Brahma Vimohan Leela: Brahma Ji Ka Moh Aur Krishna Ki Maya bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

ब्रह्मा-विमोहन लीला: ब्रह्मा जी का मोह और भगवान की अचिंत्य माया

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 13 और 14)

अघासुर के भयंकर मुख से अपने सखाओं को बचाकर जब भगवान श्रीकृष्ण बाहर आए, तो स्वर्ग के देवता भी चकित रह गए। स्वयं सृष्टि के रचयिता 'ब्रह्मा जी' भी अपने लोक से यह सब देख रहे थे। उनके मन में एक विचित्र संशय उत्पन्न हुआ— "यह कैसा बालक है जो अघासुर जैसे दैत्य को खेल-खेल में मार देता है? क्या सचमुच यह परब्रह्म है? लाओ, आज मैं इसके ऐश्वर्य की परीक्षा लूँ!" ब्रह्मा जी का यह मोह कोई साधारण घटना नहीं थी; यह तो भगवान की रची हुई एक ऐसी अलौकिक लीला की पृष्ठभूमि थी, जिसमें भगवान ने यह सिद्ध कर दिया कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड और उसके रचयिता भी उन्हीं के भीतर समाहित हैं। आइए, इस परम ज्ञानमयी लीला का श्रवण करें।

1. यमुना तट पर सखाओं के साथ भगवान का भोजन (कलेवा)

अघासुर वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी सखाओं को यमुना नदी के अत्यंत सुंदर रेतीले तट (पुलिन) पर भोजन करने के लिए बिठाया। सभी ग्वाल-बाल अपने-अपने घरों से लाए हुए दही-चावल और माखन (कलेवा) की पोटलियां खोलकर भगवान के चारों ओर गोल घेरा बनाकर बैठ गए।

॥ भगवान की भोजन लीला ॥
बिभ्रद् वेणुं जठरपटयोः शृङ्गवेत्रे च कक्षे
वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ।
तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन् नर्मगोष्ठ्या
स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलिः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— जिन्होंने अपनी बांसुरी को कमर के वस्त्र (फेंटे) में खोंस रखा है, बाईं काँख (बगल) में सींग और छड़ी दबा रखी है, बाएँ हाथ में दही-चावल का अत्यंत स्वादिष्ट ग्रास (कौर) लिया हुआ है, और उंगलियों के बीच में अचार-फल फँसाए हुए हैं; वे यज्ञों के भोक्ता भगवान श्रीकृष्ण स्वर्ग के देवताओं के देखते-देखते बालकों के बीच बैठकर उन्हें अपनी मीठी बातों से हँसाते हुए बाल-क्रीड़ा कर रहे थे।
2. बछड़ों का भटकना और कन्हैया का खोजना

जब ग्वाल-बाल आनंदपूर्वक भोजन कर रहे थे, तो उनके बछड़े हरी-हरी घास चरते हुए वन में बहुत दूर निकल गए। बालकों को चिंता हुई। तब भगवान ने कहा— "मित्रों! तुम अपना भोजन मत छोड़ो, मैं ही जाकर बछड़ों को ढूँढ लाता हूँ।"

॥ कन्हैया का वन में जाना ॥
इत्युक्त्वाद्रिदरीकुञ्ज गह्वरेष्वनुवत्सकान् ।
विचिन्वन् भगवान् कृष्णः सपाणिकवलो ययौ ॥
अर्थ: अपने मित्रों से ऐसा कहकर, हाथ में दही-चावल का कौर (ग्रास) लिए हुए ही भगवान श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत की कंदराओं, कुंजों और भयानक गुफाओं में अपने बछड़ों को ढूँढने के लिए निकल पड़े।
3. ब्रह्मा जी का मोह और बालकों का हरण

यही वह क्षण था जब ब्रह्मा जी ने अपनी माया दिखाई। जब कन्हैया बछड़ों को ढूँढने गए, तो ब्रह्मा जी ने वहां से सभी बछड़ों को चुरा लिया और उन्हें एक मायावी गुफा में सुला दिया। जब कन्हैया बछड़ों को न पाकर यमुना तट पर लौटे, तो देखा कि उनके सखा (ग्वाल-बाल) भी वहां नहीं थे!

॥ बालकों का अदृश्य होना ॥
ततो वत्सानदृष्ट्वैत्य पुलिनेऽपि च वत्सपान् ।
उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्ततः ॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने जब बछड़ों को नहीं देखा, तो वे यमुना के तट पर लौट आए। परंतु वहां आकर उन्होंने देखा कि ग्वाल-बाल भी नहीं हैं। तब श्रीकृष्ण वन में चारों ओर बछड़ों और बालकों दोनों को खोजने लगे।
4. भगवान का अंतर्यामी रूप और लीला का संकल्प

भगवान श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं है। जब उन्होंने अपने ज्ञान-नेत्रों से देखा, तो उन्हें ज्ञात हो गया कि यह सब ब्रह्मा जी की करतूत है। वे मेरी माया को परखना चाहते हैं।

॥ ब्रह्मा की माया का ज्ञान ॥
विज्ञायाखिलदृग् कृष्णः सर्वं ब्रह्माकृतं ह्यदः ।
वत्सान् वत्सपकांश्चापि सर्वं ससृजे स्वयम् ॥
अर्थ: सम्पूर्ण ब्रह्मांड को देखने वाले (अखिलदृग्) भगवान श्रीकृष्ण ने जान लिया कि यह सब कृत्य ब्रह्मा जी का ही किया हुआ है। तब माताओं के दुःख को दूर करने के लिए भगवान ने स्वयं ही उन बछड़ों और ग्वाल-बालों का रूप रच लिया (स्वयं वही बन गए)।
5. स्वयं बछड़े और ग्वाल-बाल बन जाना (सर्वात्म भाव)

यहाँ भगवान का वह अद्भुत ऐश्वर्य प्रकट हुआ, जो वेदों का परम सार है— 'एकमेवाद्वितीयम्' (वह एक ही अनेक रूपों में प्रकट है)। जितने बछड़े थे, जितने ग्वाल-बाल थे, उनकी जैसी लाठियाँ थीं, जैसी बांसुरी थी, जैसे वस्त्र थे, भगवान श्रीकृष्ण ने ठीक वैसा ही रूप धारण कर लिया।

॥ भगवान का अनंतानंत विस्तार ॥
यावद्वत्सपवत्सकाल्पकवपुर्यावत्कराङ्घ्र्यादिकं
यावद्यष्टिविषाणवेणुदलशिग्यावद्विभूषाम्बरम् ।
यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद्विहारादिकं
सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ ॥
अर्थ: उन ग्वाल-बालों और बछड़ों के जैसे छोटे-छोटे शरीर थे, जैसे उनके हाथ-पैर थे, जैसी उनकी लाठियाँ, सींग, बांसुरी और छींके थे, जैसे उनके वस्त्र और आभूषण थे, जैसा उनका स्वभाव, गुण, नाम, रूप, आयु और खेलने का तरीका था— भगवान (अजः) सर्वस्वरूप होकर बिल्कुल वैसा ही रूप धारण करके सुशोभित होने लगे। सब कुछ 'विष्णुमय' हो गया।
लीला का माधुर्य: कन्हैया स्वयं ही बछड़े बने और स्वयं ही ग्वाल-बाल बनकर उन बछड़ों को हांकने लगे। शाम होने पर वे अपने इन अनेक रूपों के साथ वृन्दावन लौट आए। किसी भी ब्रजवासी माता-पिता या गाय को यह पता ही नहीं चला कि उनके असली बालक तो ब्रह्मा जी की गुफा में सो रहे हैं।
6. एक वर्ष तक ब्रज में आनंद और बलराम जी का आश्चर्य

यह लीला कोई एक-दो दिन नहीं, पूरे 'एक वर्ष' तक चलती रही। इस एक वर्ष में गोकुल की गायों और माताओं का अपने बालकों के प्रति प्रेम अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया। माताएं अपने बालकों को दूध पिलातीं तो उन्हें ऐसा परमानंद मिलता मानो वे स्वयं परब्रह्म को दूध पिला रही हों (और वास्तव में वे भगवान को ही दूध पिला रही थीं)।

एक दिन बलराम जी ने जब गायों का अपने बछड़ों के प्रति यह असाधारण और अकारण प्रेम देखा, तो वे आश्चर्य में पड़ गए।

॥ बलराम जी का आश्चर्य ॥
किमेतदद्भुतमिव वासुदेवेऽखिलात्मनि ।
व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते ॥
अर्थ: बलराम जी ने मन में विचार किया— "यह कितना बड़ा आश्चर्य है! सम्पूर्ण आत्माओं के आत्मा साक्षात भगवान 'वासुदेव' में जैसा प्रेम होता है, वैसा ही अपूर्व और बढ़ता हुआ प्रेम ब्रजवासियों का अपने बालकों में क्यों दिखाई दे रहा है? यह निश्चय ही मेरे कन्हैया की कोई माया है।"

जब बलराम जी ने अपने ज्ञान-नेत्रों से ध्यान लगाकर देखा, तो वे समझ गए कि ये सभी ग्वाल-बाल और बछड़े कोई और नहीं, स्वयं मेरे भाई श्रीकृष्ण ही हैं। तब उन्होंने कन्हैया से यह अत्यंत गूढ़ प्रश्न किया:

॥ श्री बलराम जी का प्रश्न ॥
नैते सुरेशा ऋषयो न चैते
त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि ।
सर्वं पृथक्त्वं निगमात्कथं वदे-
त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत् ॥
अर्थ: बलराम जी ने श्रीकृष्ण से पूछा— "हे ईश! ये ग्वाल-बाल कोई देवता (सुरेश) नहीं हैं, और ये बछड़े कोई ऋषि भी नहीं हैं। इन सभी भिन्न-भिन्न रूपों में केवल आप ही सुशोभित हो रहे हैं। आप मुझे इस रहस्य को बताइये।" ऐसा पूछने पर भगवान ने उन्हें सब वृत्तांत बता दिया, जिसे सुनकर बलराम जी सब समझ गए।
7. ब्रह्मा जी की वापसी और उनका भयंकर भ्रम

ब्रह्मलोक का 'एक पल' पृथ्वी के 'एक वर्ष' के बराबर होता है। एक क्षण पश्चात जब ब्रह्मा जी लौटकर आए, तो उन्होंने देखा कि जो बालक और बछड़े वे गुफा में सुलाकर गए थे, वे तो ज्यों के त्यों कन्हैया के साथ यमुना तट पर खेल रहे हैं!

॥ ब्रह्मा का भ्रम ॥
तावदेत्यात्मभूरात्ममानेन त्रुट्यनन्तरम् ।
वृन्दावनं प्राग्खैलद्वत्सपालान् ददर्श ह ॥
अर्थ: अपने कालमान से 'एक त्रुटि' (क्षण भर) के पश्चात जब ब्रह्मा जी (आत्मभू) लौटकर आए, तो उन्होंने वृन्दावन में पूर्ववत (पहले की ही तरह) बछड़ों और ग्वाल-बालों को खेलते हुए देखा।

ब्रह्मा जी चकरा गए। उन्होंने सोचा— "क्या मेरी माया झूठी है? गुफा वाले बालक असली हैं या ये वाले?" उनके नेत्रों के सामने भगवान ने एक और महाचमत्कार कर दिया।

8. ग्वाल-बालों का चतुर्भुज 'नारायण' रूप में दर्शन

ब्रह्मा जी के देखते ही देखते वे सभी बछड़े और ग्वाल-बाल अपने साधारण रूप को छोड़कर नीलमणि के समान चमकने वाले चतुर्भुज विष्णु (नारायण) रूप में बदल गए।

॥ सभी बालकों का नारायण रूप ॥
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः ।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥
अर्थ: वे सभी बालक और बछड़े सत्य, ज्ञान, अनंत और परमानंद की साक्षात मूर्तियाँ बन गए। उनका वह महान ऐश्वर्य ऐसा था जिसे उपनिषदों के बड़े-बड़े ज्ञाता भी अपने मन और वाणी से स्पर्श नहीं कर सकते।

ब्रह्मा जी ने देखा कि प्रत्येक बालक के चार हाथ हैं, गले में वनमाला है, और स्वयं ब्रह्मा, शिव और सभी देवता उन नारायणों की स्तुति कर रहे हैं। ब्रह्मा जी का अहंकार चकनाचूर हो गया। वे अपने वाहन हंस से नीचे गिरे और एक डंडे की तरह भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लोट गए।

9. ब्रह्मा जी का अहंकार टूटना और 'ब्रह्मा-स्तुति'

भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि ब्रह्मा जी का मोह भंग हो गया है, तो उन्होंने अपनी माया का पर्दा हटा लिया। ब्रह्मा जी ने उठकर अपने चारों सिरों को भगवान के चरणों में रगड़ते हुए 40 श्लोकों में अत्यंत भावपूर्ण 'ब्रह्मा स्तुति' आरंभ की:

॥ ब्रह्मा स्तुति ॥
नौमीड्य तेऽभ्रवपुषे तडिदम्बराय
गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥
अर्थ: (ब्रह्मा जी ने कहा)— "हे स्तुति करने योग्य प्रभो! जिनका शरीर बादलों के समान श्याम है, जो बिजली के समान चमकता हुआ पीताम्बर पहने हैं, जिनके कानों में गुंजा और सिर पर मोरपंख है, जो वनमाला पहने हैं, और जिनके हाथों में भोजन का कौर, छड़ी, सींग और बांसुरी सुशोभित है— मैं उन कोमल चरणों वाले गोपनंदन (श्रीकृष्ण) को बारंबार प्रणाम करता हूँ।"

अपनी स्तुति के दौरान, ब्रह्मा जी ने भगवान से क्षमा मांगते हुए वह परम श्लोक कहा, जो शरणागति और भक्ति मार्ग का सबसे बड़ा सिद्धांत है:

॥ अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा ॥
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥
अर्थ: "हे प्रभो! जो मनुष्य निरंतर आपकी अहैतुकी कृपा की ही प्रतीक्षा करता रहता है, और अपने पूर्व कर्मों के फल (सुख-दुःख) को प्रसन्नतापूर्वक भोगता हुआ, अपने मन, वाणी और शरीर से आपके चरणों में प्रणाम करता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह आपके परम पद (मुक्ति) का उसी प्रकार अधिकारी हो जाता है, जैसे पुत्र पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी होता है।"
10. क्षमा याचना और सत्यलोक प्रस्थान

ब्रह्मा जी ने रोते हुए भगवान से अपने अपराध (चोरी) की क्षमा माँगी। उन्होंने कहा— "प्रभो! मैं तो अज्ञान के अंधकार में पैदा हुआ एक छोटा सा जीव हूँ। मेरी क्या औकात जो मैं आपकी माया को समझ सकूँ।" भगवान ने कुछ नहीं कहा, केवल मंद-मंद मुस्कुराते रहे।

॥ ब्रह्मा जी की विदाई ॥
इत्यभिष्टूय भूमानं त्रिः परिक्रम्य पादयोः ।
नत्वाभीष्टं जगद्धाता स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥
अर्थ: इस प्रकार उन अनंत (भूमान) भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करके, उनके चरणों की तीन बार परिक्रमा करके और अपने अभीष्ट (इष्टदेव) को बारंबार प्रणाम करके, जगत के रचयिता ब्रह्मा जी अपने निज धाम (सत्यलोक) को लौट गए।

ब्रह्मा जी के जाने के बाद, भगवान ने गुफा में सोए हुए असली बालकों और बछड़ों को जगाया। उन बालकों को लगा कि वे बस एक पल के लिए सोए थे। उन्होंने उठकर कन्हैया से कहा— "अरे कन्हैया! तू इतनी जल्दी बछड़े ढूँढ लाया? आ बैठ, हम सब मिलकर भोजन करें।" भगवान मुस्कुराए और सखाओं के साथ बैठकर भोजन करने लगे।

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