लत्व सन्धि (Latva Sandhi)
व्यंजन (हल्) सन्धि का एक अत्यंत सरल किन्तु महत्त्वपूर्ण नियम: 'तोर्लि' सूत्र, सामान्य उदाहरण और 'न्' के अनुनासिक लकार (ल्ँ) का विशिष्ट विवेचन।
परिचय: 'लत्व' का शाब्दिक अर्थ है — 'ल्' (लकार) हो जाना। यह सन्धि परसवर्ण (बाद वाले वर्ण के समान हो जाना) का ही एक विशेष रूप है। जब तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) के बाद 'ल्' आता है, तो तवर्ग भी 'ल्' का रूप धारण कर लेता है।
१. सन्धि विधायक मुख्य सूत्र
सूत्र: तोर्लि (८.४.६०)
सूत्र विच्छेद: तोः + लि।
अर्थ (नियम): यदि 'तोः' (तवर्ग अर्थात् त्, थ्, द्, ध्, न्) के बाद 'लि' (लकार अर्थात् 'ल्') आए, तो तवर्ग के स्थान पर परसवर्ण (बाद वाले वर्ण के समान अर्थात् 'ल्') आदेश हो जाता है।
(सरल शब्दों में: त्, थ्, द्, ध्, न् + ल् = ल्)।
अर्थ (नियम): यदि 'तोः' (तवर्ग अर्थात् त्, थ्, द्, ध्, न्) के बाद 'लि' (लकार अर्थात् 'ल्') आए, तो तवर्ग के स्थान पर परसवर्ण (बाद वाले वर्ण के समान अर्थात् 'ल्') आदेश हो जाता है।
(सरल शब्दों में: त्, थ्, द्, ध्, न् + ल् = ल्)।
२. सामान्य उदाहरण (त्/द् ➔ ल्)
यदि तवर्ग के प्रथम चार वर्णों (त्, थ्, द्, ध्) के बाद 'ल्' आता है, तो वे सीधे सामान्य (निरनुनासिक) 'ल्' में बदल जाते हैं।
• तत् + लयः = तल्लयः (उसमें लीन होना)। (यहाँ 'त्' के बाद 'ल्' आया, अतः 'त्' भी 'ल्' बन गया)।
• उद् + लासः = उल्लासः (प्रसन्नता)। (यहाँ 'द्' के बाद 'ल्' है, अतः 'द्' भी 'ल्' हो गया)।
• उद् + लेखः = उल्लेखः (वर्णन करना)।
• विद्युत् + लता = विद्युल्लता (बिजली रूपी लता)।
• उद् + लङ्घनम् = उल्लङ्घनम् (नियम तोड़ना)।
• तत् + लीनः = तल्लीनः (उसी में मग्न)।
• उद् + लासः = उल्लासः (प्रसन्नता)। (यहाँ 'द्' के बाद 'ल्' है, अतः 'द्' भी 'ल्' हो गया)।
• उद् + लेखः = उल्लेखः (वर्णन करना)।
• विद्युत् + लता = विद्युल्लता (बिजली रूपी लता)।
• उद् + लङ्घनम् = उल्लङ्घनम् (नियम तोड़ना)।
• तत् + लीनः = तल्लीनः (उसी में मग्न)।
३. 'न्' का अनुनासिक लकार (ल्ँ) - V.V.Imp
सर्वाधिक पूछे जाने वाला अपवाद:
चूँकि 'न्' एक अनुनासिक (Nasal) वर्ण है (जिसका उच्चारण नासिका से होता है), इसलिए जब 'न्' के बाद 'ल्' आता है, तो 'न्' सामान्य 'ल्' में नहीं बदलता, बल्कि वह अपनी नासिका की ध्वनि को साथ रखते हुए अनुनासिक लकार (ल्ँ) में बदल जाता है।
विशेष नियम: न् + ल् = ल्ँ (अनुनासिक ल्)
परीक्षापयोगी महत्त्वपूर्ण सिद्धियाँ:
• विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखति (विद्वान लिखता है)।
(प्रक्रिया: 'न्' + 'ल्'। 'न्' अनुनासिक है, इसलिए वह 'ल्ँ' (चंद्रबिंदु वाला ल्) बन गया। इसे 'विद्वाल्लिखति' लिखना पूर्णतः अशुद्ध है।)
• महान् + लाभः = महाँल्लाभः (बहुत बड़ा लाभ)।
• भवान् + लुण्ठति = भवाँल्लुण्ठति (आप लूटते हैं)।
• हसन् + लिखति = हसँल्लिखति (हँसते हुए लिखता है)।
• जिघ्नन् + लभते = जिघ्नँल्लभते (मारता हुआ प्राप्त करता है)।
(प्रक्रिया: 'न्' + 'ल्'। 'न्' अनुनासिक है, इसलिए वह 'ल्ँ' (चंद्रबिंदु वाला ल्) बन गया। इसे 'विद्वाल्लिखति' लिखना पूर्णतः अशुद्ध है।)
• महान् + लाभः = महाँल्लाभः (बहुत बड़ा लाभ)।
• भवान् + लुण्ठति = भवाँल्लुण्ठति (आप लूटते हैं)।
• हसन् + लिखति = हसँल्लिखति (हँसते हुए लिखता है)।
• जिघ्नन् + लभते = जिघ्नँल्लभते (मारता हुआ प्राप्त करता है)।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
- लत्व का अर्थ: तवर्ग का 'ल्' (लकार) में बदल जाना।
- मुख्य सूत्र: तोर्लि (८.४.६०)।
- पहचान: शब्द के बीच में 'ल्ल' (डबल ल्) दिखाई देता है (तल्लयः, उल्लासः)।
- विशेष ध्यान: यदि 'न्' के बाद 'ल्' हो, तो 'न्' सामान्य 'ल्' न बनकर अनुनासिक ल् (ल्ँ / चंद्रबिंदु वाला ल्) बनता है (विद्वाँल्लिखति)।
