Dhenukasura Aur Pralambasura Vadh: Balaram Ji Ka Parakram bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

तालवन प्रवेश, धेनुकासुर वध और प्रलम्बासुर का अंत

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 15 और 18)

वृन्दावन में रहते हुए जब भगवान श्रीकृष्ण और श्री बलराम जी 'पौगंड' अवस्था (लगभग 5 वर्ष से अधिक) में प्रवेश कर गए, तब माता यशोदा और नन्दबाबा ने उन्हें बछड़ों के स्थान पर अब बड़ी गायों को चराने का अधिकार दे दिया। भगवान की इस अवस्था की लीलाओं में शौर्य, मित्रता और प्रकृति-प्रेम का एक अद्भुत संगम दिखाई देता है। अब तक राक्षसों का वध मुख्य रूप से श्रीकृष्ण करते थे, परंतु अब समय था 'बलराम जी' (दाऊ दादा) के असीम पराक्रम को प्रकट करने का। 'तालवन' और 'भांडीरवन' की इन लीलाओं में हम गधे का रूप धरने वाले 'धेनुकासुर' और मायावी 'प्रलम्बासुर' के वध की अत्यंत ओजस्वी कथा का श्रवण करेंगे।

1. श्रीदामा आदि सखाओं की प्रार्थना और तालवन का वर्णन

एक दिन श्रीदामा, सुबल और स्तोककृष्ण आदि सखाओं ने बलराम जी और श्रीकृष्ण से एक विशेष प्रार्थना की। उन्होंने बताया कि वृन्दावन के निकट ही 'तालवन' नाम का एक अत्यंत विशाल वन है, जहाँ ताड़ (Palm) के पेड़ों पर बहुत मीठे और सुगंधित फल लगे हैं।

॥ सखाओं की प्रार्थना ॥
राम राम महाबाहो कृष्ण दुष्टनिबर्हण ।
इतोऽविदूरे सुमहद् वनं तालैरुपाकुलम् ॥
अर्थ: सखाओं ने कहा— "हे महाबाहु बलराम! हे दुष्टों का नाश करने वाले कृष्ण! यहाँ से कुछ ही दूरी पर ताल (ताड़) के वृक्षों से भरा हुआ एक बहुत बड़ा वन है।"

सखाओं ने बताया कि उस वन में पके हुए फलों की सुगंध इतनी मनमोहक है कि पूरे वृन्दावन में फैलती है, परंतु डर के मारे कोई उन्हें खा नहीं पाता।

॥ पके फलों का लालच ॥
फलानि तत्र भूरीणि पक्वानि पतितानि च ।
सन्ति त्ववारितानीह धेनुकेन दुरात्मना ॥
अर्थ: "वहाँ बहुत से पके हुए फल लगे हैं और कुछ जमीन पर गिरे हुए हैं, परंतु 'धेनुक' नाम के उस दुष्टात्मा दैत्य के भय से कोई भी वहां नहीं जा पाता।"
2. गर्दभ (गधे) रूपी धेनुकासुर का आतंक

सखाओं ने उस दैत्य का परिचय देते हुए बताया कि वह दैत्य कोई साधारण असुर नहीं है, बल्कि उसने एक भयंकर गधे का रूप धारण किया हुआ है। वह और उसके अन्य साथी गधे मनुष्यों का मांस (नरभक्षी) खाते हैं।

॥ धेनुकासुर का परिचय ॥
स चासावसुरो राम धेनुको गर्दभाकृतिः ।
निरनुक्रोशो बलवान् ज्ञातिभिर्बहुभिर्वृतः ॥
अर्थ: "हे राम (बलराम)! वह धेनुकासुर गधे (गर्दभ) के रूप में रहता है। वह अत्यंत निर्दयी (निरनुक्रोश) और बलवान है, और अपने ही जैसे अन्य बहुत से दैत्यों से घिरा रहता है।"

सखाओं ने हठ पकड़ लिया कि "कन्हैया! हमें वे ताल के फल खाने हैं, तुम हमें वहां ले चलो।"

3. तालवन में प्रवेश और बलराम जी का पराक्रम

अपने सखाओं की यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी हँस पड़े। अपने मित्रों को प्रसन्न करने के लिए वे दोनों तालवन की ओर चल पड़े।

॥ तालवन प्रस्थान ॥
श्रुत्वेति सुहृदां वाचो भगवान् देवकीसुतः ।
प्रहस्य जग्मतुस्तालं वनं गोपैर्वृतौ प्रभू ॥
अर्थ: अपने मित्रों की ऐसी बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण (देवकीसुत) और बलराम जी हँस पड़े, और ग्वाल-बालों को साथ लेकर उस तालवन की ओर चल पड़े।

तालवन में पहुँचते ही, श्री बलराम जी ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया। वे सीधे एक विशाल ताड़ के पेड़ के पास गए।

॥ पेड़ों को हिलाना ॥
स तत्र गत्वा बाहुभ्यां सालान् सम्परिकम्पयन् ।
फलानि पातयामास मतङ्गज इवौजसा ॥
अर्थ: वन में पहुँचकर श्री बलराम जी ने अपनी दोनों भुजाओं से ताड़ के पेड़ों को जोर से हिलाया, और एक मतवाले हाथी (मतङ्गज) के समान बल लगाकर सारे पके फलों को झड़-झड़ नीचे गिरा दिया।
4. धेनुकासुर का आक्रमण और उसका अंत

फलों के गिरने की भयंकर आवाज सुनकर धेनुकासुर क्रोध से पागल हो गया। धरती को कंपाता हुआ वह गधा दौड़कर आया और उसने पीछे घूमकर अपने पिछले दोनों पैरों से बलराम जी की छाती पर जोर से प्रहार किया।

॥ धेनुकासुर का आक्रमण ॥
फलपातः शब्दमाकर्ण्य धेनुको गर्दभाकृतिः ।
अभ्यधावत् क्षितितलं सघोषः कम्पयन् मुहुः ॥
अर्थ: फलों के गिरने का शब्द सुनकर गधे के रूप वाला वह धेनुकासुर भयंकर गर्जना करता हुआ और धरती को बारंबार कंपाता हुआ बलराम जी की ओर दौड़ा।

बलराम जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। जब उस दैत्य ने दोबारा प्रहार करने के लिए अपने पिछले पैर उठाए, तो अनंत बल के स्वामी 'बलदाऊ' ने उसका अंत कर दिया।

॥ धेनुकासुर वध ॥
स तं गृहीत्वा प्रपदे भ्रामयित्वैकपाणिना ।
चिक्षेप तृणराजस्य शिखरे भ्रामदसुम् ॥
अर्थ: बलराम जी ने उसके पिछले दोनों पैरों को एक ही हाथ से कसकर पकड़ लिया, उसे हवा में इतनी जोर से घुमाया कि उसके प्राण निकल गए, और फिर मरे हुए उस दैत्य को एक बड़े ताड़ के पेड़ की चोटी पर फेंक दिया।

इसके बाद धेनुकासुर के जितने भी साथी गधे वहां आए, बलराम जी और श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में उन सभी को पैरों से पकड़कर पेड़ों पर दे मारा। वह पूरा वन निर्भय हो गया और बालकों ने पेट भरकर मीठे फल खाए।

आध्यात्मिक रहस्य: 'धेनुकासुर' गधा है, और गधा 'देहाभिमान' (मैं यह शरीर हूँ) और 'मूढ़ता' का प्रतीक है। गधा बिना सोचे-समझे बोझा ढोता है। इसी प्रकार जीव संसार के कर्मों का बोझा ढोता है। बलराम जी 'अखंड गुरु-तत्त्व' हैं। सद्गुरु ही कृपा करके जीव के इस देहाभिमान और अज्ञान रूपी गधे को नष्ट कर सकते हैं।
5. भांडीरवन में क्रीड़ा और प्रलम्बासुर का प्रवेश

ग्रीष्म ऋतु का समय था। एक दिन श्रीकृष्ण और बलराम 'भांडीरवन' नामक वन में ग्वाल-बालों के साथ अनेक प्रकार के खेल खेल रहे थे। उसी समय कंस का एक और मायावी दैत्य वहां आया।

॥ प्रलम्बासुर का आगमन ॥
तत्राजगाम प्रलम्बो नामासुरो गोपरूपधृक् ।
जिहीर्षुः कृष्णचरितं रामं च बलशालिनम् ॥
अर्थ: वहां 'प्रलम्ब' नाम का एक असुर ग्वाल-बाल का रूप धारण करके आ गया। उसकी इच्छा भगवान श्रीकृष्ण और अत्यंत बलवान बलराम जी का हरण (अपहरण) करने की थी।

भगवान श्रीकृष्ण उसे तुरंत पहचान गए, परंतु उन्होंने ऐसा नाटक किया मानो उसे एक नया सखा मानकर उसका स्वागत कर रहे हों।

6. 'हरिण-क्रीड़न' (हिरण का खेल) और प्रलम्ब की हार

बालकों ने एक खेल आरंभ किया। इसमें दो दल (Teams) बने— एक के नायक श्रीकृष्ण थे और दूसरे के बलराम जी। नियम यह था कि जो दल हारेगा, वह जीतने वाले दल के बालकों को अपनी पीठ पर बैठाकर ढोएगा (ले जाएगा)।

खेल में श्रीकृष्ण का दल हार गया। इसलिए नियम के अनुसार श्रीकृष्ण और उनके दल के बालकों को जीतने वालों को पीठ पर उठाना पड़ा। प्रलम्बासुर श्रीकृष्ण के दल में था और बलराम जी विजयी दल में थे।

॥ पीठ पर ढोना ॥
उवाह कृष्णं श्रीदामा भद्रसेनो वृषं तथा ।
प्रलम्बो रोहिणीपुत्रमुवाह परमो बली ॥
अर्थ: खेल के नियम के अनुसार, श्रीदामा ने श्रीकृष्ण को ढोया (उठाया), भद्रसेन ने वृषभ को उठाया, और उस परम बलवान प्रलम्बासुर ने हारकर बलराम (रोहिणीपुत्र) को अपनी पीठ पर उठा लिया।
7. प्रलम्बासुर का विशाल रूप और बलराम जी का क्रोध

प्रलम्बासुर बलराम जी को पीठ पर बिठाकर बहुत दूर (नियत स्थान से भी आगे) ले गया। जब बलराम जी उसके लिए बहुत भारी हो गए, तो उसने ग्वाल-बाल का रूप छोड़कर अपना असली, पहाड़ के समान भयंकर राक्षसी रूप धारण कर लिया।

क्षण भर के लिए बलराम जी ने बालक की भाँति डरने का नाटक किया। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें याद दिलाया कि "दाऊ दादा! आप तो साक्षात अनन्त हैं, इस दुष्ट का वध कीजिए।" तब बलराम जी को क्रोध आ गया।

॥ प्रलम्बासुर का अंत ॥
शिरस्यताडयद् रामो मुष्ट्या वज्रनिपातया ।
स ताहतो मुष्टिप्रातार्दितासुरः पपात भूमौ विशीर्णमस्तकः ॥
अर्थ: श्री बलराम जी ने वज्र के समान प्रहार करने वाली अपनी मुट्ठी से उस असुर के सिर पर जोर से प्रहार किया। उस घूंसे की चोट से उस असुर का सिर (मस्तक) फट गया और वह प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़ा।
आध्यात्मिक रहस्य: 'प्रलम्बासुर' उस 'कपट और अहंकार' का प्रतीक है जो मित्र बनकर (सद्गुणों का रूप धरकर) हमारे भीतर प्रवेश करता है। जब तक जीव पर गुरु (बलराम) की पूर्ण कृपा नहीं होती, यह कपट रूपी प्रलम्बासुर जीव को भगवान से दूर ले जाने का प्रयास करता रहता है।
8. देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा और स्तुति

प्रलम्बासुर के मरते ही, गोकुल के सभी बालकों ने आकर बलराम जी की जय-जयकार की। आकाश से देवताओं ने उन पर पुष्पों की वर्षा की।

॥ देवताओं का हर्ष ॥
अहो बलेति शंसन्तः साधु साद्विति वादिनः ।
देवाः प्रमुदिताः सर्वे व्यकिरन् पुष्पवृष्टिभिः ॥
अर्थ: "अहो बल! अहो बल!" (बलराम जी की जय हो) ऐसा कहते हुए और "साधु! साधु!" (बहुत सुंदर) का उच्चारण करते हुए, स्वर्ग के अत्यंत प्रसन्न देवताओं ने उन पर पुष्पों की वर्षा की।

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने तालवन और भांडीरवन को असुरों से मुक्त किया और ब्रजवासियों को परम अभय प्रदान किया।

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