भगवान श्रीकृष्ण की 'वृन्दावन-लीला' अब अपने अंतिम चरण में है। कंस को जब यह ज्ञात हो गया कि देवकी का आठवाँ पुत्र (श्रीकृष्ण) गोकुल में जीवित है और उसी ने मेरे सारे राक्षसों को मारा है, तो वह अत्यंत भयभीत हो गया। घबराहट में उसने अपने सबसे भयंकर असुरों को एक साथ कन्हैया को मारने के लिए भेजा। इस प्रसंग में हम एक महाकाय बैल (अरिष्टासुर), एक भयंकर घोड़े (केशी) और आकाश में उड़ने वाले एक मायावी दैत्य (व्योमासुर) के संहार की अत्यंत ओजस्वी कथा का दर्शन करेंगे, जो 'मथुरा-लीला' की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
एक दिन गोकुल में एक अत्यंत भयंकर दैत्य ने प्रवेश किया। उसने एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली 'बैल' (वृषभ) का रूप धारण किया हुआ था। उस दैत्य का नाम 'अरिष्ट' (अरिष्टासुर) था।
महीं महाककुत्कम्पन् महीं खुरविक्षताम् ॥ (10.36.1)
वह भयंकर गर्जना कर रहा था, जिसे सुनकर गोकुल की गायें डर कर भागने लगीं और गर्भवती गायों के गर्भ गिर गए। सभी ब्रजवासी त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आ गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि मेरा गोकुल भयभीत है, तो उन्होंने ताल ठोककर उस दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा। क्रोध में अंधा वह बैल कन्हैया की ओर दौड़ा।
पदानवक्रम्य भूमौ निचखान यथा गजः ॥ (10.36.12)
जब वह दैत्य फिर से उठा, तो भगवान ने उसके ही एक सींग को उखाड़कर उससे ऐसा प्रहार किया कि अरिष्टासुर रक्त (खून) और गोबर वमन करता हुआ मृत्यु को प्राप्त हो गया।
अरिष्टासुर के मरने के बाद, देवर्षि नारद जी सीधे कंस के पास गए और उसे बता दिया कि "कंस! जिसे तुम यशोदा की कन्या समझ रहे थे, वह योगमाया थी। तुम्हारा काल (श्रीकृष्ण) गोकुल में नन्द-यशोदा के पास पल रहा है।" यह सुनकर कंस क्रोध से पागल हो गया और उसने अपने सबसे भयंकर राक्षस 'केशी' को गोकुल भेजा।
कंस की आज्ञा पाकर 'केशी' नामक असुर ने एक अत्यंत विशाल 'घोड़े' (अश्व) का रूप धारण किया। वह इतना भयंकर था कि उसकी गर्जना से आकाश गूँजने लगा।
महाहयो निर्जरयन् मनोजवः ।
सटावधूताभ्रविमानसङ्कुलं
कुर्वन्नभो हेषितभीषिताखिलः ॥ (10.37.1)
भगवान श्रीकृष्ण ने जब उसे ललकारा, तो वह घोड़ा अपना भयंकर मुख फाड़कर कन्हैया को निगलने के लिए झपटा। तब भगवान ने अपनी बाईं भुजा को एक सर्प की भाँति उसके मुख में डाल दिया।
पिबन्निवाभ्यद्रवदत्यमर्षणः ।
जघान पद्भ्यामविन्दलोचनं
दुरासदश्चण्डरवो दुरत्ययः ॥ (10.37.4)
भगवान की भुजा उस घोड़े के मुख (गले) में जाकर अत्यंत गर्म (अग्नि के समान) और बड़ी होने लगी। श्वास रुक जाने के कारण केशी तड़पने लगा और अंततः उसका पेट फट गया। देवताओं ने भगवान की स्तुति करते हुए उन्हें 'केशव' (केशी को मारने वाला) नाम से पुकारा।
केशी वध के पश्चात, एक दिन जब सभी सखा वन में 'लुका-छिपी' (चोर-पुलिस) का खेल खेल रहे थे, तब मय दानव का पुत्र 'व्योमासुर' वहाँ आ गया।
व्योमो गोपालवेषेण मेषान्मेषायितोऽहरत् ॥ (10.37.27)
व्योमासुर ने एक-एक करके लगभग सभी बालकों को चुरा लिया और उन्हें एक पहाड़ की गुफा में बंद करके गुफा का मुँह एक भारी पत्थर से बंद कर दिया। बाहर केवल चार-पाँच बालक बचे थे।
भगवान श्रीकृष्ण सब समझ गए। जब वह असुर फिर से एक बालक को चुराने आया, तो भगवान ने उसे शेर की तरह दबोच लिया।
इच्छन् विमोक्तुमात्मानं नाशक्नोद्ग्रहणातुरः ॥ (10.37.30)
भगवान श्रीकृष्ण ने उसे उठाकर जोर से धरती पर पटका और उसका वध कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। उसके पश्चात भगवान ने गुफा के द्वार का पत्थर हटाकर अपने सभी सखाओं को सकुशल बाहर निकाल लिया और गोकुल लौट आए।

