जो परब्रह्म परमात्मा प्रलय के समय संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं, जो यज्ञों में आहुति के रूप में देवताओं का हविष्य ग्रहण करते हैं, वे ही परमेश्वर आज गोकुल के आंगन में एक साधारण बालक की भाँति धूल और मिट्टी फांक रहे हैं! यह लीला कोई सामान्य घटना नहीं थी। इसके पीछे भगवान का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश और माता यशोदा को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराना छिपा था। भगवान श्रीकृष्ण ने मिट्टी खाकर यह सिद्ध किया कि यह 'भू-देवी' (पृथ्वी) मेरी ही पत्नी है और इसके कण-कण में मेरा ही वास है। आइए, महर्षि वेदव्यास जी के मूल श्लोकों के साथ इस अलौकिक 'ब्रह्मांड दर्शन' की लीला का रसास्वादन करें।
एक दिन नन्द भवन के आंगन में भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम (दाऊ दादा) और अन्य ग्वाल-बालों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते अचानक कन्हैया ने छिपकर थोड़ी सी मिट्टी (माटी) उठा ली और उसे अपने मुख में रख लिया। यह देखकर उनके सखाओं ने तुरंत माता यशोदा से जाकर शिकायत कर दी।
कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥
बलराम जी ने शिकायत क्यों की? दाऊ भैया शेषनाग के अवतार हैं और वे जानते थे कि लाला के भीतर पूरा ब्रह्मांड है। वे केवल माता यशोदा को लाला का ऐश्वर्य दिखाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने यह लीला रची।
माता यशोदा यह सुनते ही घबरा गईं। उन्हें चिंता हुई कि मिट्टी खाने से मेरे लाला का पेट खराब हो जाएगा और वह बीमार पड़ जाएगा। वे दौड़कर आईं और उन्होंने लाला का हाथ कसकर पकड़ लिया।
यशोदा भयसम्भ्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत ॥
मैया ने अत्यंत क्रोधित होकर कन्हैया से पूछा कि तूने अकेले में छिपकर मिट्टी क्यों खाई?
वदन्ति तावका ह्येते कुमारा अग्रजोऽप्ययम् ॥
भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत चतुर हैं। उन्होंने सोचा कि यदि मैंने हाँ कह दिया तो मैया मुझे पीटेगी। इसलिए उन्होंने अपनी तोतली बोली में अत्यंत भोला चेहरा बनाकर सीधा झूठ बोल दिया।
यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य मे मुखम् ॥
कन्हैया की इस बात में एक गहरा रहस्य था। वे कह रहे थे कि "मैया, मैं मिट्टी कैसे खा सकता हूँ? मिट्टी तो स्वयं मेरे भीतर निवास करती है। तुम मेरे मुख में ही देख लो।"
माता यशोदा ने कहा, "ठीक है, यदि तूने मिट्टी नहीं खाई है तो अपना मुँह खोल!" माता की आज्ञा पाकर, जिनके ऐश्वर्य का कोई पार नहीं है, उन लीला-पुरुषोत्तम भगवान ने अपना छोटा सा मुख खोल दिया।
व्याददादव्याहतैश्वर्यः क्रीडामनुजबाल्कः ॥
जैसे ही माता यशोदा ने लाला के उस नन्हे से मुख के भीतर झाँका, तो उन्हें वहां केवल मिट्टी नहीं दिखी। उन्हें वहां वह सब कुछ दिखा जो इस संपूर्ण सृष्टि में विद्यमान है। भागवतकार श्री शुकदेव जी इस ब्रह्मांड दर्शन का अत्यंत रोमांचक वर्णन करते हैं:
साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥
मैया की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें अपने लाला के मुख में संपूर्ण त्रिलोकी, ग्रहों का चक्र, जल, तेज, आकाश, इन्द्रियाँ, मन और कर्म सब कुछ एक साथ दिखाई देने लगा।
वैकारिकाणि भूतानि खानि कर्माशयः गुणः ॥
यह सब देखकर माता यशोदा का शरीर काँपने लगा। उनके मन में अनेक प्रकार के विचार उठने लगे कि यह मैं क्या देख रही हूँ? (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):
किं वा मदीयो बत बुद्धिमोहः ।
अथो अमुष्यैव ममाभकस्य
यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः ॥
तत्काल ही माता यशोदा का मातृ-भाव लुप्त हो गया और उनके भीतर परम ज्ञान जाग्रत हो गया। वे समझ गईं कि जिसे मैं अपना पुत्र मान रही हूँ, वह वास्तव में चराचर जगत का स्वामी परब्रह्म है। उन्होंने मन ही मन भगवान के उस अचिंत्य स्वरूप को प्रणाम किया और उनके चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरी मैया तो ज्ञानी हो गई! यदि मैया मुझे भगवान मान लेगी, तो मुझे छाती से कौन लगाएगा? मुझे दूध कौन पिलाएगा? मुझे डांटेगा कौन? भगवान को भक्तों से ज्ञान या पूजा नहीं, बल्कि उनका निश्छल प्रेम और वात्सल्य चाहिए। इसलिए भगवान ने तुरंत अपनी 'वैष्णवी माया' का पर्दा मैया की बुद्धि पर डाल दिया।
वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः ॥
माया का पर्दा पड़ते ही माता यशोदा वह सब कुछ भूल गईं जो उन्होंने अभी-अभी देखा था। ब्रह्मांड, ग्रह, नक्षत्र सब उनकी स्मृति से मिट गए। उनके सामने फिर से उनका वही सांवला सलोना, भोला-भाला कन्हैया खड़ा था, जिसकी आँखें डबडबाई हुई थीं। मैया का हृदय प्रेम से भर आया।
प्रवृद्धस्नेहकलिलहृदयासीद् यथा पुरा ॥
मैया ने कन्हैया का मुँह पोंछा, उसे चूम लिया और बोलीं— "अरे दाऊ! तू तो बड़ा झूठा है। मेरे लाला के मुँह में कोई माटी नहीं है। जा, इसे खेलने दे।"
अंतिम श्लोक में श्री शुकदेव जी माता यशोदा के इस परम भाग्य की सराहना करते हैं, जो बड़े-बड़े योगियों और तपस्वियों को भी प्राप्त नहीं है।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥

