Mati Bhakshan Leela: Mata Yashoda Ko Brahmand Darshan Katha

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

माटी भक्षण और माता यशोदा को मुख में ब्रह्मांड दर्शन

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 8)

जो परब्रह्म परमात्मा प्रलय के समय संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं, जो यज्ञों में आहुति के रूप में देवताओं का हविष्य ग्रहण करते हैं, वे ही परमेश्वर आज गोकुल के आंगन में एक साधारण बालक की भाँति धूल और मिट्टी फांक रहे हैं! यह लीला कोई सामान्य घटना नहीं थी। इसके पीछे भगवान का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश और माता यशोदा को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराना छिपा था। भगवान श्रीकृष्ण ने मिट्टी खाकर यह सिद्ध किया कि यह 'भू-देवी' (पृथ्वी) मेरी ही पत्नी है और इसके कण-कण में मेरा ही वास है। आइए, महर्षि वेदव्यास जी के मूल श्लोकों के साथ इस अलौकिक 'ब्रह्मांड दर्शन' की लीला का रसास्वादन करें।

1. मित्रों और बलराम जी द्वारा मैया से शिकायत

एक दिन नन्द भवन के आंगन में भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम (दाऊ दादा) और अन्य ग्वाल-बालों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते अचानक कन्हैया ने छिपकर थोड़ी सी मिट्टी (माटी) उठा ली और उसे अपने मुख में रख लिया। यह देखकर उनके सखाओं ने तुरंत माता यशोदा से जाकर शिकायत कर दी।

॥ माटी खाने की शिकायत ॥
एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारकाः ।
कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— एक दिन जब बलराम आदि सभी ग्वाल-बाल खेल रहे थे, तो उन सबने आकर माता यशोदा से शिकायत की कि "मैया! कन्हैया ने मिट्टी (मृद) खाई है।"

बलराम जी ने शिकायत क्यों की? दाऊ भैया शेषनाग के अवतार हैं और वे जानते थे कि लाला के भीतर पूरा ब्रह्मांड है। वे केवल माता यशोदा को लाला का ऐश्वर्य दिखाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने यह लीला रची।

2. माता यशोदा का लाला को डांटना

माता यशोदा यह सुनते ही घबरा गईं। उन्हें चिंता हुई कि मिट्टी खाने से मेरे लाला का पेट खराब हो जाएगा और वह बीमार पड़ जाएगा। वे दौड़कर आईं और उन्होंने लाला का हाथ कसकर पकड़ लिया।

॥ यशोदा जी का भय और क्रोध ॥
सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी ।
यशोदा भयसम्भ्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत ॥
अर्थ: अपने पुत्र का हित चाहने वाली माता यशोदा ने आकर श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया और जब उन्होंने देखा कि कन्हैया की आँखें भयभीत होकर इधर-उधर देख रही हैं, तब वे उन्हें डांटते हुए इस प्रकार बोलीं।

मैया ने अत्यंत क्रोधित होकर कन्हैया से पूछा कि तूने अकेले में छिपकर मिट्टी क्यों खाई?

॥ मैया की डांट ॥
कस्मान्मृदमदान्तात्मन् भवान् भक्षितवान् रहः ।
वदन्ति तावका ह्येते कुमारा अग्रजोऽप्ययम् ॥
अर्थ: (मैया ने कहा)— "अरे चंचल! अरे दुष्ट! तूने एकांत में छिपकर यह मिट्टी क्यों खाई? देख, तेरे ये सभी ग्वाल-बाल सखा और यहां तक कि तेरा बड़ा भाई बलराम भी यही कह रहा है कि तूने मिट्टी खाई है!"
3. कन्हैया का भोलापन और सफेद झूठ

भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत चतुर हैं। उन्होंने सोचा कि यदि मैंने हाँ कह दिया तो मैया मुझे पीटेगी। इसलिए उन्होंने अपनी तोतली बोली में अत्यंत भोला चेहरा बनाकर सीधा झूठ बोल दिया।

॥ कन्हैया की सफाई ॥
नाहं भक्षितवान् साम्ब सर्वे मिथ्याभिशंसिनः ।
यदि सत्यगिरस्तर्हि समक्षं पश्य मे मुखम् ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे अम्बा (मैया)! मैंने मिट्टी बिल्कुल नहीं खाई है। ये सब के सब झूठ बोल रहे हैं। यदि आपको इनकी बातों पर विश्वास है और आप मुझे झूठा मानती हैं, तो आप स्वयं मेरे मुख के भीतर देख लीजिए।"

कन्हैया की इस बात में एक गहरा रहस्य था। वे कह रहे थे कि "मैया, मैं मिट्टी कैसे खा सकता हूँ? मिट्टी तो स्वयं मेरे भीतर निवास करती है। तुम मेरे मुख में ही देख लो।"

4. भगवान ने खोला अपना नन्हा सा मुख

माता यशोदा ने कहा, "ठीक है, यदि तूने मिट्टी नहीं खाई है तो अपना मुँह खोल!" माता की आज्ञा पाकर, जिनके ऐश्वर्य का कोई पार नहीं है, उन लीला-पुरुषोत्तम भगवान ने अपना छोटा सा मुख खोल दिया।

॥ मुख खोलने की आज्ञा ॥
यद्येवं तर्हि व्यादेहीत्युक्तः स भगवान् हरिः ।
व्याददादव्याहतैश्वर्यः क्रीडामनुजबाल्कः ॥
अर्थ: यशोदा जी ने कहा— "यदि ऐसी बात है, तो अपना मुख खोल।" माता के ऐसा कहने पर, अनंत ऐश्वर्य से संपन्न साक्षात भगवान श्रीहरि, जो मनुष्य के बालक की भांति क्रीड़ा (लीला) कर रहे थे, उन्होंने अपना मुख खोल दिया।
5. मुख के भीतर अद्भुत ब्रह्मांड दर्शन

जैसे ही माता यशोदा ने लाला के उस नन्हे से मुख के भीतर झाँका, तो उन्हें वहां केवल मिट्टी नहीं दिखी। उन्हें वहां वह सब कुछ दिखा जो इस संपूर्ण सृष्टि में विद्यमान है। भागवतकार श्री शुकदेव जी इस ब्रह्मांड दर्शन का अत्यंत रोमांचक वर्णन करते हैं:

॥ प्रथम ब्रह्मांड दर्शन ॥
सा तत्र ददृशे विश्वं जगत् स्थास्नु च खं दिशः ।
साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥
अर्थ: माता यशोदा ने उस छोटे से मुख के भीतर संपूर्ण चराचर (जड़-चेतन) जगत, आकाश, सभी दिशाएं, बड़े-बड़े पर्वत, द्वीप, समुद्र और इस पूरी पृथ्वी (भूगोल) को देखा। उन्होंने उसमें वायु, अग्नि, चंद्रमा और सभी नक्षत्रों (तारों) का दर्शन किया।

मैया की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्हें अपने लाला के मुख में संपूर्ण त्रिलोकी, ग्रहों का चक्र, जल, तेज, आकाश, इन्द्रियाँ, मन और कर्म सब कुछ एक साथ दिखाई देने लगा।

॥ संपूर्ण सृष्टि का दर्शन ॥
ज्योतिश्चक्रं जलं तेजो नभस्वान् वियदेव च ।
वैकारिकाणि भूतानि खानि कर्माशयः गुणः ॥
अर्थ: उन्होंने उस मुख में ज्योतिश्चक्र (ग्रह-नक्षत्रों का मंडल), जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार से उत्पन्न पंचमहाभूत, सभी इन्द्रियाँ, मन, कर्मों के संस्कार और तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) को प्रत्यक्ष देखा।
आश्चर्य की पराकाष्ठा: मैया यशोदा ने ब्रह्मांड तो देखा ही, परंतु सबसे बड़ा आश्चर्य उन्हें तब हुआ, जब उन्होंने उस ब्रह्मांड के भीतर स्थित 'पृथ्वी' देखी। उस पृथ्वी पर 'गोकुल' देखा, गोकुल में 'नन्द भवन' देखा, और उस नन्द भवन के आंगन में स्वयं को अपने ही लाला का हाथ पकड़े हुए देखा! यह अनंत ब्रह्मांडों का एक ऐसा चक्र (Loop) था, जिसने माता यशोदा की बुद्धि को चकरा दिया।
6. माता यशोदा का विस्मय और ज्ञान-योग की प्राप्ति

यह सब देखकर माता यशोदा का शरीर काँपने लगा। उनके मन में अनेक प्रकार के विचार उठने लगे कि यह मैं क्या देख रही हूँ? (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):

॥ यशोदा जी का विस्मय ॥
किं स्वप्न एतदुत देवमाया
किं वा मदीयो बत बुद्धिमोहः ।
अथो अमुष्यैव ममाभकस्य
यः कश्चनौत्पत्तिक आत्मयोगः ॥
अर्थ: यशोदा जी सोचने लगीं— "क्या यह कोई स्वप्न है? या देवताओं की कोई माया है? या फिर मेरी ही बुद्धि का कोई भ्रम (मोह) है? अथवा मेरे इस छोटे से बालक का ही यह कोई जन्मजात ईश्वरीय प्रभाव (आत्मयोग/ऐश्वर्य) है?"

तत्काल ही माता यशोदा का मातृ-भाव लुप्त हो गया और उनके भीतर परम ज्ञान जाग्रत हो गया। वे समझ गईं कि जिसे मैं अपना पुत्र मान रही हूँ, वह वास्तव में चराचर जगत का स्वामी परब्रह्म है। उन्होंने मन ही मन भगवान के उस अचिंत्य स्वरूप को प्रणाम किया और उनके चरणों में स्वयं को समर्पित कर दिया।

7. भगवान द्वारा पुनः 'वैष्णवी माया' (वात्सल्य) का आवरण

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरी मैया तो ज्ञानी हो गई! यदि मैया मुझे भगवान मान लेगी, तो मुझे छाती से कौन लगाएगा? मुझे दूध कौन पिलाएगा? मुझे डांटेगा कौन? भगवान को भक्तों से ज्ञान या पूजा नहीं, बल्कि उनका निश्छल प्रेम और वात्सल्य चाहिए। इसलिए भगवान ने तुरंत अपनी 'वैष्णवी माया' का पर्दा मैया की बुद्धि पर डाल दिया।

॥ वैष्णवी माया का प्रभाव ॥
इत्थं विदिततत्त्वाया गोपिकायाः स ईश्वरः ।
वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्नेहमयीं विभुः ॥
अर्थ: जब भगवान ने देखा कि गोपी (यशोदा जी) ने परम तत्व (मेरे वास्तविक स्वरूप) को जान लिया है, तब उन सर्वशक्तिमान प्रभु ने तुरंत ही उनके ऊपर 'पुत्र-स्नेह से परिपूर्ण' (वात्सल्यमयी) वैष्णवी माया का विस्तार कर दिया।
8. ज्ञान पर प्रेम की विजय और लाला को हृदय से लगाना

माया का पर्दा पड़ते ही माता यशोदा वह सब कुछ भूल गईं जो उन्होंने अभी-अभी देखा था। ब्रह्मांड, ग्रह, नक्षत्र सब उनकी स्मृति से मिट गए। उनके सामने फिर से उनका वही सांवला सलोना, भोला-भाला कन्हैया खड़ा था, जिसकी आँखें डबडबाई हुई थीं। मैया का हृदय प्रेम से भर आया।

॥ वात्सल्य की पुनर्स्थापना ॥
सद्यो नष्टस्मृतिर्गोपी सावारोप्य स्वमात्मजम् ।
प्रवृद्धस्नेहकलिलहृदयासीद् यथा पुरा ॥
अर्थ: भगवान की माया से यशोदा जी की स्मृति (तत्त्वज्ञान) तुरंत नष्ट हो गई। उन्होंने अपने उस बालक को गोद में बिठा लिया। उनका हृदय पहले की ही भांति पुत्र के अत्यंत प्रगाढ़ स्नेह (वात्सल्य) से परिपूर्ण हो गया।

मैया ने कन्हैया का मुँह पोंछा, उसे चूम लिया और बोलीं— "अरे दाऊ! तू तो बड़ा झूठा है। मेरे लाला के मुँह में कोई माटी नहीं है। जा, इसे खेलने दे।"

निष्कर्ष: माता यशोदा का अद्वितीय सौभाग्य

अंतिम श्लोक में श्री शुकदेव जी माता यशोदा के इस परम भाग्य की सराहना करते हैं, जो बड़े-बड़े योगियों और तपस्वियों को भी प्राप्त नहीं है।

॥ यशोदा जी का महान सौभाग्य ॥
त्रयीमयोपनिषद्भिः साङ्ख्ययोगैः सात्वतैः ।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥
अर्थ: जिन भगवान श्रीहरि की महिमा का गान तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र और सात्वत-तंत्र (भक्ति-शास्त्र) के द्वारा किया जाता है, उन्हीं परब्रह्म परमात्मा को माता यशोदा केवल अपना पुत्र (बेटा) मानती थीं! यह प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा है।

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