) निकालती है, उसमें खेलती है, और अंत में उसे अपने भीतर ही समेट (निगल) लेती है। शिक्षा: परमात्मा भी अपनी माया से इस संसार की रचना करते हैं, उसमें रमण करते हैं, और प्रलय के समय इस पूरे ब्रह्मांड को अपने ही भीतर समेट लेते हैं।
24. भृंगी कीड़ा (Wasp/Peshakrit): भृंगी कीड़ा एक साधारण इल्ली (कैटरपिलर) को पकड़कर मिट्टी के घर में बंद कर देता है। वह इल्ली भय के मारे निरंतर उस भृंगी कीड़े का ही ध्यान (चिंतन) करती रहती है। और आश्चर्य की बात है कि लगातार ध्यान करने से वह साधारण इल्ली भी स्वयं भृंगी कीड़ा बन जाती है! शिक्षा: मनुष्य जिस वस्तु या देवता का निरंतर ध्यान करता है, वह अंततः उसी का स्वरूप (तद्रूप) प्राप्त कर लेता है। यदि हम निरंतर परमात्मा का ध्यान करेंगे, तो हम भी ईश्वर के स्वरूप में लीन हो जाएंगे।
कथा के अंत में अवधूत दत्तात्रेय महाराज यदु से कहते हैं— "हे राजन्! इन 24 गुरुओं के अतिरिक्त मेरा एक 25वाँ गुरु भी है, और वह है मेरा 'स्वयं का शरीर'। यह शरीर मुझे सिखाता है कि यह नश्वर है, एक दिन नष्ट हो जाएगा। इसलिए इसका अहंकार नहीं करना चाहिए।"

कथा का आध्यात्मिक निष्कर्ष (सार)

भगवान श्रीकृष्ण ने यह परम ज्ञान उद्धव जी को इसलिए सुनाया ताकि वे यह समझ सकें कि सच्चा गुरु बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य की अपनी दृष्टि (विवेक) में है। यदि मनुष्य के भीतर सीखने की लगन है, तो पृथ्वी का कण-कण उसे ब्रह्म-ज्ञान दे सकता है। मोह और आसक्ति (चाहे वह भगवान के साकार रूप से ही क्यों न हो) मुक्ति के मार्ग में बाधा है। उद्धव जी इस ज्ञान को प्राप्त करके परम शांत हो गए और भगवान की आज्ञा मानकर 'बद्रिकाश्रम' (बद्रीनाथ) चले गए, जहाँ उन्होंने जीवन भर इसी 'हंस गीता' का ध्यान करते हुए परम गति प्राप्त की।

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