वर्णों के उच्चारण-स्थान | Phonetics in Sanskrit Grammar

Sooraj Krishna Shastri
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वर्णों के उच्चारण-स्थान

संस्कृत व्याकरण में वर्णों के उत्पत्ति स्थल (कण्ठ, तालु, मूर्धा आदि), पाणिनीय शिक्षा के अनुसार ८ स्थान एवं उनके वैज्ञानिक सूत्रों का विस्तृत विवेचन।

परिभाषा: फेफड़ों से निकलने वाली वायु मुख-गुहा के जिस विशेष अंग (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ आदि) का स्पर्श करके बाहर निकलती है, उस स्थान विशेष को ही उस वर्ण का 'उच्चारण-स्थान' कहा जाता है।

🎯 पाणिनीय शिक्षा के अनुसार उच्चारण-स्थान (V.V.Imp)

प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रायः पूछा जाता है कि 'पाणिनीय शिक्षा' के अनुसार वर्णों के कितने उच्चारण-स्थान हैं? इसका उत्तर है — आठ (८)। इसका प्रमाण निम्नलिखित श्लोक में मिलता है:

अष्टौ स्थानानि वर्णानाम् उरः कण्ठः शिरस्तथा ।
जिह्वामूलं च दन्ताश्च नासिकोष्ठौ च तालु च ॥

८ स्थान: १. उरः (हृदय/छाती), २. कण्ठ (गला), ३. शिरः (मूर्धा), ४. जिह्वामूल (जीभ का मूल), ५. दन्त (दाँत), ६. नासिका (नाक), ७. ओष्ठ (होंठ), ८. तालु।

📚 उच्चारण-स्थानों के पाणिनीय सूत्र एवं वर्ण

सिद्धान्तकौमुदी और लघुसिद्धान्तकौमुदी के अनुसार वर्णों के उच्चारण-स्थानों को ११ सूत्रों में बाँटा गया है:

१. कण्ठ (Throat)

सूत्र: अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः

वर्ण: अ, आ, कवर्ग (क्, ख्, ग्, घ्, ङ्), ह्, और विसर्ग (ः)।
(इन वर्णों का उच्चारण कण्ठ से होता है, अतः इन्हें 'कण्ठ्य' वर्ण कहते हैं।)

२. तालु (Palate)

सूत्र: इचुयशानां तालु

वर्ण: इ, ई, चवर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्), य्, और श्।
(इनका उच्चारण जिह्वा द्वारा तालु के स्पर्श से होता है, अतः ये 'तालव्य' वर्ण हैं।)

३. मूर्धा (Cerebrum / Roof of the mouth)

सूत्र: ऋटुरषाणां मूर्धा

वर्ण: ऋ, ॠ, टवर्ग (ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्), र्, और ष्।
(इनका उच्चारण मूर्धा से होता है, अतः इन्हें 'मूर्धन्य' वर्ण कहते हैं।)

४. दन्त (Teeth)

सूत्र: ऌतुलसानां दन्ताः

वर्ण: ऌ, तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्), ल्, और स्।
(जिह्वा के दाँतों से स्पर्श होने के कारण ये 'दन्त्य' वर्ण कहलाते हैं।)

५. ओष्ठ (Lips)

सूत्र: उपूपध्मानीयानाम् ओष्ठौ

वर्ण: उ, ऊ, पवर्ग (प्, फ्, ब्, भ्, म्), और उपध्मानीय (ᳶप्, ᳶफ्)।
(इनका उच्चारण दोनों होंठों के मिलने से होता है, अतः ये 'ओष्ठ्य' वर्ण हैं।)

६. नासिका (Nose)

सूत्र: ञमङणनानां नासिका च

वर्ण: ञ्, म्, ङ्, ण्, न्।
(इन पाँचों अनुनासिक वर्णों का उच्चारण अपने-अपने वर्ग के स्थान (कण्ठ, तालु आदि) के साथ-साथ नासिका से भी होता है।)

७-८. कण्ठ-तालु एवं कण्ठ-ओष्ठ

सूत्र १: एदैतोः कण्ठतालु
सूत्र २: ओदौतोः कण्ठोष्ठम्

वर्ण: ए, ऐ का उच्चारण-स्थान कण्ठ और तालु दोनों हैं।
वर्ण: ओ, औ का उच्चारण-स्थान कण्ठ और ओष्ठ दोनों हैं।

९-१०-११. दन्तोष्ठ, जिह्वामूल एवं अनुस्वार

सूत्र: वकारस्य दन्तोष्ठम्
सूत्र: जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्
सूत्र: नासिकानुस्वारस्य

वर्ण: व् का उच्चारण-स्थान दन्त और ओष्ठ है।
वर्ण: जिह्वामूलीय (ᳵक्, ᳵख्) का उच्चारण-स्थान जिह्वामूल (जीभ की जड़) है।
वर्ण: अनुस्वार (ं) का उच्चारण-स्थान केवल नासिका है।

🌟 विशेष: दो उच्चारण-स्थान वाले वर्ण (कुल १०)

संस्कृत वर्णमाला में १० वर्ण ऐसे हैं जिनके उच्चारण में दो स्थानों की सहायता लेनी पड़ती है (यह प्रश्न परीक्षाओं में बहुधा आता है):

  • ङ् = कण्ठ + नासिका
  • ञ् = तालु + नासिका
  • ण् = मूर्धा + नासिका
  • न् = दन्त + नासिका
  • म् = ओष्ठ + नासिका
  • ए, ऐ = कण्ठ + तालु
  • ओ, औ = कण्ठ + ओष्ठ
  • व् = दन्त + ओष्ठ
🌺 सारांश (Summary)

वर्णों का शुद्ध उच्चारण ही संस्कृत व्याकरण की मूल आत्मा है। महर्षि पाणिनि ने मुख के विभिन्न अवयवों के आधार पर वर्णों का जो यह वैज्ञानिक वर्गीकरण किया है, वह आधुनिक ध्वनि-विज्ञान (Phonetics) की कसौटी पर भी पूर्णतः सत्य सिद्ध होता है।

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