अजन्त नपुंसकलिंग: फल, वारि एवं मधु
संस्कृत व्याकरण के तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नपुंसकलिंग शब्दरूपों की तालिका। लाल रंग में अंकित ह्रस्व-दीर्घ मात्राओं के भेद परीक्षाओं हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
💡 नपुंसकलिंग का सबसे बड़ा रहस्य (Golden Rule): संस्कृत में किसी भी नपुंसकलिंग शब्द की प्रथमा और द्वितीया विभक्ति हमेशा एक समान होती है। और तृतीया विभक्ति से लेकर सप्तमी तक के सभी रूप उसके पुँल्लिंग रूप (जैसे फल के रूप राम की तरह, वारि के रूप हरि की तरह) ही चलते हैं!
१. फल (अकारान्त नपुंसकलिंग) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | फलम् | फले | फलानि |
| द्वितीया | फलम् | फले | फलानि |
| तृतीया | फलेन | फलाभ्याम् | फलैः |
| चतुर्थी | फलाय | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
| पञ्चमी | फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्यः |
| षष्ठी | फलस्य | फलयोः | फलानाम् |
| सप्तमी | फले | फलयोः | फलेषु |
| सम्बोधन | हे फल! | हे फले! | हे फलानि! |
💡 विशेष (फल): प्रथमा और द्वितीया को छोड़कर, तृतीया से सप्तमी तक के सभी रूप पूरी तरह 'राम' (पुँल्लिंग) शब्द की तरह चलते हैं। मित्र, वन, ज्ञान, जल, कमल, पुस्तक आदि सभी अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द इसी प्रकार चलेंगे।
२. वारि (इकारान्त नपुंसकलिंग - जल) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | वारि | वारिणी | वारीणि |
| द्वितीया | वारि | वारिणी | वारीणि |
| तृतीया | वारिणा | वारिभ्याम् | वारिभिः |
| चतुर्थी | वारिणे | वारिभ्याम् | वारिभ्यः |
| पञ्चमी | वारिणः | वारिभ्याम् | वारिभ्यः |
| षष्ठी | वारिणः | वारिणोः | वारीणाम् |
| सप्तमी | वारिणि | वारिणोः | वारिषु |
| सम्बोधन | हे वारि! / वारे! | हे वारिणी! | हे वारीणि! |
💡 विशेष (भ्रम निवारण - V.V.Imp):
• द्विवचन में 'रि' ह्रस्व और 'णी' दीर्घ होता है ➔ वारिणी (छोटी-बड़ी)।
• बहुवचन में 'री' दीर्घ और 'णि' ह्रस्व होता है ➔ वारीणि (बड़ी-छोटी)।
• सप्तमी एकवचन में दोनों मात्राएँ ह्रस्व होती हैं ➔ वारिणि (छोटी-छोटी)।
• द्विवचन में 'रि' ह्रस्व और 'णी' दीर्घ होता है ➔ वारिणी (छोटी-बड़ी)।
• बहुवचन में 'री' दीर्घ और 'णि' ह्रस्व होता है ➔ वारीणि (बड़ी-छोटी)।
• सप्तमी एकवचन में दोनों मात्राएँ ह्रस्व होती हैं ➔ वारिणि (छोटी-छोटी)।
३. मधु (उकारान्त नपुंसकलिंग - शहद/मीठा) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मधु | मधुनी | मधूनि |
| द्वितीया | मधु | मधुनी | मधूनि |
| तृतीया | मधुना | मधुभ्याम् | मधुभिः |
| चतुर्थी | मधुने | मधुभ्याम् | मधुभ्यः |
| पञ्चमी | मधुनः | मधुभ्याम् | मधुभ्यः |
| षष्ठी | मधुनः | मधुनोः | मधूनाम् |
| सप्तमी | मधुनि | मधुनोः | मधुषु |
| सम्बोधन | हे मधु! / मधो! | हे मधुनी! | हे मधूनि! |
💡 विशेष (मात्राओं का खेल - V.V.Imp): वारि की तरह ही यहाँ भी:
• द्विवचन में 'धु' ह्रस्व और 'नी' दीर्घ है ➔ मधुनी (छोटी-बड़ी)।
• बहुवचन में 'धू' दीर्घ और 'नि' ह्रस्व है ➔ मधूनि (बड़ी-छोटी)।
• सप्तमी एकवचन में दोनों ह्रस्व हैं ➔ मधुनि (छोटी-छोटी)।
जानु (घुटना), वस्तु (चीज़), अश्रु (आँसू), दारु (लकड़ी) आदि के रूप इसी प्रकार चलेंगे।
• द्विवचन में 'धु' ह्रस्व और 'नी' दीर्घ है ➔ मधुनी (छोटी-बड़ी)।
• बहुवचन में 'धू' दीर्घ और 'नि' ह्रस्व है ➔ मधूनि (बड़ी-छोटी)।
• सप्तमी एकवचन में दोनों ह्रस्व हैं ➔ मधुनि (छोटी-छोटी)।
जानु (घुटना), वस्तु (चीज़), अश्रु (आँसू), दारु (लकड़ी) आदि के रूप इसी प्रकार चलेंगे।
