भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का केंद्र अब तक 'गोकुल' (महावन) था। परंतु जब गोकुल में एक के बाद एक राक्षसों (पूतना, शकटासुर, तृणावर्त) का आक्रमण होने लगा और यमलार्जुन वृक्षों के गिरने जैसी भयंकर घटनाएं घटीं, तो ब्रजवासियों के मन में भय उत्पन्न हो गया। भगवान तो परम स्वतंत्र हैं, वे अपनी लीला-भूमि बदलना चाहते थे। उन्हें गोवर्धन और यमुना के किनारे की वह रमणीक स्थली पुकार रही थी, जिसे 'वृन्दावन' कहा जाता है। इस अध्याय में हम गोकुल से वृन्दावन की उस परम सुंदर यात्रा और वहाँ पहुँचते ही वत्सासुर तथा बकासुर जैसे मायावी दैत्यों के संहार की प्रामाणिक कथा का दर्शन करेंगे।
1. गोकुल में अनिष्ट की आशंका और उपनन्द जी की सलाह
गोकुल में लगातार हो रहे उपद्रवों को देखकर सभी वृद्ध गोप चिंतित हो गए। उन सबने नन्दबाबा के साथ एक सभा की। उस सभा में नन्दबाबा के बड़े भाई, जो आयु और ज्ञान दोनों में वृद्ध थे— 'उपनन्द' जी ने ब्रज की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा।
॥ उपनन्द जी की चिंता ॥
उत्पातांस्त्वत्र पश्यामो दारुणान् सुमहत्तरान् ।
विनाशाय व्रजस्यास्य बालानां चाशुभानपि ॥
अर्थ: उपनन्द जी ने कहा— "हम यहाँ (गोकुल में) बहुत बड़े-बड़े और भयंकर अपशकुन (उत्पात) देख रहे हैं, जो हमारे इस ब्रज के विनाश और बालकों के लिए घोर अशुभ का संकेत दे रहे हैं।"
उपनन्द जी ने कहा कि हमें तुरंत इस स्थान को छोड़ देना चाहिए। उन्होंने एक ऐसे स्थान का वर्णन किया जो गायों, गोपियों और बालकों के लिए अत्यंत सुरक्षित और आनंददायक था।
॥ वृन्दावन का सुंदर वर्णन ॥
वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननम् ।
गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रितृणवीरुधम् ॥
अर्थ: "यहाँ से कुछ दूर 'वृन्दावन' नाम का एक अत्यंत सुंदर और नया वन है। वह पशुओं (गायों) के लिए बहुत अनुकूल है, तथा गोप, गोपियों और गायों के निवास करने योग्य है। वहाँ पवित्र गोवर्धन पर्वत और हरी-भरी घास तथा लताएं हैं।"
2. गोकुल से प्रस्थान और वृन्दावन में प्रवेश
उपनन्द जी की बात सभी गोपों को बहुत अच्छी लगी। उसी समय नन्दबाबा ने आदेश दिया कि "सभी लोग अपने छकड़ों (बैलगाड़ियों) को तैयार करो।" क्षण भर में ही गोकुल का सारा सामान छकड़ों पर लद गया और ब्रजवासी अपनी गायों को आगे करके वृन्दावन की ओर चल पड़े।
॥ वृन्दावन में अर्धचंद्राकार पड़ाव ॥
वृन्दावनं सम्प्रविश्य सर्वकालसुखावहम् ।
तत्र चक्रुर्व्रजावासं शकटैरर्धचन्द्रवत् ॥
अर्थ: सभी ऋतुओं में सुख देने वाले उस रमणीक 'वृन्दावन' में प्रवेश करके, ब्रजवासियों ने अपने छकड़ों (बैलगाड़ियों) को एक 'अर्धचन्द्र' (आधे चाँद) के आकार में खड़ा करके अपना नया ब्रज-आवास बना लिया।
जब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने वृन्दावन, गोवर्धन पर्वत और यमुना जी के रेतीले तटों (पुलिन) को देखा, तो उनके हृदय में अपार आनंद उमड़ पड़ा।
॥ भगवान का आनंद ॥
वृन्दावनं गोवर्धनं यमुनापुलिनानि च ।
वीक्ष्यासीदुत्तमा प्रीती राममाधवयोर्नृप ॥
अर्थ: हे राजन्! उस नव पल्लवित वृन्दावन, पवित्र गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी के सुंदर तटों को देखकर श्री बलराम (राम) और श्रीकृष्ण (माधव) के हृदय में उत्तम कोटि की प्रीति (अत्यंत आनंद) उत्पन्न हुई।
3. वत्सानुचारण लीला (बछड़े चराने का आरंभ)
वृन्दावन में आते ही श्रीकृष्ण और बलराम की आयु में वृद्धि हुई। अब वे 'कौमार' अवस्था (बाल्यावस्था) को पार करके 'पौगंड' अवस्था की ओर बढ़ रहे थे। अब माता यशोदा ने उन्हें छोटे-छोटे बछड़े चराने की अनुमति दे दी।
भगवान अपने सखाओं के साथ यमुना तट पर बछड़े चराने जाते थे। वे कभी बांसुरी बजाते, कभी एक-दूसरे से कुश्ती लड़ते और कभी गायों-बछड़ों के नाम लेकर उन्हें पुकारते।
4. वत्सासुर का आक्रमण (बछड़े के रूप में दैत्य)
कंस को जब पता चला कि कन्हैया वृन्दावन में हैं, तो उसने 'वत्सासुर' नाम के एक दैत्य को भेजा। वत्सासुर ने माया से एक अत्यंत सुंदर बछड़े का रूप धारण कर लिया और चुपचाप भगवान के बछड़ों के झुंड में शामिल हो गया।
॥ वत्सासुर का आगमन ॥
कदाचिद् यमुनातीरे वत्सान् चारयतोः स्वकान् ।
सवयस्ययोः कृष्णबलयोर्जिघांसुर्दैत्य आगमत् ॥
अर्थ: एक दिन जब श्रीकृष्ण और बलराम अपने सखाओं के साथ यमुना के तट पर अपने बछड़ों को चरा रहे थे, तभी उनको मार डालने की इच्छा से एक दैत्य (वत्सासुर) वहाँ आ पहुँचा।
भगवान तो अंतर्यामी हैं। वे उस मायावी दैत्य को पहचान गए। उन्होंने बलराम जी को इशारा किया।
॥ दैत्य की पहचान ॥
तं वत्सरूपिणं वीक्ष्य वत्समण्डलमध्यगम् ।
दर्शयन् बलदेवाय शनैर्मुग्ध इवासदत् ॥
अर्थ: बछड़ों के झुंड के बीच में छिपे हुए उस बछड़े के रूप वाले दैत्य को देखकर, भगवान श्रीकृष्ण ने बलराम जी को उसकी ओर इशारा किया और स्वयं एक अनजान (मुग्ध) बालक की भाँति धीरे-धीरे उसके पास गए।
5. वत्सासुर वध: दैत्य का संहार
भगवान ने उस दैत्य को भागने का अवसर ही नहीं दिया। जैसे ही वे उसके पीछे पहुँचे, उन्होंने उसके पिछले दोनों पैर और पूंछ को कसकर पकड़ लिया।
॥ वत्सासुर का वध ॥
गृहीत्वापरपादाभ्यां सहलाङ्गूलमच्युतः ।
भ्रामयित्वा कपित्थाग्रे प्राहिणोद्गतजीवितम् ॥
अर्थ: भगवान अच्युत (श्रीकृष्ण) ने उस दैत्य के पिछले दोनों पैरों को उसकी पूँछ के साथ कसकर पकड़ लिया, उसे हवा में जोर से घुमाया जिससे उसके प्राण निकल गए, और फिर मरे हुए उस दैत्य को एक 'कैथे' (कपित्थ) के पेड़ के ऊपर फेंक दिया।
आध्यात्मिक रहस्य: 'वत्सासुर' हमारे भीतर छिपे उस 'बाल-सुलभ लोभ और कपट' का प्रतीक है, जो भोलापन ओढ़कर आता है। भगवान ने इस दैत्य को मारकर सिखाया कि भक्ति के मार्ग में अज्ञान और कपट (चाहे वह कितना ही मासूम क्यों न दिखे) का सर्वथा विनाश होना चाहिए।
6. बकासुर का आगमन (बगुले के रूप में दैत्य)
कुछ दिन पश्चात एक और महाभयंकर दैत्य गोकुल में आया। एक दिन सभी सखा और भगवान श्रीकृष्ण बछड़ों को पानी पिलाने के लिए एक जलाशय (सरोवर) पर गए।
वहां उन्होंने देखा कि पहाड़ की चोटी के समान एक अत्यंत विशाल पक्षी बैठा है। वह और कोई नहीं, कंस का भेजा हुआ 'बकासुर' (बगुला रूपी दैत्य) था।
॥ विशाल बकासुर ॥
स वै बको नाम महानसुरो बकरूपधृक् ।
आगत्य सहसा कृष्णं तीक्ष्णतुण्डोऽग्रसद् बली ॥
अर्थ: वह वास्तव में 'बकासुर' नाम का एक अत्यंत बलवान महान दैत्य था, जिसने एक विशाल बगुले (बक) का रूप धारण किया हुआ था। उसने अचानक आकर अपनी अत्यंत तीखी चोंच (तुंड) से श्रीकृष्ण को निगल लिया (मुँह में भर लिया)।
जब ग्वाल-बालों ने देखा कि कन्हैया को बगुला निगल गया है, तो वे भयभीत होकर अचेत हो गए। बलराम जी भी क्षण भर के लिए आश्चर्य में पड़ गए।
7. भगवान का अग्नि रूप और बकासुर का वमन (उगलना)
परंतु जो संपूर्ण जगत के रक्षक और गुरु हैं, उन्हें कोई साधारण दैत्य कैसे पचा सकता था? जैसे ही भगवान बकासुर के गले में पहुँचे, वे उसके लिए अत्यंत गर्म (अग्नि के समान) हो गए। (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):
॥ दैत्य के गले में अग्नि ॥
तं तालुमूलं प्रदहन्तमग्निवद्
गोपालसूनुं पितरं जगद्गुरोः ।
चच्छर्द सद्योऽतिरुषाक्षतं बकस्
तुण्डेन हन्तुं पुनराप तत्परः ॥
अर्थ: उन जगतगुरु भगवान (जो साक्षात ब्रह्मा जी के भी पिता हैं) ने एक ग्वाल-बाल के रूप में उस दैत्य के तालू (गले की जड़) को अग्नि के समान जलाना शुरू कर दिया। पीड़ा के कारण बकासुर ने उन्हें बिना किसी चोट (अक्षत) के तुरंत उगल दिया (उल्टी कर दी), और अत्यंत क्रोधित होकर अपनी चोंच से पुनः मारने के लिए तत्पर हो गया।
8. बकासुर वध: चोंच को फाड़ देना
जब बकासुर ने भगवान को उगल दिया और क्रोध में आकर पुनः अपनी चोंच से उन पर प्रहार करना चाहा, तो सर्वशक्तिमान प्रभु ने खेल-खेल में ही उसका अंत कर दिया।
॥ बकासुर का संहार ॥
तमापतन्तं स बकं तुण्डेन ग्रसितुं पुनः ।
निगृह्य तुण्डयोर्दोर्भ्यां चीरयामास लीलया ॥
अर्थ: जब वह बकासुर उन्हें दोबारा निगलने के लिए अपनी चोंच बढ़ाकर झपटा, तब भगवान ने अपने दोनों हाथों से उसकी चोंच के दोनों हिस्सों (ऊपर और नीचे की चोंच) को पकड़ लिया और खेल-खेल (लीला) में ही उसे तिनके की भाँति चीर (फाड़) डाला।
आध्यात्मिक रहस्य: 'बगुला' (बक) संसार में 'पाखंड और ठगी' (बक-वृत्ति) का सबसे बड़ा प्रतीक है। जो बाहर से ध्यान लगाने का नाटक करता है, परंतु भीतर से स्वार्थी होता है, वह बकासुर है। भगवान ने उसकी चोंच फाड़कर यह संदेश दिया कि भक्ति के मार्ग में पाखंड और दोमुंहेपन (Double-standards) के लिए कोई स्थान नहीं है। ईश्वर निष्कपट प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।
बकासुर के मरते ही आकाश से देवताओं ने भगवान पर मल्लिका के पुष्पों की वर्षा की। ग्वाल-बालों की जान में जान आई और वे दौडकर अपने प्राण-प्यारे कन्हैया से लिपट गए। संध्या होने पर सभी गाते-बजाते अपने वृन्दावन लौट आए।