यलोप एवं रिलोपादि नियम | Visarga Lopa

Sooraj Krishna Shastri
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विसर्ग लोप: य-लोप एवं र-लोपादि नियम

नीरोगः, पुना रमते और भो देवाः की सिद्धि के रहस्य: 'रो रि', 'ढ्रलोपे...' और 'भोभगो...' सूत्रों का सम्पूर्ण विवेचन।

परिचय: विसर्ग सन्धि में अनेक स्थान ऐसे आते हैं जहाँ विसर्ग (जो र् या य् में बदल चुका होता है) पूरी तरह से लुप्त (गायब) हो जाता है। परीक्षाओं में लोप होने के बाद पूर्व स्वर का दीर्घ हो जाना (जैसे निर् ➔ नी) सर्वाधिक पूछा जाता है। इसे दो मुख्य भागों में समझा जाता है: १. र-लोप और २. य-लोप।

१. र-लोप एवं पूर्व-स्वर दीर्घ (Ralopa & Dirgha)

यह नियम दो सूत्रों के मेल से बनता है। पहला सूत्र 'र्' को हटाता है और दूसरा सूत्र बचे हुए स्वर को बड़ा (दीर्घ) कर देता है।

(क) लोप विधायक सूत्र: रो रि (८.३.१४)

अर्थ: यदि 'र्' (रेफ) के बाद 'र्' (रेफ) आ जाए, तो पहले वाले 'र्' का लोप (अदर्शन) हो जाता है। (अर्थात् दो 'र्' एक साथ नहीं रह सकते, पहला 'र्' हटेगा।)

(ख) दीर्घ विधायक सूत्र: ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः (६.३.१११)

अर्थ: जिस 'ढ्' या 'र्' का लोप हुआ है, उससे ठीक पहले आने वाले 'अण्' प्रत्याहार (अर्थात् ह्रस्व अ, इ, उ) को दीर्घ (आ, ई, ऊ) हो जाता है।
प्रक्रिया का क्रम (V.V.Imp):
१. निर् + रोगः ➔ 'रो रि' से पहले 'र्' का लोप हुआ (नि + रोगः)।
२. 'ढ्रलोपे...' से लुप्त 'र्' से पहले वाले 'इ' (नि) को दीर्घ 'ई' (नी) हो गया ➔ नीरोगः
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (परीक्षाओं का प्रिय):
निर् + रसः = नीरसः (रसहीन)। (नि का नी हुआ)।
पुनर् + रमते = पुना रमते (फिर रमता है)। (यहाँ 'पुनर्' के 'अ' को दीर्घ 'आ' हो गया)।
हरिर् + रम्यः = हरी रम्यः (हरि सुन्दर हैं)। (हरि का 'इ' दीर्घ 'ई' हो गया)।
शम्भुर् + राजते = शम्भू राजते (शिव सुशोभित होते हैं)। (शम्भु का 'उ' दीर्घ 'ऊ' हो गया)।
निर् + रजः = नीरजः (धूल रहित / कमल)।

२. य-लोप सन्धि (Yalopa)

इस नियम में विसर्ग (रु) पहले 'य्' बनता है और फिर उस 'य्' का लोप हो जाता है।

(क) यत्व विधायक सूत्र: भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि (८.३.१७)

अर्थ: यदि भोस् (भोः), भगोस् (भगोः), अघोस् (अघोः) या अ/आ (अपूर्वस्य) के बाद विसर्ग (रु) हो, और उसके बाद 'अश्' प्रत्याहार (सभी स्वर और मृदु व्यंजन) आए, तो विसर्ग (रु) के स्थान पर 'य्' आदेश हो जाता है।

(ख) लोप विधायक सूत्र: हलि सर्वेषाम् (८.३.२२)

अर्थ: यदि उस 'य्' के बाद 'हल्' (कोई भी व्यंजन) हो, तो सभी आचार्यों के मत में उस 'य्' का लोप हो जाता है।
महत्त्वपूर्ण उदाहरण (TGT/PGT Special):
भोः + देवाः = भो देवाः (हे देवगण!)। (प्रक्रिया: भोस् + देवाः ➔ भोरु + देवाः ➔ भोय् + देवाः ➔ 'हलि सर्वेषाम्' से 'य्' का लोप ➔ भो देवाः)।
भगोः + नमस्ते = भगो नमस्ते (हे भगवान् आपको नमस्कार)।
अघोः + याहि = अघो याहि (हे पापी जा)।
बालकाः + हसन्ति = बालका हसन्ति। (यहाँ 'आ' के बाद विसर्ग है। बालकास् ➔ बालकाय् ➔ बालका हसन्ति)।
नराः + गच्छन्ति = नरा गच्छन्ति।

३. वैकल्पिक य-लोप (लोपः शाकल्यस्य)

सूत्र: लोपः शाकल्यस्य (८.३.१९)

अर्थ: यदि 'य्' या 'व्' के बाद व्यंजन (हल्) न होकर 'अश्' (विशेषकर स्वर) आए, तो शाकल्य मुनि के मत में 'य्' का विकल्प से लोप होता है। (अर्थात् लोप हो भी सकता है और नहीं भी)।
उदाहरण:
नराः + इमे ➔ नराय् + इमे ➔ नरा इमे (य-लोप पक्ष) / नरायिमे (लोप अभाव पक्ष)।
देवाः + इह ➔ देवाय् + इह ➔ देवा इह / देवायिह
(नोट: य-लोप होने के बाद पुनः सन्धि (जैसे गुण सन्धि) नहीं होती है।)
🌺 परीक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण सार (Summary):
  • र-लोप नियम: र् + र् होने पर पहले 'र्' का लोप (रो रि)।
  • दीर्घ नियम: 'र्' लुप्त होने पर उससे पहले वाले अ, इ, उ को दीर्घ आ, ई, ऊ हो जाता है (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः)। (उदा: नीरोगः, हरी रम्यः)
  • भोभगो नियम: भोः, भगोः या आ के बाद विसर्ग हो और आगे व्यंजन हो, तो विसर्ग लुप्त हो जाता है। (उदा: भो देवाः, बालका हसन्ति)

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