भक्तों की महिमा और ५ प्रकार की मुक्ति: श्रीमद्भागवत एवं गीता के आलोक में
सनातन धर्म और भारतीय वाङ्मय में भगवान की महिमा का गान तो सर्वत्र है, परन्तु स्वयं भगवान अपने मुख से जिससे सर्वाधिक महिमावान बताते हैं, वह है—उनका 'भक्त'। संसार में भक्तों की महिमा अपार, अगम्य और असीम है। भक्त केवल वह नहीं जो कुछ कर्मकाण्ड करता है, अपितु भक्त वह है जिसके हृदय में भगवान ने अपना स्थायी निवास बना लिया है। आइए विस्तार से जानें कि ऋषियों की दृष्टि में त्रिलोकी में सबसे बड़ा कौन है, और श्रीमद्भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के अनुसार भक्त जब मृत्योपरांत अपने आराध्य के लोक में जाते हैं, तो वहां उनकी किस प्रकार की गति (मुक्ति) होती है?
संसार में सबसे बड़ा कौन? (ऋषियों का अद्भुत संवाद)
एक बार नैमिषारण्य के पवित्र वन में महान ऋषियों और मुनियों का विशाल समागम हुआ। वहां एक अत्यंत गूढ़ और तात्त्विक विषय पर विचार-विमर्श छिड़ गया कि "इस अनंत ब्रह्माण्ड में, इस चराचर संसार में सबसे बड़ा कौन है? वह सर्वोच्च सत्ता या तत्व कौन सा है, जिसका भजन और ध्यान किया जाना चाहिए?" इस प्रश्न के उत्तर में अलग-अलग ऋषियों ने अपनी-अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े ही सुंदर और तर्कपूर्ण उत्तर दिए।
एक ऋषि ने उठकर कहा—"मेरी दृष्टि में पृथ्वी सबसे बड़ी है। यह माता है, जो विशाल पर्वतों, अथाह महासागरों, असंख्य जीवों और अनंत वनस्पतियों का भार बिना किसी शिकायत के सहन करती है। यह सारे संसार को धारण किए हुए है, इसलिए पृथ्वी से बड़ा कोई नहीं हो सकता।"
यह सुनकर दूसरे ऋषि ने मुस्कराते हुए अपना मत प्रस्तुत किया—"हे मुनिवर! पृथ्वी निस्संदेह विशाल है, परन्तु उस पृथ्वी को शेष भगवान (अनंतनाग) ने अपने सहस्र फणों पर एक अत्यंत छोटे से धूल के कण (सरसों के दाने) के समान धारण कर रक्खा है। जिस पृथ्वी को हम इतना विशाल मानते हैं, वह शेषनाग जी के एक फण पर टिक कर भी उनका कुछ भार नहीं बढ़ा पाती। अतः, निसंदेह शेष भगवान ही सबसे बड़े हैं।"
सभा में उपस्थित तीसरे ज्ञानी ऋषि ने इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहा—"आपका कथन सत्य है, परन्तु विचार कीजिए कि उन अनंत शक्ति वाले शेषनाग को भगवान शंकर (महादेव) ने अपने गले और हृदय पर एक सामान्य आभूषण (हार) की तरह बड़ी सहजता से धारण कर रक्खा है। जो शेषनाग ब्रह्माण्ड का भार उठाते हैं, वे शिवजी के कंठ की शोभा मात्र हैं। अतः, देवों के देव भगवान शंकर ही सबसे बड़े हैं।"
चौथे ऋषि ने इतिहास और पुराणों का संदर्भ देते हुए कहा—"महादेव की महिमा अनंत है, परन्तु उन शिवजी के निवासस्थान 'कैलास पर्वत' को, स्वयं शिव और पार्वती के सहित, दशानन रावण ने अपनी भुजाओं के बल पर उठा लिया था। उस महापराक्रमी रावण को वानरराज बालि ने युद्ध में सहज ही जीत लिया और उसे छः मास तक अपनी कांख में दबाए रखा। और उस अजेय बालि का वध भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने एक ही बाण में कर दिया। अतः, इस पूरे घटनाक्रम और शक्ति के स्रोत को देखते हुए, साक्षात् परब्रह्म भगवान श्रीराम ही इस संसार में सबसे बड़े हैं।"
सभा में पूर्ण शांति छा गई। श्रीराम को सर्वश्रेष्ठ मान लिया गया। तभी एक वयोवृद्ध और प्रेमानंद में डूबे हुए पांचवे ऋषि खड़े हुए। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे थे। उन्होंने अत्यंत गदगद कंठ से कहा—"हे तपस्वियों! आप सभी के तर्क अपनी-अपनी जगह अकाट्य हैं। भगवान श्रीराम निःसंदेह अखिल ब्रह्माण्ड के नायक और सबसे बड़े हैं। परन्तु ज़रा सोचिए, ऐसे अनंत कोटि ब्रह्माण्ड नायक, परम शक्तिशाली परमात्मा श्रीराम को एक भक्त अपने एक छोटे से हृदय में अत्यंत सरलता से प्रेमपूर्वक बांधकर (धारण करके) रखता है। भगवान स्वयं अपने भक्त के हृदय से बाहर नहीं जाना चाहते। इसलिए, मेरी दृष्टि में स्वयं भगवान से भी बड़ा उनका 'भक्त' है। त्रिलोकी में भक्त ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वह भगवान को भी अपने प्रेम के वशीभूत कर लेता है।"
ऋषि का यह निष्कर्ष सुनकर पूरी सभा ने एक स्वर में इसका अनुमोदन किया। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में कहा है—"मोरे मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा॥" (अर्थात्, भगवान राम से भी अधिक महिमावान राम के दास या भक्त होते हैं।)
भक्तों की मुक्ति किस प्रकार की होती है?
जब भक्त की महिमा स्वयं भगवान से भी अधिक है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि जिस मुक्ति को पाने के लिए बड़े-बड़े तपस्वी, ज्ञानी और योगी जन्म-जन्मांतर तक कठोर साधना करते हैं, मृत्युपर्यंत उस भक्त की किस प्रकार की गति होती है? क्या भक्त संसार के आवागमन में फँसता है, या उसे परम धाम की प्राप्ति होती है?
इस गूढ़ रहस्य का उत्तर स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय (अक्षरब्रह्मयोग) में दिया है। भगवान सकाम कर्म और ज्ञान मार्ग की कठिनाइयों को दूर करते हुए भक्ति मार्ग की सुगमता का वर्णन करते हैं:
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ (गीता ८.१४)
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ (गीता ८.१४)
भावार्थ एवं दर्शन:
भगवान कहते हैं—"हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर (अर्थात् संसार के अन्य सभी आश्रयों और विचारों को छोड़कर केवल मेरे ही प्रेम में डूबकर) सदा ही निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी (भक्त) के लिए मैं अत्यंत सुलभ हूँ, अर्थात् मैं उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।"
यहाँ 'सुलभ' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। ज्ञानियों को परमात्मा की प्राप्ति अत्यंत क्लेश और परिश्रम के बाद होती है (क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तासक्तचेतसाम्), परन्तु अनन्य भक्त के लिए भगवान स्वयं दौड़ कर आते हैं। भगवान के वचनानुसार, मृत्यु के पश्चात् भक्त सीधे अपने आराध्य के लोक (वैकुण्ठ, गोलोक, साकेत अथवा शिवलोक) में जाते हैं।
भगवद्धाम में ५ प्रकार की मुक्ति
शास्त्रों और पुराणों के अनुसार, जब एक विशुद्ध भक्त अपने भौतिक शरीर का त्याग करके चिन्मय धाम में प्रवेश करता है, तो वहां भगवान उसे ५ प्रकार की मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करते हैं। यह भक्त के भाव और उसकी साधना के स्तर पर निर्भर करता है:
१. सालोक्य-मुक्ति: 'स' अर्थात् समान, 'लोक्य' अर्थात् लोक। भगवान के परम धाम (जैसे वैकुण्ठ या गोलोक) में निवास प्राप्त करना सालोक्य मुक्ति है। इसमें भक्त को भगवान के ही लोक में रहने का अधिकार मिल जाता है, जहां कोई दुःख, शोक या मृत्यु नहीं है। वह भगवान के लोक में एक साधारण निवासी या सेवक बनकर परमानंद में रहता है।
२. सार्ष्टि-मुक्ति: 'सार्ष्टि' का अर्थ है समान ऐश्वर्य। इस मुक्ति में भक्त को भगवान के समान ही अष्ट-सिद्धियां, नवनिधियां और अलौकिक ऐश्वर्य प्राप्त हो जाते हैं। यद्यपि वह ऐश्वर्य का स्वामी हो जाता है, परन्तु फिर भी वह उस ऐश्वर्य का उपयोग केवल और केवल अपने आराध्य की सेवा और उनकी प्रसन्नता के लिए ही करता है।
३. सारुप्य-मुक्ति: 'सारुप्य' अर्थात् भगवान के समान रूप (स्वरूप) प्राप्त कर लेना। वैकुण्ठ में प्रवेश करने वाले भक्तों को भगवान नारायण के समान ही चतुर्भुज रूप (शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए) प्राप्त हो जाता है। उनका रंग, आभूषण और वस्त्र भगवान जैसे ही हो जाते हैं। (भेद केवल इतना रहता है कि भक्त के वक्षस्थल पर 'श्रीवत्स' का चिह्न और 'कौस्तुभ मणि' नहीं होती, जो केवल भगवान के पास होती है)।
४. सामीप्य-मुक्ति: 'सामीप्य' का अर्थ है सदा भगवान के समीप (पास) रहना। इस मुक्ति को प्राप्त करने वाला भक्त भगवान का अत्यंत अंतरंग पार्षद बन जाता है। वह हर क्षण भगवान के आभूषण (जैसे मुकुट, कौस्तुभ), उनके अस्त्र-शस्त्र, उनका व्यजन (पंखा) झलने वाला या उनके रथ का सारथी बनकर सदैव उनके सान्निध्य का अमृत पीता रहता है।
५. सायुज्य-मुक्ति: 'सायुज्य' का अर्थ है भगवान के श्रीविग्रह (स्वरूप) में या उनके ब्रह्मज्योति (प्रकाश) में पूरी तरह से विलीन (merge) हो जाना। इसमें भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है और जीव पूर्ण रूप से परमात्मा में समा जाता है। (यद्यपि ज्ञानी लोग इसी मुक्ति की कामना करते हैं, परन्तु शुद्ध भक्त इसे स्वीकार नहीं करते, क्योंकि इसमें भगवान की 'सेवा' का आनंद समाप्त हो जाता है)।
जिस भक्त को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह माया के कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। वह चाहे तो भगवान की इच्छा से, उनके साथ या अलग से, धर्म की स्थापना और संतों के उद्धार के लिए संसार में 'दिव्य जन्म' ले सकता है। संसार में भगवत्कार्य (लीला) समाप्त करके वह पुन: अपने भगवद्धाम को लौट जाता है। उसका जन्म प्राकृत (साधारण) नहीं, अपितु अप्राकृत होता है।
भगवान का वचन सत्य करती एक लोक कथा: 'तुलसा महारानी और श्रीकृष्ण का कंधा'
भगवान अपने भक्तों की अत्यंत छोटी और सरल प्रार्थनाओं को भी किस प्रकार सुनते हैं और उन्हें पूर्ण करते हैं, यह कार्तिक माहात्म्य से जुड़ी इस अत्यंत मार्मिक और प्रचलित लोक कथा से सिद्ध होता है।
कहा जाता है कि एक गाँव में एक अत्यंत वृद्ध, सरल और भोली बुढ़िया रहती थी। उसका इस संसार में कोई अपना नहीं था। उसका पूरा जीवन भगवान की भक्ति में समर्पित था। कार्तिक का पवित्र महीना चल रहा था। वह बुढ़िया प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठती, स्नान करती और अपने आंगन में लगे तुलसी जी के पौधे को बड़े प्रेम से सींचती। जल चढ़ाते समय वह नित्यप्रति एक ही प्रार्थना गाती थी—
"हे तुलसा महारानी, हरि की पटरानी !
यदि मैं सच्चे मन से तेरा बिरवा (पौधा) सीचती हूँ,
तो मुझे चटक की चाल दे, पटक की ग्यारस की मोंत दे,
चंदन का काठ दे, और श्रीकृष्ण का कंधा दे !"
यदि मैं सच्चे मन से तेरा बिरवा (पौधा) सीचती हूँ,
तो मुझे चटक की चाल दे, पटक की ग्यारस की मोंत दे,
चंदन का काठ दे, और श्रीकृष्ण का कंधा दे !"
प्रार्थना का गूढ़ अर्थ:
इस सरल ग्रामीण भाषा में अत्यंत गहरा रहस्य छिपा था। 'चटक की चाल' का अर्थ है जीवन भर शरीर स्वस्थ रहे, किसी पर आश्रित न होना पड़े। 'पटक की ग्यारस की मौत' का अर्थ है कि मृत्यु एकादशी के पावन दिन अचानक बिना किसी लंबी बीमारी के आए। 'चंदन का काठ' अर्थात् अंतिम संस्कार पवित्र चंदन की लकड़ियों से हो। और अंत में सबसे बड़ी मांग—'श्रीकृष्ण का कंधा दे', अर्थात् मेरी अर्थी को स्वयं परमात्मा आकर अपना कंधा दें।
रोज-रोज बुढ़िया की यह अनोखी प्रार्थना सुन कर तुलसी माता अत्यंत चिंतित हो गईं और धीरे-धीरे सूखने लगीं। तुलसी जी जानती थीं कि बाकी सब वरदान देना तो संभव है, परन्तु साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्ण को बुढ़िया की अर्थी उठाने के लिए विवश करना अत्यंत कठिन है। एक दिन भगवान नारायण ने अपनी प्रिय तुलसी को कुम्हलाते देखा तो पूछा–"हे प्रिये ! तुम्हारे पत्ते क्यों पीले पड़ रहे हैं? तुम क्यों सूख़ रही हो?"
तुलसी जी ने अत्यंत व्यथा के साथ कहा—"प्रभु! पृथ्वी पर एक बुढ़िया रोज आती है और मुझे जल चढ़ाकर कहती है कि मुझे चटक की चाल, ग्यारस की मौत और चंदन का काठ दे। बुढ़िया की यह सब बातें पूरा करना तो मेरे वश में है; किंतु वह अंत में मांगती है कि 'मुझे श्रीकृष्ण का कंधा दे'। हे नाथ! मैं उसे कृष्ण का कंधा कैसे दिला सकती हूँ? यह मेरे वश में नहीं है, इसलिए मैं उसकी भक्ति के ऋण के भार से सूख रही हूँ।"
अपने भक्त की ऐसी निष्कपट चाहत और तुलसी जी की चिंता को देखकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण प्रेम से गदगद हो गए। वे मुस्कुराते हुए बोले—"हे प्रिये! तुम तनिक भी चिंता मत करो। जो मुझ पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है, मैं उसका ऋणी हो जाता हूँ। जब उस बुढ़िया का अंत समय आएगा, तो मैं अपने-आप मृत्युलोक जाकर उसकी अर्थी को कंधा दे आऊंगा। तुम निसंकोच बुढ़िया से यह वचन कह देना।"
समय बीतता गया। एक दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी (ग्यारस) के पुण्य अवसर पर उस बुढ़िया ने बड़ी शांति से अपने प्राण त्याग दिए। उसे 'चटक की चाल' और 'पटक की ग्यारस की मौत' मिल चुकी थी। गाँव के सब लोग उसे अंतिम-संस्कार के लिए ले जाने के लिए आ गए। चंदन की लकड़ियों का भी प्रबंध हो गया। चार लोगों ने जब उसकी अर्थी को उठाना चाहा, तो एक चमत्कार हुआ। वह अर्थी धरती से रत्ती भर भी नहीं उठी। मानो वह सुमेरु पर्वत से भी भारी हो गई हो। पूरा गाँव मिलकर भी उस दुबली-पतली बुढ़िया की अर्थी को हिला नहीं सका।
उसी समय भीड़ चीरता हुआ एक अत्यंत मनमोहक, घुंघराले बालों वाला, सांवला सलोना बारह वर्ष का बालक वहां आया। बालक ने बुढ़िया के कानों के पास जाकर अत्यंत मधुर स्वर में फुसफुसाया—"माई! मन की निकाल ले, ले अपने कृष्ण का कंधा ले।"
इतना सुनते ही मानो बुढ़िया की आत्मा को परम तृप्ति मिल गई। उसका पार्थिव शरीर अचानक फूल से भी हल्का हो गया। भगवान ने स्वयं उस बालक के रूप में उसकी अर्थी को अपना कंधा दिया। श्मशान ले जाकर उसका अंतिम संस्कार हुआ और उस जन्म-मरण के चक्र से छूटकर बुढ़िया को परम मुक्ति (भगवद्धाम) मिल गई।
ऐसी होती है भगवान के अनन्य भक्तों की महिमा और उनकी दिव्य मुक्ति! भगवान अपने भक्त का मान रखने के लिए स्वयं वैकुण्ठ से चलकर धरती पर आ जाते हैं।
गोपी-प्रेम: मुक्ति का तिरस्कार और भागवती मुक्ति की सर्वोच्चता
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में जब श्री शुकदेव जी महाराज महाराज परीक्षित को रास पंचाध्यायी सुना रहे थे, तो वे बड़ी उमंग व तन्मयता से व्रज की गोपीजनों के अलौकिक प्रेम का वर्णन कर रहे थे। गोपियों का प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वे लोक-लाज, वेद की मर्यादा और अपने परिवार को छोड़कर आधी रात में वंशी की ध्वनि सुनकर वन की ओर दौड़ पड़ी थीं।
इस वर्णन को सुनकर राजा परीक्षित के मन में एक शंका उत्पन्न हुई। वे बीच में ही बोल उठे–"हे महामुनि! वे गोपिकाएं तो भगवान को केवल अपना एक 'प्रियजन' (प्रेमी या पति) मानती थीं। उनका श्रीकृष्ण में 'ब्रह्मभाव' (ईश्वरत्व का ज्ञान) तो था नहीं। वे तो उन्हें नन्द बाबा का पुत्र ही समझती थीं। फिर ज्ञान के बिना उन्हें इस घोर संसार से मुक्ति कैसे मिल गयी? शास्त्रों का मत है कि 'ज्ञानात् एव तु कैवल्यम्' (मुक्ति तो ज्ञान के बिना होती नहीं)।"
शुकदेव जी को यह प्रश्न सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वे मुस्कुराए और बोले–"राजन्! तुम गोपियों की और मुक्ति की बात करते हो! ज़रा विचार करो, जब स्तनों पर कालकूट विष लगाकर मारने की भावना से आने वाली बालघातिनी राक्षसी 'पूतना' और तीन जन्मों तक भगवान को गालियां देने वाले दुष्टबुद्धि 'शिशुपाल' को केवल श्रीकृष्ण से द्वेष करने के कारण ही मुक्त कर दिया गया, तब उन गोपियों के विषय में क्या कहना जो श्रीकृष्ण की प्राणाधिका प्रियाएं थीं!"
शुकदेव जी ने एक परम दार्शनिक सिद्धांत स्थापित किया—"राजन्! परमात्मा श्रीकृष्ण से कैसा भी सम्बन्ध हो–चाहे वह काम का हो (जैसे गोपियों का), क्रोध या द्वेष का हो (जैसे कंस और शिशुपाल का), भय का हो (जैसे कंस का), या वात्सल्य और स्नेह का हो (जैसे नन्द-यशोदा का)–सम्बन्ध निरंतर और अनन्य होना चाहिए। जब उनसे द्वेष करने पर असुरों के सारे पाप जलकर भस्म हो जाते हैं और उन्हें मुक्ति मिल जाती है, तो प्रेम करने वालों को, उनमें भी गोपियों को, जिन्होंने अपना सर्वस्व (मन, प्राण, आत्मा) उन प्रभु को ही समझ रखा है–उन्हें क्या मिला, यह तो साक्षात् ब्रह्मा और शिव भी नहीं बता सकते। उनकी तो बात ही क्या चलानी! भगवान स्वयं उनके ऋणी हो गए।"
श्रीमद्भागवत में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण उद्धव जी से गोपीजनों की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं–
"जो मेरे गोपीजन हैं, वे मेरी सेवा के अतिरिक्त इन्द्र का पद, ब्रह्मा का पद, यहाँ तक कि सायुज्य 'मुक्ति' भी स्वीकार नहीं करते। ऐसे इच्छारहित, शान्त, निर्वैर और समदर्शी भक्तों की चरण-रज (धूल) से अपने-आपको पवित्र करने के लिए मैं सदा उनके पीछे-पीछे घूमा करता हूँ।"
ब्रजरज की महिमा और मुक्ति की विडंबना:
गोपियों के लिए मुक्ति (मोक्ष) कोई बहुत बड़ा आकर्षण नहीं है। वे मुक्ति को एक दासी से अधिक महत्व नहीं देतीं। उनके लिए श्रीकृष्ण की एक मुस्कान और उनके दर्शन के सामने चारों प्रकार की (सालोक्य, सार्ष्टि, सारुप्य, सामीप्य) मुक्तियां अत्यंत तुच्छ हैं। ब्रजमंडल के रसिक संतों ने गोपी-प्रेम की इस अवस्था का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है:
या ब्रजरज के परस (स्पर्श) से, मुकति मिलत हैं चार ।
वा रज को नित गोपिका, डारत डगर बुहार ।।
वा रज को नित गोपिका, डारत डगर बुहार ।।
भावार्थ: जिस ब्रज की धूल (रज) के मात्र एक स्पर्श से बड़े-बड़े तपस्वियों को चारों प्रकार की मुक्तियां सहज ही प्राप्त हो जाती हैं, उसी ब्रज की रज को माता यशोदा और गोपियां नित्य सुबह अपने घर के आंगन से झाड़ू लगाकर (बुहार कर) रास्ते (डगर) पर कूड़े के समान फेंक देती हैं! मैया के लिए तो वह केवल धूल है जो उनके लाला के वस्त्र गंदे कर देगी। अब विचार कीजिए कि वहां मुक्ति किसको चाहिए? मैया ने तो केवल अपने कन्हैया को चाहा है, मोक्ष को नहीं।
यहाँ तक कि स्वयं 'मुक्ति' रूपी देवी भी अपने आप को धन्य करने और अपने मोक्ष के लिए उस ब्रज की पवित्र रज (धूल) को प्राप्त करने के लिए लालायित रहती है, जहां गोपीजन और भगवान निवास करते थे। संत कहते हैं:
मुक्ति कहै गोपाल सौं मेरी मुक्ति बताय ।
ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त होइ जाय ।।
ब्रज रज उड़ि मस्तक लगै मुक्ति मुक्त होइ जाय ।।
भावार्थ: साक्षात् मुक्ति देवी भगवान गोपाल से प्रार्थना करती हैं कि "हे प्रभु! मेरा उद्धार (मुक्ति) कैसे होगा?" तब भगवान कहते हैं कि "जब व्रज की धूल उड़कर तुम्हारे मस्तक पर लगेगी, तब तुम जैसी 'मुक्ति' भी मुक्त होकर प्रेम-भक्ति को प्राप्त कर लेगी।"
निष्कर्ष: भागवती मुक्ति का स्वरूप
उपर्युक्त आख्यानों से यह सिद्ध होता है कि सच्चे वैष्णव और भगवद्भक्त 'सायुज्य मुक्ति' (भगवान में लीन होना) इसलिए स्वीकार नहीं करते; क्योंकि लीन हो जाने पर भगवान की सेवा का जो असीम आनंद और रस है, वह समाप्त हो जाता है। वे भगवान से अलग रहकर उनकी सेवा करना चाहते हैं।
वैष्णवों और गोपीजनों को जो सबसे सर्वोच्च गति प्राप्त होती है, उसे शास्त्रों में 'भागवती मुक्ति' (प्रेमा भक्ति) कहते हैं। इस अवस्था में भक्त भगवान के धाम (वैकुण्ठ या गोलोक वृंदावन) में एक अति दिव्य, चिन्मय और अप्राकृत (आध्यात्मिक) रूप धारण कर लेते हैं। वे नित्य-निरंतर भगवान की प्रेमा-भक्ति में लीन रहते हैं, उन्हें अपने हाथों से सजाते हैं, खिलाते हैं, और उनकी अनंत लीलाविलास में सम्मिलित होकर उस आनंद का रसास्वादन करते हैं, जो साक्षात् ब्रह्मानंद से भी करोड़ों गुना अधिक मधुर है। यही भक्तों की सच्ची और परम मुक्ति है।




