नन्द भवन में आनंद का सागर उमड़ रहा था, परंतु दूसरी ओर मथुरा में दुष्ट कंस मृत्यु के भय से काँप रहा था। योगमाया की चेतावनी सुनने के बाद कंस ने अपने क्रूर मंत्रियों को आदेश दिया कि राज्य में जितने भी नवजात शिशु हैं, उन सबका वध कर दिया जाए। परब्रह्म श्रीकृष्ण के प्राकट्य के साथ ही असुरों का गोकुल में आगमन आरंभ हो गया। भगवान की बाल-लीलाएं केवल मनोरंजन नहीं हैं, अपितु जीव के जीवन से अविद्या, अहंकार और रजोगुण रूपी राक्षसों के विनाश का परम दर्शन हैं। इस अध्याय में हम पूतना, शकटासुर और तृणावर्त के संहार की अत्यंत अद्भुत और विस्तृत कथा का श्रवण करेंगे।
कंस की आज्ञा पाकर 'पूतना' नाम की अत्यंत क्रूर राक्षसी, जो आकाश में उड़ने की विद्या जानती थी और छोटे बच्चों का रक्त (खून) पीती थी, वह शिशुओं को मारती हुई गोकुल में जा पहुँची। उसने अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया।
जिघांसयाप नन्दस्य गोकुलं खेचरी खला ॥
पूतना ने ऐसा मनमोहक शृंगार किया था कि उसके जूड़े में मल्लिका के पुष्प गुंथे थे, उसकी चाल अत्यंत आकर्षक थी और उसने अपने स्तनों (छाती) पर एक अत्यंत घातक और तीव्र विष (हलाहल) लगा रखा था। गोकुलवासियों ने उसे कोई लक्ष्मी या देवी समझकर नहीं रोका। वह बेरोकटोक नन्द भवन में प्रवेश कर गई।
जब पूतना ने कमरे में प्रवेश किया, तो उसने देखा कि पलने में साक्षात मृत्यु के भी काल भगवान श्रीकृष्ण लेटे हुए हैं। भगवान ने पूतना को देखते ही अपने नेत्र (आँखें) बंद कर लिए। संतों का मत है कि भगवान ने इसलिए आँखें बंद कर लीं क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि इस झूठी और कपटी माँ के विष को देखकर उनके नेत्र लाल हों।
माता यशोदा और रोहिणी वहीं थीं, परंतु पूतना के नकली सौन्दर्य को देखकर वे ठगी सी रह गईं और उसे रोक नहीं पाईं। पूतना ने पलने से भगवान को उठाया और अपनी गोद में बैठाकर अपना विष बुझा हुआ स्तन भगवान के छोटे से मुख में दे दिया। भगवान यही तो चाहते थे!
तत्प्राणैः समं रोषसमन्वितोऽपिबत् ।
सा मुञ्च मुञ्चालमिति प्रभाषिणी
निष्पीड्यमानाखिलजीवमर्मणि ॥
पूतना पीड़ा से तड़पने लगी। उसके नेत्र बाहर निकल आए, उसके बाल खुल गए और वह पसीना-पसीना हो गई। अंततः पीड़ा सहन न कर पाने के कारण वह अपने असली, भयंकर राक्षसी रूप में आ गई और गोकुल के बाहर एक खेत में जाकर गिर पड़ी।
जब पूतना के प्राण पखेरू उड़ गए, तो उसका शरीर एक विशाल पहाड़ के समान हो गया। जब वह धरती पर गिरी, तो उसके शरीर के भार से गोकुल के बाहर के वृक्ष भी चूर-चूर हो गए।
चूर्णयामास राजेन्द्र महदासीत्तदद्भुतम् ॥
पूतना के भयंकर चीत्कार को सुनकर गोपियां और माता यशोदा भागती हुई आईं। उन्होंने देखा कि उस पहाड़ जैसी राक्षसी के विशाल शरीर (छाती) पर लाला निडर होकर खेल रहा है! गोपियों ने तुरंत लाला को उठाया। वे अत्यंत भयभीत थीं कि कहीं इस राक्षसी की छाया लाला पर न पड़ गई हो। उन्होंने भगवान की रक्षा के लिए सनातन वैदिक विधान का उपयोग किया।
रक्षां चक्रुश्च शकृता द्वादशाङ्गेषु नामभिः ॥
जब ब्रजवासियों ने पूतना के विशाल शरीर को काटकर जलाया, तो उसमें से दुर्गंध के बजाय अगरू और चंदन जैसी अत्यंत सुगंधित महक आने लगी। यह चमत्कार कैसे हुआ? क्योंकि साक्षात भगवान ने उसका दूध (विष सहित) पीकर उसके सारे पापों को नष्ट कर दिया था।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम् ॥
कुछ समय पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपने घुटनों और पेट के बल थोड़ा-थोड़ा खिसकना आरंभ किया (करवट ली), तो माता यशोदा ने 'उत्थान एकादशी' (नक्षत्र-उत्सव) का महान उत्सव रखा। नन्द भवन में बाजे बज रहे थे और ब्राह्मणों का भोज चल रहा था।
लाला को नींद आ रही थी, इसलिए माता यशोदा ने उन्हें दूध पिलाकर आंगन में खड़े एक छकड़े (बैलगाड़ी / शकट) के नीचे सुला दिया। वह कोई साधारण बैलगाड़ी नहीं थी, उसमें कंस का भेजा हुआ एक मायावी दैत्य 'शकटासुर' छिपकर बैठा था, जो लाला को कुचलने की ताक में था। लाला की नींद खुली और वे दूध के लिए रोने लगे, परंतु माता यशोदा उत्सव के कार्यों में व्यस्त होने के कारण सुन न सकीं।
प्रवालमृद्वङ्घ്രിहतं व्यवर्तत ।
विध्वस्तनानाकुप्यकुप्यभाण्डं
विपर्यस्ताक्षविभिन्नकूबरम् ॥
जब तेज धमाके की आवाज सुनकर गोपियां और नन्दबाबा दौड़े आए, तो वे उल्टे पड़े छकड़े को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ खेल रहे छोटे-छोटे बच्चों ने बताया कि "लाला रो रहा था, उसने अपने पैर से ठोकर मारी और यह छकड़ा उलट गया।"
अर्भकस्येदमिति तं न विदुः कतिचिज्जनाः ॥
जब पूतना और शकटासुर मारे गए, तो कंस ने एक अत्यंत भयंकर दैत्य 'तृणावर्त' को भेजा। तृणावर्त एक बवंडर (चक्रवात / आंधी) के रूप में गोकुल आया। माता यशोदा लाला को गोद में लिए बैठी थीं, अचानक लाला भारी होने लगे। माता ने उन्हें जमीन पर बैठा दिया। तभी तृणावर्त आ गया।
चण्डवातोतपातेन जहारासीनमर्भकम् ॥
गोकुल में चारों ओर धूल ही धूल छा गई। दिन में ही घोर अंधकार हो गया। किसी को अपना हाथ तक सुझाई नहीं दे रहा था। माता यशोदा अपने पुत्र को न पाकर विलाप करने लगीं और मूर्छित होकर गिर पड़ीं।
दैत्य तृणावर्त जब लाला को आकाश में बहुत ऊपर ले गया, तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला आरंभ की। उन्होंने अपना भार बढ़ाना शुरू कर दिया। वे इतने भारी हो गए कि उस शक्तिशाली दैत्य के लिए उन्हें उड़ाना तो दूर, संभालना भी असंभव हो गया।
तमश्मसारमर्भेकमुरसा धारयन् हरिम् ॥
भगवान ने अपने छोटे-छोटे हाथों से उस दैत्य के गले को कसकर पकड़ लिया। तृणावर्त का दम घुटने लगा। (यह बड़ा श्लोक 4 पंक्तियों में प्रस्तुत है):
निस्पृष्टनार्यो गलबाहुरार्धः ।
विनिष्पतन्नादमहो मृतोऽपतत्
शिलातले विदीर्णमर्मोऽसृगुद्वमन् ॥
जब आंधी शांत हुई और धूल छंटी, तो गोपियों ने देखा कि एक पहाड़ जैसे दैत्य के शरीर पर उनका लाला सुरक्षित और मुस्कुराता हुआ खेल रहा है। माता यशोदा ने दौड़कर अपने प्राणों से प्यारे लाला को हृदय से लगा लिया। ब्रजवासियों ने भगवान नारायण को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया और गोकुल में पुनः आनंद की बांसुरी बजने लगी।

