गोपियों को विरह के सागर में छोड़कर जब अक्रूर जी का रथ मथुरा पहुँचा, तो भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने विश्राम के पश्चात मथुरा नगर भ्रमण की इच्छा प्रकट की। मथुरा कोई साधारण नगरी नहीं थी; यह कंस के अत्याचार और ऐश्वर्य का केंद्र थी। परंतु जब परब्रह्म ने उस नगरी में प्रवेश किया, तो वहां के निवासियों को लगा मानो साक्षात आनंद की वर्षा हो रही हो। इस मथुरा भ्रमण के दौरान भगवान ने अपने भक्तों को कृपा और दुष्टों को दण्ड देने का जो अद्भुत खेल खेला, वह श्रीमद्भागवत के सबसे ओजस्वी प्रसंगों में से एक है।
जब श्यामसुन्दर और बलराम जी अपने सखाओं के साथ मथुरा के राजमार्ग पर निकले, तो उनकी सुंदरता की चर्चा पूरे नगर में फैल गई। मथुरा की स्त्रियां अपना सारा कामकाज छोड़कर उन्हें देखने के लिए छतों पर दौड़ पड़ीं।
वृतौ वयस्यैर्नरदेववर्त्मना ।
द्रष्टुं समीयुस्त्वरिताः पुरस्त्रियो
हर्म्याणि चैवारुरुहुर्नृपोत्सुकाः ॥ (10.41.25)
मथुरा के नागरिक भगवान का वह भुवन-मोहन रूप देखकर चकित थे। वे आपस में चर्चा करने लगे कि ब्रज की उन गोपियों ने ऐसा कौन सा तप किया है, जिन्हें प्रतिदिन इस रूप का दर्शन होता है।
या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ ॥ (10.41.32)
आगे चलने पर श्रीकृष्ण ने देखा कि कंस का एक धोबी (रजक) रंग-बिरंगे और उत्तम वस्त्र लेकर आ रहा है। भगवान ने उससे अत्यंत प्रेमपूर्वक वस्त्र मांगे।
दृष्ट्वायाचत वासांसि धौतान्यत्युत्तमानि च ॥ (10.41.33)
वह धोबी राजा कंस का नौकर होने के कारण अत्यंत घमंडी था। उसने भगवान को गालियां देते हुए कहा कि "तुम ग्वार-बालक हो, क्या तुमने कभी ऐसे राजसी कपड़े पहने हैं?"
बध्नन्ति घ्नन्ति लुम्पन्ति दृप्तं राजकुलानि वै ॥ (10.41.36)
जब उस दुष्ट ने ऐसी कटु वाणी कही, तो सर्वेश्वर भगवान को क्रोध आ गया। उन्होंने बिना किसी शस्त्र के, केवल अपने हाथों से ही उसका अंत कर दिया।
रजकस्य कराग्रेण शिरः कायादपातयत् ॥ (10.41.37)
धोबी के मरने के बाद उसके सारे साथी वस्त्र छोड़कर भाग गए। कन्हैया और सखाओं ने अपनी इच्छा से वस्त्र पहन लिए। आगे एक दर्जी (वायक) मिला, जिसने अत्यंत प्रेम से भगवान के वस्त्रों को उनके शरीर के नाप के अनुसार सिल (पहना) दिया। भगवान ने उसे सारूप्य मुक्ति दी।
विचित्रवर्णैश्चैलेयैराकल्पैरनुरूपतः ॥ (10.41.40)
इसके बाद भगवान 'सुदामा' नाम के एक माली (फूल वाले) के घर गए। सुदामा ने भगवान को देखते ही साष्टांग प्रणाम किया और उन्हें अत्यंत सुंदर पुष्प-मालाएं पहनाईं। भगवान ने उसे धन, यश और अहैतुकी भक्ति का वरदान दिया।
तौ दृष्ट्वा स समुत्थाय ननाम शिरसा भुवि ॥ (10.41.43)
यहाँ से 42वाँ अध्याय आरम्भ होता है। राजपथ पर चलते हुए भगवान ने देखा कि एक युवती, जिसका शरीर तीन जगह से टेढ़ा (कुब्जा/त्रिवक्रा) था, हाथ में चंदन और सुगंधित लेप का बर्तन लेकर जा रही थी। भगवान ने हँसते हुए उससे पूछा:
स्त्रियं गृहीताङ्गविलेपभाजनाम् ।
विलोक्य कुब्जां युवतीं वराननां
पप्रच्छ यान्तीं प्रहसन् रसप्रदः ॥ (10.42.1)
कुब्जा ने बताया कि "मेरा नाम त्रिवक्रा है। मैं कंस की दासी हूँ और यह चंदन उसी के लिए ले जा रही हूँ।" परंतु कन्हैया के सौंदर्य पर मुग्ध होकर उसने वह सारा चंदन स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी के अंगों पर लगा दिया।
कुब्जा का शरीर यद्यपि टेढ़ा था, परंतु उसका हृदय चंदन के समान निर्मल था। जो बिना मांगे ही अपना सर्वस्व परमात्मा को अर्पण कर दे, भगवान उसे खाली कैसे जाने देते? भगवान ने उसे सुंदर बनाने का निश्चय किया।
ऋज्वीं कर्तुं मनश्चक्रे दर्शयन् दर्शने फलम् ॥ (10.42.6)
भगवान श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत अलौकिक लीला की। उन्होंने कुब्जा के पैरों को अपने पैरों से दबाया और उसकी ठोड़ी (ठुड्डी) को हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर खींच दिया।
प्रगृह्य चिबुकेऽध्यात्ममुदनीनमदच्युतः ॥ (10.42.7)
भगवान के स्पर्श मात्र से कुब्जा का वह टेढ़ा-मेढ़ा शरीर एकदम सीधा और संसार की सबसे सुंदर स्त्री के समान हो गया। वह भगवान की परम भक्ता बन गई।
इसके पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा के 'धनुष यज्ञ' के मण्डप में प्रवेश किया और भगवान शिव के उस अत्यंत कठोर धनुष को खेल-खेल में ही तोड़ डाला, जिसकी भयंकर टंकार सुनकर कंस का हृदय काँप उठा।

