देवता बनिये, स्वर्ग में रहिये
"स्वर्ग कोई स्थान नहीं, बल्कि हमारे विचारों और कर्मों की उच्च अवस्था है।"
देवता यही काम करते हैं। हम देवताओं को पुकारते हैं— 'हे भगवान् जी, हमारी सहायता कीजिए। गणेश जी, हमको बुद्धि दीजिए। लक्ष्मी जी, हमको पैसा दीजिए।' यह उनका स्वभाव है कि वे देते रहते हैं। उनके पास कोई ज्ञान, विद्या या वैभव है, तो वे आसानी से बाँट देते हैं और लोगों की मुसीबतों में हिस्सा बँटाते हैं। जो व्यक्ति 'इक्कड़-इक्कड़' (अकेला ही) खाता रहता है, जो केवल अपने लिए संचय करता है, वह वास्तव में पाप का संचय करता है।
वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु
इसीलिए हमारे यहाँ संयुक्त कुटुम्ब (परिवार) की प्रणाली है। कमाने वाला अकेला नहीं खाता; कोई बच्चा है, कोई बीमार है, कोई बूढ़ा है—सब मिल-जुलकर खाते हैं। इस पारिवारिक वृत्ति में ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पूरी धरती एक परिवार है) की मान्यता जुड़ी हुई है।
'आत्मवत् सर्वभूतेषु' का अर्थ है—दूसरों की मुसीबतों में हिस्सेदार हो जाइये और अपनी सुविधाओं को बाँट दीजिए। अपने उस 'स्व' (अहंकार) को, जिसे आपने कूपमण्डूक (कुएं के मेंढक) की तरह सीमित कर रखा है, विशाल बना दीजिए। जब आप सबके हो जायेंगे और सब आपके हो जायेंगे, तब आप देवता हो जायेंगे और आपके लिए यहीं स्वर्ग आ जायेगा। यदि आप केवल अपना खाना, अपना पहनना, अपना पैसा और अपना नाम करते रहेंगे, तो आप मानसिक दृष्टि से नरक की यातनाएँ ही भुगतेंगे।
जीवन जीने के दो स्वर्णिम सूत्र
स्वर्ग जैसी मनःस्थिति पाने के लिए आपको अपने जीवन में दो बड़े बदलाव करने होंगे:
।। निष्कर्ष ।।
भविष्य की तैयारी करें, भूतकाल को भूल जाएँ और एक खिलाड़ी की तरह प्रसन्नता से जीवन जिएँ। अपने जीवन के तौर-तरीकों में ऐसा मौलिक परिवर्तन करके ही आप सही मायनों में इसी धरती पर 'देवता' बन सकते हैं और 'स्वर्ग' का आनंद ले सकते हैं। मेरी आशा है, आप यही करेंगे।
॥ ॐ शान्तिः ॥

