Kaliya Daman Leela: Kaliya Naag Ke Phan Par Natwar Ka Nritya bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

कालिया दमन: कालिया नाग के फन पर नटवर का अद्भुत नृत्य

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 16)

वृन्दावन में प्रवाहित होने वाली परम पावन 'यमुना जी' केवल एक नदी नहीं, अपितु भगवान श्रीकृष्ण की परम भक्ता हैं। परंतु एक समय ऐसा आया जब गरुड़ के भय से भागकर आए 'कालिया नाग' ने यमुना के एक कुण्ड में अपना डेरा डाल लिया। कालिया के भयंकर विष से यमुना जी का जल इतना ज़हरीला हो गया था कि उसके ऊपर से उड़ने वाले पक्षी भी झुलस कर गिर जाते थे। अपनी परम भक्ता यमुना जी को शुद्ध करने और ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने यह अत्यंत ओजस्वी 'कालिया दमन लीला' रची। श्रीमद्भागवत के इस अद्भुत प्रसंग का मूल श्लोकों के साथ विस्तार से दर्शन करें।

1. यमुना जी की दुर्दशा और भगवान का संकल्प

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ (बिना बलराम जी के) गायें चराते हुए यमुना के उस विषैले कुण्ड के पास जा पहुँचे। भगवान ने देखा कि विष की गर्मी से यमुना का जल दूषित हो गया है।

॥ भगवान का संकल्प ॥
विलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्णः कृष्णाहिना विभुः।
तस्या विशुद्धिमन्विच्छन्सर्पं तमुदवासयत् ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि काले नाग (कालिया) के विष से कृष्णा (यमुना जी) का जल दूषित हो गया है, तब उस जल को शुद्ध करने की इच्छा से उन्होंने उस सर्प को वहां से निकाल बाहर करने का संकल्प लिया।

कालिया के विष से तट के सभी वृक्ष जलकर राख हो गए थे, केवल एक 'कदंब' का वृक्ष वहां खड़ा था। दुष्टों को दण्ड देने के लिए अवतरित हुए भगवान ने अपनी कमर कसी और उस ऊँचे कदंब के वृक्ष पर चढ़ गए।

॥ विषैले कुण्ड में छलांग ॥
तं चण्डवेगविषवीर्यमवेक्ष्य तेन
दुष्टां नदीं च खलसंयमनावतारः ।
कृष्णः कदम्बमधिरुह्य ततोऽतितुङ्‌गम्
आस्फोट्य गाढरशनो न्यपतद् विषोदे ॥
अर्थ: उस नाग के विष के प्रचंड वेग को देखकर, तथा उस विष से नदी को दूषित हुआ जानकर दुष्टों का दमन करने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कमर का फेंटा कसकर बांधा। फिर वे उस अत्यंत ऊँचे कदंब के वृक्ष पर चढ़ गए और ताल ठोककर उस विषैले जल में कूद पड़े।
2. कालिया नाग का आक्रमण और ब्रजवासियों का हाहाकार

पानी के भयंकर धमाके को सुनकर कालिया नाग क्रोध से फुफकारता हुआ बाहर आया। उसने देखा कि एक अत्यंत सुंदर और सांवला बालक उसके कुण्ड में निर्भय होकर खेल रहा है।

॥ नागपाश का बंधन ॥
तं प्रेक्षणीयसुकुमारघनावदातं
श्रीवत्सपीतवसनं स्मितसुन्दरास्यम् ।
क्रीडन्तमप्रतिभयं कमलोदराङ्‌घ्रिं
सन्दश्य मर्मसु रुषा भुजया चछाद ॥
अर्थ: नवीन मेघ के समान सुकुमार और श्यामवर्ण वाले, श्रीवत्स चिह्न और पीताम्बर धारण किए हुए, सुंदर मुस्कान से सुशोभित उन निडर होकर खेलते हुए श्रीकृष्ण को देखकर, कालिया नाग ने क्रोध में आकर उनके मर्म-स्थानों पर डँस लिया और उन्हें अपनी कुंडली के घेरे (नागपाश) में लपेट लिया।

कन्हैया को नाग के पाश में फँसा देखकर उनके सखा और ग्वाल-बाल अत्यंत व्यथित होकर मूर्छित हो गए।

॥ सखाओं की पीड़ा ॥
तं नागभोगपरिवीतमदृष्टचेष्टम्
आलोक्य तत्प्रियसखाः पशुपा भृशार्ताः ।
कृष्णेऽर्पितात्मसुहृदर्थकलत्रकामा
दुःखानुशोकभयमूढधियो निपेतुः ॥
अर्थ: नाग की कुंडली में पूरी तरह से लिपटे हुए और चेष्टा-हीन (शांत) हुए श्रीकृष्ण को देखकर, जिन्होंने अपना शरीर, स्वजन और सभी कामनाएं श्रीकृष्ण को ही अर्पित कर रखी थीं, वे उनके प्रिय सखा दुःख, शोक और भय से अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

यह भयंकर समाचार पूरे गोकुल में फैल गया। माता यशोदा, नन्दबाबा और सभी गोकुलवासी अपने प्राण-प्यारे कन्हैया के लिए रोते-बिलखते हुए यमुना तट की ओर दौड़ पड़े।

॥ गोकुलवासियों का दौड़ना ॥
आबालवृद्धवनिताः सर्वेऽङ्‌ग पशुवृत्तयः ।
निर्जग्मुर्गोकुलाद् दीनाः कृष्णदर्शनलालसाः ॥
अर्थ: हे राजन्! बालक, वृद्ध और स्त्रियों सहित गोकुल के सभी निवासी, जिनके प्राण केवल श्रीकृष्ण ही थे, अत्यंत दीन (व्याकुल) होकर श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा से गोकुल से बाहर निकल पड़े।

वे सब अचेत होकर उस कुण्ड में कूदने लगे। उस समय केवल श्री बलराम जी ऐसे थे, जो शांत थे, क्योंकि वे जानते थे कि यह केवल प्रभु की एक लीला है।

॥ बलराम जी की स्थिरता ॥
कृष्णप्राणान् निर्विशतो नन्दादीन् वीक्ष्य तं ह्रदम् ।
प्रत्यषेधत् स भगवान् रामः कृष्णानुभाववित् ॥
अर्थ: जब भगवान बलराम ने देखा कि नन्दबाबा आदि गोप, जिनके प्राण केवल श्रीकृष्ण ही हैं, उस विषैले कुण्ड में प्रवेश कर रहे हैं, तो श्रीकृष्ण के अनंत प्रभाव को जानने वाले भगवान राम (बलराम) ने उन्हें जल में जाने से रोक दिया।
3. नागपाश से मुक्ति और 'नटवर' का अद्भुत ताण्डव

जब भगवान ने देखा कि मेरा गोकुल मेरे वियोग में प्राण त्यागने को तैयार है, तो उन्होंने अपने शरीर को फुलाना शुरू कर दिया। कालिया की कुंडली टूटने लगी। पीड़ा के कारण उसे भगवान को छोड़ना पड़ा। जैसे ही कालिया ने फन उठाया, अखिल कलाओं के गुरु भगवान उछलकर उसके फनों पर चढ़ गए और ताण्डव नृत्य करने लगे।

॥ फन पर नटवर का नृत्य ॥
एवं परिभ्रमहतौजसमुन्नतांसम्
आनम्य तत्पृथुशिरःस्वधिरूढ आद्यः ।
तन्मूर्धरत्‍ननिकरस्पर्शातिताम्र
पादाम्बुजोऽखिलकलादिगुरुर्ननर्त ॥
अर्थ: इस प्रकार बार-बार चक्कर काटने से जब कालिया का बल क्षीण हो गया और उसने अपने फन झुका लिए, तब आदि-पुरुष भगवान श्रीकृष्ण उसके विशाल फनों पर चढ़ गए। कालिया के मस्तक पर जड़ी हुई मणियों के स्पर्श से उनके कमल-समान चरण अत्यंत लाल हो गए, और सभी कलाओं के आदि-गुरु भगवान वहाँ नृत्य करने लगे।

भगवान की एड़ियों की भयंकर चोट से कालिया के 101 फन चकनाचूर होने लगे। जो भी फन वह ऊपर उठाता, प्रभु उसी पर अपने कोमल (परंतु वज्र के समान) चरणों से प्रहार करते।

॥ कालिया के फनों का कुचलना ॥
यद् यद् शिरो न नमतेऽङ्‌ग शतैकशीर्ष्णः
तत्तन्ममर्द खरदण्डधरोऽङ्‌घ्रिपातैः ।
क्षीणायुषो भ्रमत उल्बणमास्यतोऽसृङ्‌
नस्तो वमन् परमकश्मलमाप नागः ॥
अर्थ: एक सौ एक (101) सिरों वाले उस कालिया नाग का जो-जो सिर नीचे नहीं झुकता था, दुष्टों को कठोर दण्ड देने वाले भगवान श्रीकृष्ण अपने चरणों की चोट से उसी सिर को कुचल देते थे। आयु क्षीण होने के कारण चक्कर काटता हुआ वह नाग अपने मुख और नासिका से भयंकर रक्त वमन (खून की उल्टी) करता हुआ अत्यंत कष्ट को प्राप्त हुआ।

नृत्य करते हुए प्रभु ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो पुष्पों से उनकी पूजा की जा रही हो।

॥ कालिया का मान-मर्दन ॥
तस्याक्षिभिर्गरलमुद्वमतः शिरःसु
यद् यत् समुन्नमति निःश्वसतो रुषोच्चैः ।
नृत्यन् पदानुनमयन् दमयां बभूव
पुष्पैः प्रपूजित इवेह पुमान्पुराणः ॥
अर्थ: क्रोध से ऊँची-ऊँची साँसें लेता हुआ कालिया जब अपनी आँखों से विष उगलने लगता और जो भी फन ऊपर उठाता, नृत्य करते हुए पुराण-पुरुष भगवान अपने चरणों की चोट से उसे झुका देते और उसका दमन करते।
4. कालिया का समर्पण और नागपत्नियों की अद्भुत स्तुति

जब कालिया नाग का सारा अहंकार टूट गया और मृत्यु समीप आ गई, तो उसने मन ही मन परब्रह्म नारायण की शरण ली।

॥ मन ही मन समर्पण ॥
तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रो
रक्तं मुखैरुरु वमन् नृप भग्नगात्रः ।
स्मृत्वा चराचरगुरुं पुरुषं पुराणं
नारायणं तमरणं मनसा जगाम ॥
अर्थ: भगवान के उस चित्र-विचित्र 'ताण्डव नृत्य' से उसके छत्राकार फन चकनाचूर हो गए। उसके मुखों से बहुत सा रक्त बहने लगा और सारे अंग टूट गए। तब उस कालिया नाग ने चराचर जगत के गुरु, पुराण पुरुष भगवान नारायण का स्मरण किया और मन-ही-मन उनकी शरण में गया।

अपने पति को मरणासन्न देखकर कालिया की पत्नियां (नागिनें) अपने बच्चों को लेकर भगवान के चरणों में आ गिरीं। उन्होंने अत्यंत उच्च कोटि के ज्ञान से परिपूर्ण स्तुति आरंभ की:

॥ दण्ड में कृपा का दर्शन ॥
न्याय्यो हि दण्डः कृतकिल्बिषेऽस्मिन्
तवावतारः खलनिग्रहाय ।
अनुग्रहोऽयं भवतः कृतो हि नो
दण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ॥ (श्लोक 33, 34 सार)
अर्थ: नागपत्नियों ने कहा— "हे प्रभो! आपने इस अपराधी को जो दण्ड दिया है, वह सर्वथा न्यायोचित है। दुष्टों को दिया गया आपका दण्ड भी वास्तव में उनके पापों को नष्ट करने वाला ही होता है। इस सर्प पर किया गया आपका यह क्रोध भी हम आपके महान अनुग्रह (कृपा) के रूप में ही मानते हैं।"

नागपत्नियां जानती थीं कि भगवान के चरणों की धूलि प्राप्त करना कितना दुर्लभ है। उन्होंने कहा:

॥ चरण-रज की महिमा ॥
न नाकपृष्ठं न च सार्वभौमं
न पारमेष्ठ्यं न रसाधिपत्यम् ।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
वाञ्छन्ति यत्पादरजःप्रपन्नाः ॥
अर्थ: "हे नाथ! जिन्होंने आपके चरण-कमलों की धूलि (शरण) प्राप्त कर ली है, वे न तो स्वर्ग चाहते हैं, न सार्वभौम सम्राट होना चाहते हैं, न ब्रह्मा का पद, न पाताल का राज्य, न योग की सिद्धियां और न ही मोक्ष (पुनर्जन्म से मुक्ति) की ही इच्छा करते हैं।"

अंत में उन्होंने अपने पति के प्राणों की भीख मांगते हुए कहा:

॥ पति के प्राणों की भिक्षा ॥
अनुगृह्णीष्व भगवन् प्राणांस्त्यजति पन्नगः ।
स्त्रीणां नः साधुशोच्यानां पतिः प्राणः प्रदीयताम् ॥
अर्थ: "हे भगवन्! कृपा कीजिए, कृपा कीजिए! यह सर्प अब अपने प्राण त्याग रहा है। हम स्त्रियां संतों के लिए भी दया (शोक) की पात्र हैं, अतः हमारे प्राण-स्वरूप हमारे इस पति को जीवन-दान दे दीजिए।"
5. कालिया नाग की क्षमा-याचना और भगवान का आदेश

नागपत्नियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने कालिया को छोड़ दिया। कालिया ने अपने अज्ञानी स्वभाव को स्वीकार करते हुए भगवान से क्षमा मांगी।

॥ कालिया नाग का समर्पण ॥
कालिय उवाच -
वयं खलाः सहोत्पत्त्या तामसा दीर्घमन्यवः ।
स्वभावो दुस्त्यजो नाथ लोकानां यदसद्ग्रहः ॥
अर्थ: कालिया नाग ने कहा— "हे नाथ! हम सर्प जन्म से ही क्रूर, तामसिक (अज्ञानी) और हमेशा क्रोध करने वाले होते हैं। हे प्रभो! प्राणियों के लिए अपना यह जन्मजात बुरा स्वभाव छोड़ना अत्यंत कठिन होता है।"
॥ भगवान की इच्छा पर छोड़ना ॥
भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्वरः ।
अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद्विधेहि नः ॥
अर्थ: "हे सर्वज्ञ जगदीश्वर! हमारे इस स्वभाव के कारण भी आप ही हैं। अब आप हम पर कृपा (अनुग्रह) करना चाहें या दण्ड (निग्रह) देना चाहें, जो आपको उचित लगे, वह कीजिए।"

कालिया के इस पूर्ण समर्पण को देखकर, मनुष्य रूप में लीला करने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने उसे यमुना छोड़ने का आदेश दिया।

॥ भगवान का आदेश ॥
श्रीशुक उवाच -
इत्याकर्ण्य वचः प्राह भगवान् कार्यमानुषः ।
नात्र स्थेयं त्वया सर्प समुद्रं याहि मा चिरम् ।
स्वज्ञात्यपत्यदाराढ्यो गोनृभिर्भुज्यते नदी ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— कालिया नाग के ऐसे वचन सुनकर, मनुष्य की भाँति लीला (कार्य) करने वाले भगवान ने कहा— "हे सर्प! अब तुम्हें यहाँ नहीं रहना चाहिए। तुम अपने परिवार, स्त्री और बच्चों के साथ बिना देर किए समुद्र में चले जाओ। अब इस नदी (यमुना) का जल गायों और मनुष्यों के काम आएगा।"
6. गरुड़ से अभयदान और यमुना जी की शुद्धि

कालिया को डर था कि समुद्र में उसका पुराना शत्रु 'गरुड़' उसे खा जाएगा। तब भगवान ने उसे वह अभयदान दिया जो संसार में किसी और को प्राप्त नहीं हुआ।

॥ गरुड़ से परम अभयदान ॥
द्वीपं रमणकं हित्वा ह्रदमेतमुपाश्रितः ।
यद्भयात्स सुपर्णस्त्वां नाद्यान्मत्पादलाञ्छितम् ॥
अर्थ: "जिस गरुड़ (सुपर्ण) के भय से तुम 'रमणक द्वीप' को छोड़कर इस कुण्ड में आकर छिप गए थे, वह गरुड़ अब तुम्हारे सिर पर अंकित मेरे इन 'चरण-चिह्नों' को देखकर तुम्हें बिल्कुल नहीं खाएगा।"

कालिया नाग भगवान की परिक्रमा करके उसी क्षण समुद्र की ओर चला गया। यमुना जी का जल पुनः अमृत के समान मीठा और विष-रहित हो गया। जब कन्हैया जल से बाहर आए, तो माता यशोदा, नन्दबाबा और सभी गोपों ने उन्हें हृदय से लगा लिया। उस रात्रि सभी ब्रजवासियों ने यमुना के तट पर ही विश्राम किया।

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