अघासुर के भयंकर मुख से अपने सखाओं को बचाकर जब भगवान श्रीकृष्ण बाहर आए, तो स्वर्ग के देवता भी चकित रह गए। स्वयं सृष्टि के रचयिता 'ब्रह्मा जी' भी अपने लोक से यह सब देख रहे थे। उनके मन में एक विचित्र संशय उत्पन्न हुआ— "यह कैसा बालक है जो अघासुर जैसे दैत्य को खेल-खेल में मार देता है? क्या सचमुच यह परब्रह्म है? लाओ, आज मैं इसके ऐश्वर्य की परीक्षा लूँ!" ब्रह्मा जी का यह मोह कोई साधारण घटना नहीं थी; यह तो भगवान की रची हुई एक ऐसी अलौकिक लीला की पृष्ठभूमि थी, जिसमें भगवान ने यह सिद्ध कर दिया कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड और उसके रचयिता भी उन्हीं के भीतर समाहित हैं। आइए, इस परम ज्ञानमयी लीला का श्रवण करें।
अघासुर वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी सखाओं को यमुना नदी के अत्यंत सुंदर रेतीले तट (पुलिन) पर भोजन करने के लिए बिठाया। सभी ग्वाल-बाल अपने-अपने घरों से लाए हुए दही-चावल और माखन (कलेवा) की पोटलियां खोलकर भगवान के चारों ओर गोल घेरा बनाकर बैठ गए।
वामे पाणौ मसृणकवलं तत्फलान्यङ्गुलीषु ।
तिष्ठन् मध्ये स्वपरिसुहृदो हासयन् नर्मगोष्ठ्या
स्वर्गे लोके मिषति बुभुजे यज्ञभुग्बालकेलिः ॥
जब ग्वाल-बाल आनंदपूर्वक भोजन कर रहे थे, तो उनके बछड़े हरी-हरी घास चरते हुए वन में बहुत दूर निकल गए। बालकों को चिंता हुई। तब भगवान ने कहा— "मित्रों! तुम अपना भोजन मत छोड़ो, मैं ही जाकर बछड़ों को ढूँढ लाता हूँ।"
विचिन्वन् भगवान् कृष्णः सपाणिकवलो ययौ ॥
यही वह क्षण था जब ब्रह्मा जी ने अपनी माया दिखाई। जब कन्हैया बछड़ों को ढूँढने गए, तो ब्रह्मा जी ने वहां से सभी बछड़ों को चुरा लिया और उन्हें एक मायावी गुफा में सुला दिया। जब कन्हैया बछड़ों को न पाकर यमुना तट पर लौटे, तो देखा कि उनके सखा (ग्वाल-बाल) भी वहां नहीं थे!
उभावपि वने कृष्णो विचिकाय समन्ततः ॥
भगवान श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं है। जब उन्होंने अपने ज्ञान-नेत्रों से देखा, तो उन्हें ज्ञात हो गया कि यह सब ब्रह्मा जी की करतूत है। वे मेरी माया को परखना चाहते हैं।
वत्सान् वत्सपकांश्चापि सर्वं ससृजे स्वयम् ॥
यहाँ भगवान का वह अद्भुत ऐश्वर्य प्रकट हुआ, जो वेदों का परम सार है— 'एकमेवाद्वितीयम्' (वह एक ही अनेक रूपों में प्रकट है)। जितने बछड़े थे, जितने ग्वाल-बाल थे, उनकी जैसी लाठियाँ थीं, जैसी बांसुरी थी, जैसे वस्त्र थे, भगवान श्रीकृष्ण ने ठीक वैसा ही रूप धारण कर लिया।
यावद्यष्टिविषाणवेणुदलशिग्यावद्विभूषाम्बरम् ।
यावच्छीलगुणाभिधाकृतिवयो यावद्विहारादिकं
सर्वं विष्णुमयं गिरोऽङ्गवदजः सर्वस्वरूपो बभौ ॥
यह लीला कोई एक-दो दिन नहीं, पूरे 'एक वर्ष' तक चलती रही। इस एक वर्ष में गोकुल की गायों और माताओं का अपने बालकों के प्रति प्रेम अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया। माताएं अपने बालकों को दूध पिलातीं तो उन्हें ऐसा परमानंद मिलता मानो वे स्वयं परब्रह्म को दूध पिला रही हों (और वास्तव में वे भगवान को ही दूध पिला रही थीं)।
एक दिन बलराम जी ने जब गायों का अपने बछड़ों के प्रति यह असाधारण और अकारण प्रेम देखा, तो वे आश्चर्य में पड़ गए।
व्रजस्य सात्मनस्तोकेष्वपूर्वं प्रेम वर्धते ॥
जब बलराम जी ने अपने ज्ञान-नेत्रों से ध्यान लगाकर देखा, तो वे समझ गए कि ये सभी ग्वाल-बाल और बछड़े कोई और नहीं, स्वयं मेरे भाई श्रीकृष्ण ही हैं। तब उन्होंने कन्हैया से यह अत्यंत गूढ़ प्रश्न किया:
त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि ।
सर्वं पृथक्त्वं निगमात्कथं वदे-
त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत् ॥
ब्रह्मलोक का 'एक पल' पृथ्वी के 'एक वर्ष' के बराबर होता है। एक क्षण पश्चात जब ब्रह्मा जी लौटकर आए, तो उन्होंने देखा कि जो बालक और बछड़े वे गुफा में सुलाकर गए थे, वे तो ज्यों के त्यों कन्हैया के साथ यमुना तट पर खेल रहे हैं!
वृन्दावनं प्राग्खैलद्वत्सपालान् ददर्श ह ॥
ब्रह्मा जी चकरा गए। उन्होंने सोचा— "क्या मेरी माया झूठी है? गुफा वाले बालक असली हैं या ये वाले?" उनके नेत्रों के सामने भगवान ने एक और महाचमत्कार कर दिया।
ब्रह्मा जी के देखते ही देखते वे सभी बछड़े और ग्वाल-बाल अपने साधारण रूप को छोड़कर नीलमणि के समान चमकने वाले चतुर्भुज विष्णु (नारायण) रूप में बदल गए।
अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥
ब्रह्मा जी ने देखा कि प्रत्येक बालक के चार हाथ हैं, गले में वनमाला है, और स्वयं ब्रह्मा, शिव और सभी देवता उन नारायणों की स्तुति कर रहे हैं। ब्रह्मा जी का अहंकार चकनाचूर हो गया। वे अपने वाहन हंस से नीचे गिरे और एक डंडे की तरह भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लोट गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि ब्रह्मा जी का मोह भंग हो गया है, तो उन्होंने अपनी माया का पर्दा हटा लिया। ब्रह्मा जी ने उठकर अपने चारों सिरों को भगवान के चरणों में रगड़ते हुए 40 श्लोकों में अत्यंत भावपूर्ण 'ब्रह्मा स्तुति' आरंभ की:
गुञ्जावतंसपरिपिच्छलसन्मुखाय ।
वन्यस्रजे कवलवेत्रविषाणवेणु-
लक्ष्मश्रिये मृदुपदे पशुपाङ्गजाय ॥
अपनी स्तुति के दौरान, ब्रह्मा जी ने भगवान से क्षमा मांगते हुए वह परम श्लोक कहा, जो शरणागति और भक्ति मार्ग का सबसे बड़ा सिद्धांत है:
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते
जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥
ब्रह्मा जी ने रोते हुए भगवान से अपने अपराध (चोरी) की क्षमा माँगी। उन्होंने कहा— "प्रभो! मैं तो अज्ञान के अंधकार में पैदा हुआ एक छोटा सा जीव हूँ। मेरी क्या औकात जो मैं आपकी माया को समझ सकूँ।" भगवान ने कुछ नहीं कहा, केवल मंद-मंद मुस्कुराते रहे।
नत्वाभीष्टं जगद्धाता स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥
ब्रह्मा जी के जाने के बाद, भगवान ने गुफा में सोए हुए असली बालकों और बछड़ों को जगाया। उन बालकों को लगा कि वे बस एक पल के लिए सोए थे। उन्होंने उठकर कन्हैया से कहा— "अरे कन्हैया! तू इतनी जल्दी बछड़े ढूँढ लाया? आ बैठ, हम सब मिलकर भोजन करें।" भगवान मुस्कुराए और सखाओं के साथ बैठकर भोजन करने लगे।

