श्रीमद्भागवत महापुराण: पूतना वध और अहैतुकी कृपा (१० महत्त्वपूर्ण श्लोकों सहित)

Sooraj Krishna Shastri
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श्रीमद्भागवत महापुराण: पूतना वध और अहैतुकी कृपा (१० महत्त्वपूर्ण श्लोकों सहित)
श्रीमद्भागवत महापुराण का दशम स्कन्ध साक्षात् परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण का हृदय है। इस स्कन्ध के छठे अध्याय में वर्णित पूतना वध की कथा केवल एक राक्षसी के संहार की ऐतिहासिक घटना नहीं है, अपितु यह वेदान्त के गूढ़ रहस्यों, अविद्या के नाश और भगवान की 'अहैतुकी कृपा' (बिना किसी कारण के की गई दया) का सबसे उज्ज्वल और प्रामाणिक आख्यान है।

प्रस्तुत विशुद्ध मूल पाठ (दशम स्कन्ध, षष्ठ अध्याय) के आधार पर, इस अलौकिक प्रसंग को १० सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण श्लोकों और उनके विस्तृत दार्शनिक, तात्त्विक तथा भक्तिपरक विश्लेषण के साथ यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
Pootna Uddhar, Krishna Leela, Bhagwat
Pootna Uddhar, Krishna Leela, Bhagwat 

१. पृष्ठभूमि: कंस का भय और मृत्यु का दूत 'पूतना'
मथुरा के कारागार में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ और वसुदेव जी उन्हें रातों-रात गोकुल में नन्द बाबा के भवन में पहुँचा आए। जब कंस को आकाशवाणी से यह ज्ञात हुआ कि उसका वध करने वाला कहीं जन्म ले चुका है, तो भय और क्रोध से वशीभूत होकर उसने अपने राज्य में नवजात शिशुओं की हत्या का एक अत्यंत क्रूर और अमानवीय अभियान प्रारंभ कर दिया। इस कार्य के लिए उसने 'पूतना' नामक एक महाभयंकर राक्षसी को चुना।
कंसेन प्रहिता घोरा पूतना बालघातिनी ।
शिशूंश्चचार निघ्नन्ती पुरग्रामव्रजादिषु ॥ २ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
महर्षि शुकदेव जी कहते हैं कि कंस द्वारा भेजी गई वह अत्यंत भयानक मुख वाली, बालकों की हत्या करने वाली (बालघातिनी) पूतना नाम की राक्षसी नगरों, ग्रामों और अहीरों की बस्तियों (व्रजों) में नवजात शिशुओं को मारती हुई घूमने लगी।
आध्यात्मिक दृष्टि से 'कंस' जीव का अहंकार है और 'पूतना' अविद्या (अज्ञान) है। अहंकार हमेशा ज्ञान (कृष्ण) के प्राकट्य से डरता है। इसलिए अहंकार अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए अविद्या रूपी पूतना को भेजता है ताकि वह जीव के अंतःकरण में जन्म लेने वाले भक्ति और ज्ञान रूपी शिशु को प्रारंभ में ही नष्ट कर दे। यह राक्षसी जहाँ-जहाँ जाती, वहाँ-वहाँ माताओं की गोद सूनी कर देती थी। उसका हृदय पाषाण के समान कठोर था और उसे किसी के रुदन से कोई दया नहीं आती थी।
२. मायाविनी का गोकुल में प्रवेश
पूतना कोई साधारण राक्षसी नहीं थी। वह आकाश मार्ग से गमन करने वाली (खेचरी विद्या जानने वाली) और इच्छानुसार रूप बदलने वाली मायाविनी थी। जब वह गोकुल पहुँची, तो उसने अपने भयंकर स्वरूप को छिपा लिया।
सा खेचर्येकदोत्पत्य पूतना नन्दगोकुलम् ।
योषित्वा माययाऽऽत्मानं प्राविशत् कामचारिणी ॥ ४ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
आकाश में उड़ने वाली और अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाली (कामचारिणी) वह पूतना एक दिन उड़ती हुई नन्द बाबा के गोकुल में आ पहुँची। वहाँ उसने अपनी मायावी विद्या से स्वयं को एक अत्यंत सुंदर और लावण्यमयी स्त्री (योषित) के रूप में परिवर्तित कर लिया और बिना किसी रोक-टोक के नन्दभवन में प्रवेश कर गई।
माया का यह सबसे बड़ा लक्षण है—वह बाहर से अत्यंत आकर्षक, लुभावनी और निर्दोष प्रतीत होती है, परन्तु भीतर से वह विषैली और विनाशकारी होती है। पूतना ने अपने केशों में मल्लिका के पुष्प गूँथ रखे थे, उसके वस्त्र बहुमूल्य थे, और उसकी चाल में ऐसा आकर्षण था कि ब्रज की गोपियों को लगा मानो साक्षात् भगवती लक्ष्मी कमल का फूल हाथ में लेकर अपने पति भगवान नारायण की खोज में नन्दभवन में पधारी हों। अज्ञान जब विद्या का रूप धारण करके आता है, तो बड़े-बड़े ज्ञानी भी धोखा खा जाते हैं; यही कारण है कि माता यशोदा और रोहिणी भी उस सुंदरी के सम्मोहन में फँस गईं और उसे शिशु के पास जाने से नहीं रोका।
३. भस्म में छिपी अग्नि: परब्रह्म का दर्शन
मायाविनी पूतना ने सूतिका-गृह में प्रवेश किया और पालने की ओर बढ़ी। उसकी दृष्टि सीधे उस बालक पर पड़ी जो संपूर्ण चराचर जगत् का नियंता था, परन्तु इस समय एक निस्सहाय शिशु के रूप में लेटा हुआ था।
बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून्
यदृच्छया नन्दगृहेऽसदन्तकम् ।
बालं प्रतिच्छन्ननिजोरुतेजसं
ददर्श तल्पेऽग्निमिवाहितं भसि ॥ ७ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
बालकों को मारने वाली वह राक्षसी शिशुओं को खोजती हुई अपनी इच्छा से नन्द बाबा के घर में आ पहुँची। वहाँ उसने शय्या (पालने) पर एक ऐसे बालक को देखा, जो वास्तव में असत् (दुष्टों) का अंत करने वाला साक्षात् काल (अन्तक) था, परन्तु जिसने अपने अनंत तेज को छिपा रखा था। पूतना ने उस बालक को वैसे ही देखा, जैसे राख (भस्म) के भीतर कोई प्रज्वलित अग्नि छिपी हुई हो।
यह श्लोक श्रीमद्भागवत के उत्कृष्ट अलंकारों का प्रमाण है। 'अग्निमिवाहितं भसि' अर्थात् भस्म में छिपी हुई आग। जिस प्रकार राख से ढकी हुई आग ठंडी और निर्दोष प्रतीत होती है, परन्तु स्पर्श करते ही वह जलाकर भस्म कर देती है; उसी प्रकार परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण एक अत्यंत कोमल, छोटे से शिशु के रूप में लेटे थे। उनका वह भोला-भाला रूप अज्ञानियों के लिए केवल एक शिशु था, परन्तु पूतना के अंतर्मन ने यह भाँप लिया था कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि एक प्रचंड ऊर्जा का पुंज है।
४. भगवान का नेत्र मूँदना: एक रहस्यमयी लीला
जैसे ही पूतना ने पालने की ओर हाथ बढ़ाया, सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण ने एक अत्यंत अद्भुत कार्य किया। उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिए।
विबुध्य तां बालक मारिकाग्रहं
चराचरात्मा स निमीलितेक्षणः ।
अनन्तमारोपयदङ्‌कमन्तकं
यथोरगं सुप्तमबुद्धिरज्जुधीः ॥ ८ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
चराचर जगत् के आत्मा भगवान श्रीकृष्ण तुरंत जान गए कि यह बालकों को मारने वाली राक्षसी (पूतना ग्रह) है। उसे पहचानकर प्रभु ने अपने नेत्र बंद कर लिए (निमीलितेक्षणः)। तब पूतना ने उस अनंत परब्रह्म को अपनी गोद में वैसे ही उठा लिया, जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति सोए हुए भयानक साँप को रस्सी समझकर उठा लेता है।
भगवान के नेत्र बंद करने के पीछे आचार्यों ने अनेक अत्यंत भावपूर्ण रहस्य बताए हैं:
१. पाप से घृणा: पूतना बालघातिनी थी। प्रभु ऐसे पापी का मुख नहीं देखना चाहते थे।
२. शिव का ध्यान: पूतना अपने स्तनों पर हलाहल 'कालकूट' विष लगाकर आई थी। विषपान का कार्य देवाधिदेव महादेव का है। अतः श्रीकृष्ण ने नेत्र बंद करके भगवान शिव का स्मरण किया कि "हे भोलेनाथ! अब विष पीने का समय आ गया है।"
३. करुणा का छिपाव: भगवान की दृष्टि में अपार करुणा है। यदि प्रभु आँख खोलकर उस राक्षसी को देख लेते, तो उनकी कृपादृष्टि से वह तुरंत पवित्र हो जाती और उसका वध करना असंभव हो जाता। इसलिए उन्होंने आँखें बंद कर लीं ताकि पहले उसे दंड दे सकें और फिर उस पर कृपा कर सकें।
५. महाकाल का प्रहार: विष और प्राणों का आकर्षण
पूतना ने बालक को गोद में बैठाया और अपना वह स्तन उनके मुख में दे दिया, जिस पर अत्यंत भयानक विष का लेप किया गया था। वह सोच रही थी कि दूध के साथ विष पेट में जाते ही बालक मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। परन्तु वह यह भूल गई कि जिसे वह दूध पिला रही है, वह संपूर्ण ब्रह्माण्डों को अपने उदर में धारण करने वाला महाविष्णु है।
तस्मिन् स्तनं दुर्जरवीर्यमुल्बणं
घोराङ्‌कमादाय शिशोर्ददावथ ।
गाढं कराभ्यां भगवान् प्रपीड्य तत्
प्राणैः समं रोषसमन्वितोऽपिबत् ॥ १० ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
उस भयंकर राक्षसी ने अपने उस स्तन को, जिस पर अत्यंत तीक्ष्ण और न पचने वाला भयंकर विष लगा हुआ था, शिशु के मुख में दे दिया। तब भगवान ने अपने दोनों नन्हें हाथों से उसके उस प्राण-स्थान को कसकर पकड़ लिया और बड़े क्रोध (रोष) के साथ उसके दूध के साथ-साथ उसके प्राणों को भी पीना (खींचना) प्रारंभ कर दिया।
यहाँ 'रोषसमन्वितोऽपिबत्' पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भगवान को क्रोध इस बात पर नहीं था कि वह उन्हें विष पिलाने आई थी; भगवान तो विष को भी अमृत बना लेते हैं। प्रभु का क्रोध इस बात पर था कि इस निर्दयी राक्षसी ने व्रजमंडल और आस-पास के न जाने कितने निरपराध और मासूम बालकों का रक्त पिया था। उन निर्दोष शिशुओं के न्याय के लिए साक्षात् न्यायेश्वर भगवान ने उसके प्राणों का आकर्षण आरंभ कर दिया। नन्हें-नन्हें हाथों की वह पकड़ इतनी वज्र के समान कठोर थी कि पूतना के प्राण कंठ में आ गए।
६. अविद्या का चीत्कार और असली रूप का प्राकट्य
जैसे ही भगवान ने उसके प्राण खींचने शुरू किए, माया का वह सुंदर आवरण छिन्न-भिन्न हो गया। पूतना की नसें फटने लगीं, उसे असहनीय पीड़ा होने लगी और वह अपना रूप बनाए रखने में असमर्थ हो गई।
सा मुञ्च मुञ्चालमिति प्रभाषिणी
निष्पीड्य मानाखिलजीवमर्मणि ।
विवृत्य नेत्रे चरणौ भुजौ मुहुः
प्रस्विन्नगात्रा क्षिपती रुरोद ह ॥ ११ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
जब श्रीकृष्ण ने उसके समस्त प्राणों के मर्मस्थान को कसकर दबा दिया (निचोड़ लिया), तब वह असहनीय पीड़ा से छटपटाती हुई चिल्लाने लगी—"मुञ्च मुञ्च अलम्" अर्थात् "छोड़ दे! छोड़ दे! बस कर!" उसकी आँखें उलटकर बाहर आ गईं, उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया और वह हवा में बार-बार अपने हाथ-पैर पटकती हुई अत्यंत भयानक स्वर में रोने और चीखने लगी।
यह अवस्था दर्शाती है कि जब जीव के हृदय में ईश्वर रूपी सत्य का प्रबल प्रहार होता है, तब अविद्या (अज्ञान) का सुंदर और मोहक मुखौटा टूट जाता है। पूतना की वह चीत्कार इतनी भयंकर थी कि पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिशाएँ काँप उठीं। ब्रजवासियों को लगा कि मानो कानों के पर्दे फट जाएंगे और आकाश से वज्र गिर पड़ा है। इस असहनीय पीड़ा में पूतना का वह मनमोहक स्त्री रूप नष्ट हो गया और वह अपने वास्तविक, वीभत्स राक्षसी रूप में प्रकट हो गई।
७. महाकाय राक्षसी का पतन
अपने प्राणों को बचाने के लिए छटपटाती हुई पूतना ब्रज के आकाश में उड़ी और अंततः प्राणहीन होकर गोकुल के बाहर एक बड़े महावन में जा गिरी।
निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसुः
व्यादाय केशांश्चरणौ भुजावपि ।
प्रसार्य गोष्ठे निजरूपमास्थिता
वज्राहतो वृत्र इवापतन्नृप ॥ १३ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
श्री शुकदेव जी कहते हैं—हे राजन् परीक्षित! इस प्रकार स्तनों में अत्यंत व्यथा (पीड़ा) होने के कारण उस निशाचरी (राक्षसी) के प्राण निकल गए। उसके बाल बिखर गए, उसने अपने दोनों हाथ और पैर फैला दिए और अपने असली भयंकर रूप में आकर वह गोष्ठ (गोकुल) के बाहर वैसे ही धड़ाम से गिर पड़ी, जैसे देवराज इंद्र के वज्र से मारा गया वृत्रासुर पहाड़ के समान धरती पर गिर पड़ा था।
पूतना का शरीर इतना विशाल था कि गिरते समय उसने छह कोस (त्रिगव्यूत्यन्तर) अर्थात् लगभग अठारह मील की दूरी में खड़े सभी पेड़ों, वनस्पतियों और लताओं को कुचलकर चूर-चूर कर दिया। उसका मुख भयानक था, उसके दांत हल के फाल (ईषामात्र) जैसे थे, नाक पर्वत की गुफा जैसी थी और उसके शरीर के अंग सूखे हुए तालाब जैसे गहरे थे। ऐसी भयंकर मृत्यु का दृश्य देखकर सभी गोपों और गोपियों के हृदय काँप उठे। परन्तु जब उन्होंने देखा कि उस महाभयानक राक्षसी के विशाल वक्षस्थल पर नन्हा कन्हैया निर्भय होकर खेल रहा है, तो उनकी जान में जान आई।
८. वात्सल्य और रक्षा-विधान: गो-माता की महिमा
गोपियों ने दौड़कर भगवान को उठाया और अपनी छाती से लगा लिया। यह ब्रज का अनुपम 'वात्सल्य रस' है, जहाँ भगवान का ऐश्वर्य छिप जाता है और भक्त का प्रेम सर्वोपरि हो जाता है। गोपियों को यह ज्ञान ही नहीं रहा कि यह बालक स्वयं ईश्वर है; उन्हें लगा कि किसी भयानक दुष्ट आत्मा का साया उनके लाल पर पड़ गया है। इसलिए उन्होंने वैदिक और पारंपरिक 'रक्षा-विधान' संपन्न किया।
गोमूत्रेण स्नापयित्वा पुनर्गोरजसार्भकम् ।
रक्षां चक्रुश्च शकृता द्वादशाङ्‌गेषु नामभिः ॥ २० ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
गोपियों ने सबसे पहले उस शिशु को गाय के मूत्र (गोमूत्र) से भली-भाँति स्नान कराया। इसके पश्चात् गायों के खुरों से उड़ी हुई पवित्र धूल (गोरज) को बालक के अंगों पर मला। तदनंतर, गाय के गोबर (गोमय/शकृता) को भगवान के ललाट आदि बारह अंगों (द्वादशाङ्‌गेषु) पर लगाया और भगवान विष्णु के विभिन्न नामों (केशव, नारायण, माधव आदि) का उच्चारण करते हुए उनकी रक्षा की (अंग-न्यास किया)।
यह श्लोक सनातन संस्कृति में 'गो-माता' की सर्वोच्च महत्ता को प्रमाणित करता है। अखिल ब्रह्माण्ड के नायक, जिनके नाम-स्मरण मात्र से बड़े-बड़े भय भाग जाते हैं, ब्रज की गोपियाँ उनकी रक्षा के लिए गोमूत्र, गोरज और गोबर का प्रयोग कर रही हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि गाय से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु परम पवित्र है। अज्ञान रूपी पूतना के स्पर्श से जो अशुद्धि आई थी (लौकिक दृष्टि से), उसे दूर करने का सबसे प्रबल माध्यम गोपियों ने गो-माता के गव्य पदार्थों को ही माना। इसके बाद उन्होंने मंत्रों द्वारा 'बीजन्यास' करके बालक को पूरी तरह सुरक्षित किया।
९. चिता से उठी दिव्य सुगंध: परम शुद्धि
उसी समय नन्द बाबा और अन्य गोप मथुरा से कर (टैक्स) चुकाकर लौट आए। मार्ग में पूतना का वह पर्वत-समान मृत शरीर देखकर वे वसुदेव जी की भविष्यवाणी पर आश्चर्य करने लगे। उस विशाल शरीर को हटाने के लिए गोपों ने कुल्हाड़ियों से उसके टुकड़े किए और लकड़ियाँ एकत्र करके उसका दाह-संस्कार किया। इसी समय एक महा-आश्चर्यजनक घटना घटी।
दह्यमानस्य देहस्य धूमश्चागुरुसौरभः ।
उत्थितः कृष्णनिर्भुक्त सपद्याहतपाप्मनः ॥ ३४ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
जब पूतना के उस विशाल शरीर को जलाया जा रहा था, तब उसकी चिता से जो धुआँ उठ रहा था, उसमें मांस जलने की भयंकर दुर्गंध नहीं थी, बल्कि उसमें से 'अगुरु' (अगरवुड) की अत्यंत दिव्य और मनमोहक सुगंध उठ रही थी। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उसका दूध (और प्राण) पी लेने से तत्काल ही (सपद्य) उसके जन्म-जन्मांतर के सारे पाप नष्ट (आहतपाप्मनः) हो चुके थे।
यह श्रीमद्भागवत का एक गूढ़ दार्शनिक रहस्य है। जो वस्तु या व्यक्ति एक बार भगवान के संपर्क में आ जाए, जिसे भगवान स्वयं ग्रहण कर लें (चाहे वह विष ही क्यों न हो), वह परम पवित्र और दिव्य हो जाता है। भगवान 'पतित-पावन' हैं। पूतना का शरीर, जो पापों और हत्याओं की गठरी था, परब्रह्म के श्रीमुख का स्पर्श पाकर चिन्मय हो गया। लौकिक अग्नि उसके भौतिक शरीर को जला रही थी, परन्तु उसका अंतःकरण पहले ही भगवान की कृपानल से शुद्ध होकर सुवासित (सुगंधित) हो चुका था।
१०. अहैतुकी कृपा का चरमोत्कर्ष: सद्गति की प्राप्ति
पूतना वध प्रसंग का यह अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण श्लोक है, जो वैष्णव धर्म के 'कृपा-सिद्धांत' (Doctrine of Grace) की आधारशिला है। शुकदेव जी महाराज यहाँ भाव-विभोर हो जाते हैं और भगवान की उस अपार करुणा का गान करते हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं है।
पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना ।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्‍गतिम् ॥ ३५ ॥
विस्तृत भावार्थ एवं दर्शन:
शुकदेव जी कहते हैं—जो पूतना संपूर्ण लोक के बालकों को मारने वाली (लोकबालघ्नी) थी, जो एक अत्यंत क्रूर राक्षसी थी, जिसका आहार ही निरपराध बच्चों का रक्त पीना (रुधिराशना) था; उस घोर पापिनी ने भी मारने की इच्छा से (जिघांसयापि) ही सही, श्रीहरि (भगवान श्रीकृष्ण) को अपना स्तनपान कराया, तो भगवान ने उसे 'सद्गति' (धात्री गति अर्थात् माता यशोदा के समान परम वैकुण्ठ का पद) प्रदान कर दी!
यही 'अहैतुकी कृपा' है। भगवान ने यह नहीं देखा कि पूतना के भीतर क्या मलिनता है, वह विष लेकर आई है या उसके मन में हत्या का विचार है। भगवान ने केवल यह देखा कि वह रूप कौन सा बनाकर आई है? वह 'माता' का रूप बनाकर आई थी और उसने भगवान को अपनी छाती से लगाया था। कृपानिधान भगवान ने सोचा कि "भले ही यह मुझे मारने आई है, लेकिन इसने कृत्य तो एक माता का किया है, इसलिए इसे दंड के साथ-साथ वही गति मिलनी चाहिए जो मेरी माता यशोदा को प्राप्त होगी।"
इसीलिए उद्धव जी तृतीय स्कन्ध में रुदन करते हुए कहते हैं—"अहो बकी यं स्तनकालकूटं... लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम।" अर्थात्, जो भगवान विष पिलाने वाली राक्षसी को माता का पद दे सकते हैं, ऐसे कृपालु को छोड़कर मैं भला किस अन्य की शरण में जाऊँ?
शुकदेव जी आगे (श्लोक ३६ में) कहते हैं कि जब प्राण लेने आई एक राक्षसी को ऐसी उत्तम गति मिल सकती है, तो उन माताओं, उन भक्तों और उन साधकों का तो कहना ही क्या, जो अत्यंत श्रद्धा, प्रेम और भक्ति के साथ अपने हृदय की सबसे प्रिय वस्तु परमात्मा श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करते हैं! उनका उद्धार तो निश्चित से भी अधिक निश्चित है।
उपसंहार
श्रीमद्भागवत महापुराण का यह 'पूतना मोक्ष' प्रसंग अज्ञान पर ज्ञान की, मृत्यु पर अमरता की, और पाप पर करुणा की परम विजय का आख्यान है। जो कोई भी मनुष्य इस अद्भुत और श्रद्धा से परिपूर्ण लीला का श्रवण, पठन या मनन करता है, उसे भगवान गोविन्द के चरणों में अनन्य रति (प्रेम) प्राप्त होती है। नन्दभवन में अविद्या रूपी पूतना का प्रवेश अवश्य हुआ, परन्तु महाकाल स्वरूप बाल-कृष्ण ने न केवल उसका अंत किया, बल्कि उसे परम पद देकर यह सिद्ध कर दिया कि हरि की शरण में आने वाला कोई भी जीव कभी भी निराश नहीं लौटता।

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