रुत्व सन्धि (Rutva Sandhi)
विसर्ग (:) का 'र्' (रेफ) में परिवर्तन: 'ससजुषो रुः' सूत्र, व्यावहारिक नियम और परीक्षापयोगी उदाहरणों का सम्पूर्ण विवेचन।
परिभाषा: 'रुत्व' का शाब्दिक अर्थ है — 'रु' (र्) हो जाना। जब विसर्ग (:) के स्थान पर 'र्' (आधा र / रेफ) आदेश हो जाता है, तो उसे 'रुत्व सन्धि' कहते हैं। संस्कृत साहित्य में शब्द के ऊपर लगने वाले 'र्' (जैसे- हरिर्गच्छति) का मुख्य कारण यही सन्धि है।
१. सन्धि विधायक मुख्य सूत्र
सूत्र: ससजुषो रुः (८.२.६६)
सूत्र विच्छेद: स-सजुषोः + रुः। (पदान्त सकार और सजुष् शब्द के 'ष्' को 'रु' होता है)।
मूल अर्थ: यदि किसी पद के अन्त में 'स्' हो, या 'सजुष्' (साथी/मित्र) शब्द का 'ष्' हो, तो उसके स्थान पर 'रु' आदेश हो जाता है। (बाद में 'रु' के 'उ' की इत् संज्ञा होकर केवल 'र्' शेष बचता है)।
मूल अर्थ: यदि किसी पद के अन्त में 'स्' हो, या 'सजुष्' (साथी/मित्र) शब्द का 'ष्' हो, तो उसके स्थान पर 'रु' आदेश हो जाता है। (बाद में 'रु' के 'उ' की इत् संज्ञा होकर केवल 'र्' शेष बचता है)।
छात्रों के लिए व्यावहारिक नियम (Practical Rule):
प्रतियोगी परीक्षाओं में विसर्ग (:) को देखकर सन्धि पहचाननी होती है। इसका सीधा नियम यह है:
यदि विसर्ग (:) से ठीक पहले 'अ' या 'आ' को छोड़कर कोई अन्य स्वर (इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ) हो, और विसर्ग के बाद कोई स्वर अथवा मृदु व्यंजन (वर्गों के ३, ४, ५ वर्ण, य्, व्, र्, ल्, ह्) आए, तो विसर्ग के स्थान पर 'र्' (आधा र) हो जाता है।
२. महत्त्वपूर्ण उदाहरण (V.V.Imp)
(क) विसर्ग + व्यंजन (रकार ऊपर चला जाता है):
• हरिः + गच्छति = हरिर्गच्छति (हरि जाता है)।
(यहाँ विसर्ग से पहले 'इ' है, और बाद में 'ग्' (मृदु व्यंजन) है। अतः विसर्ग का 'र्' बन गया, जो 'ग' के ऊपर चला गया)।
• मुनिः + जयति = मुनिर्जयति (मुनि की जय हो)।
• गुरुः + जयति = गुरुर्जयति।
• भानुः + भाति = भानुर्भाति (सूर्य चमकता है)।
• धेनुः + गच्छति = धेनुर्गच्छति।
• सजुष् + बिन्दुः = सजुर्बिन्दुः (सजुष् शब्द का विशेष उदाहरण)।
(यहाँ विसर्ग से पहले 'इ' है, और बाद में 'ग्' (मृदु व्यंजन) है। अतः विसर्ग का 'र्' बन गया, जो 'ग' के ऊपर चला गया)।
• मुनिः + जयति = मुनिर्जयति (मुनि की जय हो)।
• गुरुः + जयति = गुरुर्जयति।
• भानुः + भाति = भानुर्भाति (सूर्य चमकता है)।
• धेनुः + गच्छति = धेनुर्गच्छति।
• सजुष् + बिन्दुः = सजुर्बिन्दुः (सजुष् शब्द का विशेष उदाहरण)।
(ख) विसर्ग + स्वर (रकार स्वर में मिल जाता है):
• मुनिः + अयम् = मुनिरयम् (यह मुनि है)।
(विसर्ग का 'र्' बना, और वह आगे वाले 'अ' से मिलकर पूरा 'र' हो गया)।
• पितुः + इच्छा = पितुरिच्छा (पिता की इच्छा)।
• भानुः + उदेति = भानुरुदेति (सूर्य उगता है)।
• गौः + अयम् = गौरयम् (यह गाय है)।
• तयोः + एव = तयोरेव (उन दोनों का ही)।
(विसर्ग का 'र्' बना, और वह आगे वाले 'अ' से मिलकर पूरा 'र' हो गया)।
• पितुः + इच्छा = पितुरिच्छा (पिता की इच्छा)।
• भानुः + उदेति = भानुरुदेति (सूर्य उगता है)।
• गौः + अयम् = गौरयम् (यह गाय है)।
• तयोः + एव = तयोरेव (उन दोनों का ही)।
३. उत्व और रुत्व सन्धि में अन्तर (TGT/PGT Special)
अक्सर छात्र 'रामो गच्छति' और 'हरिर्गच्छति' में भ्रमित हो जाते हैं। इसे इस प्रकार समझें:
-
उत्व सन्धि (हशि च): यदि विसर्ग से पहले 'अ' हो, और बाद में मृदु व्यंजन हो, तो विसर्ग का 'उ' (ओ) हो जाता है।
जैसे: रामः + गच्छति = रामो गच्छति। (यहाँ म् + अ + : है)। -
रुत्व सन्धि (ससजुषो रुः): यदि विसर्ग से पहले 'अ' या 'आ' न हो (इ, उ आदि हों), और बाद में मृदु व्यंजन हो, तो विसर्ग का 'र्' हो जाता है।
जैसे: हरिः + गच्छति = हरिर्गच्छति। (यहाँ र् + इ + : है)।
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
- रुत्व का अर्थ: पदान्त 'स्' या विसर्ग (:) का 'र्' (आधा र) में बदलना।
- मुख्य सूत्र: ससजुषो रुः (८.२.६६)।
- शर्त: विसर्ग से पहले (अ/आ) न हो + बाद में स्वर या मृदु व्यंजन हो।
- पहचान: शब्द के ऊपर रेफ (र्) लगा हो, या दो शब्दों के बीच में पूरा 'र/रि/रु' आ जाए (हरिर्गच्छति, मुनिरयम्)।
