अरिष्टासुर (बैल), केशी (अश्व) और व्योमासुर का वध: Arishtasur Aur Keshi Vadh bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

अरिष्टासुर (बैल), केशी (अश्व) और व्योमासुर का वध

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 36 और 37)

भगवान श्रीकृष्ण की 'वृन्दावन-लीला' अब अपने अंतिम चरण में है। कंस को जब यह ज्ञात हो गया कि देवकी का आठवाँ पुत्र (श्रीकृष्ण) गोकुल में जीवित है और उसी ने मेरे सारे राक्षसों को मारा है, तो वह अत्यंत भयभीत हो गया। घबराहट में उसने अपने सबसे भयंकर असुरों को एक साथ कन्हैया को मारने के लिए भेजा। इस प्रसंग में हम एक महाकाय बैल (अरिष्टासुर), एक भयंकर घोड़े (केशी) और आकाश में उड़ने वाले एक मायावी दैत्य (व्योमासुर) के संहार की अत्यंत ओजस्वी कथा का दर्शन करेंगे, जो 'मथुरा-लीला' की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

1. अरिष्टासुर (बैल के रूप में दैत्य) का गोकुल में प्रवेश

एक दिन गोकुल में एक अत्यंत भयंकर दैत्य ने प्रवेश किया। उसने एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली 'बैल' (वृषभ) का रूप धारण किया हुआ था। उस दैत्य का नाम 'अरिष्ट' (अरिष्टासुर) था।

॥ अरिष्टासुर का आगमन ॥
अथ तत्रागमद् गोष्ठमरिष्टो वृषभासुरः ।
महीं महाककुत्कम्पन् महीं खुरविक्षताम् ॥ (10.36.1)
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— एक दिन उस गोकुल में 'अरिष्ट' नाम का एक वृषभ (बैल) रूपधारी असुर आ पहुँचा। उसके कंधे का ककुद (कूबड़) बहुत बड़ा था और वह अपने खुरों से धरती को खोदता और कंपाता हुआ आ रहा था।

वह भयंकर गर्जना कर रहा था, जिसे सुनकर गोकुल की गायें डर कर भागने लगीं और गर्भवती गायों के गर्भ गिर गए। सभी ब्रजवासी त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आ गए।

2. अरिष्टासुर का वध: सींग उखाड़कर प्रहार

भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि मेरा गोकुल भयभीत है, तो उन्होंने ताल ठोककर उस दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा। क्रोध में अंधा वह बैल कन्हैया की ओर दौड़ा।

॥ भगवान द्वारा सींग पकड़ना ॥
तमापतन्तं भगवान् निगृह्य शृङ्गयोर्हरिः ।
पदानवक्रम्य भूमौ निचखान यथा गजः ॥ (10.36.12)
अर्थ: अपनी ओर झपटते हुए उस बैल (अरिष्टासुर) को आते देखकर, भगवान श्रीकृष्ण ने उसके दोनों सींग (शृंग) पकड़ लिए और अपने पैरों से उसे दबाकर धरती पर उसी प्रकार गिरा दिया (निचखान), जैसे कोई मतवाला हाथी किसी को कुचल देता है।

जब वह दैत्य फिर से उठा, तो भगवान ने उसके ही एक सींग को उखाड़कर उससे ऐसा प्रहार किया कि अरिष्टासुर रक्त (खून) और गोबर वमन करता हुआ मृत्यु को प्राप्त हो गया।

आध्यात्मिक रहस्य: 'अरिष्टासुर' (बैल) मनुष्य के भीतर उठने वाले 'मिथ्या धर्म और पाखंड' का प्रतीक है, जो सींग (तर्क और कुतर्क) दिखाकर समाज को डराता है। भगवान उसके तर्क रूपी सींग को उखाड़कर पाखंड का नाश करते हैं।
3. नारद जी द्वारा कंस को सत्य बताना और केशी का प्रस्थान

अरिष्टासुर के मरने के बाद, देवर्षि नारद जी सीधे कंस के पास गए और उसे बता दिया कि "कंस! जिसे तुम यशोदा की कन्या समझ रहे थे, वह योगमाया थी। तुम्हारा काल (श्रीकृष्ण) गोकुल में नन्द-यशोदा के पास पल रहा है।" यह सुनकर कंस क्रोध से पागल हो गया और उसने अपने सबसे भयंकर राक्षस 'केशी' को गोकुल भेजा।

4. केशी (अश्व/घोड़ा) का भयंकर रूप और आक्रमण

कंस की आज्ञा पाकर 'केशी' नामक असुर ने एक अत्यंत विशाल 'घोड़े' (अश्व) का रूप धारण किया। वह इतना भयंकर था कि उसकी गर्जना से आकाश गूँजने लगा।

॥ केशी असुर का आगमन ॥
केशी तु कंसप्रहितः खुरैर्महीं
महाहयो निर्जरयन् मनोजवः ।
सटावधूताभ्रविमानसङ्‌कुलं
कुर्वन्नभो हेषितभीषिताखिलः ॥ (10.37.1)
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— कंस द्वारा भेजा गया 'केशी' असुर एक अत्यंत विशाल घोड़े (महाहय) के रूप में आया। वह मन के समान वेग (मनोजव) से दौड़ता हुआ अपने खुरों से धरती को खोद रहा था, अपनी गर्दन के बालों (सटा) से बादलों और विमानों को छिन्न-भिन्न कर रहा था और अपनी भयानक हिनहिनाहट (हेषित) से सबको डरा रहा था।
5. केशी वध: मुख में भुजा प्रवेश

भगवान श्रीकृष्ण ने जब उसे ललकारा, तो वह घोड़ा अपना भयंकर मुख फाड़कर कन्हैया को निगलने के लिए झपटा। तब भगवान ने अपनी बाईं भुजा को एक सर्प की भाँति उसके मुख में डाल दिया।

॥ मुख में भगवान की भुजा ॥
स तं निशाम्याभिमुखो मुखेन खं
पिबन्निवाभ्यद्रवदत्यमर्षणः ।
जघान पद्भ्यामविन्दलोचनं
दुरासदश्चण्डरवो दुरत्ययः ॥ (10.37.4)
अर्थ: (भगवान की ललकार) सुनकर वह अत्यंत क्रोधी और भयंकर गर्जना करने वाला असुर अपना मुख फाड़कर मानो आकाश को पीता हुआ श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा, और उन कमल-नयन भगवान पर अपने दोनों अगले पैरों (पद्भ्याम) से प्रहार करने लगा।

भगवान की भुजा उस घोड़े के मुख (गले) में जाकर अत्यंत गर्म (अग्नि के समान) और बड़ी होने लगी। श्वास रुक जाने के कारण केशी तड़पने लगा और अंततः उसका पेट फट गया। देवताओं ने भगवान की स्तुति करते हुए उन्हें 'केशव' (केशी को मारने वाला) नाम से पुकारा।

आध्यात्मिक रहस्य: 'केशी' (घोड़ा) मनुष्य के 'इन्द्रियों के अनियंत्रित वेग और अहंकार' का प्रतीक है। जब इन्द्रियां बेलगाम घोड़े की तरह भागती हैं, तो परमात्मा अपने ज्ञान रूपी भुजा से उसके मुख (अहंकार) को रोककर उसका दमन करते हैं।
6. व्योमासुर का आगमन (ग्वाल-बाल के रूप में चोर)

केशी वध के पश्चात, एक दिन जब सभी सखा वन में 'लुका-छिपी' (चोर-पुलिस) का खेल खेल रहे थे, तब मय दानव का पुत्र 'व्योमासुर' वहाँ आ गया।

॥ व्योमासुर का प्रवेश ॥
तत्रापालयता मेषान् मयपुत्रो महासुरः ।
व्योमो गोपालवेषेण मेषान्मेषायितोऽहरत् ॥ (10.37.27)
अर्थ: जहाँ बालक खेल रहे थे, वहाँ मय दानव का पुत्र 'व्योम' (व्योमासुर) नाम का महाअसुर एक ग्वाल-बाल (गोपाल) का वेश धारण करके आ गया। खेल में जो बालक भेड़ (मेष) बने हुए थे, वह चोर बनकर उन बालकों का अपहरण करने लगा।
7. व्योमासुर का वध और गुफा से सखाओं की मुक्ति

व्योमासुर ने एक-एक करके लगभग सभी बालकों को चुरा लिया और उन्हें एक पहाड़ की गुफा में बंद करके गुफा का मुँह एक भारी पत्थर से बंद कर दिया। बाहर केवल चार-पाँच बालक बचे थे।

भगवान श्रीकृष्ण सब समझ गए। जब वह असुर फिर से एक बालक को चुराने आया, तो भगवान ने उसे शेर की तरह दबोच लिया।

॥ व्योमासुर का संहार ॥
स निजं रूपमास्थाय गिरीन्द्रसदृशं बली ।
इच्छन् विमोक्तुमात्मानं नाशक्नोद्ग्रहणातुरः ॥ (10.37.30)
अर्थ: भगवान की पकड़ में आते ही उस बलवान असुर ने अपना पर्वत (गिरीन्द्र) के समान असली और भयंकर रूप धारण कर लिया। उसने भगवान की पकड़ से स्वयं को छुड़ाने की बहुत इच्छा की, परंतु वह स्वयं को छुड़ा नहीं सका (नाशक्नोद्)।

भगवान श्रीकृष्ण ने उसे उठाकर जोर से धरती पर पटका और उसका वध कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। उसके पश्चात भगवान ने गुफा के द्वार का पत्थर हटाकर अपने सभी सखाओं को सकुशल बाहर निकाल लिया और गोकुल लौट आए।

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