सवर्ण, संयोग एवं संहिता संज्ञा | Sangya Prakaran

Sooraj Krishna Shastri
By -
0

सवर्ण, संयोग एवं संहिता संज्ञा

सन्धि-प्रकरण का आधार: संस्कृत व्याकरण की तीन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संज्ञाओं का पाणिनीय सूत्रों एवं वार्तिक सहित विस्तृत विवेचन।

परिचय: संस्कृत व्याकरण में सन्धि (स्वर, व्यंजन या विसर्ग) को समझने से पूर्व इन तीन संज्ञाओं (सवर्ण, संयोग और संहिता) का ज्ञान होना परम आवश्यक है। इनके बिना सन्धि के नियम (जैसे सवर्ण दीर्घ सन्धि या यण् सन्धि) अधूरे रह जाते हैं।

१. सवर्ण संज्ञा (Savarna Sangya - सजातीय वर्ण)

'सवर्ण' का शाब्दिक अर्थ है — समान वर्ण या सजातीय (एक ही परिवार के) वर्ण।

सूत्र: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् (१.१.९)

अर्थ: जिन दो या दो से अधिक वर्णों के उच्चारण-स्थान (तालु, मूर्धा आदि) और आभ्यन्तर प्रयत्न (स्पृष्ट, विवृत आदि) समान (तुल्य) होते हैं, वे आपस में 'सवर्ण' कहलाते हैं। (नोट: बाह्य प्रयत्न के समान होने की आवश्यकता नहीं है)।
उदाहरण:
'अ' और 'आ' (दोनों का स्थान कण्ठ है और आभ्यन्तर प्रयत्न विवृत है, अतः ये सवर्ण हैं)।
'क्' और 'ख्' (दोनों का स्थान कण्ठ और आभ्यन्तर प्रयत्न स्पृष्ट है, अतः ये सवर्ण हैं)।
किन्तु, 'इ' और 'उ' सवर्ण नहीं हैं, क्योंकि 'इ' का स्थान तालु है और 'उ' का ओष्ठ।
V.V.Imp वार्तिक (TGT/PGT Special): ऋ और ऌ का सावर्ण्य
वार्तिक: ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्।
समस्या: 'ऋ' का उच्चारण स्थान मूर्धा है और 'ऌ' का दन्त। सूत्र 'तुल्यास्यप्रयत्नं...' के अनुसार ये सवर्ण नहीं हो सकते थे।
समाधान: कात्यायन जी ने यह वार्तिक बनाकर विशेष नियम दिया कि स्थान अलग-अलग होने पर भी 'ऋ' और 'ऌ' को आपस में सवर्ण माना जाएगा।

२. संयोग संज्ञा (Sanyoga Sangya - संयुक्त व्यंजन)

साधारण भाषा में जिसे हम 'संयुक्त अक्षर' या 'आधा अक्षर' कहते हैं, उसे ही पाणिनीय व्याकरण में 'संयोग' कहा जाता है।

सूत्र: हलोऽनन्तराः संयोगः (१.१.७)

अर्थ: 'हल्' (व्यंजनों) के बीच में जब किसी 'अच्' (स्वर) का व्यवधान (दूरी/अंतर) न हो, तो उन निरंतर आने वाले व्यंजनों की 'संयोग' संज्ञा होती है।
सरल शब्दों में: स्वरों के व्यवधान से रहित व्यंजनों का मिलना संयोग है।
उदाहरण:
पुष्पम्: यहाँ 'ष्' और 'प्' के बीच कोई स्वर नहीं है। अतः 'ष्प्' की संयोग संज्ञा है।
इन्द्रः: यहाँ 'न्', 'द्' और 'र्' के बीच कोई स्वर नहीं है। अतः 'न्द्र्' की संयोग संज्ञा है।
अग्निः: यहाँ 'ग्' और 'न्' संयोग हैं।

३. संहिता संज्ञा (Samhita Sangya - समीपता)

सन्धि करने की सबसे अनिवार्य शर्त 'संहिता' ही है। जहाँ संहिता होती है, वहीं सन्धि होती है।

सूत्र: परः सन्निकर्षः संहिता (१.४.१०९)

अर्थ: वर्णों की अत्यन्त समीपता (अत्यधिक नज़दीकी) को 'संहिता' कहते हैं। जब दो वर्णों के उच्चारण के बीच में आधी मात्रा से अधिक का समय (काल-व्यवधान) न लगे, तो उन वर्णों में संहिता मानी जाती है।
उदाहरण:
सुधी + उपास्यः = सुध्युपास्यः। यहाँ 'ई' और 'उ' के बीच अत्यन्त समीपता (संहिता) है, इसलिए यहाँ यण् सन्धि होकर 'यु' बन गया।
विद्या + आलयः = विद्यालयः। यहाँ 'आ' और 'आ' में संहिता है।
संहिता कहाँ अनिवार्य है? (संहिता के नियम)
श्लोक: संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः。
नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥

१. एक पद में: नित्य (अनिवार्य) है। (जैसे- नै+अकः = नायकः)।
२. धातु और उपसर्ग में: नित्य है। (जैसे- प्र+एजते = प्रेजते)।
३. समास में: नित्य है। (जैसे- विद्या+आलयः = विद्यालयः)।
४. वाक्य में: वक्ता की इच्छा (विवक्षा) पर निर्भर है। (आप चाहें तो 'रामः गच्छति' कहें या 'रामो गच्छति')।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार:

१. सवर्ण: स्थान और प्रयत्न समान हों (अ + आ)। वार्तिक से ऋ-ऌ भी सवर्ण हैं।
२. संयोग: दो व्यंजनों के बीच स्वर का न होना (क् + ल्)।
३. संहिता: वर्णों की अतिशय समीपता, जिसके कारण सन्धि होती है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!