Putana Vadh, Shaktasur Bhanjan Aur Trinavarta Ka Ant: Krishna Leela, bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

पूतना वध, शकटासुर भंजन और तृणावर्त (बवंडर) का अंत

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 6 और 7)

नन्द भवन में आनंद का सागर उमड़ रहा था, परंतु दूसरी ओर मथुरा में दुष्ट कंस मृत्यु के भय से काँप रहा था। योगमाया की चेतावनी सुनने के बाद कंस ने अपने क्रूर मंत्रियों को आदेश दिया कि राज्य में जितने भी नवजात शिशु हैं, उन सबका वध कर दिया जाए। परब्रह्म श्रीकृष्ण के प्राकट्य के साथ ही असुरों का गोकुल में आगमन आरंभ हो गया। भगवान की बाल-लीलाएं केवल मनोरंजन नहीं हैं, अपितु जीव के जीवन से अविद्या, अहंकार और रजोगुण रूपी राक्षसों के विनाश का परम दर्शन हैं। इस अध्याय में हम पूतना, शकटासुर और तृणावर्त के संहार की अत्यंत अद्भुत और विस्तृत कथा का श्रवण करेंगे।

1. मायाविनी राक्षसी पूतना का गोकुल में प्रवेश

कंस की आज्ञा पाकर 'पूतना' नाम की अत्यंत क्रूर राक्षसी, जो आकाश में उड़ने की विद्या जानती थी और छोटे बच्चों का रक्त (खून) पीती थी, वह शिशुओं को मारती हुई गोकुल में जा पहुँची। उसने अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया।

॥ पूतना का आगमन ॥
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना ।
जिघांसयाप नन्दस्य गोकुलं खेचरी खला ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— राजन्! छोटे-छोटे बालकों की हत्या करने वाली, रक्त (खून) पीने वाली और आकाश में उड़ने वाली वह अत्यंत दुष्ट राक्षसी पूतना, नन्दबाबा के गोकुल में बालकों को मारने की इच्छा से आ पहुँची।

पूतना ने ऐसा मनमोहक शृंगार किया था कि उसके जूड़े में मल्लिका के पुष्प गुंथे थे, उसकी चाल अत्यंत आकर्षक थी और उसने अपने स्तनों (छाती) पर एक अत्यंत घातक और तीव्र विष (हलाहल) लगा रखा था। गोकुलवासियों ने उसे कोई लक्ष्मी या देवी समझकर नहीं रोका। वह बेरोकटोक नन्द भवन में प्रवेश कर गई।

जब पूतना ने कमरे में प्रवेश किया, तो उसने देखा कि पलने में साक्षात मृत्यु के भी काल भगवान श्रीकृष्ण लेटे हुए हैं। भगवान ने पूतना को देखते ही अपने नेत्र (आँखें) बंद कर लिए। संतों का मत है कि भगवान ने इसलिए आँखें बंद कर लीं क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इस झूठी और कपटी माँ के विष को देखकर उनके नेत्र लाल हों।

2. पूतना वध: दुग्धपान के साथ प्राणपान

माता यशोदा और रोहिणी वहीं थीं, परंतु पूतना के नकली सौन्दर्य को देखकर वे ठगी सी रह गईं और उसे रोक नहीं पाईं। पूतना ने पलने से भगवान को उठाया और अपनी गोद में बैठाकर अपना विष बुझा हुआ स्तन भगवान के छोटे से मुख में दे दिया। भगवान यही तो चाहते थे!

॥ पूतना का संहार ॥
गाढं कराभ्यां भगवान् प्रपीड्य
तत्प्राणैः समं रोषसमन्वितोऽपिबत् ।
सा मुञ्च मुञ्चालमिति प्रभाषिणी
निष्पीड्यमानाखिलजीवमर्मणि ॥
अर्थ: भगवान ने अपने दोनों नन्हे हाथों से पूतना के स्तनों को कसकर पकड़ लिया और थोड़ा क्रोधित होकर दूध के साथ-साथ उसके प्राण भी पीने लगे! पूतना के प्राणों के मर्म-स्थान फटने लगे और वह चीख उठी— "छोड़ दो! मुझे छोड़ दो! अब बस करो!"

पूतना पीड़ा से तड़पने लगी। उसके नेत्र बाहर निकल आए, उसके बाल खुल गए और वह पसीना-पसीना हो गई। अंततः पीड़ा सहन न कर पाने के कारण वह अपने असली, भयंकर राक्षसी रूप में आ गई और गोकुल के बाहर एक खेत में जाकर गिर पड़ी।

3. पूतना का विशाल देह और गोमूत्र से लाला की रक्षा

जब पूतना के प्राण पखेरू उड़ गए, तो उसका शरीर एक विशाल पहाड़ के समान हो गया। जब वह धरती पर गिरी, तो उसके शरीर के भार से गोकुल के बाहर के वृक्ष भी चूर-चूर हो गए।

॥ पूतना का पतन ॥
पतमानापि तद्देहस्त्रिगव्यूत्यन्तरद्रुमान् ।
चूर्णयामास राजेन्द्र महदासीत्तदद्भुतम् ॥
अर्थ: हे राजेन्द्र (परीक्षित)! जब पूतना मरी और उसका वह विशाल देह धरती पर गिरा, तो उसने तीन कोस (लगभग 9 मील) के दायरे में आने वाले सभी बड़े-बड़े वृक्षों को कुचल कर चूर्ण (नष्ट) कर दिया। यह एक अत्यंत अद्भुत घटना थी।

पूतना के भयंकर चीत्कार को सुनकर गोपियां और माता यशोदा भागती हुई आईं। उन्होंने देखा कि उस पहाड़ जैसी राक्षसी के विशाल शरीर (छाती) पर लाला निडर होकर खेल रहा है! गोपियों ने तुरंत लाला को उठाया। वे अत्यंत भयभीत थीं कि कहीं इस राक्षसी की छाया लाला पर न पड़ गई हो। उन्होंने भगवान की रक्षा के लिए सनातन वैदिक विधान का उपयोग किया।

॥ गोमूत्र और गोरज से रक्षा ॥
गोमूत्रेण स्नापयित्वा पुनर्गोरजसार्भकम् ।
रक्षां चक्रुश्च शकृता द्वादशाङ्गेषु नामभिः ॥
अर्थ: गोपियों ने बालक (श्रीकृष्ण) को गोमूत्र (गाय के मूत्र) से स्नान कराया, फिर उनके शरीर पर गोरज (गायों के खुरों की धूल) लगाई, और गोमय (गाय के गोबर) से उनके बारह अंगों पर भगवान के बारह नामों का उच्चारण करते हुए रक्षा-तिलक किया।
4. पूतना का अहैतुकी उद्धार (परम सद्गति)

जब ब्रजवासियों ने पूतना के विशाल शरीर को काटकर जलाया, तो उसमें से दुर्गंध के बजाय अगरू और चंदन जैसी अत्यंत सुगंधित महक आने लगी। यह चमत्कार कैसे हुआ? क्योंकि साक्षात भगवान ने उसका दूध (विष सहित) पीकर उसके सारे पापों को नष्ट कर दिया था।

॥ पूतना की परम सद्गति ॥
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना ।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम् ॥
अर्थ: बालकों की हत्या करने वाली और रक्त पीने वाली दुष्ट राक्षसी पूतना ने यद्यपि भगवान को मारने की इच्छा से ही अपना विष-बुझा स्तन पिलाया था, फिर भी भगवान की अहैतुकी कृपा से उसे वह परम सद्गति (माता का दर्जा) प्राप्त हुई जो बड़े-बड़े योगियों को भी दुर्लभ है।
आध्यात्मिक रहस्य: पूतना 'अविद्या' (अज्ञान) और 'पाखंडी गुरु' का प्रतीक है, जो बाहर से तो सुंदर दिखती है परंतु भीतर विष भरा होता है। जब ईश्वर हृदय में आते हैं, तो अज्ञान रूपी पूतना का अंत स्वतः ही हो जाता है।
5. शकटासुर भंजन (छकड़े रूपी दैत्य का अंत)

कुछ समय पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपने घुटनों और पेट के बल थोड़ा-थोड़ा खिसकना आरंभ किया (करवट ली), तो माता यशोदा ने 'उत्थान एकादशी' (नक्षत्र-उत्सव) का महान उत्सव रखा। नन्द भवन में बाजे बज रहे थे और ब्राह्मणों का भोज चल रहा था।

लाला को नींद आ रही थी, इसलिए माता यशोदा ने उन्हें दूध पिलाकर आंगन में खड़े एक छकड़े (बैलगाड़ी / शकट) के नीचे सुला दिया। वह कोई साधारण बैलगाड़ी नहीं थी, उसमें कंस का भेजा हुआ एक मायावी दैत्य 'शकटासुर' छिपकर बैठा था, जो लाला को कुचलने की ताक में था। लाला की नींद खुली और वे दूध के लिए रोने लगे, परंतु माता यशोदा उत्सव के कार्यों में व्यस्त होने के कारण सुन न सकीं।

॥ शकटासुर का वध ॥
अधःशयानस्य शिशोरनोऽल्पक-
प्रवालमृद्वङ्घ്രിहतं व्यवर्तत ।
विध्वस्तनानाकुप्यकुप्यभाण्डं
विपर्यस्ताक्षविभिन्नकूबरम् ॥
अर्थ: छकड़े (बैलगाड़ी) के नीचे लेटे हुए उस नन्हे शिशु (श्रीकृष्ण) ने रोते हुए अपने नए कोमल पत्तों (प्रवाल) के समान अत्यंत मुलायम चरण (पैर) से उस छकड़े को एक ठोकर मारी! उस नन्हे से पैर की ठोकर लगते ही वह विशाल छकड़ा उलट गया, उसका जुआ टूट गया, पहिए बिखर गए और उस पर रखे दूध-दही के सभी बर्तन चकनाचूर हो गए। दैत्य का वहीं अंत हो गया।

जब तेज धमाके की आवाज सुनकर गोपियां और नन्दबाबा दौड़े आए, तो वे उल्टे पड़े छकड़े को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ खेल रहे छोटे-छोटे बच्चों ने बताया कि "लाला रो रहा था, उसने अपने पैर से ठोकर मारी और यह छकड़ा उलट गया।"

॥ ब्रजवासियों का आश्चर्य ॥
न ते तदुक्तं जगृहुर्बालास्याप्रमितौकसः ।
अर्भकस्येदमिति तं न विदुः कतिचिज्जनाः ॥
अर्थ: बड़े गोपों ने उन बच्चों की बात पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं किया। वे अज्ञानवश यह नहीं जानते थे कि इस छोटे से बालक (श्रीकृष्ण) के अंदर अपरिमित (अनंत) बल और शक्ति का निवास है।
आध्यात्मिक रहस्य: शकटासुर 'जन्म-जन्मांतर के संचित कर्मों के भार' और 'जड़ता (आलस्य)' का प्रतीक है। भगवान ने अपने एक ही चरण के स्पर्श से जीव के कर्मों के भारी बोझ (छकड़े) को चकनाचूर कर दिया।
6. तृणावर्त का आक्रमण (बवंडर रूपी दैत्य)

जब पूतना और शकटासुर मारे गए, तो कंस ने एक अत्यंत भयंकर दैत्य 'तृणावर्त' को भेजा। तृणावर्त एक बवंडर (चक्रवात / आंधी) के रूप में गोकुल आया। माता यशोदा लाला को गोद में लिए बैठी थीं, अचानक लाला भारी होने लगे। माता ने उन्हें जमीन पर बैठा दिया। तभी तृणावर्त आ गया।

॥ तृणावर्त (आंधी) का आना ॥
तृणावर्त इति ख्यातो दैत्यः कंसप्रचोदितः ।
चण्डवातोतपातेन जहारासीनमर्भकम् ॥
अर्थ: कंस की प्रेरणा से भेजा गया 'तृणावर्त' नाम का वह भयंकर दैत्य, एक बहुत ही प्रचंड आंधी (बवंडर) का रूप धारण करके आया और उसने वहाँ बैठे हुए बालक (श्रीकृष्ण) को उड़ाकर (चुराकर) आकाश में ले लिया।

गोकुल में चारों ओर धूल ही धूल छा गई। दिन में ही घोर अंधकार हो गया। किसी को अपना हाथ तक सुझाई नहीं दे रहा था। माता यशोदा अपने पुत्र को न पाकर विलाप करने लगीं और मूर्छित होकर गिर पड़ीं।

7. तृणावर्त वध: आकाश में भगवान का विराट भार

दैत्य तृणावर्त जब लाला को आकाश में बहुत ऊपर ले गया, तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला आरंभ की। उन्होंने अपना भार बढ़ाना शुरू कर दिया। वे इतने भारी हो गए कि उस शक्तिशाली दैत्य के लिए उन्हें उड़ाना तो दूर, संभालना भी असंभव हो गया।

॥ भगवान का पर्वत-समान भार ॥
सोऽतिभारधरो दैत्यो गन्तुं नैवाशकत् खम् ।
तमश्मसारमर्भेकमुरसा धारयन् हरिम् ॥
अर्थ: भगवान के उस अति भारी (पर्वत के समान) वजन को धारण किए हुए वह दैत्य आकाश में और आगे नहीं उड़ सका। साक्षात श्रीहरि (श्रीकृष्ण) लोहे की चट्टान (अश्मसार) के समान भारी होकर उसकी छाती पर बैठ गए थे।

भगवान ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उस दैत्य के गले को कसकर पकड़ लिया। तृणावर्त का दम घुटने लगा। (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):

॥ तृणावर्त का पतन और मृत्यु ॥
गलाग्रहेणातिनिपीडिताक्षो
निस्पृष्टनार्यो गलबाहुरार्धः ।
विनिष्पतन्नादमहो मृतोऽपतत्
शिलातले विदीर्णमर्मोऽसृगुद्वमन् ॥
अर्थ: भगवान द्वारा गला घोंटे जाने के कारण उस दैत्य की आँखें बाहर निकल आईं, उसकी आवाज बंद हो गई और प्राण सूखने लगे। अंततः उसका मर्म-स्थान फट गया और वह आकाश से अत्यंत भयंकर गर्जना करता हुआ मृत होकर ब्रज की एक चट्टान (शिला) पर आ गिरा और उसके मुँह से रक्त बहने लगा।
आध्यात्मिक रहस्य: तृणावर्त 'रजोगुण' (चंचलता और व्यर्थ के कुतर्कों) का प्रतीक है, जो धूल उड़ाकर जीव की दृष्टि (ज्ञान) को अंधा कर देता है। भगवान ने अपने ज्ञान के भार से उस रजोगुणी चंचलता का गला घोंट कर जीव (ब्रजवासियों) को शांति प्रदान की।

जब आंधी शांत हुई और धूल छंटी, तो गोपियों ने देखा कि एक पहाड़ जैसे दैत्य के शरीर पर उनका लाला सुरक्षित और मुस्कुराता हुआ खेल रहा है। माता यशोदा ने दौड़कर अपने प्राणों से प्यारे लाला को हृदय से लगा लिया। ब्रजवासियों ने भगवान नारायण को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया और गोकुल में पुनः आनंद की बांसुरी बजने लगी।

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