Davanal Pan Leela Aur Varsha Ritu Ka Adhyatmik Varnan

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

दावानल पान (जंगल की आग पीना) और वर्षा-शरद ऋतु का आध्यात्मिक वर्णन

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 17 और 20)

कालिया दमन के पश्चात ब्रजवासियों ने कन्हैया को पाकर ऐसा अनुभव किया जैसे मृतक शरीर में पुनः प्राण लौट आए हों। दिनभर की थकान, भूख और प्यास के कारण नन्दबाबा, माता यशोदा और सभी गोपों ने उस रात गोकुल लौटने के बजाय यमुना के तट पर ही विश्राम करने का निर्णय लिया। परंतु मध्यरात्रि में एक अत्यंत भयंकर संकट आ पड़ा। यह संकट केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि भगवान को अपने ऐश्वर्य का एक और दर्शन कराने का अवसर था। आइए, पहले दावानल पान की अद्भुत कथा और तत्पश्चात वर्षा ऋतु के उस अद्वितीय दार्शनिक वर्णन का रसपान करें, जो महर्षि वेदव्यास जी ने किया है।

1. मध्यरात्रि में भयानक दावानल (जंगल की आग) का प्रलय

ग्रीष्म ऋतु का समय था और वन सूखे हुए थे। आधी रात के समय, जब सभी ब्रजवासी गहरी निद्रा में थे, तब अचानक सूखे बांसों के वन (वेणुवन) में आग लग गई।

॥ दावाग्नि का प्रलय ॥
ततः समन्ताद्दावाग्निः शुष्कवेणुवनेऽभवत् ।
सुप्तं व्रजं निशीथान्धे समन्ताद्रुन्धतोल्बणः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— तदनन्तर आधी रात (निशीथ) के घोर अंधकार में, सूखे बांसों के वन में चारों ओर से एक अत्यंत भयंकर दावाग्नि (जंगल की आग) भड़क उठी और उसने सोए हुए सभी ब्रजवासियों को चारों ओर से घेर लिया।
2. ब्रजवासियों की पुकार और पूर्ण शरणागति

आग की भयंकर लपटों और ताप से ब्रजवासी जाग गए। चारों ओर हाहाकार मच गया। उन्हें बचने का कोई मार्ग नहीं दिखा, तो उन्होंने केवल एक ही उपाय सोचा— अपने रक्षक कन्हैया और बलराम जी की पुकार!

॥ भगवान की शरण ॥
कृष्ण कृष्ण महाभाग हे रामामितविक्रम ।
एष घोरतमो वह्निस्तावकान् ग्रसते हि नः ॥
अर्थ: ब्रजवासी पुकारने लगे— "हे महाभाग्यवान श्रीकृष्ण! हे कृष्ण! हे अमित पराक्रमी बलराम! देखो, यह अत्यंत भयंकर आग तुम्हारे अपने स्वजनों (हम ब्रजवासियों) को निगलने (जलाने) ही वाली है!"

गोपों ने अत्यंत करुण भाव से कहा कि "प्रभो! हम मृत्यु से नहीं डरते, परंतु हम तुम्हारे अभय देने वाले चरण-कमलों को छोड़ नहीं सकते।"

॥ अनन्य शरणागति ॥
सुदुस्तरान्नः स्वामिन्नसि पाहि त्वाच्छरणागतान् ।
न शक्नुमस्त्वच्चरणं सन्त्यक्तुमकुतोभयम् ॥
अर्थ: "हे हमारे स्वामी! हम आपकी शरण में आए हैं। इस अत्यंत दुस्तर आग से हमारी रक्षा कीजिए। हम मृत्यु के भय से भी आपके उन चरण-कमलों को नहीं छोड़ सकते, जो हर प्रकार से निर्भय (अकुतोभय) करने वाले हैं।"
3. भगवान का दावानल-पान (अग्नि को पीना)

जब अनंत शक्तियों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरे अपने स्वजन (भक्त) अग्नि से भयभीत हो रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत उस अग्नि का शमन कर दिया। जो भगवान प्रलय की अग्नि को अपने भीतर समेट लेते हैं, उनके लिए यह जंगल की आग क्या थी!

कन्हैया ने कहा, "मित्रों! अपनी आँखें बंद कर लो।" और फिर भगवान ने उस भयंकर और विकराल अग्नि को एक ही घूँट में पी लिया।

आध्यात्मिक रहस्य: 'दावाग्नि' संसार के 'भव-ताप' (जन्म-मरण, ईर्ष्या, कामनाओं की आग) का प्रतीक है। जब जीव चारों ओर से संसार की आग में जलने लगता है और पूर्ण शरणागत होकर ईश्वर को पुकारता है, तो भगवान स्वयं उसके हृदय में आकर उस सांसारिक ताप को पी जाते हैं और उसे परमानंद (शीतलता) प्रदान करते हैं।
4. वर्षा ऋतु का आरम्भ और उसका दार्शनिक स्वरूप

ग्रीष्म ऋतु समाप्त हुई और वर्षा ऋतु (प्रावृट्) का आरम्भ हुआ। श्रीमद्भागवत के 20वें अध्याय में वर्षा ऋतु का ऐसा विलक्षण वर्णन है, जहाँ प्रकृति की हर घटना में वेदांत का एक महान सिद्धांत छिपा है।

आकाश बादलों से घिर गया और सूर्य ने जो जल 8 महीने तक पृथ्वी से खींचा था, उसे बादलों ने बरसाना शुरू कर दिया।

॥ बादलों द्वारा जल वृष्टि ॥
अष्टौ मासान् निपीतं यद् भूम्याश्चोदमयं वसु ।
स्वगोभिर्मोक्तुमारेभे पर्जन्यो काल आगते ॥
अर्थ: सूर्य ने अपनी किरणों से आठ महीने तक पृथ्वी का जो जलरूपी धन (वसु) पिया था, वर्षा का उचित समय (काल) आने पर, बादल बनकर उसने वह सारा जल पुनः पृथ्वी को लौटाना (बरसाना) आरम्भ कर दिया। (यह सिद्ध करता है कि राजा को प्रजा से लिया हुआ कर उचित समय पर प्रजा के कल्याण में ही लौटा देना चाहिए)।
5. कलियुग में पाखंडियों की वृद्धि का प्रतीक

वर्षा ऋतु में आकाश में घने काले बादल छा गए। तारे और ग्रह छिप गए, परंतु जुगनू (Fireflies) चमकने लगे। महर्षि वेदव्यास जी इसका अत्यंत अद्भुत अर्थ बताते हैं:

॥ जुगनुओं का चमकना ॥
निशामुखेषु खद्योतास्तमसा भान्ति न ग्रहाः ।
यथा पापेन पाषण्डा न हि वेदाः कलौ युगे ॥
अर्थ: वर्षाकाल की अंधेरी रातों में जुगनू (खद्योत) तो बहुत चमकने लगते हैं, परंतु ग्रह और नक्षत्र दिखाई नहीं देते। यह ठीक वैसा ही है जैसे कलियुग में पाप की वृद्धि होने से पाखंडी लोग तो बहुत चमकते (प्रसिद्ध होते) हैं, परंतु वेदों का सच्चा ज्ञान छिप जाता है।
6. मेंढकों का टर्राना और नदी का मार्ग बदलना

बादलों की गर्जना सुनकर धरती में छिपे हुए मेंढक बाहर आ गए और टर्राने लगे।

॥ मेंढकों का ध्वनि करना ॥
श्रुत्वा पर्जन्यनिनदं मण्डूका व्यसृजन् गिरः ।
तूष्णीं शयानाः प्राग्यद्वद् ब्राह्मणा नियमात्यये ॥
अर्थ: बादलों की गर्जना सुनकर, जो मेंढक अब तक चुपचाप सो रहे थे, वे सब बोलने (टर्राने) लगे। ठीक वैसे ही, जैसे प्रातःकाल नियम (मौन-स्नान आदि) पूरा हो जाने पर ब्राह्मण ऊँचे स्वर में वेदमंत्रों का पाठ करने लगते हैं।

वर्षा के कारण जो नदियां अब तक सूखी थीं, वे उफनकर अपने किनारों को तोड़ने लगीं।

॥ उफनती नदियां और असंयमी पुरुष ॥
आसन्नुत्पथवाहिन्यः क्षुद्रनद्योऽनुशुष्यतीः ।
पुंसो यथास्वतन्त्रस्य देहद्रविणसम्पदः ॥
अर्थ: गर्मियों में सूख जाने वाली छोटी-छोटी नदियां वर्षा का जल पाकर मर्यादा तोड़कर उलटे-सीधे रास्तों (उत्पथ) पर बहने लगीं। जैसे किसी इन्द्रियों के गुलाम (असंयमी) मनुष्य को अचानक बहुत सा धन मिल जाए, तो वह अपनी मर्यादा तोड़कर कुमार्ग पर चलने लगता है।
7. पर्वतों की सहनशीलता: संतों का स्वभाव

वर्षा की मूसलाधार जल की बूँदें जब बड़े-बड़े पर्वतों पर गिरती हैं, तो वे पर्वत अपनी जगह से तनिक भी नहीं हिलते।

॥ पर्वतों की स्थिरता ॥
गिरयो वर्षधाराभिर्हन्यमाना न विव्यथुः ।
अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतसः ॥
अर्थ: वर्षा की भयंकर धाराओं से लगातार आहत (चोट खाए) होने पर भी पर्वत तनिक भी विचलित नहीं हुए। ठीक उसी प्रकार, जैसे जिनके चित्त भगवान (अधोक्षज) में लगे हुए हैं, ऐसे भक्त अनेक प्रकार की विपत्तियों और दुःखों के आने पर भी कभी विचलित नहीं होते।
8. शरद् ऋतु का निर्मल आगमन

वर्षा ऋतु बीत जाने पर अत्यंत सुंदर 'शरद् ऋतु' का आगमन हुआ। आकाश से बादल छंट गए, जल निर्मल हो गया और हवा शुद्ध हो गई। कीचड़ सूखने लगा।

॥ निर्मल शरद् ऋतु ॥
ततः शरत् समभवद् विशदाम्बुरजोऽनिला ।
शरत्पद्मोत्सवा... (विशदाम्बरतारका)
अर्थ: तदनंतर शरद् ऋतु का प्रादुर्भाव हुआ। नदियां और सरोवर कमलों के खिलने से उत्सव मनाने लगे। जल, वायु और आकाश अत्यंत निर्मल हो गए। ठीक वैसे ही, जैसे भगवान की भक्ति प्राप्त हो जाने पर मनुष्य के हृदय से अज्ञान का अंधकार छंट जाता है और उसका चित्त निर्मल हो जाता है।

इस अत्यंत निर्मल शरद् ऋतु में ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से गोपियों को बुलाया था और 'चीर हरण' तथा 'रासलीला' का दिव्य आरम्भ हुआ था।

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