टी, उपधा, नदी एवं घि संज्ञा | Upadha Sangya, Nadi Sangya

Sooraj Krishna Shastri
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टी, उपधा, नदी एवं घि संज्ञा

पाणिनीय अष्टाध्यायी की अत्यंत सूक्ष्म एवं महत्वपूर्ण संज्ञाओं का सूत्रों व उदाहरणों सहित विस्तृत विवेचन।

परिचय: 'टी' और 'उपधा' संज्ञाएँ शब्दों के निर्माण और सन्धि (जैसे पररूप सन्धि) में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वहीं, 'नदी' और 'घि' संज्ञाओं का ज्ञान शब्दरूपों (Declensions) को सिद्ध करने और प्रत्यय लगाने के लिए नितांत आवश्यक है।

१. टी संज्ञा (Ti Sangya)

'टी' (टि) संज्ञा किसी शब्द के अंतिम भाग को पहचानने का पाणिनीय तरीका है। इसका उपयोग मुख्य रूप से 'पररूप सन्धि' (शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्) में होता है।

संज्ञा सूत्र: अचोऽन्त्यादि टि (१.१.६४)

सूत्र विच्छेद: अचाम् + अन्त्यः + आदि + टि।
अर्थ: किसी शब्द के अचों (स्वरों) में जो सबसे अन्तिम अच् (स्वर) होता है, वह (और यदि उसके बाद कोई व्यंजन हो तो वह व्यंजन भी) 'टि' संज्ञक होता है।
सरल शब्दों में: शब्द का आखिरी स्वर और उसके बाद आने वाला पूरा हिस्सा 'टी' कहलाता है।
उदाहरण (V.V.Imp):
मनस्: म् + अ + न् + अ + स्। यहाँ अंतिम स्वर 'अ' है और उसके बाद 'स्' है। अतः 'अस्' की टि संज्ञा है।
राजन्: र् + आ + ज् + अ + न्। अंतिम स्वर 'अ' + 'न्'। अतः 'अन्' की टि संज्ञा है।
राम: र् + आ + म् + । यहाँ अंतिम स्वर 'अ' है और उसके बाद कोई व्यंजन नहीं है। अतः केवल 'अ' की टि संज्ञा है।

२. उपधा संज्ञा (Upadha Sangya)

'उपधा' का अर्थ है — किसी शब्द का 'सेकंड लास्ट' (Penultimate) अक्षर। यह संज्ञा प्रत्यय लगाने और शब्द रूप सिद्ध करने में काम आती है।

संज्ञा सूत्र: अलोऽन्त्यात्पूर्वो उपधा (१.१.६५)

सूत्र विच्छेद: अलः + अन्त्यात् + पूर्वः + उपधा।
अर्थ: किसी भी शब्द के 'अल्' (स्वर या व्यंजन) समुदाय में जो सबसे अन्तिम वर्ण होता है, उससे ठीक पहले वाले वर्ण (स्वर या व्यंजन) की 'उपधा' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
राम: र् + आ + म् + । यहाँ अंतिम वर्ण 'अ' है, उससे ठीक पहले 'म्' है। अतः 'म्' उपधा है।
राजन्: र् + आ + ज् + + न्। अंतिम वर्ण 'न्' है, उससे ठीक पहले 'अ' है। अतः 'अ' उपधा है।
महत्: म् + अ + ह् + + त्। अंतिम 'त्' से पूर्व 'अ' उपधा है।
टी और उपधा में सूक्ष्म अन्तर (Difference):
टी (टि): अंतिम स्वर से शुरू होकर अंत तक का पूरा भाग (जैसे 'मनस्' में 'अस्')।
उपधा: केवल अंतिम वर्ण से ठीक पहले का एक वर्ण (चाहे स्वर हो या व्यंजन) (जैसे 'मनस्' में 'अ')।

३. नदी संज्ञा (Nadi Sangya)

'नदी' संज्ञा विशेष रूप से नित्य स्त्रीलिंग शब्दों को पहचानने और उनके रूप (जैसे नदी, गौरी, वधू) चलाने के लिए की जाती है।

संज्ञा सूत्र: यू स्त्र्याख्यौ नदी (१.४.३)

सूत्र विच्छेद: ईत्-ऊत् (यू) + स्त्री-आख्यौ + नदी।
अर्थ: जो शब्द दीर्घ ईकारान्त (ई) और दीर्घ ऊकारान्त (ऊ) होते हैं, तथा नित्य स्त्रीलिंग वाचक होते हैं, उनकी 'नदी' संज्ञा होती है।
उदाहरण:
ईकारान्त स्त्रीलिंग: नदी, गौरी, पार्वती, जननी, पत्नी।
ऊकारान्त स्त्रीलिंग: वधू, चमू (सेना), श्वश्रू (सास)।
(नोट: 'ग्रामणी' शब्द ईकारान्त तो है, परन्तु पुल्लिङ्ग होने के कारण उसकी नदी संज्ञा नहीं होती।)

४. घि संज्ञा (Ghi Sangya)

नदी संज्ञा के बाद बचे हुए ह्रस्व (छोटे) 'इ' और 'उ' वाले शब्दों के रूप चलाने के लिए महर्षि पाणिनि ने 'घि' संज्ञा का विधान किया।

संज्ञा सूत्र: शेषो घ्यसखि (१.४.७)

सूत्र विच्छेद: शेषः + घि + असखि।
अर्थ: 'नदी' संज्ञा से जो शेष बच गए हैं अर्थात् ह्रस्व इकारान्त (इ) और ह्रस्व ऊकारान्त (उ) वाले शब्द, उनकी 'घि' संज्ञा होती है। परन्तु 'सखि' (मित्र) शब्द की घि संज्ञा नहीं होती (असखि)।
उदाहरण:
इकारान्त (पुं./नपुं.): हरि, मुनि, कवि, वारि (जल), दधि (दही)।
ऊकारान्त (पुं./नपुं.): भानु, गुरु, साधु, मधु (शहद)।
अपवाद (Exception): 'सखि' शब्द इकारान्त है, फिर भी 'असखि' निषेध के कारण इसकी 'घि' संज्ञा नहीं होती (इसीलिए सखि के रूप हरि से अलग चलते हैं - सखा, सखायौ, सखायः)।
🌺 परीक्षा हेतु सार (Quick Summary):
  • अचोऽन्त्यादि टि: अंतिम स्वर और उसके बाद का भाग (राम - , राजन् - अन्)।
  • अलोऽन्त्यात्पूर्वो उपधा: अंतिम वर्ण से ठीक पहले का वर्ण (राजन् - )।
  • यू स्त्र्याख्यौ नदी: नित्य स्त्रीलिंग दीर्घ और वाले शब्द (गौरी, वधू)।
  • शेषो घ्यसखि: ह्रस्व और वाले शब्द, 'सखि' को छोड़कर (हरि, भानु)।

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