Garg Muni Dwara Namkaran Sanskar Aur Krishna Ki Bal Leela

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

गर्ग मुनि द्वारा नामकरण संस्कार और घुटनों के बल चलने की लीला

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 8)

असुरों के निरंतर आक्रमणों (पूतना, शकटासुर, तृणावर्त) के बाद गोकुल में एक बार पुनः शांति स्थापित हुई। मथुरा के कारागार में बैठे वसुदेव जी को जब गोकुल के इन संकटों का पता चला, तो वे चिंतित हो गए। उन्हें विचार आया कि उनके पुत्रों का अब तक 'नामकरण संस्कार' नहीं हुआ है। वसुदेव जी ने यदुवंशियों के कुलगुरु, परम तपस्वी और त्रिकालदर्शी 'गर्ग मुनि' से प्रार्थना की कि वे गुप्त रूप से गोकुल जाकर बालकों का नामकरण संस्कार संपन्न करें। इस प्रकार भगवान की लीला में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दिव्य अध्याय— 'नामकरण' और वात्सल्य रस से परिपूर्ण 'घुटनों के बल चलने की लीला' (बाल-लीला)— का आरंभ होता है।

1. गर्गाचार्य जी का गोकुल आगमन और नन्दबाबा का स्वागत

वसुदेव जी की प्रेरणा और भगवान की इच्छा से, परम ज्ञानी महर्षि गर्गाचार्य जी गोकुल में नन्दबाबा के घर पधारे। गर्ग मुनि ज्योतिष शास्त्र के महान विद्वान थे।

॥ गर्ग मुनि का आगमन ॥
गर्गः पुरोहितो राजन् यदूनां सुमहातपाः ।
व्रजं जगाम नन्दस्य वसुदेवप्रचोदितः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— हे राजन्! यदुवंशियों के कुलगुरु, अत्यंत महान तपस्वी गर्गाचार्य जी वसुदेव जी की प्रेरणा (आज्ञा) पाकर नन्दबाबा के ब्रज (गोकुल) में पधारे।

नन्दबाबा ने जब देखा कि साक्षात गर्गाचार्य जी उनके घर पधारे हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर, साष्टांग प्रणाम करते हुए उनका भव्य स्वागत किया। नन्दबाबा ने उनसे प्रार्थना की कि "हे मुनिवर! आप तो साक्षात ज्योतिष शास्त्र के रचयिता हैं, कृपा करके मेरे इन दोनों बालकों (रोहिणी और यशोदा के पुत्रों) का नामकरण संस्कार संपन्न कीजिए।"

2. कंस का भय और गौशाला में गुप्त नामकरण

गर्गाचार्य जी जानते थे कि मथुरा में कंस गुप्तचरों के माध्यम से गोकुल की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। यदि उन्होंने धूमधाम से नामकरण किया, तो कंस को संदेह हो जाएगा कि यह बालक वसुदेव का ही है।

॥ गर्ग मुनि की चेतावनी ॥
यदूनामहमाचार्यः ख्यातश्च भुवि सर्वदा ।
सुतं मया संस्कृतं ते मतिर्देवकिसुते नृप ॥
अर्थ: गर्ग मुनि ने कहा— "हे नन्द! मैं पृथ्वी पर यदुवंशियों के आचार्य के रूप में प्रसिद्ध हूँ। यदि मैं तुम्हारे पुत्र का नामकरण संस्कार करूँगा, तो कंस को यह संदेह हो जाएगा कि यह देवकी का ही पुत्र है।"

गर्गाचार्य जी की इस चेतावनी को सुनकर नन्दबाबा भयभीत हो गए। उन्होंने अत्यंत विनती करते हुए कहा— "भगवन्! यदि ऐसा है, तो आप उत्सव मत मनाइए। मेरे घर की 'गौशाला' (गायों के बाड़े) में गुप्त रूप से चलकर, बिना किसी को बताए, इन बालकों का नामकरण कर दीजिए।" गर्ग मुनि यही चाहते थे। वे एकांत में गौशाला में गए जहाँ केवल नन्दबाबा, माता यशोदा और माता रोहिणी उपस्थित थीं।

3. श्री बलराम जी का नामकरण (संकर्षण और राम)

सबसे पहले गर्ग मुनि ने माता रोहिणी के पुत्र की ओर देखा, जो पहले देवकी के गर्भ में आकर फिर योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में स्थापित किए गए थे। गर्ग मुनि ने उनके गुण और स्वभाव के आधार पर अत्यंत सुंदर नाम रखे:

॥ श्री बलराम जी के नाम ॥
अयं हि रोहिणीपुत्रो रमयन् सुहृदो गुणैः ।
आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदुः ॥
अर्थ: गर्गाचार्य जी ने कहा— "माता रोहिणी का यह पुत्र अपने मधुर गुणों से सभी स्वजनों और मित्रों को आनंदित (रमण) करेगा, इसलिए इसका एक नाम 'राम' होगा। शरीर में अत्यंत बलवान होने के कारण इसे लोग 'बल' (बलराम) कहेंगे, और यदुवंशियों को जोड़ने के कारण इसका नाम 'संकर्षण' भी होगा।"
4. भगवान श्रीकृष्ण का नामकरण और युग-अवतार रहस्य

अब बारी थी माता यशोदा की गोद में बैठे उस सांवले सलोने शिशु की! गर्ग मुनि त्रिकालदर्शी थे। वे उस परब्रह्म को पहचान गए। उन्होंने नन्दबाबा को उस बालक के पूर्व जन्मों और वर्णों (रंगों) का रहस्य बताया।

॥ भगवान के युगानुसार वर्ण ॥
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥
अर्थ: गर्ग मुनि ने कहा— "नन्दबाबा! प्रत्येक युग में अवतार लेते समय तुम्हारे इस पुत्र ने तीन अलग-अलग वर्ण (रंग) धारण किए हैं। सत्ययुग में यह 'शुक्ल' (सफ़ेद) था, त्रेतायुग में यह 'रक्त' (लाल) था, और अब इस युग में इसने 'कृष्ण' (सांवला / काला) रंग धारण किया है, इसलिए इसका नाम 'कृष्ण' होगा।"

इसके पश्चात गर्गाचार्य जी ने एक बहुत बड़ा रहस्य खोला। उन्होंने बताया कि यह बालक पहले वसुदेव जी के घर प्रकट हुआ था, इसलिए इसे 'वासुदेव' भी कहा जाएगा।

॥ वासुदेव नाम का रहस्य ॥
प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्जातस्तवात्मजः ।
वासुदेव इति श्रीमानभिज्ज्ञाः सम्प्रचक्षते ॥
अर्थ: "यह तुम्हारा पुत्र पूर्वकाल में किसी समय वसुदेव जी के घर भी उत्पन्न हुआ था, इसलिए इस श्रीमान को ज्ञानी लोग 'वासुदेव' नाम से भी पुकारेंगे।"
गर्ग मुनि ने अत्यंत चतुरता से काम लिया। नन्दबाबा यह समझे कि शायद किसी पूर्व जन्म में मेरा यह पुत्र वसुदेव का पुत्र रहा होगा, परंतु गर्ग मुनि वास्तव में इसी जन्म के मथुरा-प्राकट्य की बात कर रहे थे। 'कृष्ण' का अर्थ है— जो सबको अपनी ओर आकर्षित कर ले (आकर्षक), और जो परम आनंद का स्वरूप हो।
5. नाम और गुणों की अनंतता तथा भविष्यवाणी

गर्ग मुनि ने स्पष्ट किया कि इस बालक के गुण और कर्म इतने अनंत हैं कि इसके नामों की कोई गिनती नहीं की जा सकती।

॥ अनंत नाम और कर्म ॥
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥
अर्थ: "हे नन्द! तुम्हारे इस पुत्र के इसके गुणों और कर्मों के अनुसार अनेक (अनंत) रूप और नाम हैं। उन नामों को मैं तो जानता हूँ, परंतु साधारण जन नहीं जानते।"

भविष्यवाणी करते हुए महर्षि ने कहा कि यह बालक गोकुल के सभी कष्टों को हरेगा, दुष्टों का विनाश करेगा और गोकुलवासियों को परम आनंद प्रदान करेगा।

॥ रक्षक होने की भविष्यवाणी ॥
एष वः श्रेय आधास्यद्गोपगोकुलनन्दनः ।
अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥
अर्थ: "गोपों और गोकुल को आनंदित करने वाला तुम्हारा यह पुत्र तुम्हारा परम कल्याण करेगा। इसके प्रताप से तुम लोग बड़ी आसानी से सभी विपत्तियों और संकटों को पार कर जाओगे। गुणों और ऐश्वर्य में यह साक्षात 'नारायण' के समान है।"

इस प्रकार गौशाला में अत्यंत पवित्र और गुप्तरूप से दोनों भाइयों— बलराम और श्रीकृष्ण— का नामकरण संस्कार संपन्न हुआ। नन्दबाबा ने गर्ग मुनि को बहुत सारा धन और गौदान देकर विदा किया।

6. घुटनों के बल चलने की लीला (बाल्यकाल का वात्सल्य रस)

जैसे-जैसे समय बीता, गोकुल में श्रीकृष्ण और बलराम जी बड़े होने लगे। अब वे उस अवस्था में आ गए जहाँ बालक घुटनों के बल चलना (Crawling) आरंभ करते हैं। भागवतकार श्री शुकदेव जी वात्सल्य रस में डूबकर भगवान की इस अत्यंत मधुर बाल-लीला का वर्णन करते हैं:

॥ घुटनों के बल चलना ॥
कालेन व्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ ।
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिङ्गमाणौ विजह्रतुः ॥
अर्थ: कुछ ही समय बीतने पर गोकुल में बलराम (राम) और श्रीकृष्ण (केशव) अपने घुटनों और हाथों के बल (रेंगते हुए) गोकुल के आंगनों में आनंदपूर्वक विहार (खेलने) करने लगे।

जिनके एक श्वास से अनंत ब्रह्मांडों की रचना होती है और प्रलय होता है, वे परमपिता परमात्मा आज नन्द भवन के आंगन में एक साधारण बालक की भांति घुटनों के बल चल रहे थे! जब वे चलते थे, तो उनके कमर में बंधी करधनी (किंकिणी) और पैरों की पैंजनिया से रुनझुन-रुनझुन का अत्यंत मधुर स्वर निकलता था।

॥ बछड़ों के पीछे भागना ॥
तावङ्घ्रियुग्ममनुकृष्य सरीसृपन्तौ
घोषप्रघोषरुचिरं व्रजकर्दमेषु ।
तन्नादहृष्टमनसावनुसृत्य लोकं
मुग्धप्रभीतवदुपयतुः स्वमात्रीः ॥
अर्थ: वे दोनों भाई अपने पैरों को घसीटते हुए गोकुल की कीचड़ (गायों के गोबर और मूत्र से मिश्रित पवित्र मिट्टी) में रेंगते थे। जब उनके आभूषणों से बजने वाली मधुर ध्वनि से बछड़े डरकर भागते, तो वे भी मुग्ध होकर उन बछड़ों के पीछे-पीछे भागते। और जब कोई अनजान व्यक्ति उन्हें पकड़ने आता, तो वे डरने का नाटक करते हुए तुरंत अपनी माताओं (यशोदा और रोहिणी) के पास लौट आते थे।
वात्सल्य रस की पराकाष्ठा: जब कन्हैया घुटनों के बल चलते हुए ब्रज की कीचड़ और धूल से सन जाते थे और माता यशोदा उन्हें उठाने के लिए दौड़ती थीं, तो वे और तेज़ भागते थे। मैया उन्हें पकड़कर जब अपने हृदय से लगा लेती थीं, तो लाला के शरीर की सारी मिट्टी मैया के वक्षस्थल पर लग जाती थी। माता यशोदा उसी मिट्टी से सने हुए लाला को अपना दूध पिलाती थीं और लाला के मुख में अपने प्राणों को निहारती थीं।
7. भगवान का भक्तों के प्रेम में बंधना

श्रीमद्भागवत की यह 'घुटनों के बल चलने' की लीला सिद्ध करती है कि ईश्वर केवल ज्ञान या तपस्या से नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम और वात्सल्य से प्राप्त होते हैं। जो भगवान बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में भी नहीं आते, वे आज गोपियों की गोद में जाने के लिए दोनों हाथ फैलाकर घुटनों के बल दौड़ रहे हैं। गोकुल का यह आंगन साक्षात वैकुंठ से भी अधिक सौभाग्यशाली हो गया, जहाँ परब्रह्म की चरण-रज और घुटनों की छाप पड़ रही थी।

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