Govardhan Leela: Indra Puja Ka Virodh Aur Giriraj Dharan Katha

Sooraj Krishna Shastri
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॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

इन्द्र पूजा का विरोध और श्री गोवर्धन धारण लीला

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध (अध्याय 24-25)

श्रीमद्भागवत में वर्णित 'गोवर्धन लीला' केवल एक पहाड़ उठाने की कथा नहीं है, यह एक आध्यात्मिक क्रांति है। उस काल में लोग भयवश इन्द्र की पूजा करते थे, यह मानकर कि यदि इन्द्र रुष्ट हो गए तो वर्षा नहीं होगी। परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को 'कर्मयोग' और 'प्रकृति-प्रेम' का पाठ पढ़ाया। उन्होंने सिद्ध किया कि ईश्वर किसी एक देवता में नहीं, अपितु हमारे कर्मों में, हमारी गायों में और प्रकृति (गोवर्धन पर्वत) में बसता है। आइए, इन्द्र के अहंकार-नाश और गिर्राज महाराज के प्राकट्य की इस ओजस्वी लीला का 10 प्रामाणिक श्लोकों के साथ दर्शन करें।

1. इन्द्र-यज्ञ की तैयारी और कन्हैया का प्रश्न

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सम्पूर्ण वृन्दावन में एक बहुत बड़े उत्सव (यज्ञ) की तैयारी हो रही है। नन्दबाबा और सभी बड़े गोप अत्यंत व्यस्त थे। सब कुछ जानते हुए भी, भगवान ने अत्यंत भोलेपन से नन्दबाबा से पूछा:

॥ कन्हैया का प्रश्न ॥
कथ्यतां मे पितः कोऽयं सम्भ्रमो व उपागतः ।
किं फलं कस्य चोद्देशः केन वा क्रियते मखः ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "हे पिताजी! मुझे बताइये कि यह आप लोगों के सामने कौन सा भारी उत्सव (सम्भ्रम) आ गया है? इसका फल क्या है? यह किसके उद्देश्य से और किस विधि से किया जा रहा है?"
2. नन्दबाबा का उत्तर: इन्द्र ही वर्षा के देवता हैं

नन्दबाबा ने बताया कि यह हमारी कुल-परंपरा है। हम देवराज इन्द्र की पूजा करते हैं, क्योंकि वे ही मेघों (बादलों) के स्वामी हैं। यदि वे प्रसन्न होंगे, तभी वर्षा होगी और हमारी गायों को चारा मिलेगा।

॥ इन्द्र की महिमा का तर्क ॥
पर्जन्यो भगवानिन्द्रो मेघास्तस्यात्ममूर्तयः ।
तेऽभिवर्षन्ति भूतानां प्रीणनं जीवनं पयः ॥
अर्थ: (नन्दबाबा ने कहा)— "हे लाला! भगवान इन्द्र ही वर्षा करने वाले हैं, और ये मेघ (बादल) उनके ही स्वरूप हैं। वे ही सभी प्राणियों को तृप्त करने वाला और जीवन देने वाला जल बरसाते हैं।"
3. श्रीकृष्ण द्वारा 'कर्मयोग' की स्थापना

नन्दबाबा की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के अहंकार को तोड़ने का निश्चय किया। उन्होंने गीता के 'कर्मयोग' का प्रतिपादन करते हुए कहा कि इन्द्र कुछ नहीं करते, जीव को जो कुछ भी मिलता है, वह उसके अपने 'कर्मों' का फल होता है।

॥ कर्म ही प्रधान है ॥
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते ।
सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥
अर्थ: (श्रीकृष्ण ने कहा)— "पिताजी! प्राणी अपने कर्मों के द्वारा ही जन्म लेता है और कर्मों के द्वारा ही मृत्यु को प्राप्त होता है। उसे सुख, दुःख, भय और कल्याण (क्षेम)— यह सब उसके अपने कर्मों से ही प्राप्त होता है (इसमें इन्द्र का क्या काम?)।"
4. गोवर्धन पूजा का प्रस्ताव

कन्हैया ने कहा कि हम वैश्य (गोप) हैं। हमारा कर्म गायों का पालन और कृषि है। हमारे सच्चे देवता तो ये गाएं, ब्राह्मण और 'गोवर्धन पर्वत' हैं, जो हमें जल और घास देते हैं। इसलिए इन्द्र की नहीं, गोवर्धन की पूजा होनी चाहिए।

॥ गोवर्धन पूजा का आह्वान ॥
तस्माद् गवां ब्राह्मणानामद्रेरारभ्यतां मखः ।
य इन्द्रयागसम्भारैस्तैरयं साध्यतां मखः ॥
अर्थ: "इसलिए पिताजी! इन्द्र यज्ञ के लिए आपने जो भी सामग्रियां (प्रसाद आदि) एकत्रित की हैं, उन्हीं से अब गायों, ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत का यज्ञ (पूजा) आरम्भ कीजिए।"
5. गिरिराज का साक्षात प्रकट होना

नन्दबाबा और गोप कन्हैया की तार्किक बातों से सहमत हो गए। इन्द्र का यज्ञ रोक दिया गया और छप्पन भोग बनाकर गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा और पूजा की गई। ब्रजवासियों का विश्वास बढ़ाने के लिए भगवान ने एक चमत्कार किया।

॥ गिर्राज का भोग लगाना ॥
कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं महत् ।
शैलोऽस्मीति ब्रुवन् भूरि बलिमादद् बृहद्वपुः ॥
अर्थ: गोपों का विश्वास (विश्रम्भण) बढ़ाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक दूसरा अत्यंत विशाल शरीर धारण कर लिया, और "मैं ही गोवर्धन पर्वत हूँ" (शैलोऽस्मीति) ऐसा कहते हुए ब्रजवासियों द्वारा चढ़ाई गई सारी प्रचुर सामग्री (भोग) को खा लिया।
आध्यात्मिक रहस्य: 'गोवर्धन' दो शब्दों से बना है— गो (इन्द्रियां/गायें) + वर्धन (पोषण करने वाला)। जो पर्वत हमारी इन्द्रियों को भगवान की ओर मोड़कर हमारी भक्ति का पोषण करे, वही गोवर्धन है। इन्द्र 'अहंकार' का प्रतीक है, और गोवर्धन 'नम्रता और सेवा' का।
6. इन्द्र का क्रोध और प्रलयंकारी मेघों को आदेश

जब इन्द्र को पता चला कि ब्रजवासियों ने एक छोटे से बालक (कृष्ण) के कहने पर मेरी पूजा रोक दी है, तो वह क्रोध से पागल हो गया।

॥ इन्द्र का अहंकार ॥
इन्द्रस्तदात्मनः पूजां विज्ञायाहतामृपः ।
गोपेभ्यः कृष्णनाथेभ्यो नन्दादिभ्यश्चुकोप ह ॥
अर्थ: हे राजन् (परीक्षित)! तब देवराज इन्द्र ने जब यह जाना कि मेरी पूजा भंग (नष्ट) कर दी गई है, तो वह श्रीकृष्ण को अपना अनाथ (रक्षक) मानने वाले नन्द आदि गोपों पर अत्यंत क्रोधित हुआ।

क्रोध में अंधे होकर इन्द्र ने प्रलय के समय वर्षा करने वाले 'सांवर्तक' नामक मेघों को वृन्दावन को डुबाने का आदेश दे दिया।

॥ सांवर्तक मेघों का आक्रमण ॥
इत्याज्ञप्ता मघवता मेघा मुक्तानिबन्धनाः ।
नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा ॥
अर्थ: इन्द्र (मघवा) की ऐसी आज्ञा पाकर वे मेघ बंधनों से मुक्त होकर स्वतंत्र हो गए, और अत्यंत वेग से भयंकर मूसलाधार जल की वर्षा करके नन्दबाबा के गोकुल को पीड़ा पहुँचाने लगे।
7. ब्रजवासियों की पुकार और भगवान का संकल्प

पत्थर के समान बड़ी-बड़ी जल की बूँदें और ओले गिरने लगे। गायें और ग्वाल-बाल ठंड से काँपते हुए कन्हैया के चरणों में आकर गिर पड़े। भगवान ने समझ लिया कि यह इन्द्र का अहंकार है।

॥ भगवान की शरणागत वत्सलता ॥
तस्मान्मच्छरणं गोष्ठं मन्नाथं मत्परिग्रहम् ।
गोपाये स्वात्मयोगेन सोऽयं मे व्रत आहितः ॥
अर्थ: भगवान ने संकल्प लिया— "इस गोकुल ने मेरी ही शरण ली है, मैं ही इनका स्वामी हूँ और ये मेरे ही कुटुम्बी (परिग्रह) हैं। इसलिए मैं अपनी योगमाया से इनकी रक्षा करूँगा, शरणागत की रक्षा करना मेरा परम व्रत है।"
8. श्री गोवर्धन धारण लीला: गिर्राज को उंगली पर उठाना

यह कहकर परब्रह्म परमात्मा ने खेल-खेल में ही उस विशाल गोवर्धन पर्वत को उखाड़ लिया और उसे अपने बाएँ हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका) पर धारण कर लिया।

॥ गोवर्धन धारण ॥
इत्युक्त्वैकेन हस्तेन कृत्वा गोवर्धनं गिरिम् ।
दधार लीलया कृष्णश्छत्राकमिव बालकः ॥
अर्थ: ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने एक ही हाथ से (बाएँ हाथ की उंगली पर) उस विशाल गोवर्धन पर्वत को उखाड़कर ऐसे खेल-खेल में (लीलया) धारण कर लिया, जैसे कोई छोटा बालक बरसाती छत्ते (Mushroom / छत्राक) को उखाड़ लेता है।

भगवान ने सभी ब्रजवासियों को अपनी गायों, छकड़ों और सामग्रियों के साथ उस पर्वत के नीचे आ जाने को कहा। सात दिन और सात रातों तक भगवान श्रीकृष्ण बिना कुछ खाए-पिए, एक ही स्थान पर खड़े होकर उस पर्वत को उठाए रहे। सभी ब्रजवासी उनके मुख-कमल का दर्शन करते रहे, जिससे उन्हें भूख-प्यास का अनुभव ही नहीं हुआ।

9. इन्द्र का गर्व-भंग और वर्षा का रुकना

सात दिन तक भयंकर वर्षा करने के बाद भी जब गोकुल का एक बाल भी बांका नहीं हुआ, तो इन्द्र का सारा ऐश्वर्य और अहंकार चूर-चूर हो गया।

॥ इन्द्र का आश्चर्य और हार ॥
कृष्णयोगानुभावं तं निशाम्येन्द्रोऽतिविस्मितः ।
निस्तम्भो भ्रष्टसङ्कल्पः स्वान् मेघान् सन्न्यवारयत् ॥
अर्थ: श्रीकृष्ण के उस महान योग-प्रभाव को देखकर इन्द्र अत्यंत आश्चर्यचकित (विस्मित) हो गया। उसका सारा गर्व (निस्तम्भ) चूर-चूर हो गया, उसके संकल्प टूट गए, और हार मानकर उसने अपने मेघों को वर्षा करने से रोक दिया।

जब आकाश साफ हो गया और सूर्य निकल आया, तो भगवान की आज्ञा से सभी गोकुलवासी बाहर आ गए। भगवान ने खेल-खेल में ही गोवर्धन पर्वत को वापस उसके पूर्व स्थान पर रख दिया। इसके पश्चात इन्द्र ने ऐरावत हाथी पर आकर भगवान से क्षमा माँगी और कामधेनु गाय के दूध से उनका 'गोविन्द' नाम से अभिषेक किया।

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