गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर भगवान श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक ब्रजवासियों की रक्षा की। जब देवराज इन्द्र के प्रलयंकारी मेघों का सारा जल समाप्त हो गया और गोकुल का एक बाल भी बांका नहीं हुआ, तो इन्द्र का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उसे यह ज्ञान हो गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, अपितु साक्षात चराचर जगत के स्वामी नारायण हैं। लज्जा और पश्चाताप से भरकर इन्द्र स्वर्ग से नीचे उतरे और भगवान के चरणों में गिर पड़े। आइए, इन्द्र की स्तुति, कामधेनु द्वारा भगवान के अभिषेक (गोविन्दाभिषेक) और नन्दबाबा के 'वरुण-लोक' दर्शन की अत्यंत ओजस्वी कथा का श्रवण करें।
जब गोवर्धन धारण लीला समाप्त हुई और ब्रजवासी अपने-अपने घरों को लौट गए, तब एक दिन एकांत में देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर बैठकर स्वर्ग से ब्रज में आए। उनके साथ स्वर्ग की माता 'सुरभि' (कामधेनु गाय) भी थीं।
गोलोकादाव्रजत् कृष्णं सुरभिः शक्र एव च ॥
इन्द्र अत्यंत लज्जित थे। उनका वह सारा गर्व, कि मैं त्रिलोकी का राजा हूँ और मेरे बिना ब्रज में वर्षा नहीं हो सकती, समाप्त हो चुका था। उन्होंने अपने मुकुट को भगवान के चरणों में रख दिया।
पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा ॥
इन्द्र ने भगवान की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति की। उन्होंने स्वीकार किया कि भगवान का यह अवतार केवल दुष्टों को मारने के लिए ही नहीं, बल्कि मुझ जैसे अज्ञानी देवताओं का अहंकार तोड़ने के लिए भी है।
तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् ।
मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो
न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥
इन्द्र ने भगवान से अपने अपराध की क्षमा मांगी और कहा कि "प्रभो! मैं अज्ञानवश आपको एक साधारण मनुष्य का बालक समझ बैठा था।"
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥
भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र पर कृपा की। उन्होंने कहा कि "हे इन्द्र! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, सबसे पहले उसका ऐश्वर्य और अहंकार नष्ट कर देता हूँ।"
मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्याश्रियश्रिया ॥
इन्द्र की स्तुति के पश्चात, गोलोक (स्वर्ग) से आई हुई 'सुरभि' (कामधेनु गाय) आगे बढ़ी। उसने अत्यंत प्रेम से अपने शरीर को भगवान के चरणों में रगड़ा और उनकी महिमा का गान किया।
सुरभि गाय ने कहा, "प्रभो! आप ही हमारे सच्चे रक्षक और स्वामी हैं। इन्द्र नहीं, बल्कि आप हमारे 'इन्द्र' हैं।"
अवतीर्णोऽसि विश्वात्मन् भूमेर्भारार्पणाय हि ॥
यह कहकर सुरभि गाय ने अपने थनों से निकलने वाले अत्यंत पवित्र और मीठे दूध की धार से भगवान का स्नान (अभिषेक) किया। ऐरावत हाथी ने आकाशगंगा के जल से भगवान को स्नान कराया। उसी दिन भगवान को 'गोविन्द' (गायों के इन्द्र/रक्षक) का महान नाम प्राप्त हुआ।
अभिषिच्यानयामास गोविन्देति च नामतः ॥
कुछ समय पश्चात 'कार्तिक शुक्ल एकादशी' का परम पावन दिन आया। नन्दबाबा ने एकादशी का कठोर व्रत (निर्जला उपवास) किया। अगले दिन द्वादशी (पारन का दिन) को नन्दबाबा भगवान की पूजा करने के लिए बहुत सवेरे (अंधेरे में ही) यमुना जी में स्नान करने चले गए।
परंतु उन्होंने स्नान का समय (मुहूर्त) नहीं देखा। उस समय 'आसुरी वेला' (राक्षसी समय) चल रहा था। वरुण देव के एक असुर सेवक ने देखा कि कोई अनुचित समय पर स्नान कर रहा है, तो उसने नन्दबाबा को पकड़ लिया और वरुण लोक (जल के भीतर) ले गया।
अविदित्वाऽऽसुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि ॥
जब ग्वाल-बालों को नन्दबाबा नहीं मिले, तो वे कन्हैया को पुकारने लगे। भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। वे तुरंत यमुना के जल में प्रविष्ट हुए और सीधे 'वरुण लोक' जा पहुँचे।
जब वरुण देव (जल के देवता) ने देखा कि स्वयं नारायण मेरे लोक में आए हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान की भव्य पूजा की और अपने सेवक के अपराध के लिए क्षमा माँगी।
आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ॥
जब कन्हैया नन्दबाबा को वापस गोकुल लाए, तो नन्दबाबा अत्यंत आश्चर्यचकित थे। उन्होंने गोपों को बताया कि "अरे! तुम कन्हैया को साधारण बालक मत समझो। मैंने देखा कि वरुण लोक के देवता भी इसके चरणों में गिरकर इसकी पूजा कर रहे थे।"
यह सुनकर सभी ब्रजवासियों के मन में भगवान का वह 'सच्चिदानंद' (वैकुंठ) लोक देखने की इच्छा जाग्रत हुई। तब भगवान ने उन सभी ब्रजवासियों को ध्यान-मग्न करके जल के भीतर अपने उस परम प्रकाशमय 'वैकुंठ लोक' का दर्शन कराया, जो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी दुर्लभ है। ब्रजवासी उस आनंद को पाकर परम तृप्त हो गए।
ददृशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यागात् पुरा ॥
नन्दादयस्तु तं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्वृताः।
कृष्णं च ततच्छन्दोभिः स्तूयमानं सुविस्मिताः॥
नन्दबाबा और अन्य सभी ब्रजवासी उस ज्योतिर्मय और सच्चिदानंद परम धाम को देखकर 'परमानंद' में डूब गए (अर्थात उन्हें वह आनंद मिला जो संसार में कहीं नहीं है)। परंतु उनका आश्चर्य तब अपनी सीमा पार कर गया, जब उन्होंने देखा कि वहाँ साक्षात मूर्तिमान वेद (छन्द/वेदमंत्र) उनके अपने सखा और पुत्र 'कन्हैया' की हाथ जोड़कर स्तुति कर रहे हैं! अपने लाला (श्रीकृष्ण) की इस असीमित महिमा और ऐश्वर्य को देखकर वे सभी अत्यंत विस्मित (आश्चर्यचकित) रह गए।

