विद्याधर का उद्धार और शंखचूड़ (यक्ष) का वध: Vidyadhar Uddhar Aur Shankhachuda Vadh Katha Bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

विद्याधर का उद्धार और शंखचूड़ (यक्ष) का वध

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 34)

श्रीमद्भागवत के 34वें अध्याय में दो अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन है, जो हमें यह सिखाती हैं कि मनुष्य को अपने रूप (सौंदर्य) और धन (संपत्ति) पर कभी अभिमान नहीं करना चाहिए। रूप के अहंकार में सुदर्शन नामक विद्याधर को अजगर बनना पड़ा, और धन के अहंकार में कुबेर के अनुचर 'शंखचूड़' को अपने प्राण गँवाने पड़े। भगवान श्रीकृष्ण ने इन दोनों प्रसंगों में अपनी भक्त-वत्सलता और दुष्ट-दलन की शक्ति का अपूर्व प्रदर्शन किया। आइए, इन ओजस्वी लीलाओं का श्रीमद्भागवत के मूल श्लोकों के साथ दर्शन करें।

1. नन्दबाबा की अम्बिकावन यात्रा और शिव-पूजा

एक बार शिवरात्रि के पावन पर्व पर, नन्दबाबा और सभी गोपों ने भगवान शिव (पशुपतिनाथ) की पूजा करने के लिए सरस्वती नदी के तट पर स्थित 'अम्बिकावन' जाने का निश्चय किया।

॥ देवयात्रा का आरम्भ ॥
एकदा देवयात्रायां गोपाला जातकौतुकाः ।
अनोभिरनडुद्युक्तैः प्रययुस्तेऽम्बिकावनम् ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— हे राजन्! एक बार नन्दबाबा आदि सभी गोप बड़ी उत्सुकता के साथ 'देव-यात्रा' (तीर्थ-यात्रा) के लिए बैलों से जुती हुई बैलगाड़ियों (छकड़ों) पर सवार होकर अम्बिकावन की ओर गए।

वहां पहुँचकर उन्होंने सरस्वती नदी में स्नान किया और अत्यंत श्रद्धा के साथ भगवान शंकर और माता भवानी (अम्बिका) का पूजन किया।

॥ शिव-पार्वती की अर्चना ॥
तत्र स्नात्वा सरस्वत्यां देवं पशुपतिं विभुम् ।
आनर्चुरर्हणैर्भक्त्या देवीं च नृपतेऽम्बिकाम् ॥
अर्थ: हे राजन् (परीक्षित)! वहां सरस्वती नदी में स्नान करके, उन गोपों ने सर्वव्यापक भगवान पशुपति (शिव) और देवी अम्बिका (पार्वती) की अत्यंत भक्तिपूर्वक नाना प्रकार की सामग्रियों से पूजा की।
2. रात्रि में अजगर का आक्रमण और नन्दबाबा की पुकार

उस दिन एकादशी का उपवास होने के कारण सभी गोपों ने केवल जल पीकर रात्रि में वहीं सरस्वती नदी के तट पर विश्राम किया। मध्यरात्रि में एक अत्यंत भयंकर घटना घटी।

॥ अजगर का आक्रमण ॥
कश्चिन्महानहिस्तस्मिन्विपिनेऽतिबुभुक्षितः ।
यदृच्छयागतो नन्दं शयानमुरगोऽग्रसीत् ॥
अर्थ: उस वन में एक अत्यंत भूखा और विशाल सर्प (अजगर) रहता था। वह अचानक (यदृच्छया) वहाँ आ पहुँचा और उसने सोए हुए नन्दबाबा को निगलने के लिए पकड़ लिया।

अजगर की पकड़ में आते ही नन्दबाबा भयभीत हो गए। उन्होंने किसी अन्य देवता को नहीं, अपितु अपने पुत्र रूपी परब्रह्म 'श्रीकृष्ण' को पुकारा।

॥ नन्दबाबा की आर्त पुकार ॥
स चुक्रोशाहिना ग्रस्तः कृष्ण कृष्ण महानयम् ।
सर्पो मां ग्रसते तात प्रपन्नं परिमोचय ॥
अर्थ: अजगर (अहि) द्वारा पकड़े जाने पर नन्दबाबा जोर से चिल्लाने लगे— "हे कृष्ण! हे कृष्ण! यह एक बहुत बड़ा सर्प मुझे निगल रहा है। हे तात (पुत्र)! मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मुझे इस संकट से छुड़ाओ!"
3. भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अजगर का स्पर्श

नन्दबाबा की चीख सुनकर सभी गोप जाग गए। उन्होंने उस अजगर को जलती हुई लकड़ियों (अगुल्टों) से पीटना शुरू किया, परंतु उस भयंकर सर्प ने नन्दबाबा को नहीं छोड़ा। तब साक्षात भगवान श्रीकृष्ण वहाँ आए।

॥ चरण-स्पर्श से उद्धार ॥
अलातैर्दह्यमानोऽपि नामुञ्चत्तमुरङ्गमः ।
तमस्पृशत्पदाभ्येत्य भगवान्सात्वतां पतिः ॥
अर्थ: जलती हुई लकड़ियों (अलात) से जलाए जाने पर भी उस सर्प ने नन्दबाबा को नहीं छोड़ा। तब सात्वतों (भक्तों) के रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने पास आकर उस अजगर को अपने चरणों (पैर) से स्पर्श किया।
4. सुदर्शन विद्याधर का प्राकट्य और उसकी क्षमा-याचना

जैसे ही भगवान के श्रीचरणों का स्पर्श हुआ, वह भयानक अजगर अपने पापों से मुक्त हो गया और उसके भीतर से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और स्वर्ण-माला पहने हुए एक 'विद्याधर' (देवता) प्रकट हुआ।

॥ विद्याधर रूप की प्राप्ति ॥
स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः ।
भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम् ॥
अर्थ: भगवान के उन श्रीचरणों के स्पर्श से उसके सारे पाप (अशुभ) नष्ट हो गए। उसने अपने उस सर्प (अजगर) के शरीर को छोड़ दिया और विद्याधरों द्वारा पूजित अत्यंत दिव्य और सुंदर रूप धारण कर लिया।

भगवान ने उससे पूछा— "तुम कौन हो और तुम्हें यह नीच सर्प योनि क्यों मिली थी?" तब उसने अपने अहंकार की कथा बताई।

॥ रूप का अहंकार ॥
अहं विद्याधरः कश्चित्सुदर्शन इति श्रुतः ।
श्रिया स्वरूपसम्पत्त्या विमानेनाचरन्दिशः ॥ (सार)
अर्थ: उसने कहा— "हे प्रभो! मैं 'सुदर्शन' नाम का विद्याधर था। मैं अपने धन (श्री), रूप और संपदा के अहंकार में अंधा होकर विमान से दिशाओं में घूमा करता था। एक दिन मैंने अपने 'सुंदर रूप' के अहंकार में अंगिरा गोत्र के कुरूप ऋषियों की हँसी उड़ाई थी, जिसके कारण उन्होंने मुझे यह अजगर बनने का शाप दे दिया था।"
आध्यात्मिक रहस्य: संतों का शाप भी वास्तव में कृपा ही होता है। विद्याधर ने कहा कि ऋषियों ने मुझ पर बड़ी कृपा की, क्योंकि यदि वे मुझे शाप न देते, तो मुझे अजगर बनकर 'परमात्मा' (श्रीकृष्ण) के चरण-कमलों का यह साक्षात स्पर्श कभी प्राप्त नहीं होता। रूप का अहंकार जीव को अजगर (पतन) की ओर ही ले जाता है।
5. वन में 'शंखचूड़' यक्ष का आक्रमण

अम्बिकावन की यात्रा से लौटने के कुछ समय पश्चात, एक दिन रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ब्रज की गोपियों के साथ वन में विहार कर रहे थे। वे अत्यंत मधुर स्वर में गा रहे थे। उसी समय कुबेर का एक अनुचर (सेवक) वहाँ आ पहुँचा।

॥ शंखचूड़ का आगमन ॥
एवं विक्रीडतोः स्वैरं गायतोः सम्प्रमत्तवत् ।
शङ्खचूड इति ख्यातो धनदानुचरोऽभ्यगात् ॥
अर्थ: जब श्रीकृष्ण और बलराम मतवाले होकर इस प्रकार स्वतंत्रतापूर्वक (स्वैरं) खेल और गा रहे थे, तभी वहां कुबेर (धनद) का सेवक 'शंखचूड़' नाम का एक यक्ष आ गया।
6. यक्ष का भागना और भगवान द्वारा पीछा करना

धन के मद में चूर उस शंखचूड़ यक्ष ने देखा कि दो बालक (कृष्ण-बलराम) इतनी सुंदर स्त्रियों (गोपियों) के साथ हैं। उसने कृष्ण-बलराम के सामने ही बलपूर्वक गोपियों को उत्तर दिशा की ओर हाँकना (ले जाना) शुरू कर दिया। गोपियां "कृष्ण! कृष्ण!" पुकारने लगीं।

यह देखकर दोनों भाइयों ने शाल के वृक्ष उखाड़ लिए और काल (मृत्यु) के समान उस यक्ष के पीछे दौड़े।

॥ यक्ष का भय और पलायन ॥
स वीक्ष्य तावनुप्राप्तौ कालमृत्यू इवोद्विजन् ।
विसृज्य स्त्रीजनं मूढः प्राद्रवज्जीवितेच्छया ॥
अर्थ: जब उस मूर्ख (मूढ़) यक्ष ने देखा कि साक्षात काल और मृत्यु के समान वे दोनों भाई (कृष्ण-बलराम) उसके निकट आ पहुँचे हैं, तो वह अत्यंत भयभीत हो गया और स्त्रियों (गोपियों) को वहीं छोड़कर अपने प्राण बचाने की इच्छा से तेजी से भाग खड़ा हुआ।
7. शंखचूड़ का वध और 'चूड़ामणि' का उपहार

भगवान श्रीकृष्ण ने बलराम जी से कहा कि "आप गोपियों की रक्षा करें, मैं इस दुष्ट को छोड़ूँगा नहीं।" भगवान ने उस यक्ष का पीछा किया और अपने एक ही घूँसे (मुक्के) से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

॥ शंखचूड़ वध और मणि भेंट ॥
शङ्खचूडं निहत्यैवं मणिमादाय भास्वरम् ।
अग्रजायाददात्प्रीत्या पश्यन्तीनां च योषिताम् ॥
अर्थ: इस प्रकार उस दुष्ट शंखचूड़ का वध करके, भगवान श्रीकृष्ण ने उसके सिर से वह अत्यंत चमकीली मणि (चूड़ामणि) निकाल ली और लौटकर उन सभी गोपियों (योषिताम्) के देखते-देखते अत्यंत प्रेम से वह मणि अपने बड़े भाई (श्री बलराम जी) को भेंट कर दी।

भगवान श्रीकृष्ण की यह लीला सिद्ध करती है कि जो व्यक्ति दूसरों के धन या स्त्रियों पर कुदृष्टि डालता है, उसका सर्वनाश निश्चित है। भगवान ने वह बहुमूल्य मणि स्वयं न रखकर अपने बड़े भाई को देकर आदर्श भ्रातृ-प्रेम (भाई-चारे) का भी संदेश दिया।

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