द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण और महारानी जाम्बवती के एक अत्यंत पराक्रमी और रूपवान पुत्र थे, जिनका नाम था— साम्ब। साम्ब का रूप इतना मनमोहक था कि जो भी उन्हें देखता, मुग्ध हो जाता था। उनका तेज और पराक्रम यदुवंशियों की कीर्ति को और बढ़ाता था। एक बार हस्तिनापुर के राजकुमार दुर्योधन ने अपनी परम सुंदरी पुत्री 'लक्ष्मणा' का स्वयंवर आयोजित किया। इस स्वयंवर में भारतवर्ष के बड़े-बड़े महारथी और राजकुमार पधारे थे। इसी स्वयंवर से एक ऐसी घटना का आरंभ हुआ जिसने हस्तिनापुर के कौरवों के अहंकार को चकनाचूर कर दिया और तीनों लोकों को दाऊ भैया (बलराम जी) के 'हलायुध' (हल रूपी अस्त्र) की भयंकर शक्ति का दर्शन कराया।
कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर में दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा के स्वयंवर की तैयारियां पूरी भव्यता के साथ चल रही थीं। सभा में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, शल्य और दुर्योधन जैसे अजेय योद्धा उपस्थित थे। तभी उस भरी सभा में यदुवंशी राजकुमार 'साम्ब' ने प्रवेश किया। साम्ब को लक्ष्मणा पसंद आ गई और उन्होंने देखा कि लक्ष्मणा का मन भी उन्हीं की ओर आकर्षित है।
अपने पिता श्रीकृष्ण और पितामह शूरसेन के पराक्रम का स्मरण करते हुए, साम्ब ने किसी की परवाह किए बिना क्षत्रिय धर्म (राक्षस विवाह पद्धति) के अनुसार भरी सभा से लक्ष्मणा का हरण कर लिया। उन्होंने लक्ष्मणा को अपने रथ पर बैठाया और द्वारका की ओर चल दिए।
कौरवों के सभी महारथी अपने रथों पर सवार होकर साम्ब का पीछा करने लगे। कुछ ही दूरी पर उन्होंने साम्ब को घेर लिया। परंतु साम्ब भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र थे, वे किसी से भयभीत होने वाले नहीं थे। अकेले साम्ब ने अपने धनुष की टंकार से कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया। कर्ण, शल्य और अन्य महारथियों के बाणों को उन्होंने खेल-खेल में काट दिया।
जब कौरवों ने देखा कि अकेले इस बालक को सीधे युद्ध में हराना संभव नहीं है, तो उन्होंने क्षत्रिय धर्म और युद्ध के नियमों को ताक पर रख दिया। छह-छह महारथियों ने एक साथ मिलकर उस अकेले बालक पर आक्रमण कर दिया। किसी ने उनके रथ के घोड़े मार दिए, किसी ने सारथि को गिरा दिया और किसी ने उनका धनुष काट दिया। निहत्थे साम्ब को कौरवों ने बंदी बना लिया और उन्हें तथा लक्ष्मणा को हस्तिनापुर लाकर कारागार में डाल दिया।
जब देवर्षि नारद के माध्यम से द्वारका में यह समाचार पहुँचा कि कौरवों ने युद्ध के नियमों का उल्लंघन करके अकेले साम्ब को बंदी बना लिया है, तो यदुवंशी क्रोध से उबल पड़े। राजा उग्रसेन के आदेश पर सात्यकि, प्रद्युम्न, अक्रूर और अन्य यदुवंशी योद्धा कौरवों को नष्ट करने के लिए अपनी-अपनी सेनाएं सजाने लगे।
परंतु बलराम जी (दाऊ भैया) ने उन्हें शांत किया। बलराम जी का कौरवों (विशेषकर दुर्योधन, जो उनका गदा-शिष्य था) से विशेष स्नेह था। वे नहीं चाहते थे कि यदुवंशियों और कुरुवंशियों के बीच कोई भयानक युद्ध हो।
बलराम जी ने कहा— "हे यदुवंशियों! शांत हो जाओ। कौरव हमारे संबंधी हैं। मैं स्वयं हस्तिनापुर जाऊँगा और दुर्योधन को समझा-बुझाकर, राजा उग्रसेन का संदेश देकर साम्ब और उसकी वधू को ले आऊँगा। व्यर्थ में रक्तपात ठीक नहीं है।"
बलराम जी अपने रथ पर सवार होकर कुछ प्रमुख ब्राह्मणों और यदुवंशी वृद्धों के साथ हस्तिनापुर पहुँचे। उन्होंने नगर में प्रवेश नहीं किया, बल्कि नगर के बाहर एक बगीचे में अपना डेरा डाल दिया। उन्होंने उद्धव जी को कौरवों की सभा में भेजा कि जाकर बता दें कि 'बलराम आए हैं।'
यह सुनकर भीष्म, द्रोण, दुर्योधन और कर्ण आदि अत्यंत प्रसन्न हुए और हाथ में अर्घ्य (पूजा की सामग्री) लेकर बलराम जी के स्वागत के लिए बगीचे में आए। उन्होंने बलराम जी को प्रणाम किया और कुशल-मंगल पूछा।
बलराम जी ने अत्यंत गंभीर और शांत स्वर में कौरवों से कहा— "हे कुरुवंशियों! हमारे महाराज उग्रसेन ने आप लोगों के लिए एक आज्ञा भेजी है। आप लोगों ने जिस प्रकार मिलकर हमारे अकेले बालक साम्ब को बंदी बनाया है, वह निंदनीय है। फिर भी, मैं सब कुछ भुलाने को तैयार हूँ। आप लोग तुरंत साम्ब और मेरी पुत्रवधू लक्ष्मणा को मेरे साथ विदा कर दें।"
'उग्रसेन की आज्ञा' शब्द सुनते ही कौरवों का सोया हुआ अहंकार जाग उठा। सत्ता के मद में अंधे कौरवों ने बलराम जी (जो साक्षात शेषनाग के अवतार हैं) का घोर अपमान करना शुरू कर दिया।
यदुपानेच्छति पदं शिरोभिः कृतशेखरम् ॥
(श्रीमद्भागवत 10.68.25)
ऐसा भयंकर अपमान करके कौरव बलराम जी को पीठ दिखाकर हस्तिनापुर के भीतर लौट गए।
कौरवों के वे कटु और अपमानजनक वचन सुनकर बलराम जी का धैर्य टूट गया। उनके नेत्र क्रोध से लाल हो गए, मानो उनमें से अग्नि की लपटें निकल रही हों। उनका शरीर कांपने लगा और वे जोर-जोर से हँसने लगे।
तेषां हि प्रशमो दण्डः पशूनां लगुडो यथा ॥
(श्रीमद्भागवत 10.68.31)
अपने भयंकर क्रोध में भरकर बलराम जी ने अपना अमोघ अस्त्र 'हल' (हलायुध) उठाया। उन्होंने अपने हल की नोक को हस्तिनापुर नगर की बाहरी चारदीवारी (परकोटे) में फंसा दिया। साक्षात शेषनाग रूपी बलराम जी ने अपनी अनंत शक्ति से उस पूरे नगर को उखाड़ लिया और उसे खींचकर पास ही बह रही गंगा नदी में डुबाने के लिए चल पड़े।
हस्तिनापुर की धरती फटने लगी। महल, किले, दीवारें और सड़कें एक नाव की तरह डगमगाने लगीं। पूरे नगर में ऐसा भयंकर भूकंप आया कि लगा प्रलय का समय आ गया है। हस्तिनापुर गंगा की ओर खिसकने लगा।
जब दुर्योधन, भीष्म, द्रोण और अन्य कौरवों ने देखा कि उनका पूरा नगर गंगा में समाने वाला है, तो उनका सारा घमंड चूर-चूर हो गया। मौत को सामने देखकर वे थर-थर कांपने लगे। अपने प्राणों और नगर की रक्षा के लिए वे तुरंत भागते हुए बलराम जी के पास पहुँचे।
कौरवों ने साम्ब को और लक्ष्मणा को आगे कर दिया और बलराम जी के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने हाथ जोड़कर रुंधे गले से स्तुति की— "हे त्राहिमाम! हे राम! हे जगदाधार! आप साक्षात इस ब्रह्मांड को धारण करने वाले अनंत शेष हैं। हम अज्ञानी हैं, हम आपके प्रभाव को नहीं जानते थे। कृपया हमारे अपराधों को क्षमा करें और इस नगर की रक्षा करें।"
कौरवों को अपनी शरण में आया देख और उनकी दीन प्रार्थना सुनकर, करुणासागर बलराम जी का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने अपने हल को रोक लिया और कौरवों को 'अभयदान' दिया। (आज भी हस्तिनापुर का वह हिस्सा गंगा की ओर झुका हुआ माना जाता है, जो बलराम जी की शक्ति का प्रमाण है)।
कौरवों ने अपनी भूल सुधारते हुए, साम्ब और लक्ष्मणा का अत्यंत धूमधाम से विवाह संपन्न कराया। दुर्योधन ने दहेज में हजारों हाथी, लाखों घोड़े, रथ और अपार धन-संपत्ति देकर अपनी पुत्री लक्ष्मणा को विदा किया। बलराम जी नवदम्पति को लेकर ससम्मान द्वारका लौट आए, जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ।
श्रीमद्भागवत की यह कथा हमें बताती है कि 'अहंकार' मनुष्य की बुद्धि को इतना भ्रष्ट कर देता है कि वह अपने हितैषियों और शांति दूतों का भी अपमान कर बैठता है। बलराम जी का यह चरित्र यह भी सिखाता है कि सज्जन पुरुष पहले पूर्ण शांति का प्रयास करते हैं (जैसा उन्होंने दूत बनकर किया), परंतु यदि दुष्ट अपनी उद्दंडता न छोड़े, तो उसे उसके ही अहंकार की भाषा में 'दंड' देना ही उचित नीति है।

