श्रीकृष्ण का पुनः प्राकट्य, महारास की पूर्णता और युगलगीत | Maharasa Leela Purnata Aur Yugal Geet bhagwat

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्रीकृष्ण का पुनः प्राकट्य, महारास की पूर्णता और युगलगीत

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 32, 33 और 35)

गोपियों का रुदन सुनकर यमुना तट की रेत भी पिघलने लगी थी। "तव कथामृतं तप्तजीवनं..." गाते-गाते वे लगभग अचेत हो चुकी थीं। उनका सारा 'मान' (अहंकार) अब आंसुओं में बह चुका था। वे भगवान को अपना 'स्वामी' नहीं, अपितु अपना 'सर्वस्व' मान चुकी थीं। और जहाँ जीव का पूर्ण समर्पण होता है, वहाँ परमात्मा को विवश होकर आना ही पड़ता है। श्री शुकदेव जी के श्रीमुख से उच्चारित दशम स्कंध के 32वें अध्याय में भगवान का वह अत्यंत मनमोहक पुनः प्राकट्य होता है, जो महारास के उस दिव्य ताण्डव को जन्म देता है, जिसे देखकर देवता भी स्वर्ग से पुष्प-वर्षा करने लगते हैं।

1. भगवान श्रीकृष्ण का मुस्कुराते हुए पुनः प्राकट्य

जब गोपियां फूट-फूट कर रो रही थीं, तब साक्षात कामदेव के भी कामदेव (मन्मथ-मन्मथ) भगवान श्रीकृष्ण उनके बीच प्रकट हुए। उनके मुख पर वही परम मधुर मुस्कान थी, जिसने गोपियों के प्राण वापस ला दिए।

॥ भगवान का प्राकट्य ॥
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः ।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥
अर्थ: श्री शुकदेव जी कहते हैं— उन रोती हुई गोपियों के बीच भगवान शौरि (श्रीकृष्ण) अचानक प्रकट हो गए। उनके मुख-कमल पर मधुर मुस्कान थी, वे पीताम्बर धारण किए हुए थे, गले में वनमाला थी और वे साक्षात कामदेव के भी मन को मथने वाले (मन्मथमन्मथ) लग रहे थे।

कन्हैया को अपने सामने देखकर गोपियों की क्या दशा हुई? महर्षि वेदव्यास जी इसका अत्यंत सटीक और भावपूर्ण वर्णन करते हैं:

॥ शरीर में प्राण का लौटना ॥
तं विलोक्यागतं प्रेष्ठं प्रीत्युत्फुल्लदृशोऽबलाः ।
उत्तस्थुर्युगपत् सर्वास्तन्वः प्राणमिवागतम् ॥
अर्थ: अपने परम प्रियतम श्रीकृष्ण को आया हुआ देखकर उन सभी अबलाओं (गोपियों) के नेत्र प्रेम से खिल उठे। वे सभी एक साथ उठ खड़ी हुईं, मानो मृतक शरीर (तन्व) में फिर से प्राण लौट आए हों।
2. गोपियों द्वारा अपने ओढ़नी का आसन बिछाना

गोपियां कन्हैया को घेरकर बैठ गईं। उन्होंने अपनी ओढ़नी (ऊपरी वस्त्र), जिस पर उनके स्तनों का कुमकुम लगा था, उसे उतारकर बालकृष्ण के लिए आसन बना दिया। उन गोपियों के बीच बैठे हुए भगवान ऐसे चमक रहे थे, मानो सोने की मणियों के बीच नीलमणि जड़ी हो।

॥ गोपियों के मध्य सुशोभित भगवान ॥
तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् देवकीसुतः ।
मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥
अर्थ: उस गोपीमण्डल के बीच बैठे हुए देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे सोने की मणियों (हैमानां) के बीच में कोई विशाल और चमकदार नीलमणि (महामरकत) जड़ी हुई हो।
3. भगवान का परम रहस्यमयी उत्तर (ऋण स्वीकारना)

गोपियों ने उलाहना दिया कि "प्रभो! आप हमें छोड़कर क्यों चले गए थे?" तब भगवान ने सम्पूर्ण भागवत का वह परम रहस्यमयी श्लोक कहा, जिसमें स्वयं परब्रह्म एक भक्त के सामने अपनी हार (ऋण) स्वीकार करते हैं।

॥ भगवान की हार (ऋण-स्वीकृति) ॥
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां
स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः ।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः
संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥
अर्थ: भगवान ने कहा— "हे गोपियों! तुमने मेरे लिए घर-परिवार की उन बेड़ियों (शृंखला) को तोड़ दिया है, जिन्हें तोड़ना अत्यंत कठिन है। तुमने मुझसे जो निष्कपट और पूर्ण प्रेम किया है, उसका ऋण मैं देवताओं की आयु (विबुधायुष) प्राप्त करके भी नहीं चुका सकता। मैं तुम्हारा सदैव ऋणी ही रहूँगा। तुम अपने इस प्रेम के स्वभाव से ही पूर्ण (सफल) हो जाओ।"
4. महारास का अद्भुत मण्डल (आरम्भ)

भगवान के इन वचनों से गोपियों का सारा संताप दूर हो गया। तब यमुना जी के उसी पुलिन (तट) पर उस महान 'रासलीला' का आरम्भ हुआ। भगवान ने अपनी योगमाया से उतने ही रूप धारण कर लिए, जितनी गोपियां थीं।

॥ महारास मण्डल की रचना ॥
रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः ।
योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः ॥
अर्थ: गोपियों के मण्डल (गोलाकार समूह) से सुशोभित वह 'रासोत्सव' आरम्भ हुआ। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा चमत्कार किया कि प्रत्येक दो गोपियों के बीच में एक-एक कृष्ण प्रकट हो गए। (हर गोपी को लग रहा था कि कन्हैया केवल मेरे ही साथ हैं)।
5. महारास का दिव्य नृत्य और देवताओं का आश्चर्य

जब परब्रह्म ने गोपियों के साथ नृत्य आरम्भ किया, तो घुंघरुओं और कँगनों की झनकार से पूरा वृन्दावन गूँज उठा। श्री शुकदेव जी उस नृत्य की गति का अत्यंत सुंदर वर्णन करते हैं:

॥ महारास का नृत्य ॥
पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्भ्रूविलासैर्
भज्यन्मध्यैश्चलकुचपटैः कुण्डलैर्गण्डलोलैः ।
स्विद्यन्मुख्यः कबररशनाग्रन्थयः कृष्णवध्वो
गायन्त्यस्तं तडित इव ता मेघचक्रे विरेजुः ॥
अर्थ: चरणों के ताल-युक्त संचालन, भुजाओं के हिलाने, मुस्कुराहट, भौहों के विलास, कमर के लचकने, वस्त्रों के उड़ने और गालों पर झूलते कुंडलों से वे गोपियां नृत्य कर रही थीं। उनके मुख पर पसीने की बूँदें थीं और बालों के गजरे खुल रहे थे। श्रीकृष्ण के साथ नाचती-गाती वे गोपियां ऐसी लग रही थीं, मानो बादलों के मण्डल (मेघचक्र) में बिजलियां (तड़ित) चमक रही हों।

रास करते-करते जब गोपियां थक गईं, तो परम करुणामय भगवान ने अपने ही हाथों से उनका पसीना पोंछा।

॥ भगवान की सेवा ॥
तासां रतिविहारेण श्रान्तानां वदनानि सः ।
प्रामृजत् करपद्मेन शन्तमेन शिवेन ह ॥
अर्थ: रास-विहार के उस अत्यंत आनंद में जब गोपियां थक (श्रान्त) गईं, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी और अत्यंत सुख देने वाले कर-कमलों (हाथों) से उन गोपियों के मुख का पसीना स्वयं पोंछा।
रासलीला का फलश्रुति (महान रहस्य): जो लोग रासलीला को सांसारिक दृष्टि से देखते हैं, वे इसका मर्म नहीं जानते। श्री शुकदेव जी 33वें अध्याय के अंतिम श्लोक में स्पष्ट कहते हैं:
॥ काम-विजयी फलश्रुति ॥
विक्रीडितं व्रजवधूभिरिदं च विष्णोः
श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः ।
भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं
हृद्रोगमाश्वपहिणोत्यचिरेण धीरः ॥
अर्थ: जो भी धीर मनुष्य ब्रजवधुओं (गोपियों) के साथ भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) की इस रास-क्रीड़ा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है या वर्णन करता है, वह भगवान की 'पराभक्ति' को प्राप्त कर लेता है और उसके हृदय से 'काम' (वासना) रूपी भयंकर हृदय-रोग शीघ्र ही सदा के लिए नष्ट हो जाता है।
6. युगलगीत: दिन में भी कन्हैया का स्मरण (अध्याय 35)

रात के समय महारास होता था, परंतु दिन में जब कन्हैया गाय चराने वन में चले जाते थे, तो गोपियां घर में बैठे-बैठे भी उन्हीं का ध्यान करती थीं। दो-दो गोपियां जोड़े (युगल) में बैठकर जो गीत गाती थीं, उसे ही 'युगलगीत' कहते हैं।

॥ युगलगीत: वंशी का प्रभाव ॥
वामबाहुकृतवामकपोलो
वल्गितभ्रुरधरार्पितवेणुम् ।
कोमलाङ्गुलिभिराश्रितमार्गं
गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः ॥
अर्थ: (गोपियां गाती हैं)— "सखी! जब मुकुन्द अपनी बाईं बाँह पर अपना बायां गाल रखकर, अपनी भौंहें नचाते हुए, होंठों पर बांसुरी (वेणु) रखकर अपनी कोमल उंगलियों से उसके छेदों पर स्वर निकालते हैं, तो वह दृश्य कितना मनोहर होता है!"

गोपियां कहती हैं कि कन्हैया की बांसुरी सुनकर वन के वृक्ष भी समाधिस्थ हो जाते हैं।

॥ वृक्षों का प्रेम-अश्रु ॥
वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं
व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः ।
प्रणतभारविटपा मधुधाराः
प्रेमहृष्टतनुवो ववृषुः स्म ॥
अर्थ: "सखी! उस वंशी को सुनकर वन की लताएं और वृक्ष ऐसे हो जाते हैं, मानो उनके भीतर स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हो गए हों। फलों और फूलों के भार से लदी हुई उनकी डालियां झुक जाती हैं, और प्रेम से रोमांचित होकर वे वृक्ष अपने भीतर से मधु (शहद) की धारा रूपी आँसू बहाने लगते हैं।"

इस प्रकार दिन-रात, उठते-बैठते ब्रज की गोपियों का जीवन केवल 'श्रीकृष्ण' ही हो गया था। यही निष्काम 'गोपी-प्रेम' श्रीमद्भागवत का सर्वोच्च शिखर है।

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