महारास के आरम्भ में जब गोपियों के हृदय में अपने सौभाग्य का सूक्ष्म अहंकार (मान) जाग्रत हुआ, तो उसे नष्ट करने के लिए परब्रह्म श्रीकृष्ण अचानक अन्तर्धान (अदृश्य) हो गए। कन्हैया को वन में वृक्षों और लताओं से पूछती हुई जब गोपियां थक गईं, तो वे पुनः यमुना जी के रेतीले तट पर लौट आईं। अपने प्राण-प्यारे के वियोग में तड़पती हुई उन गोपियों ने फूट-फूट कर रोते हुए एक साथ मिलकर जो करुण स्तुति गाई, उसे ही भागवत महापुराण में 'गोपीगीत' कहा जाता है। आइए, इन 19 श्लोकों वाले गोपीगीत के 10 अत्यंत प्रसिद्ध और हृदय-विदारक मूल श्लोकों का रसपान करें।
1. भगवान के जन्म से ब्रज की महिमा
गोपियां रोते हुए कहती हैं कि हे कन्हैया! तुम्हारे जन्म के कारण ही वैकुण्ठ की लक्ष्मी जी भी ब्रज में आकर बस गई हैं, परंतु तुम हमें छोड़कर कहाँ चले गए?
॥ गोपीगीत: श्लोक 1 ॥
गोप्य ऊचुः -
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः
श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्
त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥
अर्थ: गोपियों ने कहा— "हे प्यारे! तुम्हारे जन्म लेने से इस ब्रजभूमि की महिमा वैकुण्ठ से भी अधिक बढ़ गई है, इसी कारण स्वयं लक्ष्मी जी (इन्दिरा) भी यहाँ निरंतर निवास करने लगी हैं। परंतु हे प्रियतम! देखो, तुम्हारे ही लिए प्राण धारण करने वाली तुम्हारी ये दासियां तुम्हें दिशा-दिशा में ढूँढ रही हैं, तुम दर्शन दो।"
2. नेत्रों के बाण से घायल करना
गोपियां उलाहना देती हैं कि तुमने हमें अपनी तिरछी नजरों से तो मार ही डाला है, अब इस विरह से क्यों तड़पा रहे हो?
॥ गोपीगीत: श्लोक 2 ॥
शरदुदाशये साधुजातसत्-
सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा ।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका
वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥
अर्थ: "हे प्रेम के स्वामी! शरद् ऋतु के जलाशय में खिले हुए सुंदर कमल के भीतरी भाग के सौंदर्य को भी चुराने वाली अपनी तिरछी दृष्टि (चितवन) से तुम हमें घायल कर चुके हो। हे वरदाता! हम तो बिना मोल की (अशुल्क) तुम्हारी दासियां हैं, क्या इस विरह की अग्नि से हमें मारना 'वध' (हत्या) नहीं है?"
3. पूर्व संकटों से रक्षा का स्मरण
वे भगवान को याद दिलाती हैं कि पहले भी तो तुमने हमें बड़े-बड़े संकटों से बचाया है।
॥ गोपीगीत: श्लोक 3 ॥
विषजलाप्ययाद् व्यालराक्षसाद्
वर्षमारुताद् वैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद् विश्वतोभयाद्
ऋषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥
अर्थ: "हे पुरुषश्रेष्ठ! यमुना जी के विषैले जल से, अजगर रूपी अघासुर से, इन्द्र की भयंकर वर्षा और आँधी से, दावाग्नि से, वृषभासुर से और मय दानव के पुत्र व्योमासुर आदि भयंकर संकटों से तुमने ही बार-बार हमारी रक्षा की है।"
4. श्रीकृष्ण के परब्रह्म स्वरूप की पहचान
इस विरह में गोपियों का अज्ञान मिट गया है। वे जान गई हैं कि कन्हैया कोई साधारण गोप-पुत्र नहीं हैं।
॥ गोपीगीत: श्लोक 4 ॥
न खलु गोपिकानन्दनो भवान्
अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये
सख उदेयिवान् सात्वतां कुले ॥
अर्थ: "हे सखा! तुम केवल माता यशोदा (गोपिका) के ही पुत्र नहीं हो, बल्कि तुम तो सम्पूर्ण शरीरधारियों के 'अंतर्यामी' साक्षी हो। ब्रह्मा जी (विखनस) की प्रार्थना पर विश्व की रक्षा के लिए तुमने यदुवंश में अवतार लिया है।"
5. अभय देने वाले चरण-कमल
गोपियां प्रार्थना करती हैं कि अपने वे परम शीतल चरण हमारे मस्तक पर रख दो।
॥ गोपीगीत: श्लोक 6 ॥
व्रजजनार्तिहन् वीर योषितां
निजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो
जलरुहाननं चारु दर्शय ॥
अर्थ: "हे ब्रजवासियों के दुःख दूर करने वाले! हे वीर! तुम्हारी मंद-मंद मुस्कान तुम्हारे निजजनों (भक्तों) का अहंकार (स्मय) नष्ट कर देती है। हे सखा! हम तुम्हारी दासियां (किंकरी) हैं, हमें स्वीकार करो और अपना वह परम सुंदर मुख-कमल हमें दिखाओ।"
6. 'कथामृत' की अद्भुत महिमा (सबसे प्रसिद्ध श्लोक)
गोपीगीत का यह 9वाँ श्लोक सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत का प्राण माना जाता है। गोपियां कहती हैं कि तुम्हारे बिना जीवित रहने का एकमात्र सहारा अब केवल तुम्हारी 'कथा' ही है।
॥ गोपीगीत: श्लोक 9 ॥
तव कथामृतं तप्तजीवनं
कविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं
भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥
अर्थ: "हे प्रभो! तुम्हारी लीला-कथारूपी अमृत, विरह की आग में जलते हुए (तप्त) जीवों के लिए परम जीवन है। ज्ञानी भक्त इसका गान करते हैं। यह सारे पापों को नष्ट करने वाली है। इसका श्रवण करना ही परम मंगल है, यह परम कल्याणमयी है। पृथ्वी पर जो लोग तुम्हारी इस कथा का गान करते हैं, वे सबसे बड़े दानी (भूरिदा जनाः) हैं।"
आध्यात्मिक रहस्य: अन्न या धन का दान तो कुछ समय की भूख या दरिद्रता मिटाता है, परंतु जो संतों के माध्यम से भगवान की 'कथा' का दान करते हैं, वे जीव के जन्म-मरण की दरिद्रता को हमेशा के लिए मिटा देते हैं। इसलिए कथा-सुधा पिलाने वाले ही संसार के सबसे बड़े दानी हैं।
7. मिलन की स्मृतियां और अधरामृत की याचना
गोपियां भगवान की उस मधुर वंशी-ध्वनि को याद करके कहती हैं:
॥ गोपीगीत: श्लोक 14 ॥
सुरतवर्धनं शोकनाशनं
स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मरणं नृणां
वितर वीर नस्तेऽधरामृतम् ॥
अर्थ: "हे वीर! तुम्हारा वह अधरामृत (होंठों का रस/वंशी का नाद), जो प्रेम को बढ़ाने वाला है, समस्त शोकों को नष्ट करने वाला है, जिसे तुम्हारी बांसुरी भी चूमती रहती है, और जो सांसारिक विषयों की आसक्ति (इतर राग) को भुला देता है— वह हमें पिलाओ।"
8. विरह में एक क्षण भी युग के समान
जब कन्हैया दिन में गाय चराने जाते हैं, तब भी गोपियों का क्या हाल होता है?
॥ गोपीगीत: श्लोक 15 ॥
अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते
जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम् ॥
अर्थ: "हे प्रिय! जब तुम दिन में गायें चराने वन (कानन) में चले जाते हो, तो तुम्हें देखे बिना हमारा आधा क्षण (त्रुटि) भी एक युग के समान बीतता है। और जब तुम शाम को लौटते हो और हम तुम्हारे मुख का दर्शन करती हैं, तो हमारी पलकें गिराने वाले उस विधाता (ब्रह्मा) को हम जड़ (मूर्ख) मानती हैं।"
9. कोमल चरणों की चिंता (अंतिम श्लोक)
गोपीगीत के इस अंतिम (19वें) श्लोक में गोपियों के प्रेम की पराकाष्ठा है। उन्हें अब अपने विरह की चिंता नहीं है, बल्कि भगवान के कोमल चरणों की चिंता सता रही है कि कहीं उन चरणों में कंकड़-पत्थर न चुभ जाएं।
॥ गोपीगीत: श्लोक 19 ॥
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः ॥
अर्थ: "हे प्रियतम! तुम्हारे जो चरण-कमल इतने सुकुमार (कोमल) हैं कि उन्हें हम अपने कठोर वक्षस्थलों पर भी डरते-डरते धीरे से रखती हैं, उन्हीं कोमल चरणों से तुम इस रात्रि में भयानक जंगल में भटक रहे हो। क्या तुम्हारे उन चरणों में कंकड़-पत्थर नहीं चुभ रहे होंगे? यह सोच-सोचकर हमारा हृदय फटा जा रहा है, क्योंकि तुम ही हमारे एकमात्र जीवन हो।"
श्री शुकदेव जी कहते हैं कि इस प्रकार अपने प्राण-प्यारे कन्हैया के गुणों का गान करते-करते और उनके दर्शन की लालसा में अत्यंत व्याकुल होकर, सभी गोपियां ऊँचे स्वर में फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका वह रुदन इतना करुण था कि उसे सुनकर साक्षात भगवान को द्रवित होकर उनके बीच पुनः प्रकट होना ही पड़ा।