वृन्दावन में रहते हुए जब भगवान श्रीकृष्ण और श्री बलराम जी 'पौगंड' अवस्था (लगभग 5 वर्ष से अधिक) में प्रवेश कर गए, तब माता यशोदा और नन्दबाबा ने उन्हें बछड़ों के स्थान पर अब बड़ी गायों को चराने का अधिकार दे दिया। भगवान की इस अवस्था की लीलाओं में शौर्य, मित्रता और प्रकृति-प्रेम का एक अद्भुत संगम दिखाई देता है। अब तक राक्षसों का वध मुख्य रूप से श्रीकृष्ण करते थे, परंतु अब समय था 'बलराम जी' (दाऊ दादा) के असीम पराक्रम को प्रकट करने का। 'तालवन' और 'भांडीरवन' की इन लीलाओं में हम गधे का रूप धरने वाले 'धेनुकासुर' और मायावी 'प्रलम्बासुर' के वध की अत्यंत ओजस्वी कथा का श्रवण करेंगे।
एक दिन श्रीदामा, सुबल और स्तोककृष्ण आदि सखाओं ने बलराम जी और श्रीकृष्ण से एक विशेष प्रार्थना की। उन्होंने बताया कि वृन्दावन के निकट ही 'तालवन' नाम का एक अत्यंत विशाल वन है, जहाँ ताड़ (Palm) के पेड़ों पर बहुत मीठे और सुगंधित फल लगे हैं।
इतोऽविदूरे सुमहद् वनं तालैरुपाकुलम् ॥
सखाओं ने बताया कि उस वन में पके हुए फलों की सुगंध इतनी मनमोहक है कि पूरे वृन्दावन में फैलती है, परंतु डर के मारे कोई उन्हें खा नहीं पाता।
सन्ति त्ववारितानीह धेनुकेन दुरात्मना ॥
सखाओं ने उस दैत्य का परिचय देते हुए बताया कि वह दैत्य कोई साधारण असुर नहीं है, बल्कि उसने एक भयंकर गधे का रूप धारण किया हुआ है। वह और उसके अन्य साथी गधे मनुष्यों का मांस (नरभक्षी) खाते हैं।
निरनुक्रोशो बलवान् ज्ञातिभिर्बहुभिर्वृतः ॥
सखाओं ने हठ पकड़ लिया कि "कन्हैया! हमें वे ताल के फल खाने हैं, तुम हमें वहां ले चलो।"
अपने सखाओं की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी हँस पड़े। अपने मित्रों को प्रसन्न करने के लिए वे दोनों तालवन की ओर चल पड़े।
प्रहस्य जग्मतुस्तालं वनं गोपैर्वृतौ प्रभू ॥
तालवन में पहुँचते ही, श्री बलराम जी ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया। वे सीधे एक विशाल ताड़ के पेड़ के पास गए।
फलानि पातयामास मतङ्गज इवौजसा ॥
फलों के गिरने की भयंकर आवाज सुनकर धेनुकासुर क्रोध से पागल हो गया। धरती को कंपाता हुआ वह गधा दौड़कर आया और उसने पीछे घूमकर अपने पिछले दोनों पैरों से बलराम जी की छाती पर जोर से प्रहार किया।
अभ्यधावत् क्षितितलं सघोषः कम्पयन् मुहुः ॥
बलराम जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। जब उस दैत्य ने दोबारा प्रहार करने के लिए अपने पिछले पैर उठाए, तो अनंत बल के स्वामी 'बलदाऊ' ने उसका अंत कर दिया।
चिक्षेप तृणराजस्य शिखरे भ्रामदसुम् ॥
इसके बाद धेनुकासुर के जितने भी साथी गधे वहां आए, बलराम जी और श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में उन सभी को पैरों से पकड़कर पेड़ों पर दे मारा। वह पूरा वन निर्भय हो गया और बालकों ने पेट भरकर मीठे फल खाए।
ग्रीष्म ऋतु का समय था। एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम 'भांडीरवन' नामक वन में ग्वाल-बालों के साथ अनेक प्रकार के खेल खेल रहे थे। उसी समय कंस का एक और मायावी दैत्य वहां आया।
जिहीर्षुः कृष्णचरितं रामं च बलशालिनम् ॥
भगवान श्रीकृष्ण उसे तुरंत पहचान गए, परंतु उन्होंने ऐसा नाटक किया मानो उसे एक नया सखा मानकर उसका स्वागत कर रहे हों।
बालकों ने एक खेल आरंभ किया। इसमें दो दल (Teams) बने— एक के नायक श्रीकृष्ण थे और दूसरे के बलराम जी। नियम यह था कि जो दल हारेगा, वह जीतने वाले दल के बालकों को अपनी पीठ पर बैठाकर ढोएगा (ले जाएगा)।
खेल में श्रीकृष्ण का दल हार गया। इसलिए नियम के अनुसार श्रीकृष्ण और उनके दल के बालकों को जीतने वालों को पीठ पर उठाना पड़ा। प्रलम्बासुर श्रीकृष्ण के दल में था और बलराम जी विजयी दल में थे।
प्रलम्बो रोहिणीपुत्रमुवाह परमो बली ॥
प्रलम्बासुर बलराम जी को पीठ पर बिठाकर बहुत दूर (नियत स्थान से भी आगे) ले गया। जब बलराम जी उसके लिए बहुत भारी हो गए, तो उसने ग्वाल-बाल का रूप छोड़कर अपना असली, पहाड़ के समान भयंकर राक्षसी रूप धारण कर लिया।
क्षण भर के लिए बलराम जी ने बालक की भाँति डरने का नाटक किया। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें याद दिलाया कि "दाऊ दादा! आप तो साक्षात अनन्त हैं, इस दुष्ट का वध कीजिए।" तब बलराम जी को क्रोध आ गया।
स ताहतो मुष्टिप्रातार्दितासुरः पपात भूमौ विशीर्णमस्तकः ॥
प्रलम्बासुर के मरते ही, गोकुल के सभी बालकों ने आकर बलराम जी की जय-जयकार की। आकाश से देवताओं ने उन पर पुष्पों की वर्षा की।
देवाः प्रमुदिताः सर्वे व्यकिरन् पुष्पवृष्टिभिः ॥
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने तालवन और भांडीरवन को असुरों से मुक्त किया और ब्रजवासियों को परम अभय प्रदान किया।

