मथुरा प्रवेश: धोबी का वध, सुदामा माली और कुब्जा का उद्धार | Dhobi Vadh Aur Kubja Uddhar Katha Bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

मथुरा प्रवेश: धोबी का वध, सुदामा माली और कुब्जा का उद्धार

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 41 और 42)

गोपियों को विरह के सागर में छोड़कर जब अक्रूर जी का रथ मथुरा पहुँचा, तो भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने विश्राम के पश्चात मथुरा नगर भ्रमण की इच्छा प्रकट की। मथुरा कोई साधारण नगरी नहीं थी; यह कंस के अत्याचार और ऐश्वर्य का केंद्र थी। परंतु जब परब्रह्म ने उस नगरी में प्रवेश किया, तो वहां के निवासियों को लगा मानो साक्षात आनंद की वर्षा हो रही हो। इस मथुरा भ्रमण के दौरान भगवान ने अपने भक्तों को कृपा और दुष्टों को दण्ड देने का जो अद्भुत खेल खेला, वह श्रीमद्भागवत के सबसे ओजस्वी प्रसंगों में से एक है।

1. मथुरा में भगवान का प्रवेश और स्त्रियों की उत्सुकता

जब श्यामसुन्दर और बलराम जी अपने सखाओं के साथ मथुरा के राजमार्ग पर निकले, तो उनकी सुंदरता की चर्चा पूरे नगर में फैल गई। मथुरा की स्त्रियां अपना सारा कामकाज छोड़कर उन्हें देखने के लिए छतों पर दौड़ पड़ीं।

॥ दर्शन की लालसा ॥
तां सम्प्रविष्टौ वसुदेवनन्दनौ
वृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना ।
द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरस्त्रियो
हर्म्याणि चैवारुरुहुर्नृपोत्सुकाः ॥ (10.41.25)
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— जब वसुदेव नंदन (श्रीकृष्ण-बलराम) अपने सखाओं के साथ राजपथ (नरदेव-वर्त्मना) से उस मथुरा नगरी में प्रविष्ट हुए, तो नगर की स्त्रियां अत्यंत उत्सुकता से उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़ीं और शीघ्रता से अपने महलों (हर्म्याणि) की छतों पर चढ़ गईं।

मथुरा के नागरिक भगवान का वह भुवन-मोहन रूप देखकर चकित थे। वे आपस में चर्चा करने लगे कि ब्रज की उन गोपियों ने ऐसा कौन सा तप किया है, जिन्हें प्रतिदिन इस रूप का दर्शन होता है।

॥ गोपियों के तप की महिमा ॥
ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत् ।
या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ ॥ (10.41.32)
अर्थ: मथुरा के पुरवासी (पौरा) कहने लगे— "अहो! गोकुल की उन गोपियों ने ऐसा कौन सा महान तप किया है, जो मनुष्य-लोक के सबसे बड़े महोत्सव स्वरूप इन दोनों भाइयों का वे नित्य दर्शन करती हैं?"
2. अहंकारी धोबी (रजक) से भेंट और वस्त्रों की याचना

आगे चलने पर श्रीकृष्ण ने देखा कि कंस का एक धोबी (रजक) रंग-बिरंगे और उत्तम वस्त्र लेकर आ रहा है। भगवान ने उससे अत्यंत प्रेमपूर्वक वस्त्र मांगे।

॥ धोबी से याचना ॥
रजकं कञ्चिदायान्तं रङ्गकारं गदाग्रजः ।
दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च ॥ (10.41.33)
अर्थ: बलराम जी के छोटे भाई (गदाग्रज श्रीकृष्ण) ने सामने से आते हुए एक रंगरेज धोबी (रजक) को देखकर, उससे अत्यंत उत्तम और धुले हुए वस्त्र मांगे। (कहा कि "हे भाई! हमें ये वस्त्र दे दो, तुम्हारा बड़ा कल्याण होगा।")
3. धोबी का अहंकार और भगवान का प्रहार

वह धोबी राजा कंस का नौकर होने के कारण अत्यंत घमंडी था। उसने भगवान को गालियां देते हुए कहा कि "तुम ग्वार-बालक हो, क्या तुमने कभी ऐसे राजसी कपड़े पहने हैं?"

॥ धोबी के कटु वचन ॥
याताशु बालिशा मैवं प्रार्थ्यं यदि जिजीविषा ।
बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति दृप्तं राजकुलानि वै ॥ (10.41.36)
अर्थ: (धोबी ने कहा)— "अरे मूर्खों (बालिश)! यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो ऐसी अनुचित मांग मत करो और यहाँ से तुरंत भाग जाओ। राजा के सेवक ऐसे उद्दंड लोगों को बंदी बना लेते हैं, मार डालते हैं और उनका सब कुछ लूट लेते हैं।"

जब उस दुष्ट ने ऐसी कटु वाणी कही, तो सर्वेश्वर भगवान को क्रोध आ गया। उन्होंने बिना किसी शस्त्र के, केवल अपने हाथों से ही उसका अंत कर दिया।

॥ धोबी का वध ॥
एवं विकत्थमानस्य कुपितो देवकीसुतः ।
रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत् ॥ (10.41.37)
अर्थ: उसके इस प्रकार डींग मारने (विकत्थमान) और कठोर वचन कहने पर देवकी-नंदन श्रीकृष्ण को क्रोध आ गया। उन्होंने अपने हाथ के अग्रभाग (उंगलियों) के प्रहार से ही उस धोबी का सिर धड़ से अलग कर दिया (काट गिराया)।
आध्यात्मिक रहस्य: 'धोबी' (रजक) बाहर से वस्त्र तो साफ करता था, परंतु भीतर से उसका मन अहंकार और मलिनता से भरा था। भगवान हमें यह सिखाते हैं कि बाहरी चमक-दमक या पद (कंस का सेवक होने) का अहंकार ईश्वर के दरबार में नहीं चलता; वहाँ तो भीतर की शुद्धता (प्रेम) ही काम आती है।
4. वायक (दर्जी) और सुदामा माली पर भगवान की कृपा

धोबी के मरने के बाद उसके सारे साथी वस्त्र छोड़कर भाग गए। कन्हैया और सखाओं ने अपनी इच्छा से वस्त्र पहन लिए। आगे एक दर्जी (वायक) मिला, जिसने अत्यंत प्रेम से भगवान के वस्त्रों को उनके शरीर के नाप के अनुसार सिल (पहना) दिया। भगवान ने उसे सारूप्य मुक्ति दी।

॥ दर्जी पर कृपा ॥
ततस्तु वायकः प्रीतस्तयोर्वेषमकल्पयत् ।
विचित्रवर्णैश्चैलेयैराकल्पैरनुरूपतः ॥ (10.41.40)
अर्थ: तदनन्तर एक दर्जी (वायक) ने अत्यंत प्रेमपूर्वक (प्रीत) अनेक रंगों के वस्त्रों और आभूषणों से उन दोनों भाइयों को उनके शरीर के अनुरूप अत्यंत सुंदर वेश पहनाकर सजा दिया।

इसके बाद भगवान 'सुदामा' नाम के एक माली (फूल वाले) के घर गए। सुदामा ने भगवान को देखते ही साष्टांग प्रणाम किया और उन्हें अत्यंत सुंदर पुष्प-मालाएं पहनाईं। भगवान ने उसे धन, यश और अहैतुकी भक्ति का वरदान दिया।

॥ सुदामा माली का समर्पण ॥
ततः सुदाम्नो भवनं मालाकारस्य जग्मतुः ।
तौ दृष्ट्वा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि ॥ (10.41.43)
अर्थ: इसके बाद वे दोनों भाई (कृष्ण-बलराम) 'सुदामा' नामक माला बनाने वाले (माली) के घर गए। उन्हें देखते ही वह तुरंत उठ खड़ा हुआ और पृथ्वी पर सिर रखकर (साष्टांग) प्रणाम किया।
5. कुब्जा (त्रिवक्रा) से भेंट और चंदन-लेप की याचना

यहाँ से 42वाँ अध्याय आरम्भ होता है। राजपथ पर चलते हुए भगवान ने देखा कि एक युवती, जिसका शरीर तीन जगह से टेढ़ा (कुब्जा/त्रिवक्रा) था, हाथ में चंदन और सुगंधित लेप का बर्तन लेकर जा रही थी। भगवान ने हँसते हुए उससे पूछा:

॥ कुब्जा से भेंट ॥
अथ व्रजन् राजपथेन माधवः
स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम् ।
विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां
पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रदः ॥ (10.42.1)
अर्थ: तदनन्तर राजपथ से जाते हुए, रस (आनंद) प्रदान करने वाले भगवान माधव ने हाथ में सुगंधित लेप (चंदन) का बर्तन लिए हुए और अत्यंत सुंदर मुख (वरानना) वाली एक कुब्जा (कूबड़ वाली) युवती को जाते हुए देखा। भगवान ने हँसते हुए उससे पूछा कि "हे सुंदरी! तुम यह लेप किसके लिए ले जा रही हो?"

कुब्जा ने बताया कि "मेरा नाम त्रिवक्रा है। मैं कंस की दासी हूँ और यह चंदन उसी के लिए ले जा रही हूँ।" परंतु कन्हैया के सौंदर्य पर मुग्ध होकर उसने वह सारा चंदन स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी के अंगों पर लगा दिया।

6. कुब्जा का उद्धार: टेढ़े शरीर को सीधा करना

कुब्जा का शरीर यद्यपि टेढ़ा था, परंतु उसका हृदय चंदन के समान निर्मल था। जो बिना मांगे ही अपना सर्वस्व परमात्मा को अर्पण कर दे, भगवान उसे खाली कैसे जाने देते? भगवान ने उसे सुंदर बनाने का निश्चय किया।

॥ भगवान का संकल्प ॥
प्रसन्नो भगवान् कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम् ।
ऋज्वीं कर्तुं मनश्चक्रे दर्शयन् दर्शने फलम् ॥ (10.42.6)
अर्थ: भगवान ने उसके प्रेम से अत्यंत प्रसन्न होकर उस सुंदर मुख वाली त्रिवक्रा (कुब्जा) को सीधा (ऋज्वीं) करने का संकल्प (मन) किया, ताकि वे जगत को यह दिखा सकें कि भगवान के दर्शन का क्या फल होता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत अलौकिक लीला की। उन्होंने कुब्जा के पैरों को अपने पैरों से दबाया और उसकी ठोड़ी (ठुड्डी) को हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर खींच दिया।

॥ कुब्जा का सीधा होना ॥
पद्भ्यामाक्रम्य प्रपदे द्व्यङ्गुल्युत्तानपाणिना ।
प्रगृह्य चिबुकेऽध्यात्ममुदनीनमदच्युतः ॥ (10.42.7)
अर्थ: भगवान अच्युत ने अपने दोनों पैरों से कुब्जा के दोनों पैरों के पंजों (प्रपदे) को दबा लिया और अपनी दोनों उंगलियों को ऊपर की ओर करके उसके चिबुक (ठोड़ी) को पकड़कर उसके शरीर को ऊपर की ओर खींचकर एकदम सीधा कर दिया।

भगवान के स्पर्श मात्र से कुब्जा का वह टेढ़ा-मेढ़ा शरीर एकदम सीधा और संसार की सबसे सुंदर स्त्री के समान हो गया। वह भगवान की परम भक्ता बन गई।

इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा के 'धनुष यज्ञ' के मण्डप में प्रवेश किया और भगवान शिव के उस अत्यंत कठोर धनुष को खेल-खेल में ही तोड़ डाला, जिसकी भयंकर टंकार सुनकर कंस का हृदय काँप उठा।

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