Bhagwat Venu Geet: Shri Krishna Ki Bansi Ka Rahasya

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

वेणुगीत: भगवान की वंशी-ध्वनि और गोपियों की भाव-समाधि

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 21)

वर्षा ऋतु के पश्चात वृन्दावन में अत्यंत निर्मल 'शरद् ऋतु' का आगमन हुआ। सरोवरों का जल स्फटिक मणि के समान स्वच्छ हो गया और कमलों की सुगंध चारों ओर फैलने लगी। प्रकृति का ऐसा मनमोहक शृंगार देखकर परम रसिक भगवान श्रीकृष्ण का मन अपनी बाँसुरी (वेणु) बजाने के लिए मचल उठा। जब कन्हैया ने अपने अधरों (होंठों) पर रखकर वह वंशी बजाई, तो उस दिव्य नाद ने गोकुल की गोपियों को ही नहीं, बल्कि जड़ और चेतन— सभी प्राणियों को भाव-समाधि में ला दिया। गोपियों द्वारा गाया गया यह **'वेणुगीत'** भागवत का वह हृदय-हार है, जिसे सुनकर पत्थर भी पिघल जाते हैं।

1. शरद् ऋतु में भगवान का वन-प्रवेश

शरद् ऋतु के उस सुहावने वातावरण में, जहाँ नदियों का जल अत्यंत स्वच्छ था और हवाएँ कमलों की सुगंध से भर गई थीं, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सखाओं और गौ-माताओं के साथ वृन्दावन में प्रवेश किया।

॥ वृन्दावन प्रवेश ॥
इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना ।
न्यविशद् वायुना वातं सगोपालकोऽच्युतः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— इस प्रकार, जहाँ का जल शरद् ऋतु के कारण अत्यंत स्वच्छ हो गया था और जहाँ सरोवरों (कमलों) की सुगंध से भरी हुई शीतल वायु बह रही थी, ऐसे वन में ग्वाल-बालों और गायों के साथ भगवान अच्युत (श्रीकृष्ण) ने प्रवेश किया।
2. वंशी-वादन और गोपियों की व्याकुलता

वन में पहुँचकर जब भगवान ने देखा कि वृक्ष फूलों से लदे हैं और भंवरे तथा पक्षी मधुर गुंजार कर रहे हैं, तो उन्होंने भी अपनी बांसुरी से अत्यंत मधुर स्वर छेड़ दिया।

॥ वंशी का निनाद ॥
कुसुमितवनराजिशुष्मिभृङ्ग-
द्विजकुलघुष्टसरःसरिन्महीध्रम् ।
मधुपतिरवगाह्य चारयन् गाः
सहपशुपालबलश्चुकूज वेणुम् ॥
अर्थ: खिले हुए फूलों वाली वन-पंक्तियों में मतवाले भंवरों और पक्षियों के कलरव से सरोवर, नदियां और पर्वत गूँज रहे थे। ऐसे वन में प्रवेश करके मधु-पति भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं और बलराम जी के साथ गायें चराते हुए अपनी वंशी (बांसुरी) बजाने लगे।

भगवान की उस वंशी-ध्वनि को सुनकर ब्रज की गोपियों के हृदय में साक्षात कामदेव (प्रेम) का उदय हो गया। वे एक स्थान पर एकत्र होकर भगवान की रूप-माधुरी का वर्णन करने लगीं।

॥ गोपियों का वंशी-श्रवण ॥
तद् व्रजस्त्रिय आश्रुत्य वेणुगीतं स्मरोदयम् ।
काश्चित् परोक्षं कृष्णस्य स्वसखीभ्योऽन्ववर्णयन् ॥
अर्थ: प्रेम (काम) को जगाने वाले उस 'वेणुगीत' (वंशी की ध्वनि) को सुनकर ब्रज की गोपियां परोक्ष रूप से (श्रीकृष्ण की पीठ पीछे) अपनी सखियों से उनके सौंदर्य और वंशी-वादन का वर्णन करने लगीं।
3. 'नटवर' रूप का वह विश्व-प्रसिद्ध दर्शन

गोपियां आपस में कहती हैं— "हे सखी! तुमने देखा कि जब कन्हैया वन में प्रवेश करते हैं, तो उनका रूप कैसा होता है?" भागवत का यह श्लोक भगवान के 'नटवर' (सर्वश्रेष्ठ नर्तक/अभिनेता) रूप का सबसे सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है:

॥ नटवर वपुः (अद्भुत शृंगार) ॥
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं
बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्-
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥
अर्थ: "सखी! उनके सिर पर मोर-पंख (बर्हापीड) है, कानों में कनेर के पीले फूल (कर्णिकार) हैं, शरीर पर सोने के समान पीताम्बर है और गले में पांच रंगों वाले पुष्पों की 'वैजयन्ती माला' है। वे एक सर्वश्रेष्ठ नट (नटवर) के समान वेश धारण किए हुए हैं। अपनी बांसुरी के छेदों को अपने अधरों की सुधा (अमृत) से भरते हुए और ग्वाल-बालों द्वारा अपनी कीर्ति सुनते हुए वे वृन्दावन में प्रवेश करते हैं। उनके चरण पड़ने से वृन्दावन रमणीक हो जाता है।"
4. नेत्रों का एकमात्र फल (सार्थकता)

गोपियां कहती हैं कि यदि किसी को आँखें मिली हैं, तो उनका केवल एक ही उपयोग है— उस बाँसुरी बजाते हुए कन्हैया के मुख-कमल का दर्शन करना।

॥ नेत्रों की सार्थकता ॥
अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः
सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः ।
वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं
यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥
अर्थ: "हे सखियो! जो लोग नेत्र वाले हैं, उनके नेत्रों का बस यही एक फल है (इसके अतिरिक्त हम और कुछ नहीं जानतीं) कि वे अपने सखाओं के साथ गायों के पीछे-पीछे वन में जाते हुए और अपनी बांसुरी बजाते हुए श्रीकृष्ण तथा बलराम जी के उस मुख-कमल का छककर पान करें (दर्शन करें), जिस मुख से वे प्रेम-भरी तिरछी चितवन (कटाक्ष) की वर्षा करते हैं।"
5. बांसुरी का परम भाग्य (वेणु का तप)

गोपियों को उस निर्जीव सी बांसुरी से ईर्ष्या होने लगती है। वे सोचती हैं कि यह सूखी हुई बांस की लकड़ी ऐसा कौन सा पुण्य कर आई है, जो हमारे कन्हैया के होंठों से लगकर उनके अधरामृत को पी रही है?

॥ वेणु का सौभाग्य ॥
गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्-
दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम् ।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो
हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः ॥
अर्थ: "हे गोपियो! इस बाँसुरी (वेणु) ने ऐसा कौन सा महान पुण्य (तप) किया है कि यह जिस दामोदर (श्रीकृष्ण) के अधरामृत (होंठों के रस) पर केवल हम गोपियों का अधिकार था, उसे यह स्वयं अकेले ही पी रही है! इस बांसुरी का यह प्रताप देखकर इसकी माता (नदियां) कमलों के रूप में प्रसन्न हो रही हैं और इसके पिता (वृक्ष) आनंद के आँसू (मधु) बहा रहे हैं।"
आध्यात्मिक रहस्य: बांसुरी अंदर से पूरी तरह 'खोखली' (रिक्त) होती है। उसमें अपना कोई स्वर या अहंकार नहीं होता। गोपियां हमें सिखाती हैं कि जो भक्त अपने हृदय को 'अहंकार-शून्य' कर लेता है, साक्षात भगवान उसे अपने होंठों से लगाकर अपने प्राणों (श्वास) से भर देते हैं और उसे अपना माध्यम बना लेते हैं।
6. वंशी-ध्वनि से पशु-पक्षियों की भाव-समाधि

केवल गोपियां ही नहीं, वृन्दावन के पशु-पक्षी भी इस वेणु-नाद से जड़वत (मूर्छित) हो जाते हैं। मोरों का नृत्य और हरिणियों का मुग्ध होना अद्भुत है।

॥ मोरों का नृत्य ॥
वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं
यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि ।
गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं
प्रेक्ष्याद्रिसान्ववरतान्यसमस्तसत्त्वम् ॥
अर्थ: "हे सखी! यह वृन्दावन पृथ्वी की कीर्ति को बढ़ा रहा है, क्योंकि इसने भगवान के चरण-कमलों का स्पर्श प्राप्त कर लिया है। जब गोविन्द अपनी बांसुरी बजाते हैं, तो मतवाले मोर नाचने लगते हैं। उनका वह नृत्य देखकर गोवर्धन पर्वत के अन्य सभी जीव-जंतु शांत (चित्रलिखित से) होकर खड़े रह जाते हैं।"

वन की भोली-भाली हरिणियां (Deer) भी अपने पतियों के साथ आकर भगवान की पूजा करने लगती हैं।

॥ मुग्ध हरिणियां ॥
धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता
या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम् ।
आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः
पूजामदधुरविरलविलोकितेन ॥
अर्थ: "सखी! ये वन की हरिणियां पशु-योनि में होने के कारण भले ही अज्ञानी हों, परंतु ये धन्य हैं! जो विचित्र वेश धारण किए हुए नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की वंशी-ध्वनि सुनकर अपने पतियों (काले मृगों) के साथ उनके पास आ जाती हैं और अपनी निरंतर (अपलक) दृष्टि से भगवान की पूजा करती हैं।"
7. गायों और बछड़ों का प्रेमाश्रु बहाना

गायें और बछड़े भी भगवान की इस बांसुरी के अमृत को अपने कानों के दोनों दोने (कप) बनाकर पीने लगते हैं।

॥ बछड़ों की समाधि ॥
गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत-
पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः ।
शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थुर्-
गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः ॥
अर्थ: "ये गायें अपने कानों को खड़ा करके श्रीकृष्ण के मुख से निकले हुए वंशी-गीत रूपी अमृत को पी रही हैं। और देखो, इन छोटे-छोटे बछड़ों को! अपनी माताओं का दूध पीते-पीते इनके मुँह में दूध का घूँट ज्यों का त्यों रुका हुआ है। ये अपनी आँखों से आँसू बहाते हुए गोविन्द को हृदय में धारण करके जड़ (मूर्ति की तरह) हो गए हैं।"
8. नदियों (यमुना जी) का भगवान को आलिंगन करना

चेतन प्राणी ही नहीं, नदियां (जल) भी इस वेणु-नाद को सुनकर अपनी गति भूल जाती हैं और प्रेम से भर उठती हैं।

॥ नदियों का प्रेम-निवेदन ॥
नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीतम्
आवर्तलक्षितमनोभवभग्नवेगाः ।
आलिङ्गनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारेर्-
गृह्णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः ॥
अर्थ: "सखियो! ये नदियां (यमुना जी) भी भगवान मुकुन्द का वह गीत सुनकर प्रेम-मग्न हो गई हैं। पानी के भँवरों (Whirlpools) के रूप में उनकी प्रेम-व्यथा दिखाई दे रही है और उनका बहना रुक गया है। वे अपनी तरंगों रूपी भुजाओं से कमलों का उपहार लेकर मुरारी भगवान के चरण-कमलों को पकड़ कर उनका आलिंगन (गले लगा रही) कर रही हैं।"

इस प्रकार, सम्पूर्ण वृन्दावन भगवान के उस वेणुगीत में डूबकर प्रेम और आनंद का साक्षात स्वरूप बन जाता है। जो भगवान निराकार हैं, वे अपनी बांसुरी की एक तान से सगुण होकर कण-कण में प्रेम जगा देते हैं।

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