Shri Krishna Makhan Chori Leela: Gokul Ka Adbhut Darshan bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

गोकुल में श्रीकृष्ण की माखन चोरी लीला का अद्भुत दर्शन

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 8 और 9)

जिस परब्रह्म परमात्मा के एक रोम-कूप में अनंत ब्रह्मांड तैरते हैं, जो स्वयं लक्ष्मीपति हैं और जिनके भृकुटी विलास मात्र से सृष्टि का सृजन और संहार होता है, वे ही त्रिभुवन-पति आज गोकुल की संकरी गलियों में, ग्वालिनों के घरों में, तनिक से माखन के लिए चोरी करते फिर रहे हैं! यह कैसी अद्भुत लीला है? यह 'चोरी' नहीं, अपितु अपने भक्तों के निश्छल प्रेम को स्वीकार करने का एक दिव्य बहाना है। ब्रज की गोपियां अपने हृदय रूपी मटकी में प्रेम रूपी माखन भरकर रखती थीं, और 'चित्तचोर' कन्हैया उसी प्रेम को चुराने के लिए उनकी मटकियां फोड़ते थे। आइए, महर्षि वेदव्यास रचित मूल श्लोकों के माध्यम से इस परम मधुर 'माखन चोरी लीला' का रसास्वादन करें।

1. माखन चोरी का उद्देश्य: प्रेम की भूख

नन्द भवन में क्या दूध-दही की कमी थी? वहां तो बीस लाख गायें थीं, दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। फिर भी कन्हैया दूसरों के घरों में माखन चुराने क्यों जाते थे? क्योंकि नन्द भवन का माखन 'वात्सल्य' (माता-पिता के प्रेम) का था, और कन्हैया को 'माधुर्य' (गोपियों के प्रेम) के माखन की भूख थी।

गोपियां सुबह उठकर जब दही बिलोती थीं, तो उनका मन कन्हैया में ही लगा रहता था। वे सोचती थीं— "मेरा यह माखन कन्हैया खाए।" भगवान तो अंतर्यामी हैं, वे भक्तों की इस पुकार को सुन लेते थे और अपनी 'चोर मंडली' के साथ निकल पड़ते थे।

॥ भगवान की बाल-चपलता ॥
श्रीशुक उवाच
एवं विहारैः कौमारैः कौमारं जहतुर्व्रजे ।
निलायनैः सेतुबन्धैर्मर्कटोत्प्लवनादिभिः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— हे राजन्! इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम ब्रज में कभी लुका-छिपी खेलते, कभी पुल बांधते और कभी बंदरों की तरह उछल-कूद करते हुए अपनी कुमार अवस्था की बाल-लीलाओं का आनंद ले रहे थे।
2. चोर मंडली का गठन और चोरी की योजना

भगवान श्रीकृष्ण अकेले चोरी नहीं करते थे। उनके साथ ग्वाल-बालों की एक पूरी टोली होती थी— श्रीदामा, सुबल, मधुमंगल, स्तोककृष्ण आदि। इनकी योजना बड़ी पक्की होती थी। वे देखते थे कि कब गोपी घर के काम में व्यस्त है, कब वह पानी भरने यमुना तट पर गई है, या कब वह सो रही है।

जैसे ही मौका मिलता, यह 'वानर सेना' घर में घुस जाती। यदि माखन की मटकी नीचे रखी होती, तो कोई समस्या नहीं थी। लेकिन ब्रज की गोपियां भी चतुर थीं। वे कन्हैया के डर से माखन की मटकियों को छत से लटकते हुए ' छींके' (शिका) पर ऊँचा टांग देती थीं।

1. गोपियों द्वारा लाला की चपलता का दर्शन और उलाहना

जब श्रीकृष्ण थोड़े बड़े हुए, तो उनकी चंचलता बढ़ने लगी। वे अपने सखाओं के साथ गोपियों के घरों में घुस जाते और दूध-दही चुराने लगे। यद्यपि गोपियों को इसमें बड़ा आनंद आता था, परंतु वे इस बहाने माता यशोदा के पास कन्हैया के दर्शन करने और उनसे बातचीत करने (उलाहना देने) पहुँच जाती थीं।

॥ गोपियों का आगमन ॥
कृष्णस्य गोप्यो रुचिरं वीक्ष्य कौमारचापलम् ।
शृण्वन्त्याः किल तन्मातुरिति होचुः समागताः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— भगवान श्रीकृष्ण की अत्यंत आकर्षक और बाल-सुलभ चंचलता को देखकर ब्रज की गोपियां (उनके कारनामों की चर्चा करने के लिए) माता यशोदा के पास एकत्र होकर इस प्रकार उलाहना (शिकायत) देने लगीं।
2. चोरी के अनूठे तरीके और बछड़ों को खोलना

गोपियां मैया यशोदा को कन्हैया की करतूतें विस्तार से बताने लगीं। उनकी शिकायतें साधारण नहीं थीं, बल्कि भगवान की बुद्धिमानी और चपलता का परिचायक थीं।

॥ गोपियों की शिकायत - 1 ॥
वत्सान् मुञ्चन् क्वचिदसमये क्रोशसञ्जातहासः
स्तेयं स्वाद्वत्त्यथ दधि पयः कल्पितैः स्तेययोगैः ।
मर्कान् भोक्ष्यन् विभजति स चेन्नात्ति भाण्डं भिनत्ति
द्रव्यालाभे सगृहकुपितो यात्युपक्रोश्य तोकान् ॥
अर्थ: "हे यशोदा! तुम्हारा यह पुत्र कभी असमय (दूध दुहने से पहले) ही बछड़ों को खोल देता है, और जब हम क्रोधित होती हैं तो यह जोर से हंसने लगता है। यह नए-नए उपाय रचकर स्वादिष्ट दही और दूध चुराकर खा लेता है। स्वयं खाने के बाद यह बंदरों को बांटता है, और यदि वे नहीं खाते तो मटकी फोड़ देता है। यदि घर में कुछ नहीं मिलता, तो घर वालों पर गुस्सा होकर छोटे बच्चों को रुलाकर (चिकोटी काटकर) भाग जाता है।"
3. अंधेरे कमरे और ऊँचे छींके से चोरी का उपाय

गोपियां कहती हैं कि हम माखन को अंधेरे कमरों में और छत पर लटके हुए 'छींके' (शिका) पर रखती हैं, ताकि तेरा लाला पहुँच न सके। परंतु तेरा यह 'चोर' बड़ा ही चतुर है।

॥ गोपियों की शिकायत - 2 ॥
हस्तग्राह्ये रचयति विधिं पीठकोलूखलाद्यैः
छिद्रं ह्यन्तर्निहितवयुनः शिक्यभाण्डेषु तद्वित् ।
ध्वान्तागारे धृतमणिगणं स्वाङ्गमर्थप्रदीपं
काले गोप्यो यर्हि गृहकृत्येषु सुव्यग्रचित्ताः ॥
अर्थ: "यदि मटकी छींके पर ऊँची होती है, तो यह पीढ़ा या ओखली रखकर उस तक पहुँचने की विधि रच लेता है। यह मटकियों में छेद करना भी जानता है। अंधेरे कमरे में भी इसके शरीर पर धारण किए हुए मणियों की चमक से इसे सब दिखाई दे जाता है। यह चोरी तब करता है जब हम गोपियां घर के कामों में अत्यंत व्यस्त होती हैं।"
4. कन्हैया का भोलापन और यशोदा का वात्सल्य

चोरी करने के पश्चात भगवान अत्यंत भोले बन जाते थे। जब गोपियां यह सब बातें माता यशोदा से कह रही होती थीं, तब कन्हैया अपनी बड़ी-बड़ी, भयभीत आँखों से मैया को देखते थे।

॥ कन्हैया का अभिनय ॥
एवं धार्ष्ट्यान्युशति कुरुते मेहनादीनि वास्तौ
स्तेयोपायैर्विरचितकृतिः सुप्तमत्तः प्रगेहः ।
इत्थं स्त्रीभिः सभयनयनश्रीमुखालोकिनीभिर्
व्याख्याताघार्थप्रहसितमुखी न ह्युपालब्धुमैच्छत् ॥
अर्थ: "चोरी करने के बाद यह कभी-कभी घर के स्वच्छ स्थानों पर मल-मूत्र त्यागने की ढिठाई भी करता है।" गोपियां जब इस प्रकार शिकायत करती थीं, तब भगवान अपनी सुंदर आँखों में भय का नाटक करते हुए माता यशोदा की ओर देखते थे। उनके उस भयभीत और सुंदर मुख को देखकर माता यशोदा केवल मुस्कुरा देती थीं और उन्हें डांटना नहीं चाहती थीं।
5. माता यशोदा का संकल्प: स्वयं दधि मथना

गोपियों के नित्य उलाहने सुनकर माता यशोदा ने विचार किया कि अवश्य ही मेरे घर की दासियां माखन निकालने में कोई कमी रखती होंगी, जो मेरे लाला को बाहर का माखन अच्छा लगता है और वह चोरी करता है। इसलिए मैया ने एक दिन स्वयं ही दही मथने का निश्चय किया।

॥ माता का संकल्प ॥
श्रीशुक उवाच
एकदा गृहदासीषु यशोदा नन्दगेहिनी ।
कर्मान्तरनियुक्तासु निर्ममन्थ स्वयं दधि ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— एक दिन जब घर की सभी दासियां अन्य घरेलू कार्यों में लगी हुई थीं, तब नन्द-पत्नी माता यशोदा स्वयं ही दही मथने (बिलोने) के लिए बैठ गईं।
भक्तों का प्रेम देखिए! जो माता सारे ब्रज की महारानी है, वह अपने पुत्र को बाहर जाने से रोकने और उसे सर्वोत्तम नवनीत (माखन) खिलाने के लिए स्वयं कठोर परिश्रम कर रही है।
6. दही मथते हुए भगवान की लीलाओं का गायन

जब माता यशोदा दही बिलो रही थीं, तो उनका मन पूरी तरह से अपने प्रिय कन्हैया में ही रमा हुआ था। वे लाला की बाल-लीलाओं को स्मरण कर रही थीं।

॥ लीला गान ॥
यानि यानीह गीतानि तद्बालचरितानि च ।
दधिनिर्मन्थने काले स्मरन्ती तान्यगायत ॥
अर्थ: दही मथते समय माता यशोदा अपने प्रिय लाला श्रीकृष्ण की उन सभी बाल-लीलाओं (पूतना वध, शकटासुर भंजन, उलाहने आदि) का स्मरण करने लगीं, और स्मरण करते-करते उन्हें मधुर गीतों के रूप में गाने लगीं।
7. लाला का जागना और मथानी को पकड़ लेना

मैया को गीत गाते सुन लाला की नींद खुल गई। उन्हें बहुत जोर की भूख लगी थी। वे दौड़ते हुए अपनी मैया के पास आए।

॥ मथानी को रोकना ॥
तं स्तन्यकाम आसाद्य मथ्नन्तीं जननीं हरिः ।
गृहीत्वा दधिमन्थानं न्यषेधत् प्रीतिमावहन् ॥
अर्थ: उसी समय भगवान श्रीहरि (कन्हैया) को भूख लगी। वे माता यशोदा के पास आए और उनका प्रेम बढ़ाते हुए (मचलते हुए) उन्होंने दही मथने वाली मथानी (रई) को पकड़ लिया और मैया को दही मथने से रोक दिया।
8. चूल्हे पर दूध का उफान और भगवान का क्रोध

मैया ने लाला को अपनी गोद में बैठा लिया और अपना स्नेह-स्रावित दूध पिलाने लगीं। परंतु तभी एक विघ्न आ गया। पास ही चूल्हे पर दूध उबलने के लिए रखा था।

॥ दूध का उबलना ॥
तमङ्कमारूढमपाययत्स्तनं
स्नेहस्नुतं सस्मितमीक्षती मुखम् ।
अतृप्तमुत्सृज्य जवेन सा ययौ
उत्सिच्यमाने पयसि त्वधिश्रिते ॥
अर्थ: मैया ने लाला को अपनी गोद में बैठा लिया और मुस्कुराते हुए उनका मुख निहारते हुए दूध पिलाने लगीं। तभी चूल्हे पर रखे हुए दूध में उफान आ गया। यह देखकर मैया लाला को अतृप्त (भूखा) ही छोड़कर अत्यंत शीघ्रता से दूध उतारने चली गईं।

परब्रह्म को यह बिलकुल सहन नहीं हुआ कि उनके होते हुए मैया किसी और (दूध) की ओर ध्यान दे। पेट न भरने के कारण लाला को बहुत भयंकर (और अत्यंत प्यारा) क्रोध आ गया।

9. घर की मटकी फोड़ना और एकांत में माखन खाना

जब मैया दूध उतारने गईं, तो क्रोधित कन्हैया ने घर में ही माखन चोरी की लीला आरंभ कर दी।

॥ मटकी फोड़ना ॥
सञ्जातकोपः स्फुरितारुणाधरं
सन्दश्य दद्भिर्दधिमन्थभाजनम् ।
भित्त्वा मृषाश्रुर्द्दषदश्मना रहो
जघास हैयङ्गवमन्तरं गतः ॥
अर्थ: पेट न भरने के कारण भगवान को क्रोध आ गया। उनके लाल-लाल होंठ फड़कने लगे। उन्होंने अपने दांतों से होंठों को दबाया और पास ही पड़े हुए एक पत्थर (लोढ़े) से दही मथने की मटकी को फोड़ दिया। फिर वे झूठे आँसू बहाते हुए एक एकांत कमरे में चले गए और वहां रखा हुआ ताज़ा माखन खाने लगे।
10. बंदरों को माखन खिलाते हुए रंगे हाथों पकड़े जाना

जब मैया दूध उतारकर लौटीं, तो देखा मटकी फूटी हुई है और दही फैला हुआ है। वे समझ गईं कि यह मेरे लाला की ही करतूत है। मैया छड़ी लेकर लाला को ढूंढने निकलीं।

॥ रंगे हाथों पकड़े जाना ॥
उलूखलाङ्घ्रेरुपरि व्यवस्थितं
मर्काय कामं ददतं शिचि स्थितम् ।
हैयङ्गवं चौर्यविशङ्कितेक्षणं
पश्चात्प्रपश्यन्त्युपलेभ आगता ॥
अर्थ: मैया ने भीतर जाकर देखा कि कन्हैया उल्टी रखी हुई ओखली के ऊपर खड़े हैं और छींके से माखन निकालकर पेट भरकर बंदरों को खिला रहे हैं। उनकी दृष्टि चोरी पकड़े जाने की आशंका से भयभीत होकर इधर-उधर देख रही थी। पीछे से आती हुई मैया ने इस अद्भुत दृश्य को देखा। (यहीं से 'दामोदर लीला' का आरम्भ होता है)।
माखन चोरी का आध्यात्मिक रहस्य: 'माखन' सार तत्व का प्रतीक है। दूध का सार दही है, और दही का सार नवनीत (माखन) है। इसी प्रकार, जीवन का सार 'भक्ति' और 'प्रेम' है। भगवान श्रीकृष्ण इस संसार की नश्वर वस्तुओं के भूखे नहीं हैं, वे तो केवल भक्त के हृदय में छिपे हुए उस निष्काम प्रेम रूपी माखन के भूखे हैं। जब वे मटकी फोड़ते हैं, तो वे हमारे 'अहंकार' (Ego) की मटकी को फोड़ते हैं। जब तक अहंकार का पात्र नहीं टूटता, तब तक ईश्वर के लिए प्रेम का माखन बाहर नहीं आता।

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