श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (दुर्गा जी के 108 नाम) | Durga Ashtottara Shatanama Stotram

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
ईश्वर उवाच ॥
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने ।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती ॥१॥
अर्थ: भगवान शिव बोले - "हे कमलानने (कमल के समान मुख वाली पार्वती)! मैं तुम्हें माता दुर्गा के एक सौ आठ (108) नाम बताता हूँ, सुनो। जिसके पाठ मात्र (प्रसाद) से सती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।"
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी ।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ॥२॥
अर्थ: १. सती, २. साध्वी, ३. भवप्रीता (भगवान शिव पर प्रीति रखने वाली), ४. भवानी, ५. भवमोचनी (संसार-बंधन से मुक्त करने वाली), ६. आर्या, ७. दुर्गा, ८. जया, ९. आद्या, १०. त्रिनेत्रा, ११. शूलधारिणी।
पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः ।
मनो बुद्धिरहङ्कारा चित्तरूपा चिता चितिः ॥३॥
अर्थ: १२. पिनाकधारिणी (शिव का धनुष धारण करने वाली), १३. चित्रा, १४. चण्डघण्टा (प्रचंड स्वर से घण्टा नाद करने वाली), १५. महातपाः (भारी तपस्या करने वाली), १६. मन, १७. बुद्धि, १८. अहंकारा, १९. चित्तरूपा, २०. चिता, २१. चिति (चेतना)।
सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी ।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ॥४॥
अर्थ: २२. सर्वमन्त्रमयी, २३. सत्ता, २४. सत्यानन्दस्वरूपिणी, २५. अनन्ता, २६. भाविनी (सबको उत्पन्न करने वाली), २७. भाव्या (भावना करने योग्य), २८. भव्या (कल्याणरूपा), २९. अभव्या (जिससे बढ़कर भव्य कुछ न हो), ३०. सदागतिः।
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा ।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥५॥
अर्थ: ३१. शाम्भवी (शिवप्रिया), ३२. देवमाता, ३३. चिन्ता, ३४. रत्नप्रिया, ३५. सर्वविद्या, ३६. दक्षकन्या, ३७. दक्षयज्ञविनाशिनी।
अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती ।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥६॥
अर्थ: ३८. अपर्णा (तपस्या के समय पत्ते तक न खाने वाली), ३९. अनेकवर्णा (अनेक रंगों वाली), ४०. पाटला (गुलाब के फूल जैसी लाल), ४१. पाटलावती, ४२. पट्टाम्बरपरीधाना (रेशमी वस्त्र पहनने वाली), ४३. कलमंजीररंजिनी (मधुर ध्वनि करने वाले नूपुर धारण करने वाली)।
अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी ।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ॥७॥
अर्थ: ४४. अमेयविक्रमा (असीम पराक्रम वाली), ४५. क्रूरा (दैत्यों के प्रति कठोर), ४६. सुन्दरी, ४७. सुरसुन्दरी, ४८. वनदुर्गा, ४९. मातंगी, ५०. मतंगमुनिपूजिता।
ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा ।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ॥८॥
अर्थ: ५१. ब्राह्मी, ५२. माहेश्वरी, ५३. ऐन्द्री, ५४. कौमारी, ५५. वैष्णवी, ५६. चामुण्डा, ५७. वाराही, ५८. लक्ष्मी, ५९. पुरुषाकृतिः (पुरुष रूप धारण करने वाली)।
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा ।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥९॥
अर्थ: ६०. विमला, ६१. उत्कर्षिणी, ६२. ज्ञाना, ६३. क्रिया, ६४. नित्या, ६५. बुद्धिदा, ६६. बहुला, ६७. बहुलप्रेमा, ६८. सर्ववाहनवाहना (सभी वाहनों पर विराजमान होने वाली)।
निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी ।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥१०॥
अर्थ: ६९. निशुम्भशुम्भहननी, ७०. महिषासुरमर्दिनी, ७१. मधुकैटभहन्त्री, ७२. चण्डमुण्डविनाशिनी।
सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी ।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥११॥
अर्थ: ७३. सर्वासुरविनाशा, ७४. सर्वदानवघातिनी, ७५. सर्वशास्त्रमयी, ७६. सत्या, ७७. सर्वास्त्रधारिणी।
अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी ।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः ॥१२॥
अर्थ: ७८. अनेकशस्त्रहस्ता, ७९. अनेकास्त्रधारिणी, ८०. कुमारी, ८१. एककन्या, ८२. कैशोरी, ८३. युवती, ८४. यतिः (तपस्विनी)।
अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा ।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला ॥१३॥
अर्थ: ८५. अप्रौढा, ८६. प्रौढा, ८७. वृद्धमाता, ८८. बलप्रदा, ८९. महोदरी, ९०. मुक्तकेशी (खुले बालों वाली), ९१. घोररूपा, ९२. महाबला।
अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी ।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी ॥१४॥
अर्थ: ९३. अग्निज्वाला, ९४. रौद्रमुखी, ९५. कालरात्रि, ९६. तपस्विनी, ९७. नारायणी, ९८. भद्रकाली, ९९. विष्णुमाया, १००. जलोदरी।
शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी ।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ॥१५॥
अर्थ: १०१. शिवदूती, १०२. कराली, १०३. अनन्ता, १०४. परमेश्वरी, १०५. कात्यायनी, १०६. सावित्री, १०७. प्रत्यक्षा, १०८. ब्रह्मवादिनी।
॥ फलश्रुतिः ॥
य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम् ।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ॥१६॥
अर्थ: हे पार्वती! जो मनुष्य प्रतिदिन दुर्गा जी के इन 108 नामों का पाठ करता है, हे देवि! उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य (असंभव) नहीं रह जाता।
धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥१७॥
अर्थ: वह धन, धान्य, पुत्र, पत्नी, घोड़े और हाथी (ऐश्वर्य), तथा चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्राप्त करता है, और अंत में सनातन मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् ।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ॥१८॥
अर्थ: कन्याओं का पूजन करके और देवेश्वरी माता का ध्यान करके, जो परम भक्ति के साथ पूजा करता है और इन 108 नामों का पाठ करता है...
तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वैः सुरवरैरपि ।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥१९॥
अर्थ: ...हे देवि! उसे श्रेष्ठ देवताओं से भी सिद्धि प्राप्त हो जाती है। बड़े-बड़े राजा भी उसके दास (वश में) हो जाते हैं और वह राज्य तथा राजलक्ष्मी को प्राप्त करता है।
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन
सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण ।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो
भवेत् सदा धारयते पुरारिः ॥२०॥
अर्थ: जो विधि को जानने वाला पुरुष गोरोचन, आलता, कुमकुम, सिन्दूर, कपूर और मधु (शहद), घी तथा चीनी— इन सबसे विधिपूर्वक यन्त्र लिखकर उसे सदा धारण करता है, वह साक्षात् शिव (पुरारि) के समान हो जाता है।
भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते ।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम् ॥२१॥
अर्थ: भौमवती अमावस्या (मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या) की आधी रात के समय, जब चन्द्रमा शतभिषा नक्षत्र में हो, उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है, वह महान सम्पत्तियों का स्वामी बन जाता है।

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