प्रातिपदिक, पद एवं अवसान संज्ञा | Pratipadika Sangya, Pada Sangya

Sooraj Krishna Shastri
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प्रातिपदिक, पद एवं अवसान संज्ञा

संस्कृत व्याकरण में शब्द-निर्माण और वाक्य-प्रयोग के मूलाधार: प्रातिपदिक, पद और अवसान संज्ञाओं का पाणिनीय सूत्रों सहित सम्पूर्ण विवेचन।

सीखने का क्रम: किसी भी शब्द को वाक्य में प्रयोग करने से पहले उसकी 'प्रातिपदिक' संज्ञा होती है। फिर उसमें प्रत्यय लगकर वह 'पद' बनता है। और जब पद या वाक्य का उच्चारण समाप्त होता है, तो उसे 'अवसान' कहते हैं।

१. प्रातिपदिक संज्ञा (Pratipadika Sangya - मूल शब्द)

साधारण भाषा में जिसे हम 'मूल शब्द' (Base word) कहते हैं (जैसे- राम, बालक, ज्ञान), पाणिनीय व्याकरण में उसे 'प्रातिपदिक' कहा जाता है। इसके लिए अष्टाध्यायी में दो प्रमुख सूत्र हैं:

प्रथम सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (१.२.४५)

सूत्र विच्छेद: अर्थवत् + अधातुः + अप्रत्ययः + प्रातिपदिकम्।
अर्थ: जो शब्द अर्थवान् (Meaningful) हो, किन्तु न तो वह कोई धातु (Root) हो और न ही कोई प्रत्यय (Suffix) हो, ऐसे शब्द-स्वरूप की 'प्रातिपदिक संज्ञा' होती है।
उदाहरण: 'राम', 'कृष्ण', 'लता'। ये शब्द अर्थवान हैं, इनमें कोई धातु या प्रत्यय अलग से नहीं जुड़ा है। अतः ये सीधे प्रातिपदिक हैं।

द्वितीय सूत्र: कृत्तद्धितसमासाश्च (१.२.४६)

अर्थ: कृदन्त (कृत् प्रत्ययान्त), तद्धितान्त (तद्धित प्रत्ययान्त) और समास (Compound words) की भी 'प्रातिपदिक संज्ञा' होती है।
(चूँकि पिछले सूत्र ने 'अप्रत्ययः' कहकर प्रत्ययों को बाहर कर दिया था, इसलिए पाणिनि जी ने इस सूत्र से कृत् और तद्धित प्रत्ययों से बने शब्दों को भी प्रातिपदिक मान लिया।)
उदाहरण:
कृदन्त: पाचक (पच् + ण्वुल्)।
तद्धितान्त: दाशरथि (दशरथ + इञ्)।
समास: राजपुरुषः (राज्ञः पुरुषः)।

२. पद संज्ञा (Pada Sangya - पूर्ण शब्द)

संस्कृत का सबसे बड़ा नियम है — "अपदं न प्रयुञ्जीत" (बिना पद बनाए किसी भी शब्द का वाक्य में प्रयोग नहीं करना चाहिए)। प्रातिपदिक में प्रत्यय लगने के बाद ही वह 'पद' बनता है।

संज्ञा सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम् (१.४.१४)

सूत्र विच्छेद: सुप् + तिङ् + अन्तम् + पदम्।
अर्थ: सुबन्त (जिनके अंत में सुप् प्रत्यय हों) और तिङन्त (जिनके अंत में तिङ् प्रत्यय हों) शब्दों की 'पद' संज्ञा होती है।
  • सुप् प्रत्यय (२१): ये शब्दरूप (संज्ञा, सर्वनाम) बनाने के काम आते हैं। (सु, औ, जस्... आदि 21 प्रत्यय)।
    उदाहरण: राम (प्रातिपदिक) + सु (प्रत्यय) = रामः (पद)
  • तिङ् प्रत्यय (१८): ये धातुरूप (क्रिया) बनाने के काम आते हैं। (तिप्, तस्, झि... आदि 18 प्रत्यय)।
    उदाहरण: भू (धातु) + तिप् (प्रत्यय) = भवति (पद)

३. अवसान संज्ञा (Avasana Sangya - विराम)

'अवसान' का अर्थ है — रुक जाना, विश्राम लेना या समाप्ति।

संज्ञा सूत्र: विरामोऽवसानम् (१.४.११०)

अर्थ: वर्णों के उच्चारण के अभाव (समाप्ति) को 'अवसान' कहते हैं। जब किसी वर्ण के बाद कोई अन्य वर्ण न हो (अर्थात् उच्चारण रुक जाए), तो उस अंतिम स्थिति की 'अवसान' संज्ञा होती है।
उपयोग (V.V.Imp): अवसान संज्ञा का मुख्य कार्य विसर्ग सन्धि में होता है। सूत्र है — खरवसानयोर्विसर्जनीयः (खर् प्रत्याहार बाद में हो, या अवसान हो, तो 'र्' को विसर्ग हो जाता है)।
उदाहरण: रामर्। यहाँ 'र्' के बाद कोई वर्ण नहीं है (विराम है), अतः अवसान होने के कारण 'र्' को विसर्ग होकर 'रामः' बन जाता है।
🌺 परीक्षा हेतु सार (Quick Summary):
  • प्रातिपदिक (Base): अर्थवान् मूल शब्द। (सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः और कृत्तद्धितसमासाश्च)।
  • पद (Word): वाक्य में प्रयोग के योग्य सुबन्त या तिङन्त शब्द। (सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम्)।
  • अवसान (Pause/End): वर्णों के उच्चारण की समाप्ति। (सूत्र: विरामोऽवसानम्)।

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