केशी और व्योमासुर के वध के पश्चात, कंस का भय अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाकर मारने का षड्यंत्र रचा। इसके लिए उसने 'धनुष यज्ञ' का आयोजन किया और यदुवंशी 'अक्रूर जी' को उन्हें आमन्त्रित करने के लिए गोकुल भेजा। कंस नहीं जानता था कि अक्रूर जी भगवान के अनन्य भक्त हैं। अक्रूर जी के लिए यह यात्रा परमानंद की थी, परंतु गोकुलवासियों के लिए यह 'महा-प्रलय' के समान थी। आइए, भक्ति और विरह के इस अद्भुत संगम का मूल श्लोकों के साथ दर्शन करें।
1. अक्रूर जी की मथुरा से नन्द-गोकुल की यात्रा
कंस की आज्ञा पाकर महामति अक्रूर जी रात भर मथुरा में रुके और प्रातःकाल रथ पर सवार होकर गोकुल की ओर चल पड़े। रास्ते भर वे केवल भगवान श्रीकृष्ण के दर्शनों का ही चिंतन कर रहे थे।
॥ गोकुल प्रस्थान ॥
अक्रूरोऽपि च तां रात्रिं मधुपुर्यां महामतिः ।
उषित्वा रथमास्थाय प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥ (10.38.1)
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— महाबुद्धिमान अक्रूर जी भी उस रात्रि को मधुपुरी (मथुरा) में बिताकर, प्रातःकाल रथ पर सवार होकर नन्दबाबा के गोकुल की ओर चल पड़े।
2. अक्रूर जी का स्वयं को परम भाग्यशाली मानना
रथ पर बैठे-बैठे अक्रूर जी सोच रहे थे कि आज मेरा कौन सा पुण्य उदय हुआ है, जो मुझे साक्षात परब्रह्म के दर्शन होंगे।
॥ अक्रूर जी का विचार ॥
किं मयाचरितं भद्रं किं तप्तं परमं तपः ।
किं वाथाप्यर्हते दत्तं यद्द्रक्ष्याम्यद्य केशवम् ॥ (10.38.3)
अर्थ: (अक्रूर जी सोचने लगे)— "मैंने पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा कल्याणकारी कार्य (भद्रं) किया है? कौन सा परम तप किया है? अथवा किस सत्पात्र को क्या दान दिया है, जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान केशव (श्रीकृष्ण) का साक्षात दर्शन करूँगा?"
3. भगवान के चरण-चिह्नों का दर्शन और धूलि में लोटना
संध्या के समय जब अक्रूर जी का रथ वृन्दावन पहुँचा, तो उन्हें धरती पर भगवान के वे चरण-चिह्न दिखाई दिए, जिन्हें बड़े-बड़े देवता भी ढूँढते रहते हैं।
॥ चरण-चिह्नों का दर्शन ॥
पदानि तस्याखिललोकपाल-
किरीटजुष्टामलपादरेणोः ।
ददर्श गोष्ठे क्षितिकौतुकानि
विलक्षितान्यब्जयवाङ्कुशाद्यैः ॥ (10.38.24)
अर्थ: जिनके निर्मल चरणों की धूलि सम्पूर्ण लोकपालों के मुकुटों (किरीट) द्वारा सेवन की जाती है, उन भगवान श्रीकृष्ण के चरण-चिह्नों को, जो पृथ्वी के लिए भी मंगलकारी हैं और जिनमें कमल (अब्ज), जौ (यव) और अंकुश आदि के चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, अक्रूर जी ने गोकुल की भूमि पर देखा।
उन चरण-चिह्नों को देखते ही अक्रूर जी प्रेम में इतने पागल हो गए कि वे रथ से कूद पड़े और वृन्दावन की उस पवित्र धूलि (रज) में लोटने लगे।
॥ वृन्दावन की रज में लोटना ॥
तद्दर्शनाह्लादविवृद्धसम्भ्रमः
प्रेम्णोर्ध्वरोमाश्रुकलाकुलेक्षणः ।
रथादवस्कन्द्य स तेष्वचेष्टत
प्रभोरमून्यङ्घ्रिरजांस्यहो इति ॥ (10.38.26)
अर्थ: उन चरण-चिह्नों के दर्शन से अक्रूर जी का आनंद और भाव-विभोरता (सम्भ्रम) अत्यंत बढ़ गई। प्रेम के कारण उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गए और नेत्रों में आँसू छलक आए। "अहो! ये मेरे प्रभु के चरणों की धूलि है!" ऐसा कहते हुए वे रथ से कूद पड़े और उन चरण-चिह्नों की धूलि में लोटने लगे।
4. श्रीकृष्ण और बलराम का प्रथम दर्शन
आगे चलकर अक्रूर जी ने देखा कि दो अत्यंत सुंदर बालक गायों को दुहने के स्थान पर खड़े हैं। वे ही कृष्ण और बलराम थे।
॥ प्रभु का दर्शन ॥
ददर्श कृष्णं रामं च व्रजे गोदोहनं गतौ ।
पीतनीलाम्बरधरौ शरद्दाम्बुरुहेक्षणौ ॥ (10.38.28)
अर्थ: अक्रूर जी ने देखा कि ब्रज में गायों के दोहने के स्थान पर श्रीकृष्ण और बलराम गए हुए हैं। उन्होंने क्रमशः पीले और नीले रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके नेत्र शरद् ऋतु के खिले हुए कमलों के समान सुंदर हैं।
अक्रूर जी ने साष्टांग प्रणाम किया। भगवान ने उन्हें हृदय से लगा लिया और उनका सत्कार किया। अक्रूर जी ने नन्दबाबा को कंस का निमंत्रण (धनुष यज्ञ का बुलावा) दिया। नन्दबाबा ने सुबह मथुरा चलने की घोषणा कर दी।
जब यह समाचार ब्रज की गोपियों तक पहुँचा कि 'अक्रूर' नाम का कोई दूत आया है जो कल सुबह हमारे कन्हैया को मथुरा ले जाएगा, तो पूरे गोकुल में वज्रपात सा हो गया।
5. गोपियों का हाहाकार और विधाता को उलाहना
गोपियों की रातों की नींद उड़ गई। वे रोते हुए विधाता (ब्रह्मा जी) को कोसने लगीं कि हे विधाता! तुमने हमें मिलाकर फिर अलग क्यों कर दिया?
॥ विधाता को उलाहना ॥
अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया
संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः ।
तांश्चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं
विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा ॥ (10.39.19)
अर्थ: गोपियां कहने लगीं— "अहो विधाता! तुम्हारे भीतर कहीं भी दया नहीं है। पहले तो तुम प्राणियों को मित्रता और प्रेम से मिला देते हो, और फिर उनकी इच्छाएं पूरी हुए बिना ही उन्हें व्यर्थ में अलग (वियोग) कर देते हो। तुम्हारा यह खेल बिल्कुल छोटे बच्चों के खेल (खिलौने तोड़ देने) के समान है।"
6. अक्रूर को 'क्रूर' कहना
गोपियां अक्रूर जी पर अपना क्रोध उतारते हुए कहती हैं कि इसका नाम अक्रूर किसने रख दिया? यह तो संसार का सबसे बड़ा 'क्रूर' (कठोर) व्यक्ति है।
॥ अक्रूर की क्रूरता ॥
क्रूरस्त्वमक्रूरसमाख्यया स्म नश्-
चक्षुर्हि दत्तं हरसे बताज्ञवत् ।
येनैकदेशेऽखिलसर्गसौष्ठवं
त्वदीयमद्राक्ष्म वयं मधुद्विषः ॥ (10.39.22)
अर्थ: "हे विधाता! तुम वास्तव में 'अक्रूर' (दयालु) नाम रखकर बड़े 'क्रूर' (कठोर) के रूप में आए हो। जो नेत्र तुमने हमें भगवान श्रीकृष्ण के उस मुख-कमल (जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि का सौंदर्य निवास करता है) का दर्शन करने के लिए दिए थे, उन्हें तुम आज मूर्खों की भाँति हमसे छीन रहे हो।"
7. लोक-लज्जा का त्याग और "गोविन्द-दामोदर-माधव" का क्रंदन
सुबह हो गई। अक्रूर जी ने रथ तैयार किया। श्रीकृष्ण और बलराम रथ पर बैठ गए। तब गोपियों से रहा नहीं गया। वे लोक-लाज, परिवार और समाज का सारा भय छोड़कर रथ के सामने आ खड़ी हुईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। श्रीमद्भागवत का यह श्लोक भक्ति और विरह का सबसे बड़ा शिखर है:
॥ गोपियों का महा-क्रंदन ॥
एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं
व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः ।
विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं
गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ (10.39.31)
अर्थ: इस प्रकार बातें करते हुए, विरह से अत्यंत व्याकुल और श्रीकृष्ण में पूर्णतः आसक्त मन वाली वे ब्रज की गोपियां, अपनी सारी लोक-लज्जा को छोड़कर "हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव!" इस प्रकार ऊँचे स्वर में फूट-फूट कर रोने लगीं।
8. रथ का प्रस्थान और गोपियों का चित्रलिखित खड़ा रहना
गोपियों के इस रुदन को देखकर साक्षात सूर्य भगवान भी मानो रुक गए हों। अक्रूर जी ने भगवान की आज्ञा पाकर भारी मन से रथ को हाँक दिया। कन्हैया ने गोपियों को सांत्वना दी कि "मैं लौटकर आऊँगा।"
॥ रथ का प्रस्थान ॥
स्त्रीणामेवं रुदन्तीनामुदिते सवितर्यथ ।
अक्रूरश्चोदयामास कृतमैत्रादिको रथम् ॥ (10.39.32)
अर्थ: उन स्त्रियों (गोपियों) के इस प्रकार रोते रहने पर ही, सूर्योदय (सवेरा) हो गया। तब अपनी प्रातःकालीन संध्योपासना आदि पूर्ण करके, अक्रूर जी ने रथ को (मथुरा की ओर) हाँक दिया।
गोपियां रथ के पीछे-पीछे दौड़ीं। जब तक रथ दिखाई दिया, वे देखती रहीं। जब रथ ओझल हो गया, तो वे रथ की उड़ती हुई धूलि को ही निहारती रहीं।
॥ चित्रलिखित सी गोपियां ॥
यावच्चूडामणिर्यावद् रेणुर्यानस्य गोचरः ।
तावत्तमाशयानैका ददृशुश्चित्रचेतसः ॥ (10.39.34)
अर्थ: जब तक उस रथ की ध्वजा (चूडामणि) दिखाई देती रही, और जब तक रथ के पहियों से उड़ती हुई धूलि (रेणु) दिखाई देती रही, तब तक वे गोपियां अपने चित्त को श्रीकृष्ण में लीन करके चित्रलिखित सी (मूर्ति के समान जड़ होकर) वहीं खड़ी देखती रहीं।
निराश होकर गोपियां लौट आईं और दिन-रात केवल कन्हैया के गुणों का ही गान करने लगीं। इधर अक्रूर जी भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी को लेकर यमुना जी के तट पर पहुँचे और फिर 'मथुरा' में प्रवेश किया। इस प्रकार ब्रज की वह मधुर 'गोकुल लीला' यहीं विश्राम लेती है और 'मथुरा लीला' का शंखनाद होता है।