Krishna Ko Govind Naam Kaise Mila? Kamdhenu Abhishek Bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
By -
0
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

इन्द्र का गर्व-भंग, कामधेनु द्वारा अभिषेक और वरुण-लोक दर्शन

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 27 और 28)

गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर भगवान श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक ब्रजवासियों की रक्षा की। जब देवराज इन्द्र के प्रलयंकारी मेघों का सारा जल समाप्त हो गया और गोकुल का एक बाल भी बांका नहीं हुआ, तो इन्द्र का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उसे यह ज्ञान हो गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, अपितु साक्षात चराचर जगत के स्वामी नारायण हैं। लज्जा और पश्चाताप से भरकर इन्द्र स्वर्ग से नीचे उतरे और भगवान के चरणों में गिर पड़े। आइए, इन्द्र की स्तुति, कामधेनु द्वारा भगवान के अभिषेक (गोविन्दाभिषेक) और नन्दबाबा के 'वरुण-लोक' दर्शन की अत्यंत ओजस्वी कथा का श्रवण करें।

1. इन्द्र और सुरभि (कामधेनु) गाय का आगमन

जब गोवर्धन धारण लीला समाप्त हुई और ब्रजवासी अपने-अपने घरों को लौट गए, तब एक दिन एकांत में देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर बैठकर स्वर्ग से ब्रज में आए। उनके साथ स्वर्ग की माता 'सुरभि' (कामधेनु गाय) भी थीं।

॥ इन्द्र का आगमन ॥
गोवर्धने धृते शैले आसारान्नाक्षिते व्रजे ।
गोलोकादाव्रजत् कृष्णं सुरभिः शक्र एव च ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— गोवर्धन पर्वत के उठाए जाने पर और मूसलाधार वर्षा से ब्रज की पूर्ण रक्षा हो जाने पर, गोलोक (स्वर्ग) से 'सुरभि' नाम की गाय और इन्द्र (शक्र) श्रीकृष्ण के पास आए।
2. इन्द्र का क्षमा याचना और साष्टांग प्रणाम

इन्द्र अत्यंत लज्जित थे। उनका वह सारा गर्व, कि मैं त्रिलोकी का राजा हूँ और मेरे बिना ब्रज में वर्षा नहीं हो सकती, समाप्त हो चुका था। उन्होंने अपने मुकुट को भगवान के चरणों में रख दिया।

॥ इन्द्र का भगवान को प्रणाम ॥
विविक्त उपसङ्‌गम्य व्रीडितः कृतहेलनः ।
पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा ॥
अर्थ: एकांत (विविक्त) स्थान में भगवान के पास पहुँचकर, अपने किए गए अपराध (हेलन) के कारण अत्यंत लज्जित (व्रीडित) हुए इन्द्र ने, सूर्य के समान चमकते हुए अपने मुकुट (किरीट) से उनके चरण-कमलों का स्पर्श किया (साष्टांग प्रणाम किया)।
3. इन्द्र द्वारा भगवान की स्तुति

इन्द्र ने भगवान की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति की। उन्होंने स्वीकार किया कि भगवान का यह अवतार केवल दुष्टों को मारने के लिए ही नहीं, बल्कि मुझ जैसे अज्ञानी देवताओं का अहंकार तोड़ने के लिए भी है।

॥ इन्द्र की स्तुति ॥
विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं
तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् ।
मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो
न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥
अर्थ: (इन्द्र ने कहा)— "हे प्रभो! आपका यह स्वरूप (धाम) विशुद्ध सत्त्वमय (शांतिमय) है। यह तपोमय है और इसमें रजोगुण तथा तमोगुण का सर्वथा अभाव है। यह जो मायामयी गुणों (संसार) का प्रवाह है, जो अज्ञान (अग्रहण) से उत्पन्न होता है, वह आपके भीतर बिल्कुल भी विद्यमान नहीं है।"

इन्द्र ने भगवान से अपने अपराध की क्षमा मांगी और कहा कि "प्रभो! मैं अज्ञानवश आपको एक साधारण मनुष्य का बालक समझ बैठा था।"

॥ इन्द्र का पश्चाताप ॥
मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः ।
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥
अर्थ: "हे भगवन्! मेरा यज्ञ (पूजा) रुक जाने के कारण, मैंने अत्यंत घमंड (मानी) और भयंकर क्रोध के वश में होकर, इस गोकुल का नाश करने के लिए मूसलाधार वर्षा और आँधी (वायु) भेजने का यह महान अपराध (चेष्टित) किया था। मुझे क्षमा करें।"
4. भगवान का इन्द्र को उपदेश

भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र पर कृपा की। उन्होंने कहा कि "हे इन्द्र! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, सबसे पहले उसका ऐश्वर्य और अहंकार नष्ट कर देता हूँ।"

॥ भगवान का इन्द्र को आदेश ॥
मया तेऽकारि मघवान् मखभङ्‌गोऽनुगृह्णता ।
मदनुस्मृतये नित्यं मत्तस्याश्रियश्रिया ॥
अर्थ: (भगवान ने कहा)— "हे इन्द्र (मघवान्)! तुम अपने ऐश्वर्य (श्रिया) के नशे में अंधे (मत्त) हो गए थे और मुझे भूल गए थे। इसलिए तुम्हें हमेशा मेरा स्मरण (अनुस्मृति) बना रहे, इसी कृपा-भाव (अनुग्रह) से मैंने तुम्हारे इस यज्ञ (पूजा) को भंग किया था।"
आध्यात्मिक रहस्य: इन्द्र कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे 'मन' (इन्द्रियों के स्वामी) का प्रतीक है। जब मन ऐश्वर्य और सफलता पाकर अहंकारी हो जाता है और ईश्वर को भूल जाता है, तो भगवान उसके अहंकार (यज्ञ) को तोड़कर उसे पुनः अपने शरणागत कर लेते हैं।
5. सुरभि गाय द्वारा भगवान का अभिषेक (गोविन्दाभिषेक)

इन्द्र की स्तुति के पश्चात, गोलोक (स्वर्ग) से आई हुई 'सुरभि' (कामधेनु गाय) आगे बढ़ी। उसने अत्यंत प्रेम से अपने शरीर को भगवान के चरणों में रगड़ा और उनकी महिमा का गान किया।

सुरभि गाय ने कहा, "प्रभो! आप ही हमारे सच्चे रक्षक और स्वामी हैं। इन्द्र नहीं, बल्कि आप हमारे 'इन्द्र' हैं।"

॥ सुरभि माता की पुकार ॥
इन्द्रं नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्माणचोदिता वयम् ।
अवतीर्णोऽसि विश्वात्मन् भूमेर्भारार्पणाय हि ॥
अर्थ: (सुरभि ने कहा)— "हे विश्वात्मन्! ब्रह्मा जी की प्रेरणा से, अब हम गायें आपको ही अपना 'इन्द्र' (स्वामी) मानकर आपका अभिषेक करेंगी। आप इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए ही अवतरित हुए हैं।"

यह कहकर सुरभि गाय ने अपने थनों से निकलने वाले अत्यंत पवित्र और मीठे दूध की धार से भगवान का स्नान (अभिषेक) किया। ऐरावत हाथी ने आकाशगंगा के जल से भगवान को स्नान कराया। उसी दिन भगवान को 'गोविन्द' (गायों के इन्द्र/रक्षक) का महान नाम प्राप्त हुआ।

॥ गोविन्द नाम की प्राप्ति ॥
एवंकृष्णांस्तुभिर्वाग्भिः पयसात्मन ईशिता ।
अभिषिच्यानयामास गोविन्देति च नामतः ॥
अर्थ: इस प्रकार स्तुति करने वाली उत्तम वाणियों के साथ, सुरभि माता ने अपने दूध (पय) से अपने स्वामी (ईशिता) भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, और उसी समय से वे 'गोविन्द' नाम से प्रसिद्ध हुए।
6. एकादशी का व्रत और नन्दबाबा का यमुना में बहना

कुछ समय पश्चात 'कार्तिक शुक्ल एकादशी' का परम पावन दिन आया। नन्दबाबा ने एकादशी का कठोर व्रत (निर्जला उपवास) किया। अगले दिन द्वादशी (पारन का दिन) को नन्दबाबा भगवान की पूजा करने के लिए बहुत सवेरे (अंधेरे में ही) यमुना जी में स्नान करने चले गए।

परंतु उन्होंने स्नान का समय (मुहूर्त) नहीं देखा। उस समय 'आसुरी वेला' (राक्षसी समय) चल रहा था। वरुण देव के एक असुर सेवक ने देखा कि कोई अनुचित समय पर स्नान कर रहा है, तो उसने नन्दबाबा को पकड़ लिया और वरुण लोक (जल के भीतर) ले गया।

॥ नन्दबाबा का हरण ॥
तं गृहीत्वानयद् भृत्यो वरुणस्यासुरोऽन्तिकम् ।
अविदित्वाऽऽसुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि ॥
अर्थ: रात्रि के समय (निशि), उस आसुरी वेला (समय) को न जानकर जल (यमुना जी) में स्नान के लिए प्रवेश करने वाले नन्दबाबा को पकड़कर, वरुण देव का एक असुर सेवक अपने स्वामी (वरुण) के पास ले गया।
7. भगवान का वरुण लोक जाना और नन्दबाबा का उद्धार

जब ग्वाल-बालों को नन्दबाबा नहीं मिले, तो वे कन्हैया को पुकारने लगे। भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ जानते थे। वे तुरंत यमुना के जल में प्रविष्ट हुए और सीधे 'वरुण लोक' जा पहुँचे।

जब वरुण देव (जल के देवता) ने देखा कि स्वयं नारायण मेरे लोक में आए हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान की भव्य पूजा की और अपने सेवक के अपराध के लिए क्षमा माँगी।

॥ वरुण देव की क्षमा याचना ॥
अजानता मामककेन मूढेनाकार्यवेदिना ।
आनीतोऽयं तव पिता तद् भवान् क्षन्तुमर्हति ॥
अर्थ: (वरुण देव ने कहा)— "हे प्रभो! मेरे इस अज्ञानी (मूढ़) सेवक ने न पहचानते हुए आपके पिता को यहाँ ला दिया है। हे करुणासागर! आप मुझ पर अनुग्रह करके मेरे इस अपराध को क्षमा करने की कृपा करें। यह आपके पिता नन्दबाबा हैं, इन्हें ले जाइये।"
8. नन्दबाबा का ब्रजवासियों को 'वैकुंठ' दर्शन कराना

जब कन्हैया नन्दबाबा को वापस गोकुल लाए, तो नन्दबाबा अत्यंत आश्चर्यचकित थे। उन्होंने गोपों को बताया कि "अरे! तुम कन्हैया को साधारण बालक मत समझो। मैंने देखा कि वरुण लोक के देवता भी इसके चरणों में गिरकर इसकी पूजा कर रहे थे।"

यह सुनकर सभी ब्रजवासियों के मन में भगवान का वह 'सच्चिदानंद' (वैकुंठ) लोक देखने की इच्छा जाग्रत हुई। तब भगवान ने उन सभी ब्रजवासियों को ध्यान-मग्न करके जल के भीतर अपने उस परम प्रकाशमय 'वैकुंठ लोक' का दर्शन कराया, जो बड़े-बड़े ज्ञानियों को भी दुर्लभ है। ब्रजवासी उस आनंद को पाकर परम तृप्त हो गए।

॥ ब्रजवासियों का 'वैकुंठ लोक दर्शन ॥
ते तु ब्रह्मह्रदं नीता मग्ना कृष्णेन चोद्धृताः।
ददृशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोऽध्यागात् पुरा ॥
नन्दादयस्तु तं दृष्ट्वा परमानन्दनिर्वृताः।
कृष्णं च ततच्छन्दोभिः स्तूयमानं सुविस्मिताः॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण उन सभी गोपों को यमुना जी के 'ब्रह्मह्रद' (जिसे बाद में अक्रूर तीर्थ कहा गया) नामक कुण्ड पर ले गए। वहाँ भगवान ने उन्हें जल में डुबकी लगवाई और फिर जल से बाहर निकाला। जल से बाहर आते ही उन ब्रजवासियों को अपनी चर्म-चक्षुओं (साधारण आँखों) के स्थान पर दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई और उन्होंने भगवान के उस असीम 'ब्रह्मलोक' (सच्चिदानंद वैकुंठ धाम) का साक्षात दर्शन किया। श्री शुकदेव जी कहते हैं कि यह वही स्थान है जहाँ आगे चलकर अक्रूर जी ने भी इसी प्रकार भगवान के उस दिव्य लोक का दर्शन किया था।
नन्दबाबा और अन्य सभी ब्रजवासी उस ज्योतिर्मय और सच्चिदानंद परम धाम को देखकर 'परमानंद' में डूब गए (अर्थात उन्हें वह आनंद मिला जो संसार में कहीं नहीं है)। परंतु उनका आश्चर्य तब अपनी सीमा पार कर गया, जब उन्होंने देखा कि वहाँ साक्षात मूर्तिमान वेद (छन्द/वेदमंत्र) उनके अपने सखा और पुत्र 'कन्हैया' की हाथ जोड़कर स्तुति कर रहे हैं! अपने लाला (श्रीकृष्ण) की इस असीमित महिमा और ऐश्वर्य को देखकर वे सभी अत्यंत विस्मित (आश्चर्यचकित) रह गए।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!