जिसका ना कोई आदि है, ना अंत, ना भीतर है, ना बाहर, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित किए हुए है, उस 'अनंत' और 'असीम' को क्या कोई रस्सी से बांध सकता है? संसार के बड़े-बड़े ज्ञानी और योगी जन्म-जन्मांतर तक तपस्या करके भी जिस परब्रह्म को अपने ध्यान में नहीं बांध पाते, उसी त्रिलोकीनाथ को आज गोकुल में माता यशोदा एक साधारण रस्सी से बांधने का प्रयास कर रही हैं! यह वह परम पावन लीला है जहाँ 'ज्ञान' हार जाता है और 'वात्सल्य (भक्ति)' विजयी होती है। इसी लीला के कारण भगवान श्रीकृष्ण का नाम 'दामोदर' (दाम = रस्सी, उदर = पेट) पड़ा। आइए, महर्षि वेदव्यास जी के मूल श्लोकों के साथ इस अद्भुत 'ऊखल-बंधन' और 'यमलार्जुन उद्धार' की लीला का दर्शन करें।
1. माता यशोदा का क्रोध और ऊखल-बंधन का प्रयास
जब माता यशोदा दूध उफनता छोड़कर रसोई में गईं, तो पीछे से कन्हैया ने क्रोध में आकर मटकी फोड़ दी और एकांत में जाकर छींके से माखन उतारकर बंदरों को खिलाने लगे। जब मैया ने यह दृश्य देखा तो उन्होंने छड़ी (रस्सी) उठा ली और लाला को दौड़ाया। बहुत दौड़ाने के बाद, जब मैया थकने लगीं, तो भगवान स्वयं ही मैया के हाथों में आ गए। मैया ने सोचा कि आज इस उद्दंडी को बांधकर ही छोडूँगी। उन्होंने एक रस्सी ली और लाला के पेट (उदर) को ओखली (ऊखल) से बांधने लगीं। परंतु यहाँ एक महान आश्चर्य हुआ!
॥ रस्सी का दो अंगुल छोटा पड़ना ॥
तद्दाम बध्यमानस्य स्वार्भकस्य कृतागसः ।
द्व्यङ्गुलूनमभूत् तेन सन्दधेऽन्यद्-गोपिका ॥
अर्थ: माता यशोदा जब अपराध करने वाले (मटकी फोड़ने वाले) अपने उस छोटे से बालक को रस्सी से बांधने लगीं, तो वह रस्सी 'दो अंगुल' छोटी पड़ गई। यह देखकर गोपी (यशोदा) ने उसमें एक और रस्सी जोड़ दी।
दो अंगुल का रहस्य: मैया घर की सारी रस्सियाँ जोड़ती गईं, परंतु हर बार रस्सी ठीक 'दो अंगुल' छोटी पड़ जाती थी। संतों ने इस दो अंगुल का बड़ा गूढ़ अर्थ बताया है। भगवान को बांधने के लिए भक्त को दो चीज़ों की आवश्यकता होती है— पहला अंगुल है 'भक्त का अपना परिश्रम (साधना/प्रयास)' और दूसरा अंगुल है 'भगवान की अहैतुकी कृपा'। जब तक भगवान की कृपा नहीं होती, तब तक साधन की रस्सी हमेशा छोटी ही पड़ती है।
2. माता का परिश्रम और भगवान की कृपा
मैया यशोदा घर की सारी रस्सियाँ ला-लाकर जोड़ती रहीं, परंतु पारब्रह्म की कमर (उदर) नापी नहीं जा सकी। मैया पसीने से लथपथ हो गईं, उनके बालों की चोटी खुल गई और पुष्प जमीन पर गिरने लगे। जब भगवान ने अपनी मैया का यह परिश्रम देखा, तो उनका हृदय पिघल गया।
॥ भगवान का वश में होना ॥
स्वमातुः स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रजः ।
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत् स्वबन्धने ॥
अर्थ: जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरी माता का शरीर पसीने से लथपथ (स्विन्नगात्र) हो गया है, उनके बालों की चोटी ढीली पड़ गई है और फूलों की माला गिर रही है, तो अपनी माता के उस परिश्रम (थकान) को देखकर भगवान ने कृपा करके स्वयं को बंधन में बंध जाने दिया।
3. माता यशोदा के भाग्य की महिमा
जो भगवान मृत्यु के भी काल हैं, जिनके भय से सूर्य तपता है और वायु चलती है, आज वे एक गोपी की साधारण सी ओखली से बंधे खड़े हैं। श्री शुकदेव जी इस दृश्य को देखकर माता यशोदा के भाग्य की सराहना करते हैं:
॥ दुर्लभ कृपा की प्राप्ति ॥
नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्गसंश्रया ।
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् प्राप विमुक्तिदात् ॥
अर्थ: मुक्ति प्रदान करने वाले भगवान श्रीकृष्ण की जैसी अहैतुकी कृपा (प्रसाद) इन गोपी (माता यशोदा) को प्राप्त हुई, वैसी कृपा न तो ब्रह्मा जी को मिली, न भगवान शिव को प्राप्त हुई, और न ही भगवान के वक्षस्थल पर सदा निवास करने वाली साक्षात लक्ष्मी जी को ही प्राप्त हुई।
क्योंकि भगवान केवल ज्ञानियों के लिए नहीं, बल्कि प्रेम करने वाले भक्तों के लिए अत्यंत सुलभ हैं।
॥ ज्ञानियों से अधिक भक्तों को सुलभ ॥
नायं सुखापो भगवान् देहिनां गोपिकासुतः ।
ज्ञानिनां चात्मभूतानां यथा भक्तिमतामिह ॥
अर्थ: ये गोपी-नंदन भगवान श्रीकृष्ण देह-अभिमानी जीवों और अपने-पराये का भेद करने वाले ज्ञानियों (तपस्वियों) को उतनी सुगमता (आसानी) से प्राप्त नहीं होते, जितनी सरलता से वे अनन्य भक्ति करने वाले प्रेमियों (भक्तों) को प्राप्त हो जाते हैं।
4. नलकूबर और मणिग्रीव का पूर्व जन्म (नारद जी का श्राप)
मैया यशोदा लाला को ओखली से बांधकर घर के कामों में लग गईं। कन्हैया आंगन में ओखली से बंधे हुए थे। उनकी दृष्टि नन्द भवन के द्वार पर खड़े दो अत्यंत विशाल और प्राचीन 'यमलार्जुन' (जुड़वाँ अर्जुन) के वृक्षों पर पड़ी। ये दोनों वृक्ष वास्तव में कुबेर के दो पुत्र 'नलकूबर' और 'मणिग्रीव' थे।
॥ कुबेर पुत्रों का अहंकार ॥
रुद्रस्यानुचरौ भूत्वा सुदृप्तौ धनदात्मजौ ।
कैलासोपवने रम्ये मन्दाकिन्यां मदोत्कटौ ॥
अर्थ: ये दोनों कुबेर (धनद) के पुत्र थे और भगवान शिव के अनुचर थे। धन और ऐश्वर्य के नशे में अत्यंत चूर होकर, ये दोनों मदांध एक बार कैलाश के अत्यंत सुंदर उपवन (बगीचे) में मंदाकिनी (गंगा) नदी में अप्सराओं के साथ निर्वस्त्र होकर जल-विहार कर रहे थे।
उसी समय वहां से देवर्षि नारद जी गुजरे। अप्सराओं ने तो नारद जी को देखकर लज्जावश वस्त्र पहन लिए, परंतु मदिरा के नशे में चूर कुबेर के पुत्र निर्वस्त्र ही खड़े रहे और उन्होंने ऋषि का कोई सम्मान नहीं किया। इस उदंडता को देखकर देवर्षि नारद ने उन्हें श्राप दे दिया कि— "तुम दोनों वृक्षों की भाँति निर्वस्त्र और जड़ होकर खड़े हो, इसलिए गोकुल में जाकर 'यमलार्जुन' के वृक्ष बन जाओ।" जब वे रोने लगे, तो नारद जी ने कहा— "द्वापर के अंत में साक्षात परब्रह्म श्रीकृष्ण तुम्हें स्पर्श करके तुम्हारा उद्धार करेंगे।"
5. भगवान का संकल्प और यमलार्जुन का उद्धार
बंधे हुए भगवान ने ओखली को घसीटते हुए उन वृक्षों की ओर देखा। वे अपने परम भक्त नारद जी की बात को सत्य करना चाहते थे।
॥ भक्त के वचन की रक्षा ॥
देवर्षिर्मे प्रियतमो यदीमौ धनदात्मजौ ।
तत्तथा साधयिष्यामि यद्गीतं तन्महात्मना ॥
अर्थ: भगवान ने मन में विचार किया— "देवर्षि नारद मेरे अत्यंत प्रिय भक्त हैं, और ये दोनों कुबेर के पुत्र हैं। इसलिए, मेरे उस महात्मा भक्त (नारद) ने इनके उद्धार के लिए जो वचन कहा था, उसे मैं आज सत्य करूँगा।"
यह निश्चय करके भगवान घुटनों के बल चलते हुए उस ओखली को घसीटते-घसीटते दोनों यमलार्जुन वृक्षों के बीच में से निकल गए। कन्हैया तो निकल गए, परंतु वह ओखली तिरछी होकर दोनों वृक्षों के बीच फंस गई। भगवान ने तनिक सा बल लगाया। (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):
॥ वृक्षों का भयंकर पतन ॥
बालेन निष्कर्षयतान्वगुलूखलं तद्
दामोदरेण तरसावलितोङ्घ्रिस्कन्धौ ।
निपेततुः परमविक्रमितातिवेप-
स्कन्धप्रवालविटपौ कृतचण्डशब्दौ ॥
अर्थ: बालक दामोदर (श्रीकृष्ण) द्वारा अपने पीछे घसीटे जाते हुए उस ऊखल (ओखली) के तिरछा फँस जाने पर, जब भगवान ने ज़रा सा ज़ोर (बल) लगाया, तो वे दोनों विशाल वृक्ष जड़ और तने सहित भयंकर रूप से काँपने लगे। देखते ही देखते उनकी शाखाएं और पत्ते टूट गए, और वे एक अत्यंत भयंकर और प्रचंड शब्द (धमाके) के साथ धरती पर गिर पड़े।
6. वृक्षों से सिद्ध पुरुषों का प्रकट होना और स्तुति
उन टूटे हुए वृक्षों के तनों में से अग्नि के समान अत्यंत तेजस्वी दो सिद्ध पुरुष (नलकूबर और मणिग्रीव) प्रकट हुए। उन्होंने आकर संपूर्ण लोकों के नाथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में सिर रखकर साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर यह अत्यंत सुप्रसिद्ध स्तुति की:
॥ नलकूबर और मणिग्रीव की स्तुति ॥
तत्र श्रिया परमया ककुभः स्फुरन्तौ
सिद्धावुपेत्य कुजयोरिव जातवेदाः ।
कृष्णं प्रणम्य शिरसाखिललोकनाथं
बद्धाञ्जली विरजसाविदमूचतुः स्म ॥
अर्थ: उन गिरे हुए वृक्षों में से अपनी परम कांति से दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए दो सिद्ध पुरुष अग्नि के समान प्रकट हुए। उन्होंने अखिल लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण को सिर झुकाकर प्रणाम किया और रजोगुण-तमोगुण से मुक्त होकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे।
उन्होंने भगवान से वह वरदान माँगा जो हर सनातन भक्त की अंतिम इच्छा होती है— अपने शरीर की हर इंद्रिय को ईश्वर में लगा देना!
॥ सर्वस्व समर्पण की प्रार्थना ॥
वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां
हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्नः ।
स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे
दृष्टिः सतां दर्शनेऽस्तु भवत्तनूनाम् ॥
अर्थ: "हे प्रभो! हमारी वाणी सदा आपके गुणों का गान करे, हमारे कान आपकी कथाएं सुनें, हमारे हाथ आपके ही कर्म (सेवा) में लगें, हमारा मन सदा आपके चरणों में रहे, हमारा सिर आपके निवास-स्थान (इस जगत) को प्रणाम करने के लिए झुके, और हमारी दृष्टि हमेशा आपके स्वरूप (संतों और भक्तों) के दर्शन में ही लगी रहे।"
7. भगवान द्वारा वरदान और विदाई
ओखली से बंधे हुए उस छोटे से मुस्कराते हुए बालक (भगवान) ने उन दोनों सिद्धों की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति सुनकर उन्हें परम धाम जाने का वरदान दिया।
॥ भगवान का वरदान ॥
तद्गच्छतं मत्परमौ नलकूबर सादनम् ।
सञ्जातो मयि भावो वामीप्सितः परमोऽभवत् ॥
अर्थ: भगवान ने कहा— "हे नलकूबर और मणिग्रीव! तुम दोनों मुझे ही अपना परम आश्रय मानकर अपने लोक (कुबेर लोक) को जाओ। जैसा तुम चाहते थे, मेरे प्रति तुम्हारा वह परम (अनन्य) प्रेम भाव उत्पन्न हो गया है। अब तुम्हें कभी संसार में पतन नहीं देखना पड़ेगा।"
भगवान की परिक्रमा करके वे दोनों अपने लोक चले गए। जब भयंकर धमाके की आवाज सुनकर नन्दबाबा और सभी गोकुलवासी वहाँ दौड़े आए, तो उन्होंने देखा कि दो विशाल वृक्ष गिरे पड़े हैं और उनके बीच में लाला ओखली से बंधा हुआ सुरक्षित मुस्कुरा रहा है। नन्दबाबा ने दौड़कर लाला को गले लगा लिया और उसे बंधन से मुक्त कर दिया।
दामोदर लीला का आध्यात्मिक सार: 'यमलार्जुन' के वृक्ष मनुष्य के भीतर के 'अहंकार' और 'पद-प्रतिष्ठा के मद (घमंड)' के प्रतीक हैं। जब तक मनुष्य में अहंकार रूपी यमलार्जुन खड़े हैं, तब तक उसे भगवान के दर्शन नहीं हो सकते। और इन वृक्षों को तोड़ने का उपाय क्या है? 'दामोदर'! जब जीव प्रेम की रस्सी से भगवान को अपने हृदय की ओखली (बुद्धि/देह) से बांध लेता है, तो भगवान स्वयं उस हृदय में प्रवेश करके अहंकार के जड़-मूल को उखाड़ फेंकते हैं।