भक्ति मार्ग में ज्ञान और कर्मकाण्ड से कहीं अधिक श्रेष्ठ 'प्रेम' को माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी एक अत्यंत मधुर लीला से इसी सिद्धांत को सिद्ध किया। एक बार वृन्दावन में वन-विहार करते समय ग्वाल-बालों को अत्यंत भूख लगी। कन्हैया ने उन्हें पास ही यज्ञ कर रहे कर्मकांडी ब्राह्मणों के पास अन्न मांगने भेजा। परंतु उन अज्ञानी ब्राह्मणों ने उन्हें दुत्कार दिया। तब भगवान ने उन्हें उन ब्राह्मणों की पत्नियों (यज्ञपत्नियों) के पास भेजा, जिन्होंने अपना सर्वस्व छोड़कर प्रभु को अन्न अर्पित किया। यह कथा भक्ति की विजय और अहंकार के पतन का सबसे उत्तम उदाहरण है।
1. ब्राह्मणों के पास भोजन की याचना और उनका अहंकार
भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर ग्वाल-बाल उन ब्राह्मणों के पास गए जो 'आंगिरस' नामक एक महान यज्ञ कर रहे थे। बालकों ने जाकर कहा— "हे देवगण! हमें श्रीकृष्ण और बलराम जी ने भेजा है। वे भूखे हैं, कृपया उन्हें थोड़ा अन्न दे दीजिए।" परंतु ब्राह्मण अपने कर्मकाण्ड के अहंकार में डूबे हुए थे।
॥ ब्राह्मणों की उपेक्षा ॥
इति ते भगवद्याच्ञां शृण्वन्तोऽपि न शुश्रुवुः ।
क्षुद्राशा भूरिकर्माणो बालिशा वृद्धमानिनः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— भगवान श्रीकृष्ण की याचना (प्रार्थना) सुनने पर भी उन ब्राह्मणों ने अनसुना कर दिया। वे क्षुद्र (स्वर्ग आदि) आशाओं वाले थे, बहुत अधिक कर्मकाण्ड करने वाले थे, परंतु वास्तव में वे अज्ञानी (बालिश) होकर भी स्वयं को बड़ा ज्ञानी (वृद्धमानी) समझते थे।
ब्राह्मणों ने सोचा कि यह तो साधारण ग्वार-बालक हैं। उन्हें यह ज्ञात ही नहीं था कि जिसके लिए वे यज्ञ कर रहे हैं, वह स्वयं अन्न मांग रहा है।
॥ यज्ञ का वास्तविक भोक्ता ॥
देशः कालः पृथग्द्रव्यं मन्त्रतन्त्रर्त्विजोऽग्नयः ।
देवता यजमानश्च क्रतुर्धर्मो यदात्मकः ॥
अर्थ: यद्यपि देश, काल, यज्ञ की सामग्री, मन्त्र, तन्त्र, ऋत्विज, अग्नि, देवता, यजमान, यज्ञ और धर्म— यह सब कुछ जिनका (श्रीकृष्ण का) ही स्वरूप है (वे ही साक्षात यज्ञ-पुरुष हैं, फिर भी ब्राह्मण उन्हें पहचान न सके)।
2. भगवान की मुस्कान और यज्ञपत्नियों के पास भेजना
जब ग्वाल-बाल निराश होकर लौट आए और उन्होंने कन्हैया को सब बात बताई, तो भगवान को तनिक भी क्रोध नहीं आया। वे समझ गए कि जहाँ अहंकार होता है, वहाँ भक्ति नहीं टिक सकती।
॥ भगवान की लौकिक चेष्टा ॥
इत्याकर्ण्य वचः कृष्णो भगवान् प्रहसन् विभुः ।
दर्शयन् लौकिकीं चेष्टां गोपान् भूयोऽन्वशासत ॥
अर्थ: बालकों की यह बात सुनकर सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण (ब्राह्मणों के अज्ञान पर) हँस पड़े (प्रहसन्), और लौकिक चेष्टा (मनुष्यों जैसा व्यवहार) दिखाते हुए उन्होंने गोपों को दोबारा आदेश दिया।
कन्हैया ने कहा— "मित्रों! मांगने वाले को एक बार में निराश नहीं होना चाहिए। इस बार तुम यज्ञशाला में नहीं, बल्कि उन ब्राह्मणों के घर उनकी पत्नियों (यज्ञपत्नियों) के पास जाओ और मेरा नाम लेकर अन्न मांगो।"
3. यज्ञपत्नियों का प्रेम और भगवान की ओर दौड़ना
ग्वाल-बालों ने जाकर ब्राह्मण-पत्नियों से कहा कि "कन्हैया भूखे हैं।" बस इतना सुनना था कि उन माताओं का हृदय प्रेम से छलक उठा। वे अपने पतियों (ब्राह्मणों) के रोकने पर भी नहीं रुकीं और अत्यंत स्वादिष्ट छप्पन भोग लेकर कन्हैया की ओर दौड़ पड़ीं।
॥ नदी के समान प्रवाह ॥
चतुर्विधं बहुगुणमन्नमादाय भाजनैः ।
अभिसस्रुः प्रियं सर्वाः समुद्रमिव निम्नगाः ॥
अर्थ: वे सभी ब्राह्मण-पत्नियाँ बर्तनों में चार प्रकार के (चबाने, चूसने, चाटने और पीने योग्य) अत्यंत स्वादिष्ट और बहुगुणी अन्न (भोजन) लेकर अपने प्रियतम श्रीकृष्ण की ओर उसी प्रकार दौड़ पड़ीं, जैसे नदियां समुद्र की ओर दौडती हैं।
4. भगवान के 'नटवर' रूप का अलौकिक दर्शन
वन में पहुँचकर उन ब्राह्मण-पत्नियों ने अशोक वृक्ष के नीचे अपने उन आराध्य का दर्शन किया, जिन्हें वे केवल कानों से सुनकर प्रेम करती आई थीं। भागवत का यह 4 पंक्तियों वाला श्लोक भगवान के रूप का अत्यंत सजीव वर्णन है:
॥ भगवान का मनमोहक रूप ॥
श्यामं हिरण्यपरिधिं वनमाल्यबर्ह-
धातुप्रवालनटवेषमनुव्रतांसे ।
विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जं
कर्णोत्पलालककपोलमुखाब्जहासम् ॥
अर्थ: उन्होंने देखा कि श्यामसुन्दर ने सोने के समान पीताम्बर धारण किया है। गले में वनमाला, सिर पर मोरपंख, तथा गेरू और नए पत्तों से एक 'नट' (नर्तक) का वेश बनाया हुआ है। उन्होंने अपना एक हाथ अपने सखा के कंधे पर रखा है और दूसरे हाथ से लीला-कमल घुमा रहे हैं। उनके कानों में कमल हैं, घुंघराले बाल कपोलों (गालों) पर झूल रहे हैं और मुख-कमल पर अत्यंत मधुर मुस्कान है।
5. भगवान द्वारा स्वागत और 'अहैतुकी भक्ति' का उपदेश
यज्ञपत्नियों ने अपनी आँखों के मार्ग से भगवान को हृदय में बिठा लिया। अंतर्यामी भगवान ने उनके प्रेम को स्वीकार करते हुए मुस्कुराकर उनका स्वागत किया।
॥ यज्ञपत्नियों का स्वागत ॥
स्वागतं वो महाभागा आस्यतां करवाम किम् ।
यन्नो दिदृक्षया प्राप्ता उपपन्नमिदं हि वः ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे महाभाग्यवती माताओं! आपका स्वागत है। बैठिये, हम आपकी क्या सेवा करें? आप लोग जो मेरे दर्शन की इच्छा (दिदृक्षा) से यहाँ आई हैं, यह आपके लिए सर्वथा उचित ही है।"
भगवान ने उन्हें 'निष्काम भक्ति' का परम सिद्धांत समझाते हुए कहा:
॥ अहैतुकी भक्ति ॥
नन्वद्धा मयि कुर्वन्ति कुशलाः स्वार्थदर्शिनः ।
अहैतुक्यव्यवहितां भक्तिं सर्वात्मनि प्रिये ॥
अर्थ: "जो लोग चतुर हैं और अपना सच्चा स्वार्थ (कल्याण) समझते हैं, वे मुझ सर्वात्मा और परम प्रियतम में 'अहैतुकी' (बिना किसी सांसारिक कामना के) और निरंतर (व्यवधान-रहित) भक्ति करते हैं।"
6. पत्नियों की विदाई और भगवान का आश्वासन
जब भगवान ने उन्हें वापस अपने पतियों के पास लौटने को कहा, तो वे रोने लगीं। उन्होंने कहा— "प्रभो! हम सब कुछ छोड़कर आई हैं, अब हमारे पति हमें स्वीकार नहीं करेंगे।" तब भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया।
॥ भगवान का वचन ॥
पत्यो वो नासूयिष्यन्ति पितृभ्रातृसुतादयः ।
जनाश्चान्ये मयोपेता देवा अप्यनुमन्वते ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "आप चिंता न करें। मेरे द्वारा स्वीकार कर ली जाने के कारण, आपके पति, पिता, भाई और पुत्र आपसे क्रोध (ईर्ष्या) नहीं करेंगे। यहाँ तक कि संसार के अन्य लोग और देवता भी आपके इस कृत्य का अनुमोदन (प्रशंसा) ही करेंगे।"
आध्यात्मिक रहस्य: 'ब्राह्मण' कर्मकाण्ड और बुद्धि (Intellect) के प्रतीक हैं, जबकि 'यज्ञपत्नियां' शुद्ध भावना और हृदय (Emotion/Devotion) की प्रतीक हैं। जब बुद्धि अहंकार में डूब जाती है, तब हृदय की शुद्ध भक्ति ही बिना किसी मन्त्र या विधि के, सीधे परमात्मा को प्राप्त कर लेती है। भगवान केवल भाव के भूखे हैं, छप्पन भोग के नहीं।
7. ब्राह्मणों का पश्चाताप और आत्मग्लानि
यज्ञपत्नियां वापस लौट गईं और उनके पतियों (ब्राह्मणों) ने उन्हें ससम्मान स्वीकार कर लिया। जब उन ब्राह्मणों को अपनी भूल का आभास हुआ कि साक्षात परब्रह्म अन्न मांग रहे थे और हमने उन्हें दुत्कार दिया, तो उन्हें भयंकर पश्चाताप हुआ।
॥ कर्मकाण्ड पर धिक्कार ॥
धिग् जन्म नस्त्रिवृद् यत्तद् धिग्व्रतं धिग्बहुज्ञताम् ।
धिक् कुलं धिक्क्रियादाक्ष्यं विमुखा ये त्वधोक्षजे ॥
अर्थ: ब्राह्मण पश्चाताप करते हुए कहने लगे— "हमारे इस तीन प्रकार के उच्च जन्म (ब्राह्मण जन्म) को धिक्कार है! हमारे व्रत, हमारे शास्त्रों के ज्ञान (बहुज्ञता), हमारे कुल और हमारी कर्मकाण्ड की कुशलता (क्रियादाक्ष्य) को भी धिक्कार है, यदि हम उन भगवान (अधोक्षज) से ही विमुख हो गए!"
उन्होंने स्वीकार किया कि भगवान की माया बड़ी प्रबल है, जो ज्ञानियों को भी अंधा कर देती है और स्त्रियों (जिन्हें समाज में वे अशिक्षित मानते थे) को परम ज्ञान दे देती है।
॥ माया का प्रभाव ॥
नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी ।
यद्वयं गुरवो नॄणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजाः ॥
अर्थ: "निश्चय ही भगवान की यह माया बड़े-बड़े योगियों को भी मोहित करने वाली है। हम द्विज (ब्राह्मण) मनुष्यों के 'गुरु' (मार्गदर्शक) कहलाते हैं, फिर भी हम अपने सच्चे स्वार्थ (कल्याण) के विषय में ही मोहित (अंधे) हो गए।"
कंस के डर से वे ब्राह्मण गोकुल तो नहीं जा सके, परंतु उन्होंने मन ही मन भगवान की स्तुति की और उनके प्रति पूर्ण समर्पण कर दिया।