हलन्त (व्यञ्जनान्त) पुँल्लिंग: राजन्, भवत् एवं विद्वस्
संस्कृत व्याकरण के तीन सर्वाधिक रहस्यमयी और महत्त्वपूर्ण हलन्त शब्दरूपों की तालिका। लाल रंग में अंकित परिवर्तित रूप (जैसे- राज्ञः, विदुषः) परीक्षाओं हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
💡 हलन्त का सबसे बड़ा रहस्य (Golden Rule): जो शब्द व्यंजन पर समाप्त होते हैं (जैसे राजन् में 'न्', भवत् में 'त्'), उनके रूप 'सर्वनामस्थान' (प्रथमा के तीनों वचन और द्वितीया के एकवचन व द्विवचन) में मज़बूत (दीर्घ) रहते हैं, परन्तु द्वितीया बहुवचन से आगे आते ही उनका रूप अचानक सिकुड़ कर कमज़ोर (परिवर्तित) हो जाता है। परीक्षाओं में यही बदलाव पूछा जाता है।
१. राजन् (नकारान्त पुँल्लिंग - राजा) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | राजा | राजानौ | राजानः |
| द्वितीया | राजानम् | राजानौ | राज्ञः |
| तृतीया | राज्ञा | राजभ्याम् | राजभिः |
| चतुर्थी | राज्ञे | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| पञ्चमी | राज्ञः | राजभ्याम् | राजभ्यः |
| षष्ठी | राज्ञः | राज्ञोः | राज्ञाम् |
| सप्तमी | राज्ञि / राजनि | राज्ञोः | राजसु |
| सम्बोधन | हे राजन्! | हे राजानौ! | हे राजानः! |
💡 विशेष (राजन्): 'राजानौ' से अचानक द्वितीया बहुवचन में रूप सिकुड़कर 'राज्ञः' (ज् + ञ्) हो जाता है। सप्तमी एकवचन में दो रूप (राज्ञि और राजनि) बनते हैं। सम्बोधन एकवचन में 'हे राजन्!' बनता है ('हे राजा' नहीं)। आत्मन् (आत्मा), नामन् (नाम) आदि के रूप मिलते-जुलते हैं।
२. भवत् (तकारान्त पुँल्लिंग - आप) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | भवान् | भवन्तौ | भवन्तः |
| द्वितीया | भवन्तम् | भवन्तौ | भवतः |
| तृतीया | भवता | भवद्भ्याम् | भवद्भिः |
| चतुर्थी | भवते | भवद्भ्याम् | भवद्भ्यः |
| पञ्चमी | भवतः | भवद्भ्याम् | भवद्भ्यः |
| षष्ठी | भवतः | भवतोः | भवताम् |
| सप्तमी | भवति | भवतोः | भवत्सु |
| सम्बोधन | हे भवन्! | हे भवन्तौ! | हे भवन्तः! |
💡 विशेष (भवत्): 'भवत्' शब्द का प्रयोग आदरसूचक 'आप' के लिए होता है। इसमें भी द्वितीया बहुवचन से 'न्' का लोप होकर रूप 'भवतः' हो जाता है। ध्यान दें: पञ्चमी/षष्ठी एकवचन और द्वितीया बहुवचन तीनों में 'भवतः' ही बनता है। गच्छत्, पठत् (शतृ प्रत्ययान्त) शब्द भी इसी प्रकार चलेंगे।
३. विद्वस् (सकारान्त पुँल्लिंग - विद्वान) शब्दरूप
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्वान् | विद्वांसौ | विद्वांसः |
| द्वितीया | विद्वांसम् | विद्वांसौ | विदुषः |
| तृतीया | विदुषा | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भिः |
| चतुर्थी | विदुषे | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| पञ्चमी | विदुषः | विद्वद्भ्याम् | विद्वद्भ्यः |
| षष्ठी | विदुषः | विदुषोः | विदुषाम् |
| सप्तमी | विदुषि | विदुषोः | विद्वत्सु |
| सम्बोधन | हे विद्वन्! | हे विद्वांसौ! | हे विद्वांसः! |
💡 विशेष (विद्वस् - V.V.Imp): TGT/PGT का सबसे प्रिय शब्द! द्वितीया बहुवचन में आकर 'विद्वांसौ' अचानक 'विदुषः' बन जाता है (सम्प्रसारण नियम के कारण व का उ और स का ष हो जाता है)। तृतीया द्विवचन में 'विद्वद्भ्याम्' (जश्त्व सन्धि) और सप्तमी बहुवचन में 'विद्वत्सु' (चर्त्व सन्धि) भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं।
