गुण, वृद्धि एवं सम्प्रसारण संज्ञा
स्वर सन्धि (अच् सन्धि) का मूलाधार: संस्कृत व्याकरण की तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संज्ञाओं का पाणिनीय सूत्रों एवं उदाहरणों सहित विस्तृत विवेचन।
परिचय: स्वर सन्धि (विशेषकर गुण, वृद्धि और यण् सन्धि) को समझने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि व्याकरण शास्त्र में 'गुण' किसे कहते हैं, 'वृद्धि' क्या है, और 'सम्प्रसारण' का क्या अर्थ है। महर्षि पाणिनि ने इनके लिए अत्यंत वैज्ञानिक सूत्र रचे हैं।
१. वृद्धि संज्ञा (Vriddhi Sangya)
विशेष तथ्य: 'वृद्धिरादैच्' पाणिनीय अष्टाध्यायी का सबसे पहला सूत्र (१.१.१) है। महर्षि पाणिनि ने अपने महान ग्रन्थ का आरम्भ 'वृद्धि' (जिसका अर्थ विकास, उन्नति या मङ्गल होता है) शब्द से किया है, जो मंगलाचरण का भी कार्य करता है।
संज्ञा सूत्र: वृद्धिरादैच् (१.१.१)
सूत्र विच्छेद: वृद्धिः + आत् + ऐच्।
अर्थ: 'आ' (आत्) और 'ऐ, औ' (ऐच् प्रत्याहार) — इन तीन वर्णों की 'वृद्धि' संज्ञा होती है। अर्थात्, जब भी व्याकरण में 'वृद्धि' करने को कहा जाए, तो उसका मतलब 'आ, ऐ, औ' करना होगा।
अर्थ: 'आ' (आत्) और 'ऐ, औ' (ऐच् प्रत्याहार) — इन तीन वर्णों की 'वृद्धि' संज्ञा होती है। अर्थात्, जब भी व्याकरण में 'वृद्धि' करने को कहा जाए, तो उसका मतलब 'आ, ऐ, औ' करना होगा।
सन्धि विधायक सूत्र से अन्तर (V.V.Imp):
• वृद्धि संज्ञा करने वाला सूत्र = वृद्धिरादैच् (१.१.१)
• वृद्धि सन्धि करने वाला सूत्र = वृद्धिरेचि (६.१.८८)
(परीक्षाओं में छात्र अक्सर इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं। 'वृद्धिरादैच्' केवल नाम रखता है, जबकि 'वृद्धिरेचि' सन्धि का कार्य करता है।)
• वृद्धि संज्ञा करने वाला सूत्र = वृद्धिरादैच् (१.१.१)
• वृद्धि सन्धि करने वाला सूत्र = वृद्धिरेचि (६.१.८८)
(परीक्षाओं में छात्र अक्सर इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं। 'वृद्धिरादैच्' केवल नाम रखता है, जबकि 'वृद्धिरेचि' सन्धि का कार्य करता है।)
२. गुण संज्ञा (Guna Sangya)
संज्ञा सूत्र: अदेङ् गुणः (१.१.२)
सूत्र विच्छेद: अत् + एङ् + गुणः।
अर्थ: 'अ' (अत्) और 'ए, ओ' (एङ् प्रत्याहार) — इन तीन वर्णों की 'गुण' संज्ञा होती है। जहाँ भी सूत्र में 'गुण' करने का निर्देश हो, उसका अर्थ इन्हीं तीन (अ, ए, ओ) वर्णों का आदेश होना है।
अर्थ: 'अ' (अत्) और 'ए, ओ' (एङ् प्रत्याहार) — इन तीन वर्णों की 'गुण' संज्ञा होती है। जहाँ भी सूत्र में 'गुण' करने का निर्देश हो, उसका अर्थ इन्हीं तीन (अ, ए, ओ) वर्णों का आदेश होना है।
सन्धि विधायक सूत्र से अन्तर (V.V.Imp):
• गुण संज्ञा करने वाला सूत्र = अदेङ् गुणः (१.१.२)
• गुण सन्धि करने वाला सूत्र = आद्गुणः (६.१.८७)
(उदाहरण: रमेशः (रमा+ईशः)। यहाँ 'आ' और 'ई' मिलकर 'ए' बने हैं। चूँकि 'ए' एक गुण संज्ञक वर्ण है, इसलिए इसे 'गुण सन्धि' कहा जाता है।)
• गुण संज्ञा करने वाला सूत्र = अदेङ् गुणः (१.१.२)
• गुण सन्धि करने वाला सूत्र = आद्गुणः (६.१.८७)
(उदाहरण: रमेशः (रमा+ईशः)। यहाँ 'आ' और 'ई' मिलकर 'ए' बने हैं। चूँकि 'ए' एक गुण संज्ञक वर्ण है, इसलिए इसे 'गुण सन्धि' कहा जाता है।)
३. सम्प्रसारण संज्ञा (Samprasarana Sangya)
सम्प्रसारण की प्रक्रिया 'यण् सन्धि' की ठीक उल्टी (Reverse) प्रक्रिया है। यण् सन्धि में स्वरों (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर व्यंजन (य्, व्, र्, ल्) होते हैं, जबकि सम्प्रसारण में व्यंजनों के स्थान पर स्वर हो जाते हैं।
संज्ञा सूत्र: इग्यणः सम्प्रसारणम् (१.१.४५)
सूत्र विच्छेद: इक् + यणः + सम्प्रसारणम्।
अर्थ: यण् (य्, व्, र्, ल्) के स्थान पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) वर्णों का हो जाना 'सम्प्रसारण' कहलाता है।
अर्थ: यण् (य्, व्, र्, ल्) के स्थान पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) वर्णों का हो जाना 'सम्प्रसारण' कहलाता है।
सम्प्रसारण तालिका:
- य् के स्थान पर इ
- व् के स्थान पर उ
- र् के स्थान पर ऋ
- ल् के स्थान पर ऌ
उदाहरण:
• यज् (यजन करना) धातु में क्त प्रत्यय लगने पर 'य्' को सम्प्रसारण (इ) होकर इष्टः / इष्टिः बनता है।
• वच् (बोलना) धातु से उक्तः / उच्यते बनता है। (यहाँ 'व्' को 'उ' हो गया)।
• वप् (बोना) धातु से उप्तः बनता है।
• यज् (यजन करना) धातु में क्त प्रत्यय लगने पर 'य्' को सम्प्रसारण (इ) होकर इष्टः / इष्टिः बनता है।
• वच् (बोलना) धातु से उक्तः / उच्यते बनता है। (यहाँ 'व्' को 'उ' हो गया)।
• वप् (बोना) धातु से उप्तः बनता है।
🌺 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु महत्त्वपूर्ण सारांश:
- गुण वर्ण: अ, ए, ओ (सूत्र: अदेङ् गुणः)
- वृद्धि वर्ण: आ, ऐ, औ (सूत्र: वृद्धिरादैच् - अष्टाध्यायी का प्रथम सूत्र)
- सम्प्रसारण: य्, व्, र्, ल् का क्रमशः इ, उ, ऋ, ऌ में बदल जाना (सूत्र: इग्यणः सम्प्रसारणम्)। यह यण् सन्धि (इको यणचि) का विपरीत है।
