Shri Durga Saptashati Argala Stotram (श्री अर्गला स्तोत्रम्)

Sooraj Krishna Shastri
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॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥

अथार्गलास्तोत्रम्
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
अर्थ: ॐ. इस श्री अर्गला स्तोत्र मन्त्र के विष्णु ऋषि हैं, अनुष्टुप् छंद है, श्री महालक्ष्मी देवता हैं और श्री जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए सप्तशती पाठ के अंग के रूप में इसके जप का विनियोग किया जाता है।
ॐ नमश्चण्डिकायै ॥
मार्कण्डेय उवाच ॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥१॥
अर्थ: मार्कण्डेय जी कहते हैं - "हे जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा नाम वाली देवि! आपको मेरा नमस्कार है।"
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥२॥
अर्थ: "हे चामुण्डे देवि! आपकी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! आपकी जय हो। सब जगह व्याप्त रहने वाली हे कालरात्रि देवि! आपको नमस्कार है।"
मधुकैटभविद्रावि विधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥
अर्थ: "मधु और कैटभ नामक राक्षसों का नाश करने वाली और ब्रह्माजी को वरदान देने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे (आत्मिक) रूप दें, जय दें, यश दें और मेरे शत्रुओं (काम, क्रोध आदि) का नाश करें।"
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥
अर्थ: "महिषासुर का नाश करने वाली तथा भक्तों को सुख प्रदान करने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥
अर्थ: "रक्तबीज का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड का विनाश करने वाली हे देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और मेरे शत्रुओं का नाश करें।"
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्रलोचनमर्दिनी ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥
अर्थ: "शुम्भ, निशुम्भ और धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली हे देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥
अर्थ: "जिनके दोनों चरणों की वंदना देव-मुनि सभी करते हैं और जो सभी सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं, हे देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥
अर्थ: "जिनके रूप और चरित्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती तथा जो सभी शत्रुओं का नाश करने वाली हैं, हे देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥
अर्थ: "हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक आपके सामने नतमस्तक होते हैं, उनके सभी पापों को हरने वाली देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥
अर्थ: "हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, उनके सभी रोगों (व्याधियों) को नष्ट करने वाली देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥
अर्थ: "हे चण्डिके! जो लोग इस संसार में भक्तिपूर्वक निरंतर आपकी पूजा करते हैं, आप उन्हें रूप दें, जय दें, यश दें और उनके शत्रुओं का नाश करें।"
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥
अर्थ: "हे देवि! आप मुझे सौभाग्य और आरोग्य (स्वास्थ्य) दें तथा मुझे परम सुख प्रदान करें। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥
अर्थ: "हे देवि! आप मेरे शत्रुओं का नाश करें और मुझे महान बल (शक्ति) प्रदान करें। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥
अर्थ: "हे देवि! आप मेरा कल्याण करें और मुझे उत्तम धन-संपत्ति (परम श्री) प्रदान करें। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥
अर्थ: "देवताओं और असुरों के मुकुटों के रत्नों से जिनके चरण घिसे जाते हैं (अर्थात जो आपके चरणों में शीश झुकाते हैं), हे अम्बिके! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥
अर्थ: "हे देवि! आप अपने भक्त जन को विद्यावान, यशस्वी और धनवान (लक्ष्मीवान) बनाएं। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥
अर्थ: "प्रचंड दैत्यों के घमंड को चूर करने वाली हे चण्डिके! मुझ शरणागत को आप रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥
अर्थ: "चार मुख वाले ब्रह्माजी द्वारा स्तुति की जाने वाली हे चार भुजाओं वाली परमेश्वरी! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥
अर्थ: "भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सदा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाने वाली हे अम्बिके! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥
अर्थ: "हिमालय की पुत्री (पार्वती) के पति भगवान शिव द्वारा स्तुति की जाने वाली हे परमेश्वरि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥
अर्थ: "इन्द्राणी के पति देवराज इन्द्र द्वारा सद्भाव और प्रेम से पूजित होने वाली हे परमेश्वरि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥
अर्थ: "प्रचंड भुजाओं वाले दैत्यों के घमंड का नाश करने वाली हे देवि! आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयोम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥
अर्थ: "हे देवि! हे अम्बिके! आप अपने भक्तों को अपार आनंद प्रदान करने वाली हैं। आप मुझे रूप दें, जय दें, यश दें और शत्रुओं का नाश करें।"
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥
अर्थ: "हे देवि! आप मुझे मेरे मन की इच्छा के अनुसार चलने वाली, उत्तम कुल में उत्पन्न हुई और इस दुर्गम संसार-सागर से पार उतारने वाली मनोरम पत्नी प्रदान करें।"
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम् ॥२५॥
अर्थ: "जो मनुष्य पहले इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करके फिर सप्तशती रूपी महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती की संख्या (सात सौ) के बराबर श्रेष्ठ संपत्तियों और सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है।"

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