Aghasura Vadh: Krishna Ajgar Leela Aur Van Vihar Bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

अघासुर वध (अजगर लीला) और वन-विहार का आनंद

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 12)

वृन्दावन की वह पावन भूमि, जहाँ के वृक्ष, लताएं, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि धूल का एक-एक कण भी परब्रह्म के स्पर्श से चैतन्य हो चुका था! भगवान श्रीकृष्ण ने गोकुलवासियों को कंस के राक्षसों से बचाने के लिए वृन्दावन में प्रवेश किया था। एक दिन भगवान का मन हुआ कि आज सभी सखाओं के साथ मिलकर वन में एक बड़ा 'वन-विहार' (पिकनिक) किया जाए। बाल-सखाओं के इस आनंदोत्सव के बीच में ही एक महाभयंकर और मायावी दैत्य 'अघासुर' ने अजगर का रूप धारण करके प्रवेश किया। यह लीला न केवल भगवान की शक्ति का परिचायक है, बल्कि इसमें जीव और ईश्वर के बीच के अगाध विश्वास का भी अद्भुत दर्शन है।

1. वन-विहार (पिकनिक) की तैयारी और प्रस्थान

एक दिन प्रातःकाल भगवान श्रीकृष्ण ने विचार किया कि आज वन में जाकर कलेवा (सुबह का भोजन) किया जाएगा। उन्होंने अपनी सींग की बनी हुई बाँसुरी (शृंगी) बजाई, जिसकी मधुर ध्वनि सुनकर सभी ग्वाल-बाल और बछड़े जाग गए।

॥ भगवान का वन प्रस्थान ॥
क्वचिद् वनाशाय मनो दधद्धरिः
प्रातः समुत्थाय वयस्यवत्सपान् ।
प्रबोधयन् शृङ्गरवेण चारुणा
विनिर्गतो वत्सपुरःसरो विभुः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— एक दिन वन में बैठकर भोजन (वनाशाय) करने की इच्छा से भगवान श्रीहरि प्रातःकाल ही उठे। अपनी अत्यंत मधुर सींग की बांसुरी (शृंगी) बजाकर उन्होंने अपने सभी सखाओं को जगाया और बछड़ों को आगे करके वन की ओर निकल पड़े।

कन्हैया को आगे बढ़ता देख, वृन्दावन के हजारों ग्वाल-बाल अपने-अपने घरों से स्वादिष्ट भोजन की पोटलियां (छींके) लेकर और अपने-अपने बछड़ों को हांकते हुए भगवान के पीछे-पीछे अत्यंत उत्साह से चल पड़े।

2. वृन्दावन में बालकों का वन-विहार और क्रीड़ा

वृन्दावन पहुँचकर उन बालकों ने जो आनंद प्राप्त किया, वह बड़े-बड़े योगियों को समाधि में भी दुर्लभ है। भगवान अपने ऐश्वर्य को भुलाकर एक साधारण बालक की भाँति अपने मित्रों के साथ खेल रहे थे।

॥ ग्वाल-बालों की क्रीड़ा ॥
यदि दूरं गतः कृष्णो वनशोभेक्षणाय तम् ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति संस्पृश्य रेमिरे ॥
अर्थ: जब श्रीकृष्ण वन की सुंदरता देखने के लिए थोड़ी दूर आगे निकल जाते, तो सभी सखा 'मैं पहले छूऊंगा! मैं पहले छूऊंगा!' (अहं पूर्वमहं पूर्वम्) ऐसा कहते हुए दौड़ पड़ते और भगवान को स्पर्श करके परमानंद प्राप्त करते थे।

कभी वे मोर के पंख लगाकर नाचते, कभी बंदरों के साथ उछल-कूद करते, तो कभी मेंढकों की तरह फुदकते। श्री शुकदेव जी इन ग्वाल-बालों के परम भाग्य की सराहना करते हुए कहते हैं:

॥ ब्रजवासियों का परम सौभाग्य ॥
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या
दास्यं गतानां परदैवतेन ।
मायाश्रितानां नरदारकेण
सार्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः ॥
अर्थ: जो ज्ञानियों के लिए 'ब्रह्मानंद' हैं, भक्तों के लिए जो परम आराध्य 'परमेश्वर' हैं, और अज्ञानियों के लिए जो केवल एक साधारण 'मनुष्य के बालक' हैं, उन्हीं भगवान के साथ वे ग्वाल-बाल खेल रहे थे। निश्चय ही इन बालकों ने पूर्व जन्मों में पुण्य के पहाड़ (पुण्यपुञ्ज) एकत्रित किए होंगे।
3. अघासुर (अजगर दैत्य) का प्रवेश और उसका क्रोध

जब बालकों का यह परम सुखमय वन-विहार चल रहा था, तब कंस द्वारा भेजा गया एक अत्यंत क्रूर और महाभयंकर दैत्य वहाँ आ पहुँचा। उसका नाम था— 'अघासुर'

॥ अघासुर का आगमन ॥
ततोऽघनामाभ्यपतन्महासुरस्-
तेषां सुखं क्रीडनमीक्षणाक्षमः ।
नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभिः
पीतामृतैरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते ॥
अर्थ: तभी 'अघ' नाम का एक महाअसुर वहाँ आ पहुँचा। वह भगवान और बालकों के इस सुखमय खेल को देख नहीं सका (ईर्ष्या से जल उठा)। यह दैत्य इतना भयंकर था कि अमृत पीने वाले अमर देवता भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए सदा इसके मरने की प्रतीक्षा करते रहते थे।

अघासुर वास्तव में 'पूतना' और 'बकासुर' का छोटा भाई था। जब उसने देखा कि इन्हीं बालकों के बीच वह बालक (श्रीकृष्ण) है जिसने मेरे भाई-बहन को मारा है, तो वह क्रोध से पागल हो गया।

॥ दैत्य का संकल्प ॥
दृष्ट्वार्भकान् कृष्णमुखानघासुरः
कंसानुशिष्टः स बकीबकानुजः ।
अयं तु मे सोदरनाशकृत् तयोर्-
द्वयोर्मयैनं सबलं हनिष्ये ॥
अर्थ: कंस की आज्ञा से आया हुआ पूतना (बकी) और बकासुर का भाई अघासुर, श्रीकृष्ण और बालकों को देखकर सोचने लगा— "इसी ने मेरे भाई-बहन की हत्या की है। आज मैं इन सबको और इस कृष्ण को एक साथ मारकर उनका बदला लूँगा।"
4. अघासुर का अजगर रूप और बालकों का प्रवेश

यह निश्चय करके उस मायावी अघासुर ने एक अत्यंत विशाल 'अजगर' (विशालकाय सर्प) का रूप धारण कर लिया। वह इतना बड़ा था कि उसका शरीर आठ मील लंबा था। उसने अपना मुख एक पहाड़ की गुफा की तरह खोल लिया और रास्ते में लेट गया।

॥ अजगर का खुला मुख ॥
धराघरोष्ठाग्रमुदग्रतालु
गुहाननान्तं शिखराभदंष्ट्रम् ।
अन्तः समत्वं तमसोग्रगन्धं
पथि व्यशेत ग्रसनाशया खलः ॥
अर्थ: उसका निचला होंठ धरती पर और ऊपरी होंठ बादलों को छू रहा था। उसका मुख एक विशाल गुफा के समान था, जिसके दाँत पहाड़ की चोटियों जैसे थे। भीतर घोर अंधकार और गले से भयंकर दुर्गंध आ रही थी। वह दुष्ट बालकों को निगलने की इच्छा से रास्ते में लेट गया।

बालकों ने जब इस विशाल अजगर को देखा, तो वे उसे सचमुच पहाड़ की कोई नई गुफा समझ बैठे। उन्होंने सोचा कि इसके दाँत तो पत्थर हैं और भीतर का अंधकार गुफा का अंधेरा है। आपस में बातें करते हुए, बिना किसी डर के वे उस अजगर के मुख में प्रवेश करने लगे। उन्हें अपने सखा 'कन्हैया' पर पूर्ण विश्वास था।

॥ बालकों का विश्वास ॥
अन्तो विशामो न भयं हि नः सखे
हनिष्यतीत्थं बकवत् स माधवः ।
इत्थं मिथो भाषितवन्तस्तदा
विशुर्गुहां बालका भूरिकौतुकाः ॥
अर्थ: ग्वाल-बालों ने आपस में कहा— "मित्रों! चलो इस गुफा के भीतर चलते हैं। हमें कोई भय नहीं है। यदि यह कोई राक्षस भी होगा, तो हमारा कन्हैया (माधव) इसे बकासुर की तरह मार डालेगा।" यह कहते हुए वे हँसते-खेलते उस गुफा (अजगर के मुख) में प्रवेश कर गए।
भक्तों का ईश्वर पर ऐसा ही अटल विश्वास होना चाहिए। मृत्यु के मुख (अजगर) में जाते हुए भी ग्वाल-बाल निडर थे, क्योंकि वे जानते थे कि हमारा रक्षक स्वयं पीछे आ रहा है!
5. श्रीकृष्ण की चिंता और स्वयं मुख में प्रवेश

भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। जब उन्होंने देखा कि मेरे भोले-भाले सखा अज्ञानवश मृत्यु के मुख में जा रहे हैं, तो वे एक क्षण के लिए चिंतित हो गए।

॥ भगवान का प्रवेश ॥
भगवानपि तान् वीक्ष्य विवशान् भूरिकम्पितान् ।
प्रविवेश गुहां कृष्णो निजप्राणपरीप्सया ॥
अर्थ: जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके प्राण-प्रिय सखा विवश होकर उस दैत्य के मुख में चले गए हैं, तो अपने प्राणों (मित्रों) की रक्षा करने के लिए भगवान स्वयं भी उस गुफा (अजगर के मुख) के भीतर प्रविष्ट हो गए।
6. अघासुर का गला घोंटना और उसका संहार

जैसे ही भगवान भीतर गए, अघासुर ने अपना भयानक मुख बंद कर लिया। भीतर विषैली गैस और अग्नि के कारण सभी बालकों के प्राण संकट में आ गए। तब साक्षात नारायण श्रीकृष्ण ने अपने शरीर को बढ़ाना (विस्तार करना) आरंभ किया।

॥ दैत्य का दम घुटना ॥
ततोऽतिमात्रं प्रविवृद्धकायो
गले निरुद्धोऽस्य रुषा महोग्रः ।
रुद्ध्वा श्वासं निष्पपात
दृशोर्विनिर्गत्य विदीर्णमस्तकः ॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शरीर को इतना अधिक बड़ा कर लिया कि उस भयंकर दैत्य के गले का रास्ता पूरी तरह से रुक गया। श्वास रुक जाने के कारण उसकी आँखें बाहर निकल आईं और अंततः उसका मस्तक (सिर) फट गया, जिससे उसके प्राण बाहर निकल गए।

दैत्य के मरते ही भगवान ने अपनी अमृतमयी दृष्टि से सभी मृतप्राय ग्वाल-बालों और बछड़ों को पुनः जीवित कर दिया और सबको लेकर उसके फटे हुए मस्तक से बाहर आ गए।

7. अघासुर की सायुज्य मुक्ति और आध्यात्मिक संदेश

जब अघासुर का प्राणांत हुआ, तो उसके शरीर से एक अत्यंत अद्भुत और चमत्कारी ज्योति (प्रकाश) निकली और वह आकाश में स्थित हो गई।

॥ अघासुर की परम गति ॥
तदेकमद्भुतं ज्योतिरघासुरशरीरगम् ।
प्रतीक्ष्य कृष्णमेवाशु विवेश तस्मिन् पश्यताम् ॥
अर्थ: अघासुर के शरीर से निकली हुई वह एक अत्यंत अद्भुत ज्योति (आत्मा), आकाश में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। और फिर सभी देवताओं के देखते ही देखते, वह ज्योति साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के भीतर प्रवेश कर गई (उसे सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई)।
अघासुर का आध्यात्मिक रहस्य: 'अघ' का अर्थ होता है— पाप (Sin/Guilt)। मनुष्य के भीतर जन्म-जन्मांतरों के पाप एक अजगर की भाँति कुंडली मारे बैठे रहते हैं, जो जीव को निगल जाना चाहते हैं। परंतु जब जीव पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को 'कृष्ण' के चरणों में समर्पित कर देता है, तो भगवान स्वयं उसके हृदय में प्रवेश करते हैं और अपने दिव्य ज्ञान के विस्तार से उन सभी पापों (अघासुर) का गला घोंट कर जीव को परम मुक्ति प्रदान करते हैं।

आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की। ब्रह्मा जी भी इस अद्भुत दृश्य को अपने लोक से देख रहे थे। यहाँ भगवान ने एक अत्यंत क्रूर दैत्य को भी अपनी शरण देकर यह सिद्ध कर दिया कि उनकी कृपा अहैतुकी (बिना कारण) है।

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