असुरों के निरंतर आक्रमणों (पूतना, शकटासुर, तृणावर्त) के बाद गोकुल में एक बार पुनः शांति स्थापित हुई। मथुरा के कारागार में बैठे वसुदेव जी को जब गोकुल के इन संकटों का पता चला, तो वे चिंतित हो गए। उन्हें विचार आया कि उनके पुत्रों का अब तक 'नामकरण संस्कार' नहीं हुआ है। वसुदेव जी ने यदुवंशियों के कुलगुरु, परम तपस्वी और त्रिकालदर्शी 'गर्ग मुनि' से प्रार्थना की कि वे गुप्त रूप से गोकुल जाकर बालकों का नामकरण संस्कार संपन्न करें। इस प्रकार भगवान की लीला में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दिव्य अध्याय— 'नामकरण' और वात्सल्य रस से परिपूर्ण 'घुटनों के बल चलने की लीला' (बाल-लीला)— का आरंभ होता है।
वसुदेव जी की प्रेरणा और भगवान की इच्छा से, परम ज्ञानी महर्षि गर्गाचार्य जी गोकुल में नन्दबाबा के घर पधारे। गर्ग मुनि ज्योतिष शास्त्र के महान विद्वान थे।
व्रजं जगाम नन्दस्य वसुदेवप्रचोदितः ॥
नन्दबाबा ने जब देखा कि साक्षात गर्गाचार्य जी उनके घर पधारे हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर, साष्टांग प्रणाम करते हुए उनका भव्य स्वागत किया। नन्दबाबा ने उनसे प्रार्थना की कि "हे मुनिवर! आप तो साक्षात ज्योतिष शास्त्र के रचयिता हैं, कृपा करके मेरे इन दोनों बालकों (रोहिणी और यशोदा के पुत्रों) का नामकरण संस्कार संपन्न कीजिए।"
गर्गाचार्य जी जानते थे कि मथुरा में कंस गुप्तचरों के माध्यम से गोकुल की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। यदि उन्होंने धूमधाम से नामकरण किया, तो कंस को संदेह हो जाएगा कि यह बालक वसुदेव का ही है।
सुतं मया संस्कृतं ते मतिर्देवकिसुते नृप ॥
गर्गाचार्य जी की इस चेतावनी को सुनकर नन्दबाबा भयभीत हो गए। उन्होंने अत्यंत विनती करते हुए कहा— "भगवन्! यदि ऐसा है, तो आप उत्सव मत मनाइए। मेरे घर की 'गौशाला' (गायों के बाड़े) में गुप्त रूप से चलकर, बिना किसी को बताए, इन बालकों का नामकरण कर दीजिए।" गर्ग मुनि यही चाहते थे। वे एकांत में गौशाला में गए जहाँ केवल नन्दबाबा, माता यशोदा और माता रोहिणी उपस्थित थीं।
सबसे पहले गर्ग मुनि ने माता रोहिणी के पुत्र की ओर देखा, जो पहले देवकी के गर्भ में आकर फिर योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में स्थापित किए गए थे। गर्ग मुनि ने उनके गुण और स्वभाव के आधार पर अत्यंत सुंदर नाम रखे:
आख्यास्यते राम इति बलाधिक्याद् बलं विदुः ॥
अब बारी थी माता यशोदा की गोद में बैठे उस सांवले सलोने शिशु की! गर्ग मुनि त्रिकालदर्शी थे। वे उस परब्रह्म को पहचान गए। उन्होंने नन्दबाबा को उस बालक के पूर्व जन्मों और वर्णों (रंगों) का रहस्य बताया।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥
इसके पश्चात गर्गाचार्य जी ने एक बहुत बड़ा रहस्य खोला। उन्होंने बताया कि यह बालक पहले वसुदेव जी के घर प्रकट हुआ था, इसलिए इसे 'वासुदेव' भी कहा जाएगा।
वासुदेव इति श्रीमानभिज्ज्ञाः सम्प्रचक्षते ॥
गर्ग मुनि ने स्पष्ट किया कि इस बालक के गुण और कर्म इतने अनंत हैं कि इसके नामों की कोई गिनती नहीं की जा सकती।
गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जनाः ॥
भविष्यवाणी करते हुए महर्षि ने कहा कि यह बालक गोकुल के सभी कष्टों को हरेगा, दुष्टों का विनाश करेगा और गोकुलवासियों को परम आनंद प्रदान करेगा।
अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥
इस प्रकार गौशाला में अत्यंत पवित्र और गुप्तरूप से दोनों भाइयों— बलराम और श्रीकृष्ण— का नामकरण संस्कार संपन्न हुआ। नन्दबाबा ने गर्ग मुनि को बहुत सारा धन और गौदान देकर विदा किया।
जैसे-जैसे समय बीता, गोकुल में श्रीकृष्ण और बलराम जी बड़े होने लगे। अब वे उस अवस्था में आ गए जहाँ बालक घुटनों के बल चलना (Crawling) आरंभ करते हैं। भागवतकार श्री शुकदेव जी वात्सल्य रस में डूबकर भगवान की इस अत्यंत मधुर बाल-लीला का वर्णन करते हैं:
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिङ्गमाणौ विजह्रतुः ॥
जिनके एक श्वास से अनंत ब्रह्मांडों की रचना होती है और प्रलय होता है, वे परमपिता परमात्मा आज नन्द भवन के आंगन में एक साधारण बालक की भांति घुटनों के बल चल रहे थे! जब वे चलते थे, तो उनके कमर में बंधी करधनी (किंकिणी) और पैरों की पैंजनिया से रुनझुन-रुनझुन का अत्यंत मधुर स्वर निकलता था।
घोषप्रघोषरुचिरं व्रजकर्दमेषु ।
तन्नादहृष्टमनसावनुसृत्य लोकं
मुग्धप्रभीतवदुपयतुः स्वमात्रीः ॥
श्रीमद्भागवत की यह 'घुटनों के बल चलने' की लीला सिद्ध करती है कि ईश्वर केवल ज्ञान या तपस्या से नहीं, बल्कि निश्छल प्रेम और वात्सल्य से प्राप्त होते हैं। जो भगवान बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में भी नहीं आते, वे आज गोपियों की गोद में जाने के लिए दोनों हाथ फैलाकर घुटनों के बल दौड़ रहे हैं। गोकुल का यह आंगन साक्षात वैकुंठ से भी अधिक सौभाग्यशाली हो गया, जहाँ परब्रह्म की चरण-रज और घुटनों की छाप पड़ रही थी।

