पररूप सन्धि (Pararūpa Sandhi)
वृद्धि सन्धि का प्रमुख अपवाद: 'एङि पररूपम्' और 'शकन्ध्वादिषु...' वार्तिक का पाणिनीय व्याकरण के अनुसार विस्तृत विवेचन।
परिभाषा: 'पररूप' का शाब्दिक अर्थ है — बाद वाले वर्ण (पर रूप) के समान हो जाना। जब सन्धि करते समय पहले वाला स्वर (पूर्व स्वर) अपने बाद वाले स्वर (पर स्वर) में पूरी तरह घुल-मिल जाए और बाद वाले स्वर का ही रूप धारण कर ले, तो उसे 'पररूप सन्धि' कहते हैं।
१. सन्धि विधायक मुख्य सूत्र (उपसर्ग + धातु)
सूत्र: एङि पररूपम् (६.१.९४)
सूत्र विच्छेद: एङि + पररूपम्। (इसमें 'उपसर्गादृति धातौ' से 'उपसर्गात्' और 'धातौ' की अनुवृत्ति आती है)।
शर्तें (Conditions):
शर्तें (Conditions):
- पूर्व पद: अकारान्त उपसर्ग होना चाहिए (ऐसा उपसर्ग जिसके अन्त में 'अ' हो, जैसे- प्र, उप, अव, अप)।
- उत्तर पद: 'एङ्' (अर्थात् ए या ओ) से प्रारम्भ होने वाली कोई धातु (Verb) होनी चाहिए।
ध्यान दें (वृद्धि सन्धि का अपवाद): सामान्य नियम 'वृद्धिरेचि' के अनुसार अ + ए = 'ऐ' (प्रैजते) होना चाहिए था, परन्तु यह सूत्र वृद्धि सन्धि को रोककर पररूप करता है।
पररूप सन्धि के मुख्य उदाहरण:
• प्र + एजते = प्रेजते (प्रकर्ष रूप से काँपता है)। (यहाँ 'प्र' अकारान्त उपसर्ग है, 'एजते' ए से शुरू होने वाली धातु है। अतः अ+ए = ए हुआ, न कि ऐ)।
• उप + ओषति = उपोषति (जलाता है)। (अ+ओ = ओ, न कि औ)।
• अव + एहि = अवेहि (जानो)।
• उप + ओषति = उपोषति (जलाता है)। (अ+ओ = ओ, न कि औ)।
• अव + एहि = अवेहि (जानो)।
२. शकन्ध्वादि गण में पररूप (TGT/PGT Special)
प्रतियोगी परीक्षाओं में सर्वाधिक प्रश्न इसी वार्तिक से पूछे जाते हैं, क्योंकि इसमें 'टि' संज्ञा (अचोऽन्त्यादि टि) का नियम लागू होता है।
वार्तिक: शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्
अर्थ: 'शकन्धु' आदि गण (समूह) में पढ़े गए शब्दों में भी 'पररूप सन्धि' ही होती है।
नियम की विशेषता: इस गण के शब्दों में पूर्व पद की 'टि' (अंतिम स्वर और उसके बाद का भाग) का बाद वाले स्वर के साथ पररूप हो जाता है।
नियम की विशेषता: इस गण के शब्दों में पूर्व पद की 'टि' (अंतिम स्वर और उसके बाद का भाग) का बाद वाले स्वर के साथ पररूप हो जाता है।
अत्यंत महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
१. मनस् + ईषा = मनीषा (बुद्धि):
प्रक्रिया: 'मनस्' में 'अस्' की टि संज्ञा है। इस 'अस्' का 'ईषा' के 'ई' के साथ पररूप (दोनों मिलकर 'ई') हो जाता है।
मन् + (अस् + ई) + षा ➔ मन् + ई + षा = मनीषा।
२. पतत् + अञ्जलिः = पतञ्जलिः:
प्रक्रिया: 'पतत्' में 'अत्' की टि संज्ञा है। इसका 'अञ्जलि' के 'अ' के साथ पररूप (अ) हो जाता है।
पत् + (अत् + अ) + ञ्जलिः ➔ पत् + अ + ञ्जलिः = पतञ्जलिः।
३. शक + अन्धुः = शकन्धुः (शक देश का कुआँ)। (यहाँ सवर्ण दीर्घ 'शकान्धुः' प्राप्त था, पर वार्तिक से पररूप हुआ)।
४. कर्क + अन्धुः = कर्कन्धुः (बेर का पेड़)।
५. मार्त + अण्डः = मार्तण्डः (सूर्य)। (सवर्ण दीर्घ का अपवाद)।
६. सीमन् + अन्तः = सीमन्तः (माँग में सिन्दूर भरना)। (नोट: यदि 'सीमन्तः' का अर्थ 'बालों की माँग' है तो पररूप होगा, यदि अर्थ 'सीमा का अन्त' (Border) है तो सवर्ण दीर्घ 'सीमान्तः' होगा)।
प्रक्रिया: 'मनस्' में 'अस्' की टि संज्ञा है। इस 'अस्' का 'ईषा' के 'ई' के साथ पररूप (दोनों मिलकर 'ई') हो जाता है।
मन् + (अस् + ई) + षा ➔ मन् + ई + षा = मनीषा।
२. पतत् + अञ्जलिः = पतञ्जलिः:
प्रक्रिया: 'पतत्' में 'अत्' की टि संज्ञा है। इसका 'अञ्जलि' के 'अ' के साथ पररूप (अ) हो जाता है।
पत् + (अत् + अ) + ञ्जलिः ➔ पत् + अ + ञ्जलिः = पतञ्जलिः।
३. शक + अन्धुः = शकन्धुः (शक देश का कुआँ)। (यहाँ सवर्ण दीर्घ 'शकान्धुः' प्राप्त था, पर वार्तिक से पररूप हुआ)।
४. कर्क + अन्धुः = कर्कन्धुः (बेर का पेड़)।
५. मार्त + अण्डः = मार्तण्डः (सूर्य)। (सवर्ण दीर्घ का अपवाद)।
६. सीमन् + अन्तः = सीमन्तः (माँग में सिन्दूर भरना)। (नोट: यदि 'सीमन्तः' का अर्थ 'बालों की माँग' है तो पररूप होगा, यदि अर्थ 'सीमा का अन्त' (Border) है तो सवर्ण दीर्घ 'सीमान्तः' होगा)।
३. ओमाङोश्च (अन्य विशेष नियम)
सूत्र: ओमाङोश्च (६.१.९५)
अर्थ: यदि अकार (अ/आ) के बाद 'ओम्' या 'आङ्' (आ) उपसर्ग आए, तो भी दोनों के स्थान पर पररूप एकादेश होता है।
उदाहरण:
• शिव + ओम् = शिवोम्। (यहाँ वृद्धि सन्धि 'शिवौम्' नहीं होगी)।
• शिव + एहि = शिवेहि। (यहाँ 'एहि' शब्द 'आङ् + इहि' से बना है। अतः 'शिव' के 'अ' और 'एहि' के 'ए' में पररूप होकर 'शिवेहि' बना)।
• शिव + ओम् = शिवोम्। (यहाँ वृद्धि सन्धि 'शिवौम्' नहीं होगी)।
• शिव + एहि = शिवेहि। (यहाँ 'एहि' शब्द 'आङ् + इहि' से बना है। अतः 'शिव' के 'अ' और 'एहि' के 'ए' में पररूप होकर 'शिवेहि' बना)।
🌺 पूर्वरूप और पररूप में भेद (भ्रम निवारण):
- पूर्वरूप (एङः पदान्तादति): पद के अन्त में ए/ओ + अ हो, तो 'अ' पहले वाले में मिल जाता है और अवग्रह (ऽ) बन जाता है। (हरे + अव = हरेऽव)।
- पररूप (एङि पररूपम्): उपसर्ग के अन्त में अ + ए/ओ हो, तो 'अ' बाद वाले में मिल जाता है और कोई अवग्रह नहीं लगता। (प्र + एजते = प्रेजते)।
- पतञ्जलिः और मनीषा में 'टि' का पररूप होता है (शकन्ध्वादिषु...)।
