प्रकृतिभाव सन्धि (Prakritibhava Sandhi)
स्वर सन्धि का अपवाद: जब सन्धि के नियम लागू होने पर भी सन्धि न हो। पाणिनीय सूत्रों एवं उदाहरणों सहित विस्तृत विवेचन।
परिभाषा: 'प्रकृतिभाव' का अर्थ है — अपनी मूल प्रकृति (स्वाभाविक अवस्था) में ही बने रहना। जब दो वर्णों के बीच सन्धि प्राप्त हो रही हो (जैसे यण् या दीर्घ सन्धि के नियम लग रहे हों), फिर भी किसी विशेष नियम के कारण सन्धि न हो और दोनों शब्द अलग-अलग ही लिखे/बोले जाएँ, तो उसे 'प्रकृतिभाव सन्धि' कहते हैं। इसे 'सन्धि का अभाव' भी कहा जा सकता है।
१. प्रगृह्य संज्ञा (Pragrihya Sangya) - V.V.Imp
प्रकृतिभाव सन्धि को समझने के लिए सबसे पहले 'प्रगृह्य संज्ञा' को समझना अनिवार्य है, क्योंकि जिसकी प्रगृह्य संज्ञा होती है, उसी का प्रकृतिभाव होता है।
संज्ञा सूत्र: ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् (१.१.११)
सूत्र विच्छेद: ईत् + ऊत् + एत् + द्विवचनम् + प्रगृह्यम्।
अर्थ: दीर्घ ईकारान्त (ई), दीर्घ ऊकारान्त (ऊ) और एकारान्त (ए) वाले जो द्विवचन के रूप होते हैं, उनकी 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है।
अर्थ: दीर्घ ईकारान्त (ई), दीर्घ ऊकारान्त (ऊ) और एकारान्त (ए) वाले जो द्विवचन के रूप होते हैं, उनकी 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है।
प्रगृह्य संज्ञक शब्दों के उदाहरण:
• हरी: (हरि शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — ईकारान्त।
• विष्णू: (विष्णु शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — ऊकारान्त।
• गङ्गे/लते: (गङ्गा/लता शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — एकारान्त।
• हरी: (हरि शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — ईकारान्त।
• विष्णू: (विष्णु शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — ऊकारान्त।
• गङ्गे/लते: (गङ्गा/लता शब्द का प्रथमा/द्वितीया द्विवचन) — एकारान्त।
२. प्रकृतिभाव विधायक मुख्य सूत्र
सन्धि सूत्र: प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (६.१.१२५)
सूत्र विच्छेद: प्लुत-प्रगृह्याः + अचि + नित्यम्।
अर्थ: प्लुत स्वर और प्रगृह्य संज्ञक वर्णों के बाद यदि कोई अच् (स्वर) आ जाए, तो नित्य रूप से 'प्रकृतिभाव' होता है (अर्थात् कोई सन्धि नहीं होती)।
अर्थ: प्लुत स्वर और प्रगृह्य संज्ञक वर्णों के बाद यदि कोई अच् (स्वर) आ जाए, तो नित्य रूप से 'प्रकृतिभाव' होता है (अर्थात् कोई सन्धि नहीं होती)।
प्रकृतिभाव के मुख्य उदाहरण:
- हरी + एतौ = हरी एतौ (यहाँ 'ई' के बाद 'ए' आने से यण् सन्धि प्राप्त थी, किन्तु 'हरी' द्विवचन होने से प्रगृह्य है, अतः प्रकृतिभाव हुआ)।
- विष्णू + इमौ = विष्णू इमौ (यहाँ 'ऊ' के बाद 'इ' आने से यण् सन्धि प्राप्त थी, किन्तु प्रगृह्य होने से सन्धि नहीं हुई)।
- गङ्गे + अमू = गङ्गे अमू (यहाँ 'ए' के बाद 'अ' आने से पूर्वरूप/अयादि प्राप्त थी, किन्तु प्रकृतिभाव हुआ)।
प्लुत का उदाहरण:
हे कृष्ण३ ! अत्र गौश्चरति। (यहाँ कृष्ण को दूर से बुलाने के कारण 'अ' प्लुत हो गया है। अतः 'कृष्ण३' के 'अ' और 'अत्र' के 'अ' में सवर्ण दीर्घ सन्धि नहीं हुई।)
३. प्रगृह्य संज्ञा के अन्य विशेष सूत्र (TGT/PGT Special)
'ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्' के अतिरिक्त कुछ अन्य सूत्र भी प्रगृह्य संज्ञा करते हैं, जो परीक्षाओं में सीधे पूछे जाते हैं:
(क) सूत्र: अदसो मात् (१.१.१२)
अर्थ: 'अदस्' (वह) शब्द के रूप में जहाँ मकार (म्) के बाद ई या ऊ आए, तो उसकी प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण: अमी + ईशाः = अमी ईशाः। (यहाँ सवर्ण दीर्घ सन्धि नहीं हुई)। अमू + आसाते = अमू आसाते।
उदाहरण: अमी + ईशाः = अमी ईशाः। (यहाँ सवर्ण दीर्घ सन्धि नहीं हुई)। अमू + आसाते = अमू आसाते।
(ख) सूत्र: निपात एकाजनाङ् (१.१.१४)
अर्थ: 'आङ्' (आ) को छोड़कर यदि कोई निपात (अव्यय) केवल एक अच् (स्वर) वाला हो, तो उसकी प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण: इ + इन्द्रः = इ इन्द्रः। उ + उमेशः = उ उमेशः। (यहाँ दीर्घ या यण् सन्धि नहीं हुई)।
उदाहरण: इ + इन्द्रः = इ इन्द्रः। उ + उमेशः = उ उमेशः। (यहाँ दीर्घ या यण् सन्धि नहीं हुई)।
(ग) सूत्र: ओत् (१.१.१५)
अर्थ: 'ओकारान्त' (जिसके अंत में 'ओ' हो) निपात की प्रगृह्य संज्ञा होती है।
उदाहरण: अहो + ईशाः = अहो ईशाः। (यहाँ अयादि सन्धि नहीं हुई)।
उदाहरण: अहो + ईशाः = अहो ईशाः। (यहाँ अयादि सन्धि नहीं हुई)।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार:
- प्रकृतिभाव का अर्थ: सन्धि के नियम लगने पर भी सन्धि का न होना। ज्यों का त्यों रहना।
- मुख्य शर्त: शब्द का 'प्लुत' होना या 'प्रगृह्य' संज्ञक होना अनिवार्य है।
- प्रगृह्य की पहचान: द्विवचन के अंत में आने वाले ई, ऊ, ए (हरी, विष्णू, गङ्गे)।
- विशेष सूत्र: अदसो मात् (अमी ईशाः), निपात एकाजनाङ् (इ इन्द्रः), ओत् (अहो ईशाः)।
