महाभारत के 18 पर्व: नाम याद रखने का सूत्र, अध्याय संख्या और कथा सारांश

Sooraj Krishna Shastri
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महाभारत के 18 पर्व: संक्षिप्त सूत्र, अध्याय संख्या और उनका विस्तृत वर्णन
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत सनातन धर्म का सबसे विशाल महाकाव्य है। इसमें एक लाख श्लोक हैं, जिस कारण इसे 'शतसाहस्री संहिता' भी कहा जाता है। महाभारत मात्र एक युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, नीति, राजनीति, दर्शन और जीवन-मूल्यों का विश्वकोश है। महाभारत की पूरी कथा १८ भागों में विभाजित है, जिन्हें 'पर्व' कहा जाता है।
इन 18 पर्वों के नाम क्रमानुसार याद रखने के लिए ऋषियों और विद्वानों ने एक अत्यंत सरल और अद्भुत सूत्र (Mnemonic) बनाया है:
आ-स-व-वि-उ-भी-द्रो-क-श-सौ-स्त्री-शा-अ-आ-आ-मौ-म-स्व
महाभारत के 18 पर्व और उनके अध्यायों की सूची
महाभारत के किस पर्व में कितने अध्याय (Chapters) हैं, इसका विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत है:
क्रम पर्व का नाम अध्यायों की संख्या (लगभग)
आदि पर्व (Adi Parva)२३६
सभा पर्व (Sabha Parva)८१
वन पर्व / अरण्यक पर्व (Vana Parva)३१५
विराट पर्व (Virata Parva)७२
उद्योग पर्व (Udyoga Parva)१९९
भीष्म पर्व (Bhishma Parva)१२२
द्रोण पर्व (Drona Parva)२०२
कर्ण पर्व (Karna Parva)९६
शल्य पर्व (Shalya Parva)६५
१०सौप्तिक पर्व (Sauptika Parva)१८
११स्त्री पर्व (Stri Parva)२७
१२शांति पर्व (Shanti Parva)३६५
१३अनुशासन पर्व (Anushasana Parva)१६७
१४आश्वमेधिक पर्व (Ashvamedhika Parva)९२
१५आश्रमवासिक पर्व (Ashramavasika Parva)३९
१६मौसल पर्व (Mausala Parva)
१७महाप्रस्थानिक पर्व (Mahaprasthanika Parva)
१८स्वर्गारोहण पर्व (Svargarohana Parva)
*नोट: गीता प्रेस (गोरखपुर) और भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) के भिन्न-भिन्न संस्करणों के आधार पर अध्यायों की संख्या में आंशिक भिन्नता हो सकती है।
18 पर्वों का विस्तृत वर्णन
आइए इस सूत्र के प्रत्येक अक्षर का विस्तार से अर्थ और उस पर्व की मुख्य घटनाओं को जानें:
१. आ - आदि पर्व
यह महाभारत का प्रथम पर्व है। इसमें कुरु वंश की उत्पत्ति, राजा दुष्यंत और शकुंतला की कथा, कौरवों और पाण्डवों का जन्म, उनकी शिक्षा-दीक्षा, लाक्षागृह का षड्यंत्र, द्रौपदी स्वयंवर और इन्द्रप्रस्थ की स्थापना का विस्तार से वर्णन है।
२. स - सभा पर्व
इस पर्व में मय दानव द्वारा युधिष्ठिर के लिए एक अद्भुत और मायावी सभा-भवन (इन्द्रप्रस्थ) का निर्माण किया जाता है। युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ, दुर्योधन की ईर्ष्या, शकुनि का कपट-द्यूत (चौसर का खेल), द्रौपदी का चीरहरण और अंततः पाण्डवों के वनवास जाने की हृदयविदारक घटना इसी पर्व में है।
३. व - वन पर्व (अरण्यक पर्व)
यह महाभारत के सबसे बड़े पर्वों में से एक है। इसमें पाण्डवों के १२ वर्ष के कठिन वनवास का वर्णन है। ऋषियों के साथ तीर्थयात्रा, नल-दमयंती और सावित्री-सत्यवान की कथाएँ, जयद्रथ द्वारा द्रौपदी का हरण-प्रयास और यक्ष-युधिष्ठिर का प्रसिद्ध संवाद इसी पर्व का हिस्सा हैं।
४. वि - विराट पर्व
वनवास के बाद पाण्डवों के एक वर्ष के 'अज्ञातवास' की कथा। पाण्डव छद्म वेश धारण करके राजा विराट के यहाँ नौकरी करते हैं। इसी दौरान भीम द्वारा कीचक का वध और कौरवों का विराट नगर पर आक्रमण करने पर अर्जुन द्वारा उन्हें परास्त करने का प्रसंग है।
५. उ - उद्योग पर्व
अज्ञातवास पूर्ण होने पर पाण्डव अपना राज्य वापस मांगते हैं। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं 'शांतिदूत' बनकर कौरवों की सभा में जाते हैं, परन्तु दुर्योधन सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से मना कर देता है। युद्ध की तैयारियां और दोनों पक्षों द्वारा सेनाएं जुटाने का 'उद्योग' (प्रयास) इसी पर्व में वर्णित है।
६. भी - भीष्म पर्व
कुरुक्षेत्र के महायुद्ध का आरंभ! कौरव सेना के प्रथम सेनापति भीष्म पितामह बनते हैं। युद्ध के प्रथम दिन अर्जुन को मोहग्रस्त देखकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें विश्व-प्रसिद्ध 'श्रीमद्भगवद्गीता' का उपदेश इसी पर्व में देते हैं। दसवें दिन भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर गिर पड़ते हैं।
७. द्रो - द्रोण पर्व
भीष्म के बाद गुरु द्रोणाचार्य कौरवों के सेनापति बनते हैं। इसी पर्व में चक्रव्यूह की रचना होती है और वीर अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त होता है। जयद्रथ का वध, घटोत्कच की मृत्यु और अंततः गुरु द्रोणाचार्य का वध इस पर्व की मुख्य घटनाएँ हैं।
८. क - कर्ण पर्व
द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात् सूर्यपुत्र कर्ण कौरव सेना का सेनापति बनता है। दुःशासन का वध और अंत में अर्जुन व कर्ण के बीच हुए भयंकर युद्ध तथा कर्ण के वध का वर्णन इस पर्व में है।
९. श - शल्य पर्व
कर्ण के बाद राजा शल्य सेनापति बनते हैं जो उसी दिन मारे जाते हैं। कौरव सेना का पूर्ण विनाश हो जाता है। दुर्योधन भयभीत होकर द्वैपायन सरोवर में छिप जाता है। भीम और दुर्योधन के गदा-युद्ध और दुर्योधन की जांघ तोड़े जाने का वृत्तांत इसी पर्व में है।
१०. सौ - सौप्तिक पर्व
रात के अंधेरे में, जब पाण्डव शिविर में सब सो रहे थे (सुप्त अवस्था में), तब अश्वत्थामा ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पांचों पुत्रों (उपपाण्डवों) की कायरतापूर्वक हत्या कर दी।
११. स्त्री - स्त्री पर्व
यह अत्यंत करुण पर्व है। युद्ध में मारे गए लाखों वीरों की पत्नियों और माताओं (विशेषकर माता गांधारी और कुंती) का विलाप इसमें वर्णित है। अपने पुत्रों के शव देखकर गांधारी भगवान श्रीकृष्ण को यदुवंश के सर्वनाश का शाप देती हैं।
१२. शा - शांति पर्व
यह महाभारत का सबसे बड़ा पर्व है। युद्ध के बाद युधिष्ठिर को भारी पश्चाताप और वैराग्य होता है। तब श्रीकृष्ण उन्हें शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह के पास ले जाते हैं। भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म का अत्यंत गूढ़ और विस्तृत उपदेश देते हैं, जिससे उन्हें 'शांति' मिलती है।
१३. अ - अनुशासन पर्व
भीष्म पितामह का उपदेश जारी रहता है। इसमें दान-धर्म और सदाचार के नियम बताए गए हैं। इसी पर्व में प्रसिद्ध 'विष्णु सहस्रनाम' (भगवान विष्णु के 1000 नाम) और 'शिव सहस्रनाम' का पाठ है। उपदेश पूर्ण होने के बाद सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म पितामह स्वेच्छा से अपने प्राण त्याग देते हैं।
१४. आ - आश्वमेधिक पर्व
पापों की शांति के लिए महर्षि व्यास के निर्देश पर युधिष्ठिर 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन करते हैं। इसी पर्व में श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का सार पुनः सुनाते हैं, जिसे 'अनुगीता' कहा जाता है।
१५. आ - आश्रमवासिक पर्व
पाण्डवों के साथ कई वर्ष रहने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, विदुर और संजय संन्यास लेकर वन (आश्रम) चले जाते हैं। अंत में एक भीषण दावानल (जंगल की आग) में योगयुक्त होकर वे अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं।
१६. मौ - मौसल पर्व
गांधारी का शाप फलीभूत होता है। द्वारका में अपशकुन होने लगते हैं। यदुवंशी मदिरा पान करके प्रभास क्षेत्र में एक लोहे की छड़ (मूसल) से उपजी एरक घास (सरकंडों) से आपस में लड़कर एक-दूसरे का सर्वनाश कर देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी एक व्याध (जरा) का बाण लगने के बाद स्वधाम लौट जाते हैं।
१७. म - महाप्रस्थानिक पर्व
श्रीकृष्ण के गोलोक गमन के बाद पाण्डवों का इस संसार से मोहभंग हो जाता है। वे परीक्षित को राजा बनाकर द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर अंतिम यात्रा (महाप्रस्थान) पर निकल पड़ते हैं। रास्ते में द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम एक-एक करके गिरकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। एक कुत्ता युधिष्ठिर के साथ चलता रहता है।
१८. स्व - स्वर्गारोहण पर्व
महाभारत का यह अंतिम पर्व है। युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग पहुँचते हैं। वहां उन्हें कुछ समय के लिए नरक का दर्शन कराया जाता है और अंततः वे अपने भाइयों, द्रौपदी और कौरवों को उनके वास्तविक देव-स्वरूपों में देखते हैं। इसके साथ ही इस महान महाकाव्य की पूर्णता होती है।
निष्कर्ष
महाभारत के संबंध में महर्षि वेदव्यास जी ने स्वयं उद्घोष किया है— "यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्" (अर्थात् जो इस ग्रंथ में नहीं है, वह इस संसार में कहीं और नहीं है)। इन 18 पर्वों को उनके अध्यायों सहित क्रमानुसार याद रखना भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों को समझने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

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