महारास का आरम्भ, भगवान अन्तर्धान और गोपियों की व्याकुलता | Krishna Antardhan Aur Gopi Viyog, Maharasa Leela Bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

महारास का आरम्भ, भगवान का अन्तर्धान और गोपियों की व्याकुलता

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 29 और 30)

श्रीमद्भागवत का 'रास पंचाध्यायी' (अध्याय 29 से 33) वह परम गुह्य और विशुद्ध प्रेमामृत है, जहाँ काम (Desire) पर निष्काम प्रेम (Divine Love) की विजय का दर्शन होता है। चीर हरण के समय भगवान ने गोपियों को वरदान दिया था कि वे शरद् ऋतु की रात्रियों में उनके साथ रास-विहार करेंगे। जब वह बहुप्रतीक्षित शरद् पूर्णिमा की रात्रि आई, तो परब्रह्म ने अपनी योगमाया का आश्रय लेकर वह बाँसुरी बजाई, जिसे सुनकर गोपियों ने अपने लोक-वेद की सारी मर्यादाएं छोड़ दीं। आइए, महर्षि वेदव्यास रचित 15 प्रामाणिक मूल श्लोकों के माध्यम से इस महारास के आरम्भ और गोपियों के विरह का दर्शन करें।

1. शरद् पूर्णिमा की रात्रि और भगवान का संकल्प

जब शरद् ऋतु में मल्लिका (चमेली) के फूल खिले और पूर्णिमा का लाल चंद्रमा उदित हुआ, तब भगवान ने अपना वह पुराना वचन पूर्ण करने का निश्चय किया।

॥ रासलीला का संकल्प ॥
श्रीबादरायणिरुवाच -
भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (10.29.1)
अर्थ: श्री शुकदेव जी (बादरायणि) कहते हैं— जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि शरद् ऋतु की वे सुंदर रात्रियां आ गई हैं जिनमें मल्लिका के फूल खिले हुए हैं, तब उन्होंने अपनी 'योगमाया' का आश्रय लेकर (गोपियों के साथ) रमण (विहार) करने का मन किया।
2. काम-वर्धिनी वंशी-ध्वनि और गोपियों का दौड़ना

वृन्दावन के उस एकांत वन में भगवान ने अपनी वंशी (बाँसुरी) से वह राग छेड़ा जो गोपियों के हृदय में छिपे हुए भगवान के प्रति उनके प्रेम (काम) को जगाने वाला था।

॥ वंशी का नाद ॥
निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं
व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः ।
आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः
स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः ॥ (10.29.3)
अर्थ: प्रेम को बढ़ाने वाले उस वंशी-गीत को सुनकर, ब्रज की वे गोपियां (जिनका मन श्रीकृष्ण ने पहले ही चुरा लिया था) बिना एक-दूसरे को बताए अत्यंत वेग से उसी ओर दौड़ीं जहाँ उनके प्रियतम श्रीकृष्ण थे। उस समय उनके कानों के कुंडल अत्यंत वेग से हिल रहे थे।
3. सभी कार्यों का त्याग और लोक-मर्यादा का भंजन

गोपियों की व्याकुलता इतनी तीव्र थी कि जो जिस अवस्था में थी, वह उसी अवस्था में सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ी।

॥ कार्यों का त्याग - 1 ॥
दुहन्त्योऽभिययुः काश्चिद्दोहं हित्वा समुत्सुकाः ।
पयोऽधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यापरा ययुः ॥ (10.29.4)
अर्थ: जो गोपियां गायें दुह रही थीं, वे अत्यंत उत्सुक होकर दूध दुहना बीच में ही छोड़कर दौड़ पड़ीं। कुछ गोपियां चूल्हे पर उबलता हुआ दूध छोड़कर, और कुछ पकाई जा रही लपसी (संयाव) को बिना उतारे ही भाग खड़ी हुईं।

यहाँ तक कि उन्हें अपने शृंगार और वस्त्रों का भी भान नहीं रहा।

॥ कार्यों का त्याग - 2 ॥
लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अञ्जन्त्यः काश्च लोचने ।
व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्चित्कृष्णान्तिकं ययुः ॥ (10.29.6)
अर्थ: कुछ गोपियां जो उबटन लगा रही थीं, कुछ जो स्नान कर रही थीं, और कुछ जो आँखों में काजल लगा रही थीं, वे उल्टे-सीधे वस्त्र और आभूषण पहनकर ही श्रीकृष्ण के पास पहुँच गईं।
4. जो गोपियां घर में बंध गईं, उनका परम उद्धार

कुछ गोपियों को उनके पतियों और घरवालों ने कमरों में बंद कर दिया। वे शरीर से वृन्दावन नहीं जा सकीं, परंतु उनकी आत्मा ने ध्यान-योग से परम गति प्राप्त कर ली।

॥ ध्यान द्वारा मिलन ॥
अन्तर्गृहगताः काश्चिद्गोप्योऽलब्धनिर्गमाः ।
कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्युर्मीलितलोचनाः ॥ (10.29.9)
अर्थ: जो गोपियां घरों के भीतर ही रह गईं और बाहर निकलने का कोई मार्ग न पा सकीं, उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिए और भगवान श्रीकृष्ण की तन्मय भावना (ध्यान) में डूबकर उनका स्मरण करने लगीं।

उस तीव्र ध्यान में उन्हें जो विरह-ताप हुआ, उसने उनके सारे पाप नष्ट कर दिए, और भगवान के ध्यान के सुख ने उनके सारे पुण्य क्षीण कर दिए।

॥ पाप-पुण्य का नाश ॥
दुःसहप्रेष्ठविरहतीव्रतापधुताशुभाः ।
ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः ॥ (10.29.10)
अर्थ: अपने परम प्रियतम श्रीकृष्ण के दुःसह विरह के तीव्र ताप (पीड़ा) से उनके सारे पाप (अशुभ) जलकर भस्म हो गए, और ध्यान में ही भगवान का आलिंगन प्राप्त करने के परमानंद से उनके सारे पुण्य (मंगल) भी क्षीण हो गए (वे कर्म-बंधन से मुक्त हो गईं)।
॥ सायुज्य मुक्ति ॥
तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः ।
जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः ॥ (10.29.11)
अर्थ: यद्यपि वे उन परमात्मा (श्रीकृष्ण) से जार-बुद्धि (प्रेमी/उपपति) के भाव से ही जुड़ी थीं, फिर भी उनके सारे कर्म-बंधन तुरंत नष्ट हो गए और उन्होंने अपना वह प्राकृत (गुणमयी) शरीर त्यागकर परम गति प्राप्त कर ली।
5. भगवान द्वारा परीक्षा: "हे गोपियों! घर लौट जाओ"

जब अन्य सभी गोपियां वन में आ गईं, तो भगवान ने उनके प्रेम की परीक्षा लेने के लिए अत्यंत कठोर और धर्मानुकूल वचन कहे।

॥ भगवान का स्वागत और प्रश्न ॥
स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः ।
व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम् ॥ (10.29.18)
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे महाभाग गोपियों! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारी क्या प्रिय सेवा करूँ? कहो, ब्रज में सब कुशल-मंगल तो है? तुम लोग इतनी रात को यहाँ इस वन में क्यों आई हो?"

भगवान ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा कि स्त्रियों का वास्तविक धर्म पति की सेवा ही है।

॥ स्त्रियों का परम धर्म ॥
भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मो ह्यमायया ।
तद्बन्धूनां कल्याण्यः प्रजानां चानुपोषणम् ॥ (10.29.24)
अर्थ: "हे कल्याणकारी देवियों! स्त्रियों का सबसे परम धर्म यही है कि वे निष्कपट भाव से अपने पति की सेवा करें, पति के बंधु-बांधवों का सत्कार करें और अपनी संतान का पालन-पोषण करें।"
6. गोपियों की विरह-वेदना और पूर्ण समर्पण

कन्हैया के ये निष्ठुर वचन सुनकर गोपियों का हृदय टूट गया। वे रोने लगीं। उन्होंने भगवान से वह बात कही जो शरणागति का सर्वोच्च श्लोक माना जाता है:

॥ गोपियों का रुदन ॥
मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं
सन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम् ।
भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्
देवो यथादिपुरुषो भजते मुमुक्षून् ॥ (10.29.31)
अर्थ: गोपियों ने कहा— "हे विभो! हे स्वतंत्र! आपको ऐसे निष्ठुर (कठोर) वचन नहीं कहने चाहिए। हम सभी सांसारिक विषयों को छोड़कर केवल आपके चरणों में आ गिरी हैं। आप हम भक्ताओं को स्वीकार कीजिए, हमें मत त्यागिये, जैसे आदिपुरुष नारायण मुमुक्षुओं को स्वीकार करते हैं।"
7. रास का आरम्भ, गोपियों का 'मान' और भगवान का अन्तर्धान

गोपियों का यह विशुद्ध प्रेम देखकर भगवान मुस्कुराए और उन्होंने यमुना तट पर रास-विहार आरम्भ किया। परंतु जब परब्रह्म उनके इतने निकट आ गए, तो गोपियों के मन में एक सूक्ष्म 'अहंकार' आ गया कि "हम संसार की सबसे सौभाग्यशालिनी स्त्रियां हैं।" भगवान तो अहंकार-हारी हैं, वे तुरंत अन्तर्धान हो गए।

॥ भगवान का लुप्त होना ॥
तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः ।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥ (10.29.48)
अर्थ: उन गोपियों के उस सौभाग्य के मद (गर्व) और मान (अहंकार) को देखकर, उनके उस मान को शांत करने के लिए और उन पर परम कृपा करने के लिए, भगवान केशव उसी स्थान पर अचानक अन्तर्धान (अदृश्य) हो गए।
8. गोपियों की विरह-व्याकुलता और वन में खोजना

जैसे ही भगवान अदृश्य हुए, गोपियों के पैरों तले से जमीन खिसक गई। (यहाँ से 30वां अध्याय आरम्भ होता है)।

॥ गोपियों का उन्माद ॥
अन्तर्हिते भगवति सहसैव व्रजाङ्गनाः ।
अतप्यंस्तमचक्षाणाः करिण्य इव यूथपम् ॥ (10.30.1)
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण के अचानक अन्तर्धान हो जाने पर, उन्हें न देख पाने के कारण ब्रज की गोपियां उसी प्रकार अत्यंत संताप (पीड़ा) करने लगीं, जैसे अपने झुंड के स्वामी (गजराज) के बिछड़ जाने पर हथिनियां व्याकुल हो जाती हैं।
9. गोपियों द्वारा भगवान की लीलाओं का अनुकरण

जब कन्हैया कहीं नहीं मिले, तो गोपियां प्रेम के उन्माद में स्वयं को ही 'कृष्ण' मान बैठीं और उनकी बाल-लीलाओं की नकल करने लगीं।

॥ लीला-अनुकरण ॥
गत्यनुरागस्मितविभ्रमेक्षितैर्-
मनोरमालापविहारविभ्रमैः ।
आक्षिप्तचित्ताः प्रमदा रमापतेस्-
तास्ताश्चेष्टा जगृहुस्तदात्मिकाः ॥ (10.30.2)
अर्थ: रमापति भगवान श्रीकृष्ण की चाल, प्रेम, मुस्कान, चितवन, मनोहर बातचीत और लीला-विलास ने उन गोपियों का चित्त पूरी तरह चुरा लिया था। भगवान में तन्मय (तदात्मिका) होकर वे स्त्रियां भगवान की उन्हीं चेष्टाओं का अनुकरण (Acting) करने लगीं।
10. जड़-चेतन से पूछना और गोपी-गीत की भूमिका

पागलों की तरह वे वन के पेड़ों और लताओं से पूछने लगीं कि "क्या तुमने हमारे श्यामसुन्दर को देखा है?"

॥ पेड़ों से पूछना ॥
गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता
विचिक्युरुन्मत्तकवद्वनानिव ।
पप्रच्छुराकाशवदन्तरं बहिर्-
भूतेषु सन्तं पुरुषं वनस्पतीन् ॥ (10.30.4)
अर्थ: वे सब एक साथ मिलकर ऊँचे स्वर में भगवान के गुणों का गान करती हुई पागलों की तरह वनों में उन्हें खोजने लगीं। जो परम पुरुष आकाश की भाँति सभी प्राणियों के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसे वे पेड़ों-पौधों (वनस्पतियों) से पूछने लगीं।
॥ वृक्षों से सविनय प्रार्थना ॥
चूतप्रियालपनसासनकोविदार
जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाम्ब्रकदम्बनीपाः ।
येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः
शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥ (10.30.9)
अर्थ: गोपियों ने कहा— "हे आम, प्रियाल, कटहल, असन, कोविदार, जामुन, मदार, बेल, बकुल, कदम्ब और नीप के वृक्षों! तुम सब दूसरों के परोपकार के लिए ही यमुना तट पर जीवित हो। हमारे प्राण श्रीकृष्ण ने हर लिए हैं, कृपया हमें उनका मार्ग (पता) बता दो।"
इस प्रकार वन में भटकते हुए जब उन्हें कन्हैया के चरण-चिह्न दिखाई दिए, और फिर वे चिह्न भी लुप्त हो गए, तो गोपियां यमुना के रेतीले तट पर लौट आईं। वहीं बैठकर उन्होंने फूट-फूट कर रोते हुए वह विश्व-प्रसिद्ध 'गोपी-गीत' गाया, जिसे सुनकर परब्रह्म परमात्मा को पुनः प्रकट होना ही पड़ा।

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