Cheer Haran Leela: Katyayani Vrat Aur Krishna Ki Kripa bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

चीर हरण लीला: कात्यायनी व्रत का फल और गोपियों पर कृपा

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 22)

श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित 'चीर हरण लीला' को सांसारिक दृष्टि से समझना सर्वथा असंभव है। यह लीला जीवात्मा और परमात्मा के बीच के उस आवरण (अहंकार और वासनाओं रूपी वस्त्र) को हटाने का प्रतीक है, जो मिलन में बाधक है। ब्रज की कुमारिकाएं (अविवाहित गोपियां) भगवान श्रीकृष्ण को 'पति' (स्वामी) रूप में प्राप्त करने के लिए 'कात्यायनी व्रत' कर रही थीं। जब व्रत पूर्ण हुआ, तो भगवान ने उनके द्वारा की गई एक अनजाने भूल (जल में निर्वस्त्र स्नान) को सुधारते हुए, उन्हें पूर्ण शरणागति का पाठ पढ़ाया और 'रासलीला' का परम वरदान दिया।

1. नन्द-व्रज की कुमारिकाओं का कात्यायनी व्रत

हेमंत ऋतु के प्रथम मास (मार्गशीर्ष/अगहन) में ब्रज की सभी अविवाहित गोपियों (कुमारिकाओं) ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता कात्यायनी (दुर्गा) का व्रत आरम्भ किया।

॥ व्रत का आरम्भ ॥
हेमन्ते प्रथमे मासि नन्दव्रजकुमारिकाः ।
चेरुर्हविष्यं भुञ्जानाः कात्यायन्यर्चनव्रतम् ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— हेमंत ऋतु के पहले महीने में नन्दबाबा के ब्रज की कुमारिकाएं केवल 'हविष्य' (यज्ञ के योग्य शुद्ध अन्न) खाकर माता कात्यायनी के पूजन का व्रत करने लगीं।
2. माता कात्यायनी से गोपियों की परम प्रार्थना

ये गोपियां प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व यमुना जी में स्नान करतीं और यमुना के तट पर रेत की देवी बनाकर उनकी गंध, पुष्प, धूप और दीप से पूजा करती थीं। उनका एक ही मंत्र था:

॥ देवी से प्रार्थना ॥
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः ॥
अर्थ: (गोपियां कहतीं)— "हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी अधीश्वरी देवि! आप नन्दगोप के पुत्र (श्रीकृष्ण) को मेरा पति (स्वामी) बना दीजिए। हम आपको बारंबार नमस्कार करती हैं।"
3. भगवान का अंतर्यामी रूप और लीला का संकल्प

इस प्रकार व्रत करते हुए एक महीना बीत गया। व्रत के अंतिम दिन सभी गोपियां अपने वस्त्र किनारे पर रखकर यमुना जल में निर्वस्त्र होकर स्नान कर रही थीं और श्रीकृष्ण के ही मंगलमय गुणों का गान कर रही थीं। सर्वज्ञ भगवान उनकी निष्काम भक्ति को जान गए।

॥ भगवान का आगमन ॥
भगवांस्तदभिप्रेत्य कृष्णो योगेश्वरेश्वरः ।
वयस्यैरावृतो गोपैस्तत्र जग्मे तदिच्छया ॥
अर्थ: योगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उन गोपियों के हृदय के भाव (अभिप्राय) को जान लिया। उनके उस संकल्प को पूरा करने की इच्छा से, भगवान अपने सखाओं (ग्वाल-बालों) के साथ यमुना तट पर वहाँ आ पहुँचे।
4. वस्त्र हरण (चीर हरण) और कदम्ब पर आरोहण

शास्त्रों का नियम है कि जल (जो वरुण देव का स्वरूप है) में पूर्णतः निर्वस्त्र होकर स्नान करना जल के देवता का अपमान है। गोपियों का व्रत शुद्ध था, परंतु उनसे यह त्रुटि हो रही थी। साथ ही भगवान को उनके 'देहाभिमान' (लज्जा रूपी अहंकार) को भी दूर करना था।

॥ चीर हरण ॥
तासां वासांस्युपादाय नीपमारुह्य सत्वरः ।
हसद्भिः प्रहसन् बालैः परिहासमिदं जगौ ॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत उनके सारे वस्त्र उठा लिए और एक ऊँचे नीप (कदम्ब) के वृक्ष पर चढ़ गए। वहां बैठकर वे हँसते हुए बालकों के साथ स्वयं भी हँसने लगे और गोपियों से यह परिहास (मजाक) करने लगे।
5. कन्हैया का गोपियों को पुकारना

भगवान ने मुस्कराते हुए गोपियों से कहा— "हे कुमारिकाओं! तुम लोग जल में क्या कर रही हो? तुम्हारे वस्त्र यहाँ हैं, आकर ले जाओ।"

॥ भगवान की पुकार ॥
अत्रागत्याबलाः कामं स्वं स्वं वासः प्रगृह्यताम् ।
सत्यं ब्रवाणि नो नर्म यद् यूयं व्रतकर्शिताः ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे अबलाओं! यहाँ आकर तुम लोग अपनी इच्छानुसार अपने-अपने वस्त्र ले लो। मैं सत्य कह रहा हूँ, कोई मजाक (नर्म) नहीं कर रहा, क्योंकि तुम सबने व्रत करके अपने शरीर को बहुत सुखा लिया है (अतः मुझे तुम पर दया आ रही है)।"
6. गोपियों की पूर्ण शरणागति और दासत्व का भाव

गोपियां लज्जा के कारण गले तक जल में डूब गईं। उन्होंने कन्हैया से प्रार्थना की कि हे धर्मज्ञ! हमें हमारे वस्त्र दे दो, अन्यथा हम नन्दबाबा से तुम्हारी शिकायत कर देंगी। परंतु जब भगवान नहीं माने, तो उन गोपियों ने अपना समस्त देहाभिमान छोड़कर पूर्ण शरणागति ले ली।

॥ पूर्ण समर्पण ॥
श्यामसुन्दर ते दास्यः करवाम तवोदितम् ।
देहि वासांसि धर्मज्ञ नो चेद् राज्ञे ब्रुवामहे॥
अर्थ: (गोपियों ने कहा)— "हे श्यामसुन्दर! हम तुम्हारी दासियां हैं। तुम जो आज्ञा दोगे, हम वही करेंगी। हे धर्मज्ञ! हे माधव! हमें हमारे वस्त्र दे दो, नहीं तो नन्दबाबा से आपकी शिकायत कर दूँगी।"
7. आवरण-भंग: देहाभिमान से मुक्ति

जब भगवान ने देखा कि गोपियों का सारा अहंकार टूट गया है और उन्होंने मुझे ही अपना एकमात्र स्वामी मान लिया है, तो भगवान ने उन्हें जल से बाहर आने को कहा।

॥ आवरण का हटना ॥
ततो जलाशयात् सर्वा दारिकाः शीतवेपिताः ।
पाणिभ्यां योनिमाच्छाद्य प्रोत्तेरुः शीतकर्शिताः ॥
अर्थ: श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर, ठंड से काँपती हुई वे सभी कन्याएं अपने हाथों से अपने अंगों को छिपाती हुई उस जलाशय (यमुना) से बाहर निकल आईं।

भगवान ने उनसे कहा कि तुमने जल में निर्वस्त्र स्नान करके वरुण देव का अपराध किया है, इसलिए अपने दोनों हाथ सिर के ऊपर जोड़कर भगवान से क्षमा मांगो। जैसे ही गोपियों ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए, उनका अंतिम आवरण (लज्जा) भी गिर गया और वे पूर्ण रूप से केवल परमात्मा की हो गईं। भगवान ने अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें उनके वस्त्र लौटा दिए।

चीर हरण का आध्यात्मिक रहस्य: 'चीर' का अर्थ है वस्त्र या आवरण (Covering)। जीव जब तक अज्ञान, पद, प्रतिष्ठा, लोक-लज्जा और देहाभिमान (शरीर के प्रति मोह) के कपड़े पहने रहता है, तब तक उसे परमात्मा के निर्गुण रस का आनंद नहीं मिलता। भगवान चीर (वस्त्र) चुराकर जीव को 'अहंकार-शून्य' कर देते हैं।
8. भगवान की स्वीकृति और निष्काम प्रेम का सिद्धांत

भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के विशुद्ध प्रेम को स्वीकार करते हुए उन्हें पूर्णता का आश्वासन दिया।

॥ व्रत की पूर्णता ॥
सङ्कल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदार्चनम् ।
मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे साध्वियो! मुझे पति रूप में पाने के लिए तुम लोगों ने जो मेरा पूजन (व्रत) किया है, तुम्हारे उस संकल्प को मैं जान गया हूँ। मैंने उसका अनुमोदन (स्वीकार) कर लिया है, इसलिए तुम्हारा यह संकल्प अवश्य सत्य होगा।"

यहाँ भगवान एक बहुत बड़ा रहस्य बताते हैं। कोई यह सोच सकता है कि गोपियों का भगवान को पति रूप में मांगना एक 'सांसारिक काम' (Desire) है। परंतु प्रभु कहते हैं:

॥ काम का निष्काम होना ॥
न मय्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।
भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥
अर्थ: "जिनका चित्त पूर्ण रूप से मुझमें (परमात्मा में) लग गया है, उनकी कोई भी कामना फिर सांसारिक कामना नहीं रह जाती। जैसे आग में भूने या उबाले गए बीज (धान) फिर से अंकुरित नहीं होते, उसी प्रकार मुझमें लगाया गया प्रेम संसार-चक्र को उत्पन्न नहीं कर सकता।"
9. आगामी 'रासलीला' का परम वरदान

अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों को वह वरदान दिया, जिसकी प्रतीक्षा स्वयं देवता भी करते हैं।

॥ रासलीला का वरदान ॥
याताबला व्रजं सिद्धा मयेमा रंस्यथ क्षपाः ।
यदुद्दिश्य व्रतं चेदं चेरुरायार्यकाचनम् ॥
अर्थ: "हे अबलाओं! अब तुम सब पूर्णकाम (सिद्धा) हो गई हो, तुम ब्रज लौट जाओ। जिस उद्देश्य से तुमने देवी का यह व्रत किया था, उसे पूर्ण करने के लिए आने वाली शरद् ऋतु की रात्रियों में तुम मेरे साथ रास-विहार करोगी।"

भगवान का यह वरदान पाकर गोपियों के आनंद की कोई सीमा न रही। वे भगवान के चरण-कमलों का ध्यान करती हुई अपने-अपने घरों को लौट गईं।

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